Wednesday, August 21, 2013

' आदर्श मनुष्यों (Ideal Man ) का निर्माण करने वाला संगठन ' [ Ideal and Organisation]

स्वामी विवेकानन्द की योजना के अनुसार गाँव गाँव में आदर्श मनुष्यों (Ideal Man ) का निर्माण करने वाले संगठन (Organization) के नेताओं का निर्माण करने में पाठ-चक्र की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
सामान्य कक्षा में वक्ता और श्रोता के बीच दूरी होती है, इस विशेष कक्षा में प्रश्नोत्तरी के माध्यम से Ideal and Organisation अर्थात स्वामी विवेकानन्द को आदर्श मानकर उनकी शिक्षाओं के अनुरूप आदर्श-मनुष्यों के निर्माण लिये नये पाठ-चक्र की स्थापना कैसे होती है, उसकी जानकारी दी जायेगी। भारत के विभिन्न स्थानों से आये प्रशिक्षणार्थियों, शाखा संचालकों को या जो लोग इस कैम्प में पहली बार आये हैं, यदि उन्हें महामण्डल का उद्देश्य और कार्यक्रम अच्छा लगा हो, और वे अपने गाँव या इलाके में इसकी शाखा खोलना चाहते हों, या किसी पुराने पाठ-चक्र के संचालक को अपने संगठन के संचालन में यदि कोई कठिनाई हो, या कोई प्रश्न हो, तो आप इस विशेष प्रशिक्षण कक्षा में उसको अपनी भाषा में पूछ सकते हैं, यहाँ से उसी भाषा में उसका उत्तर दिया जायेगा।
श्री शंकराचार्य स्वयं निवृत्ति मार्गी या संन्यासी थे;किन्तु उन्होंने अपने गीता भाष्य के आरंभ में ही वैदिक धर्म के दो भेद – प्रवृत्ति और निवृत्ति बतलाए हैं. प्रवृत्ति लक्ष्णो योगः ज्ञानं सन्यासलक्षणम् अर्थात योग का अर्थ प्रवृत्ति–मार्ग और ज्ञान का अर्थ सन्यास या निवृत्ति–मार्ग है।गीता में 'योग शब्द प्रवृत्ति मार्ग अर्थात 'कर्मयोग' के अर्थ ही में प्रयुक्त हुआ है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने निवृत्ति मार्ग के अधिकारीयों के लिये १८९७ में एक संगठन बनाया ' रामकृष्ण मठ और मीशन ' तथा आदर्श-वाक्य दिया 'आत्मनो मोक्षार्थम् जगत् हिताय च' – For one's own salvation and for the welfare of the world ! जिसका मुख्यालय बेलुड़, पश्चिम बंगाल में  है.

यदि सभी मनुष्यों के उपर एक ही मार्ग को -केवल निवृत्ति मार्ग को अपनाने बाध्यता थोप दी जाये तो वैसा करना ठीक नहीं होगा। इसीलिये श्रुति या शास्त्र प्रवृत्ति से होकर निवृत्ति तक आने में बाधा नहीं देते। मनु महाराज कहते हैं- विवाह करो, थोड़ा खा पहन लो; किन्तु यह सदा स्मरण रहे कि -निवृत्तिअस्तु महाफला।  
  
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
     प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला । ।
 मनुस्मृतिः५.५६ । ।
 अर्थ-मांसभक्षण,मद्यपान और मैथुन में दोष नहीं है। मनुष्यों में यह गुण प्रकृति प्रदत्त हैं, किन्तु इनसे निवृत्ति लेना अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि निवृत्ति ही सबसे बड़ा फल है !
चारे में जब मछली फंसती है, तो वह डोर को खींचने लगती है, उस समय डोर को ढील देनी पड़ती है; डोर को ढील देते हुए मछली को थोड़ी देर तक खाने देना पड़ता है, बाद में मछली को खींच लिया जाता है. पहले ही खींचने से डोरी टूट जाएगी। इसीलिये श्रीरामकृष्ण जिस व्यक्ति में भोग-वासना अधिक देखते थे, उन्हें थोड़ा भोग कर लेने के लिये कहते थे, किन्तु अन्त में यह भी जोड़ देते थे -" लेकिन यह जान लेना कि इसमें कुछ रखा नहीं है ! " श्रुति भगवती बहुत दयालु है, यदि किसी को पुत्र की कामना हो, तो उसके लिये पुत्रेष्टि-यज्ञ का विधान दिया है. यहाँ तक कि शत्रू-नाश, अन्न वृद्धि आदि के लिये भी यज्ञ का करने का विधान है. ऐसा करके शास्त्र हमें असत कर्म करने लिये प्रोत्साहित नहीं करते, इसप्रकार उसके भोग-प्रवण मन को क्रमशः शास्त्रोमुखी बनाने की ही चेष्टा करते हैं.
इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -' जब तक सम्पूर्ण जगत यह नहीं जान लेता कि वह और ईश्वर एक है, तब तक मैं हर जगह के मनुष्यों को अनुप्रेरित करता ही रहूँगा ' " It may be that I shall find it good to get outside of my body -- to cast it off like a disused garment. But I shall not cease to work! I shall inspire men everywhere, until the world shall know that it is one with God !
 अपने इसी वचन को प्रमाणित करते हुए, हम जैसे गृहस्थ या प्रवृत्ति मार्गी पुरुषों या कर्म -योगियों के लिये उनकी ही प्रेरणा से १९६७ ई० में ' अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' नामक संगठन की स्थापना हुई। जिसका आदर्श वाक्य है ' Be and Make ' और नारा है ' चरैवेति चरैवेति ' -अर्थात आगे बढ़ो, आगे बढ़ो! इसका मुख्यालय ' भुवन-भवन ' पो० बलराम धर्म सोपान,  खरदा,उत्तर २४ परगना, ७००११६, पश्चिम बंगाल में है. इस समय भारत के विभिन्न राज्यों में इसके ३१५ से अधिक केन्द्र क्रियाशील हैं, और निरन्तर इसकी शाखायें हिन्दी भाषी प्रदेशों में भी खुलती जा रही हैं.  उसी प्रकार निवृत्ति मार्गी स्त्रियों के लिये भी एक मठ दक्षिणेश्वर में है, और प्रवृत्ति मार्गी स्त्रियों के लिये महामण्डल की सहयोगी संस्था (Sister concern )  के रूप /में ' सारदा नारी संगठन ' भी कार्यरत है. यदि भारत में महामण्डल की स्थापना नहीं हुई होती तो हम जैसे अधिकांश गृहस्थ आदर्श के अभाव में शास्त्रोक्त धर्म को छोड़ देते (और 'चार-धाम की यात्रा से मोक्ष मिलता है' -सोचकर उत्तराखण्ड में बादल फटने से मोक्ष को प्राप्त हो गये होते।)  
महामण्डल द्वारा संचालित पाठचक्र का उद्देश्य ' Ideal Man ' आदर्श-मानव का निर्माण करना है। 'one-sided man ' एक पक्षीय मनुष्य को ' Ideal Man ' में या 'man with capital M' में रूपान्तरित करना है। विश्व की जनसंख्या ६ अरब है, किन्तु उनमें मनुष्यत्व का उन्मेष नहीं हुआ है; इसीलिये आम तौर से विश्व भर में humanity या मानवता का घोर आभाव दिखाई दे रहा है। किन्तु जो अभिभावक या नेता ' तुम तो ऐसे सुधरोगे नहीं !' जैसी टीका-टिप्पणी करके मनुष्य निर्माण करना कहते हैं, वे नहीं जानते कि प्रत्येक मनुष्य का शरीर भगवान मन्दिर है ! इसीलिये किसी के चरित्र में दुर्बलता दिखे, या कमजोरी दिखे तब भी कहीये नहीं ! उसका उत्साह नहीं बढ़ायेंगे तो वह लड़ लेगा और संगठन को नुकसान पहुंचेगा। यदि किसी को वातावरण या कुसंग के प्रभाव से अनजाने ही पीने वालों की संगती हो गयी हो, तो उससे भी मीठा रहिये- महामण्डल सदस्य को दवा छोड़ कर ' अंगूर ' का जूस या जिस किसी पेय में अल्कोहल हो, उसे हाथ भी नहीं लगाना चाहिये;  अंगूर का रस छोड़ कर बाकी सब फल का रस पी सकते हो, ऐसे समझाना चाहिये। हमारे जीवन का लक्ष्य और संकल्प होना चाहिये -चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण !
भावी संचालकों (नेताओं) को सबसे पहले अपने गाँव के किसी स्कूल में या सुविधाजनक स्थान में, या किसी मैदान में पेड़ के नीचे जहाँ तरुण और युवा लोग शाम को एकत्र होते हैं, वहाँ पहुंचकर उनसे कहें, आओ हमलोग अपने गाँव में भी स्वामी विवेकानन्द के विचारों तथा जीवन गठन के भावों को तथा नया भारत गढ़ने की उनकी योजना को कार्यरूप देने के लिये एक साप्ताहिक पाठ चक्र का शुभारम्भ करें ! उनको स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र को आह्वान, विवेकानन्द संक्षिप्त जीवनी, शक्तिदायी विचार, महामण्डल द्वारा प्रकाशित कुछ पुस्तिकाओं यथा- 'जीवन-गठन ' 'मनः संयोग', 'चरित्र के गुण', 'चरित्र-निर्माण कैसे करें', 'एक युवा आन्दोलन' आदि  को उन्हें दिखलाते हुए, उन्हें अपनी भाषा में सामूहिक रूप से पढ़कर, उस पर चर्चा करके उन्हें अनुप्रेरित करें कि इन अच्छे विचारों को अपनाने से हमारा, हमारे परिवार, समाज और देश का बहुत भला हो सकता है. आरम्भ में विवेकानन्द साहित्य के मोटे वोल्यूम को सामूहिक रूप में पढ़ना ठीक नहीं होगा, कोई सदस्य चाहे तो अलग से अपने घर में पढ़ सकता है.
 महामण्डल एक त्री -आयामी संगठन है, जिसके अन्तर्गत सर्वप्रथम " विवेकानन्द युवा पाठचक्र " की स्थापना की जाती है. सभी सदस्यों को सबसे पहले (महामण्डल PC ) पाठचक्र के उद्देश्य के विषय में स्पष्ट अवधारणा होनी चाहिये, इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि इसका सार, मौलिक कार्य क्या है ? हमें आदर्श मनुष्य बनना है, एक आयामी मनुष्य से त्री-आयामी मनुष्य बनना है , one sided man नहीं रहना है. इसके लिये अपने किसी ऐसे ही आदर्श के साँचे में अपने जीवन को ढाल कर अपना जीवन गढ़ लेना पड़ता है. उसके लिये ५ कार्य प्रार्थना, मनःसंयोग, संकल्प-ग्रहण सूत्र आदि का अभ्यास प्रतिदिन करना है. (व्रत तो आप लोग रहते होंगे ? १७ अगस्त को एकादसी है, कठोर तप करें कृपा बरसेगी,आप अनुभव करेंगे।)  इन्हें करने से क्या लाभ होगा ? विवेक-प्रयोग ही स्वाभाव बन जायेगा, दृढ़ संकल्प और प्रचण्ड इच्छा शक्ति की सहायता मन वशीभूत हो जायेगा, हमारे द्वारा केवल सद्कर्म ही होंगे, उससे सद्प्रवृत्ति बन जाएगी, और सद्चरित्र गठित हो जायेगा।
जब आपके इलाके के कुछ प्रबुद्ध निवासी आपके इस शुभ संकल्प को देखकर अनुप्रेरित हो जाएँ, तो सबसे पहले अपने गाँव या शहर का नाम आगे लिखकर पाठ चक्र स्थापित करें ' ग्राम का नाम' विवेकानन्द युवा पाठचक्र " के नाम से नया पाठचक्र अपने गाँव या शहर में स्थापित कर सकते हैं. पूरी निष्ठा के साथ और नियमित रूप से विवेकानन्द को पढ़ें, विवेक-जीवन या विवेक-अंजन पढ़ें, केंद्र के साथ नियमित सम्पर्क में रहिये.  फिर उसके अनुमोदन हेतु रजिस्टर्ड ऑफिस -' भुवन-भवन ' के सम्पर्क में रहते हुए मासिक रिपोर्ट भेजते रहें। कुछ महीनों तक कार्य करने के बाद, 'भुवन-भवन ' के परामर्श के अनुसार एक दिवसीय शिविर का आयोजन कर लेते हैं, तो आपके केन्द्र को ' युवा महामण्डल ' का नाम व्यवहार करने की अनुमति दी जा सकती है. यह प्रयास तभी करें जब आपको यह विश्वास हो जाये कि यह संगठन अब कभी बन्द नहीं हो सकता है. युवा महामण्डल का स्थायी-प्रतिनिधि के निर्देशानुसार महामण्डल संचालन समिति का गठन करने के बाद, समिति का अनुमोदन केन्द्रीय संस्था से करवा केन चाहिये। यह अनुमति मिल जाने के बाद आप अपने लेटर पैड  पर महामण्डल का 
 ' monogram'  या नाम-चिन्ह  का व्यवहार कर सकते हैं; और दो, दो, महीने पर रिपोर्ट भेज सकते हैं.
फिर जब त्रि-दिवसीय शिविर का आयोजन कर लेते हैं, या समीति को ऐसा लगे कि इस केन्द्र के पास महामण्डल-ध्वज,बिगुल,शिविर में प्रातः काल बजने वाला दादा का गाया चैंटिंग CD भी होना चाहिये तो, किसी पुराने केन्द्र से जानकारी प्राप्त करके केन्द्र से सम्बद्ध करने का आवेदन फॉर्म प्राप्त कर लें,और उसे भर कर मुख्यालय  भेज दें. संबंधन अनुमति (affiliation) मिल जाने बाद ही, और अब आप ३ महीने पर रिपोर्ट भेज सकते हैं. इसके पीछे कारण यही है, कि जब पौधा छोटा होता है, तो उसको अधिक नजदीक से देख-भाल करनी पड़ती है.
अतः पाठ-चक्र से भी महामण्डल का उतना ही घनिष्ट सम्बन्ध है, जितना किसी संबंधन प्राप्त केन्द्र का. क्या आपको स्वामी विवेकानन्द की मनुष्य निर्माण-कारी शिक्षा-पद्धति में पूर्ण आस्था है, क्या आप केवल स्वामी विवेकानन्द को ही अपना आदर्श स्वीकार करते हैं ? क्या आप यह स्वीकार करते हैं कि स्वामीजी ही हमारे मार्गदर्शक नेता हैं ? (मूर्ति माने बिन, सगुन को जाने बिन ? जइयो कहाँ ऐ हुजूर ? समस्त साधना ही व्यर्थ है! धर्म हमेशा 'अवतार' का, 'सगुण-साकार' का समर्थक होता है) यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है, तो आप के इकाई का नाम पाठ चक्र हो या महामण्डल आप हमारे लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं ! महामण्डल अपने पाठ चक्र और प्रशिक्षण-शिविर आदि के माध्यम से -ज्ञान,कर्म,भक्ति और राजयोग -चारों मार्गों का समन्वयव करके आदर्श मनुष्यों का निर्माण करने का प्रयास करता है.हम कौन हैं ? जीवन क्या है ? जीवन का उद्देश्य क्या है ? पाठ चक्र में इसी प्रकार ज्ञान-योग के द्वारा चिन्तन-मनन किया जाता है . पाठ चक्र में जिस पुस्तिका से पाठ चल रहा है, उसके खत्म हो जाने के बाद ही, दूसरी को लेना चाहिए।
प्रत्येक केन्द्र में पाठ चक्र शुरू होने के पहले, एक हस्ताक्षर-पंजी पर हस्ताक्षर और ५ कार्यों का साप्ताहिक आत्ममुल्यांकन करने के बाद , हिन्दी में महामण्डल द्वारा हिन्दी प्रकाशित स्वदेश-मन्त्र और संघ-मन्त्र संस्कृत और हिन्दी अनुमोदित धुन के अनुसार पाठ करना चाहिये। पाठचक्र की अवधि १.३० घन्टे से २ घन्टे तक हो सकती है, आधा घन्टा तो प्रार्थना और स्वदेश-मन्त्र में चला जाता है, किन्तु २ घन्टे से अधिक समय तक पाठ चक्र न होना ही अच्छा है. उतना ही खाओ, जितना पच सके. 
अखिल भारत विवेकानन्द तो समझा लेकिन ' महामण्डल '-का क्या अर्थ है ? एक वृहत वृत में भारत के मानचित्र के दक्षिणी प्रान्त पर स्वामीजी परिव्राजक के वेश-भूषा में खड़े हैं.इसका तात्पर्य है कि महामण्डल किसी खास जाति या धर्म के लोगों का संगठन नहीं है, जो भी मनुष्य भारतमाता को जीवन्त मूर्ति समझकर, इसके समस्त सन्तानों को अपने ह्रदय से प्रेम करते हों वे इसके सदस्य बन सकते हैं. १८८७ में उन्होंने संन्यास लिया था, १८९० से अगस्त १८९३ तक परिव्राजक जीवन था, इसीलिये हाथ में लाठी थी. किनारे किनारे वज्र का प्रतीक है, नीचे ' Be and Make ' लिखा है, उपर में 'चरैवेति चरैवेति ' लिखा है. भारत की सम्पूर्ण जनसंख्या को देश-भक्ति के रंग में रंग देंगे, चरित्र-निर्माण आन्दोलन देश के हर गाँव में पहुँचा देंगे इसी संकल्प के साथ हमें भी स्वामीजी के पीछे पीछे चलते जाना है!
उनके गुरु ने अपने शिष्य नरेन्द्रनाथ के उपर सम्पूर्ण जगत में उस 'शिक्षा'  का प्रचार-प्रसार करने का उत्तरदायित्व सौंपा था जिसे वेदों में, 'श' के साथ 'ई' की मात्रा लगा कर "शीक्षा" कहा जाता है। (तैत्तरीय उपनिषद की 'शीक्षा-वल्ली ' देखें वहाँ शिक्षा को 'शीक्षा' लिखा गया है ) जो शिक्षा मनुष्य को पैगम्बर या मानवजाति के सच्चे 'नेता' में परिणत कर दे उसी को 'शीक्षा' कहते हैं। इसीलिये 'अनपढ़ ठाकुर' ने स्लेट पर लिखा था- " नरेन् शिक्षा देगा ! " और उसी 'शीक्षा'  को प्राप्त करके भारतवासी मानवजाति के पथप्रदर्शक या सच्चे नेता बनेंगे।
 
 और तब हमारी भारतमाता अपने "जगद्गुरू" के गौरवशाली सिंहासन पर फिर से विराजमान हो जाएगी। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द भारत के युवाओं का आह्वान करते है-
 'चरैवेति चरैवेति!' आगे बढ़ो ! आगे बढ़ो !  
देखो यह अवसर कहीं बीत न जाये। वे हमे सचेत करते हुए कहते हैं- " समय तीव्र गति से व्यतीत होता जा रहा है, किन्तु अपने आमोद पूर्ण जीवन से सन्तुष्ट, अपने सुन्दर प्रसादों में मनोरम वस्त्राभूषणों से विभूषित, अनेकविध भोज्य  पदार्थों से तुष्ट; हे मोहनिद्रा में अभिभूत नर-नारियों! ..जगत के इस महा सत्य पर विचार करो, संसार में चारो ओर दुःख ही दुःख है।देखो,संसार में पदार्पण करता हुआ शिशु भी वेदनापूर्ण रुदन करने लगता है। यह एक हृदयविदारक सत्य है।  
कभी कभी इन उपदेशों को भूलकर मैं मोह से अभिभूत हो जाता हूँ। तब इस स्थिति में हठात तथागत बुद्ध का सन्देश मुझे सुनाई पड़ता है-'सावधान ! संसार के सकल पदार्थ नश्वर हैं। संसार दुःखमय है। 
" सर्वं दुःखम् अनित्यम् ध्रुवम् "
तभी मेरे कानों में ईसा की घोषणा गूंजने लगती है-
"प्रस्तुत रहो ! (अर्थात मन को एकाग्र करने का अभ्यास करो !), स्वर्गराज्य अत्यन्त समीप है !"

स्वामी विवेकानन्द ने एक बार ऐसा कहा था, कि  "श्रीरामकृष्ण के आविर्भूत होने के साथ ही साथ, सत्ययुग का प्रारंभ हो गया है।" उनके इस कथन का तात्पर्य क्या है ? सत्ययुग कहने से हमलोगों को क्या समझना चाहिये? क्या यही कि - श्रीरामकृष्ण आये, और जितनी भी अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अपवित्रता मैलापन आदि भाव समाज में थे, वे सभी समाप्त हो गये-सब कुछ सुन्दर हो गया और मनुष्य सत्य के पुजारी बन गये !  किन्तु हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि युगपरिवर्तन मनुष्यों के विचार-जगत में होता है, 

कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः । उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् । 

चरैवेति चरैवेति॥
 -सोये रहने का नाम है कलिकाल में रहना, जब नींद टूट गयी तो द्वापर में रहना कहेंगे, जब उठ कर खड़े हो गये तब जीवन में त्रेता युग चलने लगता है; फिर जब चलना शुरू कर दिये, तब उसे सत्ययुग में रहना कहते हैं। इसलिये सत्ययुग का लक्ष्ण है, निरन्तर आगे बढ़ना-"चरैवेति चरैवेति।"    जो मनुष्य (मोहनिद्रा में ) सोया रहता है और पुरुषार्थ नहीं करता उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है,  जो पुरुषार्थ करने के लिये खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है. जो आगे बढ़ता जाता है, उसका भाग्य भी आगे बढ़ता जाता है, इसीलिये- 
" हे मनुष्यों- चरैवेति चरैवेति ! आगे बढो, आगे बढो ! "

सोये रहने का तात्पर्य है, जो मनुष्य सोया हुआ है- "कलिः शयानो भवति" वह अभी ' कलिकाल में वास 'कर रहा है, और स्वामीजी की ललकार -  सुनने से जिसकी मोहनिद्रा भंग हो गयी है, " संजिहानस्तु द्वापरः" वह द्वापर युग में वास कर रहा है. 

" उत्तिष्ठ्म स्त्र्रेता भवति |"

- जो व्यक्ति (पुरुषार्थ करने के लिये ) उठ कर के खड़ा हो जाता है- अर्थात मनुष्य बन जाने के लिये, अपना चरित्र-निर्माण करने के लिये कमर कस कर उठ खड़ा होता है, वह त्रेता युग में वास कर रहा है, 

" कृतं संपद्यते चरन् । "

और अपनी मंजिल की ओर जिसने चलना शुरू कर दिया है,अर्थात जो व्यक्ति मनुष्य बन जाने के लिये तप करना (मन को एकाग्र करने का अभ्यास ) शुरू कर दिया है, वह मानो सत्य युग में वास कर रहा होता है।
 महामण्डल-ध्वज में वज्र का सम्पूर्ण चित्र अंकित है, इसके ' गुम्फाक्षर '(monogram) में उसका केवल प्रतीक अंकित है. यह वज्र ही देवासुर संग्राम में वृत्तासुर को मारने वाला अस्त्र है। 


योऽध्रुवेणात्मना नाथा न धर्म न यशः पुमान् ।
ईहेत भूतदयया स शोच्यः स्थावरैरपि ॥

( श्रीमद्भा० ६।१०।८ )
' जो पुरुष नाशवान् शरीरके द्वारा समर्थ होकर भी प्राणियोंपर दया करके धर्म या यश प्राप्त करनेकी इच्छा, चेष्टा, प्रयत्न नहीं करता, वह तो स्थावर वृक्ष - पर्वतादिके द्वारा भी शोचनीय है; क्योंकि वृक्ष - पर्वतादि भी अपने शरीरके द्वारा प्राणियोंकी सेवा करते हैं ।'
देवराज इन्द्र ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि ' जो कोई अश्विनीकुमारोंको ब्रह्माविद्याका उपदेश करेगा, उसका मस्तक मैं वज्रसे काट डालूँगा ।' वैद्य होनेके कारण अश्विनीकुमारोंको देवराज हीन मानते थे । अश्विनीकुमारोंने महर्षि दधीचिसे ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेकी प्रार्थना की । एक जिज्ञासु अधिकारी प्रार्थना करे तो उसे किसी भय या लोभवश उपदेश न देना धर्म नहीं है । महर्षिने उपदेश देना स्वीकार कर लिया । अश्विनीकुमारोने ऋषिका मस्तक काटकर औषधद्वारा सुरक्षित करके अलग रख दिखा और उनके सिरपर घोड़ेका मस्तक लगा दिया । इसी घोड़ेके मस्तकसे उन्होंने ब्रह्माविद्याका उपदेश किया । इन्द्रने वज्रसे जब ऋषिका वह मस्तक काट दिया, तब अश्विनीकुमारोंने उनका पहला सिर उनके धड़से लगाकर उन्हें जीवित कर दिया । इस प्रकार ब्रह्मपुत्र अथवां ऋषिके पुत्र ये दधीचिजी घोड़ेका सिर लगनेसे अश्वशिरा भी कहे जाते हैं ।
जब त्वष्टाके अग्नि - कुण्डसे उत्पन्न होकर वृत्रासुरने इन्द्रके स्वर्गपर अधिकार कर लिया और देवताओंने अपने जिन अस्त्रोंसे उसपर आघात किया, उन अस्त्र - शस्त्रोंको भी वह असुर निगल गया, तब निरस्त्र देवता बहुत डरे । कोई और उपाय न देखकर देवता ब्रह्माजीकी शरणमें गये । ब्रह्माजीने भगवानकी स्तुति की । भगवानने प्रकट होकर दर्शन दिया और बताया - कि यह युद्ध तो अच्छाई और बुराई के बीच चलने वाला युद्ध है, जब कोई व्यक्ति लोक-कल्याण की इच्छा से जीवित अवस्था में अपनी हड्डियों का दान कर देगा, और उससे जो वज्र बनेगा, उसी से असुर मरेगा। ' महर्षि दधीचिकी हड्डियाँ उग्र तपस्याके प्रभावसे दृढ़ तथा तेजस्विनी हो गयी हैं । उन हड्डियोंसे वज्र बने, तभी इन्द्र उस वज्रसे वृत्रको मार सकते हैं । महर्षि दधीचि मेरे आश्रित हैं, अतः उन्हें बलपूर्वक कोई मार नहीं सकता । तुमलोग उनसे जाकर याचना करो । माँगनेपर वे तुम्हें अपना शरीर दे देगे ।'
देवता साभ्रमती तथा चन्द्रभागाके सङ्गमपर दधीचिऋषिके आश्रममें गये । उन्होंने नाना प्रकारसे स्तुति करके ऋषिको सन्तुष्ट किया और उनसे उनकी हड्डियाँ माँगीं ।
 महर्षिने कहा कि उनकी इच्छा तीर्थयात्राचा करनेकी थी । इन्द्रने नैमिषारण्यमें सब तीर्थोका आवाहन किया । वहाँ स्त्रान करके दधीचिजी आसन लगाकर बैठ गये । जिस इन्द्रने उनका सिर काटना चाहा था, उन्हीके लिये ऋषिने अपनी हड्डियाँ देनेमें भी सक्कोच नहीं किया ! शरीरसे उन्हें तानिक भी आसक्ति नहीं थी । एक - न - एक दिन तो शरीर छूटेगा ही । यह नश्चर देह किसीके भी उपयोगमें आ जाय, इससे बड़ा और कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता । महर्षिने अपना चित्त भगवानमें लगा दिया । मन तथा प्राणोंको हदयमें लीन करके वे शरीरसे ऊपर उठ गये । जङ्गली गायोंने अपनी खुरदरी जीमोंसे महर्षिके शरीरको चाट - चाटकर चमड़ा, मांसादि अलग कर दिया । इन्द्रने ऋषिकी हड्डी ले ली । उसी हड्डीसे विश्वकर्माने वज्र बनाया और उस वज्रसे इन्द्रने वृत्रको मारा । इस प्रकार एक तपस्वी दधिची के अनुपम त्यागसे इन्द्रकी, देवलोककी वृत्रासुर से रक्षा हुई ।
वज्र अच्छाई की संगठित-शक्ति का प्रतिक है, जिसके द्वारा बुराइयों को जीता जा सकता है. भगिनी निवेदिता ने -गेरुआ पर वज्र के निशान वाले पताका को  स्वाधीन-भारत का राष्ट्रीय-ध्वज बनाने का प्रस्ताव दिया था, किन्तु हमारे छद्म-धर्मनिर्पेक्ष राजनितिक नेताओं ने उनके द्वारा निर्मित पताका को 'भगवा-पताका ' की संज्ञा देकर अस्वीकार कर दिया. उसी ध्वज को महामण्डल-ध्वज के रूप में चुन लिया गया है।
मासिक रिपोर्ट में किन बातों का उल्लेख करना है ? अभी क्या पढ़ा जा रहा है, कितना अटेंडेंस कितना होता है ? सभी सदस्य विवेक-प्रयोग, प्रेम प्रयोग, आदि ५ कार्य करते हैं या नहीं ? यदि करते हैं तो उसका फल क्या हो रहा है ? यदि अब भी लेट आता है, तो क्या कारण है ? जो टी.वि सिनेमा के कारण लेट आता हो,वह महामण्डल कर्मी नहीं हो सकता। मुख्य कार्य आत्मविकास करके Ideal Man  में रूपान्तरित हो जाना है.इस कार्य में फल कितना मिल रहा है ? प्रतिमाह महामण्डल सचिव को इ-मेल से जानकारी देना चाहिये,एवं शिविर अथवा जयन्ती आयोजित करनी हो तो, सारे कार्यक्रम की जानकारी - जैसे ध्वजा रोहन कैसे व्यक्ति से करवानी चाहिए ? मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि बनने का निमंत्रण किन लोगों को भेजना उचित है; इन सब विषयों पर महामण्डल की केन्द्रीय समीति से दिशानिर्देश पहले प्राप्त कर लेना चाहिये।
किसी भी आयोजन के लिये केन्द्र से मार्गदर्शन प्राप्त करना क्यों अनिवार्य है?  क्योंकि साधारण तौर से जो लोग केवल अख़बारों में अपना नाम छपवाने के लिये महापुरुषों (तुलसीदास, कबीरदास, मुंशी प्रेमचन्द, राम-हनुमान, रानीसती दादी, खाटूवाले श्यामबाबा या स्वामी विवेकानन्द की 'सार्धशती  या जयन्ती ' )  आदि मनाते हैं, वे स्वयं को जनाने के उद्देश्य से ही यह सब आयोजन करते हैं, उन्हें उनकी चरित्र-निर्माणकारी शिक्षाओं से कुछ लेना-देना नहीं होता। किन्तु महामण्डल सम्पूर्ण भारत को अपना परिवार मानता है, इसीलिये बच्चों में क्या संस्कार डाले, कैसे डालें इस शिक्षा को गाँव-गाँव तक या प्रत्येक परिवार में पहुंचा देना ही पाठचक्र का उद्देश्य है.अतः अपना सुन्दर जीवन गठन करने के साथ साथ (simultaneously), महामण्डल के नेताओं को ' ब्रह्म', 'परमात्मा' और 'भगवान' का अर्थ समझ लेने के बाद, सारे संकोच त्याग कर, उच्च स्वर से घोषणा करनी होगी कि - " इस युग के आदर्श स्वामी विवेकानन्द हैं, तथा इस युग के भगवान श्रीरामकृष्ण हैं! " जब तक भारतवर्ष इस आदर्श को स्वीकार नहीं कर लेता,तब तक - मुर्दा-घाट (जैसे राज-घाट आदि) पर विदेशियों से माला-फूल चढ़वा कर,नकली महात्मा और नकली भगवानों की पूजा करते रहने से चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण नहीं हो सकता, और भारत एक भ्रष्टाचार-मुक्त महान देश भी नहीं बन सकता. अतः इस युग में टी.वी. पर चलने वाला भागवत-रामायण का कथा वाचन यदि वयोवृद्ध लोग सुनते हों तो सुने; किन्तु युवाओं को स्वामी विवेकानन्द के सन्देश -Be and Make से परिचित कराना सभी देशभक्त सन्तों का परम कर्तव्य होना चाहिये ! मन को वश में करने की दवा -अभ्यास और वैराग्य ही है, किन्तु वैराग्य का नाम सुनने से मुँह का स्वाद कड़वा हो जाता है, इस लिये ह्लोग उसको लालच कम करना कह सकते हैं,क्योंकि यदि कड़वी दवा हो, तो शहद मिलाकर दो लेकिन पिलाओ जरुर।
जो युवा नेता गाँव गाँव में स्वामी विवेकानन्द की योजना के अनुसार आदर्श मनुष्यों (Ideal Man ) का निर्माण करने वाले नेताओं का निर्माण करने वाले संगठन (Organization) की स्थापना करने में अगुवा बनना चाहते हैं, उनको पहले यह समझना होगा कि आदर्श मनुष्य कैसा होता है ? वैसे मनुष्य कैसे तैयार किये जाते हैं? 
मनुष्य के तीनों अवयव-'3H ' में fully developed मनुष्य-निर्माण का कार्य प्रतिमा गढ़ने जैसा कलाकारी का कार्य है! जो शिल्पकार को मूर्ति गढ़ना जानते हैं, उनके पास लकड़ी, बाँस, पुआल, मिट्टी आदि जमा कर दिया जाय तो वह सुन्दर मूर्ति गढ़ लेता है. जीवन गढ़ना भी ठीक उसी प्रकार का कार्य है.इसकी शुरुआत पहले स्वयं को चरित्रवान मनुष्य के रूप में गढने से होनी चाहिये। आदर्श मनुष्य का निर्माण कैसे होता है, इसको समझने और समझाने के लिये ' जीवन गठन ' पुस्तिका से PC का प्रारम्भ करना अच्छा होगा। 
स्वामी विवेकानन्द ने भारत के भावी नेताओं के निर्माण का जो मानदण्ड रखा है, उसके अनुसार - " आदर्श मनुष्य का मन-मस्तिष्क शंकर के जैसा मेधा-सम्पन्न होगा, ह्रदय बुद्ध के जैसा विशाल होगा, जो एक मेमने की रक्षा के लिये भी अपने प्राणों को न्योछावर करने के को तत्पर रहेगा। और उसका शरीर इतना सुगठित होगा कि वह अथक परिश्रम करने से कभी थकेगा नहीं।" ऐसा ही आदर्श मनुष्य ' बनना और बनाना ' महामण्डल के नेताओं उद्देश्य है.  जीवन को परिभाषित करते हुए स्वामीजी ने कहा है-" Life is unfoldment and development of a being (प्राणी ) under the circumference tending to press it down." अर्थात एक अन्तर्निहित शक्ति (पूर्णता) अपने को अभिव्यक्त करना चाह रही है, और वाह्य परिवेश तथा परिस्थितियाँ उसको दबाये रखना चाहती हैं, परिस्थिति और परिवेश के दबाव को हटाकर पूर्ण विकसित हो जाना जीवन है! किन्तु मन को नियंत्रित करने का कौशल सीखे बिना, इन्द्रियाँ और विषय-भोग हमें पशु जैसा जीवन जीने को विवश किये रहते हैं। इसीलिये हमारे शास्त्रों में ज्ञान प्राप्ति का उपाय बताया गया है -श्रवण, मनन और निदिध्यासन! क्योंकि जो कुछ हमने सुना है, जब तक उसका अर्थ हमारी बुद्धि के सामने स्पष्ट नहीं होता, तब तक उस विषय की धारणा नहीं हो पाती है.
 3H का विकास अर्थात ' Head-Hand-Heart ' का विकास - मेधा या बुद्धि का अधिष्ठान मस्तिष्क में है, प्रेम और सहनुभूति का अधिष्ठान ह्रदय में होता हा, आदर्श मनुष्य केवल एक या दो पहलुओं में ही विकसित नहीं होता, उसके तीनों पहलु सुसमन्वित रूप में विकसित होते हैं. यदि हममें कर्म करने की शक्ति तो रहे, किन्तु बुद्धि न हो तो हमें 'एक पक्षीय ' मनुष्य कहा जायेगा। या बुद्धि भी रहे, किन्तु ह्रदय का विकास नहीं हुआ हो, हमारा ह्रदय यदि आत्मकेन्द्रित हो, तो दूसरों के सुख-दुःख को देखकर मेरा ह्रदय द्रवित नहीं होगा। इस प्रकार हम आदर्श मनुष्य 'Ideal Man ' न बनकर One sided man ही बने रहेंगे। आदर्श मनुष्य बनने के लिये ' 3H development process ' या 3H विकास की पद्धति का अनुसरण करना होगा।  
मनुष्य का पहला ' H ' (Hand) या प्रमुख अवयव शरीर है इसकी शक्ति का विकास कैसे होगा ?- इसका उपाय स्वामी विवेकानन्द ने बताया है। दैहिक(Hand) शक्ति को बढ़ाने का उपाय है, व्यायाम और पौष्टिक आहार। इसका नियमित अभ्यास करने से दुर्बल भी बलवान हो जायेगा, सारा दिन काम करने से भी उसको थकावट नहीं होगी। अंग-प्रत्यंग में फुर्ती बनी रहेगी, इसका कारण बिल्कुल वैज्ञानिक है- जिस अंग का हमलोग अधिक व्यवहार करते हैं, वो अंग अधिक मजबूत होजाता है. शरीर को रूप-आकार हमलोग नहीं देते हैं, वह प्रकृति के नियमानुसार जन्म लेता है, फिर स्वतः उसमें विकास होता है. व्यायाम और पौष्टिक आहार के द्वारा शरीर को सबल और स्वस्थ रखना आवश्यक है, क्योंकि तभी हमलोग स्वामीजी के कार्य को करने में सक्षम हो सकेंगे।
दूसरा ' H '(Head) या मन है : किन्तु मन तो सूक्ष्म वस्तु है, उसे बाहर से देखा नहीं जा सकता, फिर की शक्ति बढ़ाने के लिये मन का व्यायाम कैसे करेंगे ? मन का अस्तित्व है, उसके कार्यों को देखने से इतना तो समझ में तो आता है;  किन्तु उसको यदि अपनी आवश्यकता अनुसार जब और जहाँ चाहें लगाने और हटा लेने का अभ्यास नहीं करेंगे तो उसकी शक्ति का विकास नहीं होगा। जैसे किसी बच्चे को सदैव गोदी में ही रखे रहें, तो वह बलवान नहीं बन पाता है; इसका सिद्धान्त यही है कि जिस किसी अवयव का व्यवहार कम होगा, या बिल्कुल नहीं होगा वह organ दुर्बल हो जाता है. मन का व्यायाम है- कारण और कार्य के उपर चिन्तन करना। कार्य स्थूल है, वह सबको दीखता है, पर उसके पीछे उसका कारण क्या है ? मन को विकसित करने के लिये पहले यह समझना पड़ेगा कि यह जीवन क्या है ? कहाँ से आया है ?
इसे जानने के लिये जीवन के उपर ही चिन्तन-मनन करना पड़ता है. जैसे देश में हर स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है, यह तो हर किसी को दीखता है, प्रधानमन्त्री कार्यालय से भी कोयला घोटाले की फाइलें गायब हो जाती है; किन्तु उसका कारण क्या है ? यह किसी भी दल के नेता को नहीं दीखता।इसका कारण है, देश के हर स्तर पर चरित्रवान मनुष्यों का आभाव। जब हमलोग यह समझ लेंगे कि चरित्र का आभाव ही समस्त समस्याओं का कारण है, तो हम चरित्र-निर्माण की शिक्षा को पूरे जोर-शोर से फ़ैलाने में क्यों नहीं लगेंगे ? जैसे विशाल बरगद के वृक्ष का कारण उसका बहुत छोटा सा बीज होता है, उसी प्रकार भ्रष्टाचार का कारण चरित्र का आभाव ही तो है, यदि हम एक दूसरे को कोसना छोड़ कर चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण - ' बनो और बनाओ ' (Be and Make) के कार्य में अब भी लग जायें तो देश से बाढ़ और अकाल जैसी समस्याओं को दूर करने में कितना समय लगेगा ? हमें अपने स्कूलों में प्राथमिक कक्षा से ही मन का व्यायाम करना अर्थात कारण और कार्य पर चिन्तन करना सिखाया जाये तो, हमारा मन कभी दुर्बल नहीं होगा, कारण की ओर हमारी दृष्टि तुरंत चली जाएगी।
मन के व्यायाम का पहला सोपान है - मनः संयोग। मन, हमारे शरीर का सबसे चंचल हिस्सा। मन को साधने या उसे जीतने में कई लोगों को बरसों लग जाते हैं। युवा पीढ़ी के साथ यह समस्या सबसे आम है कि उनका मन कभी एक जगह नहीं टिकता। पढ़ाई, खेल, नौकरी या निजी जीवन, हर जगह युवा वैसे ही चलता है, व्यवहार करता है, जैसा मन कहे। जब तक मन लगा काम किया, नहीं तो छोड़ दिया। मन के मुताबिक चलना युवाओं का स्वभाव हो गया है। बस, यहीं से शुरू होती है असफलता और अशांति की कहानी। मन को साधने से ही सारे संकट मिट सकते हैं। मुश्किल समय में मन ही सबसे ज्यादा भटकता है और सही निर्णय नहीं लेने देता। मन स्थिर रहे तो सारे संकट से छुटकारा मिल सकता है।
 मन बहुत चंचल है, उसको एकाग्र और स्थिर करने का प्रशिक्षण लेना पड़ता है. मन लगाकर पढ़ने या जिस किसी भी कार्य को करने से वह कार्य जल्दी हो जाता है, और याद भी रहता है. जो कुछ भी कर रहे हों, स्वामी जी को ही पढ़ रहे हों, तो उनकी प्रत्येक उक्ति चाहे वह "Be and Make !" जैसी छोटी ही क्यों न हो; उसी पर तबतक विचार-मंथन चलता रहेगा, जब तक कि उसका अर्थ स्पष्ट नहीं हो जाता। यही है मन का व्यायाम और उसका पौष्टिक आहार है- स्वामीजी के शक्तिदायी विचारों का अध्यन करना।
मन को जीतना मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं है ! पूरे समय भागदौड़, ढेर सारा धन कमाने के बाद भी हम जीवन के किसी हिस्से में असफल और अशांत ही रहते हैं। मन को साधना एक बड़ी चुनौती है। अब प्रश्न है, मन को कैसे जीता जाए?  दरअसल यह एक दिन का कार्य नहीं है, बल्कि निरंतर किया जाने वाला अभ्यास है।  जीवन में अगर स्थायी शांति और सुख की इच्छा हो तो मन को साधना ही पड़ेगा। मन को साधने का एक सबसे बड़ा फायदा है कि यह हमें एक रास्ते पर ले जाएगा, भटकाएगा नहीं। मन को जीतने के लिए, हमें भोगों के प्रति लालच को कम करना पड़ता है, अपने भीतर खुद से ही लडऩा पड़ता है, जो तकलीफ तो देता ही है, हमारे सामने कई बार विचित्र स्थितियां भी पैदा कर देता है।  श्रीकृष्ण से अर्जुन कहते हैं-
  चज्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
                  तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।। गीता ६/३४ ।।

हि = क्योंकि; कृष्ण =हे कृष्ण (यह ); मन: =मन; चज्जलम् = बड़ा चज्जल (और ); प्रमाथि = प्रमथन स्वभाव वाला है (तथा); दृढम् = बड़ा दृढ़ (और ); बलवत् = बलवान् है; (अत:) = इसलिये; तस्य = उसका; निग्रहम् = वश में करना; अहम् = मैं; वायो: = वायु की; इव = भांति; सुदुष्करम् = अति दुष्कर; मन्ये =मानता हूं; 

हे भगवन ! यह मन तो बहुत चंचल है, इन्द्रिय भोगों का आकर्षण इसको बल पूर्वक मथ देता है, इसको वश में लाना तो उतना ही कठिन है, जैसे वायु को मुट्ठी में पकड़ना। अर्जुन की इस बात से भगवान इन्कार भी नहीं करते हैं, किन्तु उसको वश में लाने का एक उपाय या औषधि भी बता देते हैं- 

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
      अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गुह्राते ।।६/३५ ।।

महाबाहो = हे महाबाहो; असंशयम् =नि: सन्देह; मन: =मन;चलम् = चज्ज्ल; दुर्निग्रहम् =कठनिता से वश में होने वाला है; तु =परन्तु; कौन्तेय = हे कुन्तीपुत्र अर्जुन अभ्यास; अभ्यासेन = अभ्यास अर्थात् स्थिति के लिये बारम्बार यन्त्र करने से; गृह्मते =वश में करता है।  

श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है॥ ठीक यही उपाय योगसूत्र में महर्षि पतंजली ने भी बताया है-'अभ्यासवैराग्या-
भ्याम तन्ननिरोधः।' और यही उपाय श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है.
 मन को साधने का सबसे आसान तरीका है- निरन्तर मन को एकाग्र करने का अभ्यास (अष्टांग के पाँच अंग- यम-नियम-आसन -प्रत्याहार -धारणा तक अभ्यास ) और लालच को कम करते जाना अर्थात वैराग्य । सुबह-शाम दो बार थोड़ी देर तक आसन, प्रत्याहार और धारणा का अभ्यास करना चाहिये, किन्तु यम (सत्य,अहिंसा,ब्रह्मचर्य,आस्तेय और अपरिग्रह ) -नियम (शौच,संतोष,तपः, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधानम) का पालन जीवन भर प्रतिक्षण करते रहना चाहिये। मन, वचन या कर्म के द्वारा किसी को हानि पहुंचाना, कष्ट देना या दु:खी करना, हिंसा का कार्य है। सामान्यत: सोचा जाता है कि हथियारों से या हाथ पैर से किसी को मारना-पीटना ही हिंसा है, जबकि यह तो हिंसा का मात्र एक प्रकार है। बिना हाथ हिलाए, बिना बोले भी हिंसा हो सकती है। 
यदि आप किसी से मन ही मन घृणा करें या उसकी उपेक्षा (अनदेखा) करें तो यह भी एक प्रकार की हिंसा ही है। अहिंसा धर्म को पूरी तरह से अपनाने का तात्पर्य है कि मन, वचन अथवा कर्म से किसी भी मनुष्य को दु:ख, कष्ट, अथवा किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाना। न करें स्वयं के प्रति हिंसा- हिंसा सदैव दूसरों के साथ होती हो यह भी आवश्यक नहीं है, जाने-अनजाने मनुष्य खुद अपने प्रति भी हिंसा का आचरण करता रहता है। मनुष्य हीन भावनासे, अज्ञानता से और मनोरोगों से घिरकर जाने-अनजाने स्वयं के प्रति भी हिंसा करता है। प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग कमजोरियां एवं दोष होते हैं। इसलिए समझदारी यह कहती है कि हमें दूसरों के दोषों एवं अपराधों को संभवत: सहन करते हुए क्षमता कर देना चाहिए। जो व्यक्ति बार-बार जानबूझकर कोई अपराध करें और क्षमा करने पर, समझाने पर भी न माने ऐसे व्यक्ति का मुनासिब (आवश्यक) प्रतिकार अवश्य करना चाहिए। क्षमा का उद्देश्य दोषी या अपराधी को सुधरने या बदलने का मौका देना होता है। लेकिन क्षमा कायरता की पहचान नहीं होनी चाहिए। अर्थात् यदि क्षमा को कोई अपराधी आपकी कायरता, कमजोरी, मजबूरी समझे तो ऐसे व्यक्ति को सबक सिखाना आवश्यक हो जाता है। अत: जिनके सुधरने या बदलने की संभावना हो उसे क्षमा करना धर्म है अन्यथा नहीं। इस प्रकार पतंजली ऋषि के सूत्रों के माध्यम मन रूपी डॉन को पकड़ना मुश्किल तो है, किन्तु नामुमकिन बिल्कुल नहीं है ! 
 तीसरे ' H ' (Heart) या ह्रदय की शक्ति का विकास कैसे होगा ? इसके लिये पहले हमें यह समझना होगा कि  इस मुख्य अवयव ह्रदय (Heart) का कार्य (या function ) क्या है ? उसका कार्य है -अनुभव करना, To feel for others, अपने देश की वर्तमान अवस्था को देखने से जो दुःख-वेदना की अनुभूति होती है, वह ह्रदय का ही कार्य है. दूसरों के सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख जैसा अनुभव करने (empathy) से ह्रदय की शक्ति विकास होता है. इस प्रकार ह्रदय (Heart) का व्यायाम है-समानुभूति या (empathy)! अभी हमलोगों का हृदय आत्मकेन्द्रित होने के कारण, स्वार्थपरता में ही रत रहने के कारण जम कर ' पत्थर ' जैसा hard हो गया है. अपने ही देश-वासियों को दुःख में डूबा देखकर भी द्रवित नहीं होता है. ह्रदय की शक्ति को बढ़ाने के लिये अपने आस-पास रहने वाले सभी मनुष्यों की आवश्यकताओं को, उनकी दुःख-वेदना को अपने ह्रदय में अनुभव करना होगा।
 हमारे साथ हमारे घर में ही, कितने लोग रहते हैं - दाई, नौकर, या मजदूर लोग रहते हैं, उनका बच्चा पढ़ने में तेज है, छठी कक्षा तक स्वयं पढ़ लिया है, पर सातवीं कक्षा में tutor (अनुशिक्षक) नहीं मिलने से आगे नहीं पढ़ पा रहा है, किन्तु उनके अभिभावकों के पास इतना पैसा नहीं है, कि वे उसको कहीं ट्यूशन (tuition) दिल सकें। यह बात तुम्हारे कानों में आती है, तुम कोई बड़ा ऑफिसर या धनी-मानी व्यक्ति हो, -तुमने feel किया- ओह ! इतना तेज लड़का था, क्या अब आगे नहीं पढ़ पायेगा ? क्या पैसे के आभाव में उसकी पढाई छूट जायेगी? -मुझे उसके लिये कुछ करना चाहिये। मेरे घर में एक मौसी या चाची बर्तन माँजने का काम करती है, वह भी अपने बेटे को पढ़ाना चाहती है, उसके लिये हमलोग अपने पाठचक्र की छत के नीचे एक निःशुल्क कोचिंग सेन्टर 'free coaching center ' तो खोल सकते हैं. यह बात मैं अपने पाठचक्र के दोस्त को बताया उन सबने feel किया, हाँ ये बात तो ठीक है, यदि हमलोग बारी बारी से एक दिन का श्रमदान करें तो उनका पैसा खर्च नहीं होगा, दूसरे गरीब और असहाय बच्चे भी पढ़ सकेंगे. यदि उनके बिल्कुल अपने भैया जैसे बनकर पूरी श्रद्धा और निष्ठा से पढ़ते हो, तो कोई लड़का यदि बहकने वाला भी होगा तो तुम उसे सुधार सकोगे।
कभी यह दिखाई देगा कि पहले जो लड़का कोचिंग में रेगुलर आता था, उसने आना भी कम कर दिया है, अब पढाई में उतना ध्यान भी नहीं देता है; बाद में पूछने से पता चला कि उसके पिता रिक्सा चलते थे, दो  दिन से बीमार हो गये हैं, इसीलिये उसके घर में चूल्हा नहीं जला है ; वह दो दिन कुछ खाया ही नहीं है तो पढ़ेगा कैसे? जब तक उसके पिता स्वस्थ नहीं होते तुम उस दोस्त को अपने घर ले जाकर माँ से कहकर ईश्वर बुद्धि से खाना खिला दिया। तुम्हारी माँ ने जब उसको बैठाकर प्रेम से खाना खिला दिया - तो उसका मुख कितना उज्ज्वल हो गया ! उसके प्रसन्न और चमकते चेहरे को देखकर तुम्हारे हृदय में कितने असीम आनन्द का अनुभव हुआ ! ह्रदय का आनन्द कितना असीम हो सकता है, इसका पता तमको आज चला -कि सचमुच सुख और आनन्द में कितना बड़ा अंतर होता है !! 
तुम उसके पिता को डॉक्टर के यहाँ ले गये, उसने दवा देकर उसके  पिता को अच्छा कर दिया, तब उसका आनन्द जो होगा वह खुद आइसक्रीम खाने के सुख से बहुत बड़ा होगा ! मनुष्यों के दुःख को दूर करने की जितनी चेष्टा करते जाओगे, तुम्हारा ह्रदय उतना ही अधिक विशाल होता जायेगा। यही है ह्रदय का व्यायाम इससे हृदय की feel करने की शक्ति बहुत अधिक बढ़ जाती है. इस प्रकार अपने 3H को विकसित करने का अवसर इस प्रशिक्षण शिविर में प्राप्त होता है. दूसरे मनुष्य के दुःख-कष्ट को अपना दुःख-कष्ट जैसा अनुभव करके उनके दुःख को दूर करने की चेष्टा करने से ह्रदय का व्यायाम होता है.
ह्रदय का पौष्टिक आहार है, माँ ठाकुर स्वामीजी के जीवन को नजदीक से देखना- वे लोग केवल मौखिक सहानुभूति दिखाकर काम नहीं चलाते थे, माँझी की बहु ने माँ से आकर कहा कि उसका बेटा मर गया है, माँ इसे सुनकर ऐसे रो पड़ी मानो उन्हीं का बेटा मर गया हो, फिर सान्तवना देते हुए उसको स्नेह के साथ मुढ़ी- लाय खाने को दिया, अपने हाथ से उसके सिर में तेल लगा दिया। उनके जीवन को देखने से हमलोग भी 'मातृ ह्रदय ' की हृदयवत्ता प्राप्त करके ' heart whole Man ' या Ideal Man बन सकते हैं ! हमारा जीवन सुन्दर बन सकता है.
 फिर अपने ह्रदय के बन्द दरवाजे को खोलना होगा। ह्रदय के अंदर जो प्रेम का झरना है, वह जमकर पत्थर जैसा हो गया है, अहंकार के पत्थर से बन्द है, उसको unfold नहीं करने से, उस प्रेम को अभिव्यक्त नहीं करने से वहाँ विद्यमान जो चुम्बकत्व है, वह सुप्त-प्राय हो गया है, मेरे ह्रदय का चुबंक क्यों किसी को आकर्षित नहीं करता है ? हमें अपने हृदय में विद्यमान ब्रह्म की सत्ता को, ह्रदय के feeling को अभिव्यक्त करने का कौशल सीखना होगा। पहले उस सूप्त सत्ता को प्रकाशित या प्रकट करना है, फिर उसको विकसित करना होगा। किन्तु परिवेश और परिस्थिति हृदय के बन्द दरवाजे को खोलने नहीं देंगे, उसको press करके बन्द किये रखना चाहेंगे। इस दबाव को हटाने के लिये जो दृढ़ संकल्प और प्रचण्ड इच्छा शक्ति चाहिये उसे कहा से लाऊंगा ? मन को बदलने का कार्य भी मन के द्वारा ही होता है, इसके लिये यहाँ - ' संकल्प ग्रहण विधि ' या ' चमत्कार जो तुम कर सकते हो ' का अभ्यास करना, या मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो- 'Autosuggestion' या ' आत्मसुझाव ' की पद्धति भी बताई जाती है. इसे सीखकर अब दृढ़ संकल्प और प्रचण्ड इच्छा शक्ति के बल पर मनुष्य बनने के काम में जुट जाउँगा।
अभीतक तो मनुष्य जीवन क्या है, किस लिए मिला है ? यह सब नहीं समझता था, पूस-मेला ( या धजाधारी पहाड़ का मेला) में जाकर life enjoy करने का मौका मिलता है-इतना ही जानता था. इतने दिनों तक सहज-प्रवृत्ति के अनुसार आहार निद्रा-विषयभोग या खाना, सोना, वंश विस्तार करने को ही जीवन का आनन्द मानकर मनुष्य-जीवन बिता रहा था? साधारण डिग्री वाली शिक्षा प्राप्त लोगों के लिये मनुष्य बनने का अर्थ- I.A.S, I.P.S - बनकर उत्कृष्ट पशु-जीवन जीना ही है. अपने घर में ही फ्रिज में चील्ड बियर रखो, V.D.O  में CD डाल कर मनपसन्द सिनेमा देखो - life enjoy करो ! मोहनिद्रा में सोया हुआ आदमी सोचता है, इन्द्रिय भोग और धन-सम्पत्ति अर्जित करने में रत आदमी सोचता है, मैं बहुत सुखी हूँ ! किन्तु यह सुख तो क्षणिक है, इन्द्रिय विषयों से प्राप्त होने वाला सुख अवसाद में परिणत हो जाता है.
 इसलिये ' विवेक-प्रयोग ' द्वारा संचालित जीवन ही, श्रेष्ठ जीवन है,  किन्तु मन इन्द्रिय भोगों में ही सुख मान कर उससे बाहर निकलना नहीं चाहता, बार बार उसी को पाना चाहता है, मनुष्य की गरिमा से नीचे गिर देता है. हमारा यह पतन हमारा मन ही करा रहा है, मनुष्य बनने की दृढ़-इच्छाशक्ति के बल पर जो परिवेश मेरे मन को नीचे गिरा  देता है, उसे बदलना होगा, कुसंग को पूरी तरह से त्याग देना होगा। मन का केन्द्रापसारी होकर विषय-मुखी बने रहना, मानसिक पतन है, मानसिक दिवालियेपन की पहचान है!
भारत के अधिकांश जनता का मन विषय-भोगो के पीछे ही नष्ट हो रहा है- भारत को इस मोहनिद्रा से जगाने के लिये ' उत्तिष्ठत जाग्रत ' के मन्त्र को सुनाने का उत्तरदायित्व स्वामीजी ने युवाओं पर ही सौंपा है. जीवन-गठन  करना मनुष्य-जीवन का श्रेष्ठ पक्ष है.इसीलिये 3H निर्माण को स्वामीजी पुनर्जीवन का उपाय, पुनरुद्धार या 
' Regeneration of India ' कहते हैं ! आम आदमी जो कुछ करता है, केवल जीवन निर्वाह के लिये ही करता है. किसी प्रकार जीवन-निर्वाह कर लेना निम्न पहलु का जीवन है; जीवन-निर्वाह तो गली गली घूमने वाले पशु-पक्षी भी कर लेते हैं। किन्तु हमलोग तो मनुष्य हैं, हमारा मन जिन विषयों में आसक्त होकर दुर्बल हो गया है, विषय के उन व्यसनों से मन को मुक्त करना होगा, विषयगामी मन को उपर उठाने के लिये मन के साथ ही संग्राम छेड़ देना होगा। मन में परिवर्तन लाकर उसे संस्कारों के द्वारा सुसंस्कृत बना देना होगा। मन को बदलने का कार्य भी मन के द्वारा ही होता है, इसीको इच्छा शक्ति कहते हैं,इस सूप्त इच्छा शक्ति को जाग्रत और अभिव्यक्त करके मनुष्य बन जाना ही शिक्षा या प्रशिक्षण का उद्देश्य है.
हमलोग स्वरूपतः अमृत-पुत्र हैं, किन्तु पाँच इन्द्रियों और शरीर को ही मैं समझने वाले पशु-मानव से हमारा स्वरूप ढंका हुआ है. इन्द्रियाँ हमें भोगों की ओर प्रेरित करती हैं, और हमलोग भोग में उन्मत्त होकर अपनी जवानी को व्यर्थ में गँवा देते हैं. अत्मवस्तु भीतर में है, किन्तु वह पशु मानव के आवरण में छुपा हुआ है, हमलोग दूसरों को हानी पहुँचाकर भी भोग के लिये उतारू हो जाते हैं. अमावस्या की रात्रि में यदि १००० वाट के बल्ब को भी आवरण से ढंक दिया जाय तो, स्विच दबाने से भी उसका प्रकाश बाहर नहीं आयेगा। धर्म वह वस्तु है जो पशु-मानव को देव मानव में, उससे भी उपर ब्रह्म में भी उन्नत कर देता है. हमारे जो युवा भाई अपने गाँव में 'आदर्श मनुष्यों (Ideal Man ) का निर्माण  करने वाला संगठन ' खोलना चाहते हैं, वे ही तो मानव जाति के सच्चे नेता हैं.
पशु मानव को नरदेव में रूपान्तरित करने की वैज्ञानिक पद्धति को अष्टांग या पतंजली योग-सूत्र कहते हैं. मनः संयोग सीखकर मन को शक्तिशाली बना लेने से यह संभव हो जाता है ! हमलोग अपने प्रशिक्षण शिविर और 
' पाठ-चक्र' में ' संसार-चक्र ' से मुक्ति  (या इसके समस्त प्रकार के बन्धनों से मुक्त होने का) प्राप्त करने का उपाय सीखते हैं ! यही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है! केन्द्र के सचिव-अध्यक्ष को इस बात पर दृष्टि रखनी है कि कोई सदस्य ५ काम में टिक तो मार रहा है, फिर भी यदि उसमें विकास नहीं हो रहा है, तो उसका कुछ कारण अवश्य है. अवश्य उसका विवेक सो रहा है, इसीलिये व्यसनों को त्याग नहीं पा रहा है. विवेक-प्रयोग करते रहने से, आदत अवश्य बदलती है. नजर रखनी होगी कि सदस्य साधना कर रहा है या नहीं ? अंत में एक गाना माँ मुझे मनुष्य बना दो गा कर समापन करना अच्छा होगा। 
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Thursday, August 15, 2013

क्या राजनीति मनुष्य को गिरगिट बना देती है ?

प्रश्न : आत्मा क्या है ? 
उत्तर :  किसी देश के राजा और प्रजा दोनों मुर्ख थे उन्होंने एक साधू से पूछा आप बताइये कि बुद्धिमान किसे कहते हैं ? साधू ने कहा कि जो व्यक्ति आत्मा को शून्य कहकर उड़ा देता हो, वह मूर्ख है. श्रुति और शास्त्रों में आत्मा को जानने की युक्ति दी गयी है,श्रवण -मनन और निदिध्यासन - जिसकी सहायता से आत्मा को समझने में सहायता मिल सकती है. किन्तु उसको पुस्तकों के द्वारा या प्रयोग शाला में दूरबीन से देखकर या चिमटे से पकड़ कर दिखाया नहीं जा सकता कि देखो -यही आत्मा है. निर्धारित साधना पद्धति को सीख कर स्वयं आत्मा की उपलब्धी करनी होती है -या आत्मसाक्षात्कार करना होता है. शास्त्रों में ' चैतन्यात सर्वं उत्पन्नम ' या  'जन्मादि यस्य यतः ' आदि सूत्रों के द्वारा केवल उसका संकेत भर दिया जा सकता है. यह दृश्यमान जगत प्रपंच ब्रह्म से ही उत्पन्न हुआ है, उसी में स्थित है, फिर उसी में लीन हो जाता है. किन्तु इन बातों को भाषण के द्वारा नहीं समझा या समझाया नहीं जा सकता है. इसकी अनुभूति करनी होती है.
 एक बार किसी स्थान में पूछा गया था कि परमात्मा या ब्रह्म एक है, तो उससे इतनी आत्मायें कैसे निकली ? एक ही वस्तु के इतने टुकड़े हो गये तब तो ब्रह्म भी खत्म हो गया होगा ? ब्रह्म या आत्मा अनन्त हैं, विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि अनन्त का अंश नहीं होता। अनन्त से अनन्त को निकालने से अनन्त ही बचता है. इतनी आत्मायें कहा से आती हैं ? विश्व में मनुष्यों की संख्या छः अरब है, वास्तव में ये सभी भगवान के ही मूर्त रूप हैं- मनुष्य के रूप में हमें भगवान को ही देखने की विद्या अर्जित करनी चाहिये। मन्दिर को हमलोग भगवान का शो रूम कह सकते हैं, जिसे देखकर प्रत्येक मनुष्य शरीर रूपी मन्दिर में अवस्थित भगवान की याद हो जाती है.
आत्मा ही इस जगत का निमित्त और उपादान कारण दोनों हैं. जगत को निर्मित करने के लिये Raw Material जैसा अलग से कुछ नहीं है.
आमतौर से हमलोग जीवात्मा को आत्मा कहते हैं, किन्तु जीव का शरीर भी एक मन्दिर है, जिसमें वही ब्रह्म अवस्थित हैं. फिर उसके परे भी जो कुछ है, वह ब्रह्म ही है. 'सोअयं आत्मा चतुष्पादः ' - समूचा विश्व ब्रह्माण्ड इसके एक पाद या एक अंश में अवस्थित है, उसके तीन पाद इसके परे हैं. इससे अधिक नहीं कहूँगा।
प्रश्न : धर्म का अर्थ यदि धारण करना है, तो क्या धारण करना है ? इसे समझाइये।
उत्तर: धर्म हमें धारण करता है, अर्थात हमारी रक्षा करता है. इसका अर्थ हुआ कि आध्यात्मिकता या रूहानियत ही वास्तव में धर्म है, जो हमें पशु बन जाने से बचाए रखता है, यह हमें राक्षस नहीं बनने देता है. हमें मनुष्य से देवता में उन्नत कर देता है.
प्रश्न : जन्म के पहले मैं कहाँ था ? मेरा स्वरुप क्या है ? 
उत्तर : गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को बोलते हैं,
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ।।४/५ ।।
" हे परन्तप अर्जुन मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किंतु मैं जानता हूँ. " बुद्ध को भी अपना ५०० पूर्व जन्म याद था. किन्तु हमलोगों को इस बहस में न पड़कर यह देखना चाहिये कि इस जन्म में मेरा क्या कर्तव्य है ? कण्ठ फूट जाने के बाद कोई तोता राम राम बोलना नहीं सीख पाता है. इसलिये तरुण या युवा अवस्था में हमलोगों का पहला कर्तव्य अपने जीवन को गठित करना, चरित्र-निर्माण करके यथार्थ मनुष्य बन जाना है. नहीं तो इस जन्म के बाद , या इस शरीर की मृत्यु हो जाने के बाद जहाँ कहीं भी जाउँगा, वहाँ इसी शरीर को लेकर तो नहीं जा सकूँगा ? यह प्रश्नोत्तर कठोपनिषद में है, महाभारत में है. 
मृत्यु के बाद कहाँ जाउँगा ? इसको जानने की  आवश्यकता अभी नहीं है. किन्तु अपना चरित्र निर्माण किये बिना यह युवा अवस्था बीत गयी तो, बुड्ढा हो जाने पर कुछ भी नहीं हो सकेगा। जब तक मिट्टी कच्ची है, उसके आकार में परिवर्तन लाया जा सकता है. किन्तु उसको पका देने के बाद उसके आकार में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है.
  मेरा स्वरुप क्या है ? यह कोई ' कौन बनेगा करोड़पति ' में पूछा जाने वाला प्रश्न नहीं है. आत्मा बोल देने से कुछ नहीं होगा- इसकी उपलब्धी करनी होगी। जगत और ब्रह्म स्वरूपतः  एक ही वस्तु है, ब्रह्म के सिवा अन्य कोई वस्तु नहीं है. ठाकुर ने कहा था - ' ब्रह्म ही वस्तु है बाकी सबकुछ अवस्तु है. ' वस्तु के उपर अवस्तु आरोपित है! किन्तु 'परिणाम वाद' और 'विवर्त-वाद' पर बहस करके इसे समझा नहीं जा सकता। द्रष्टा-दृश्य विवेक का अभ्यास करना होता है, यह सब मुख से कहने से कुछ नहीं होता। चरित्र गठन करने से ही पता चल सकता है. अपने स्वरुप की उपासना करो ! ऐसा किसने कहा ? इस शिविर में किसी की उपासना करना तो सिखाया नहीं जाता है. स्वामी विवेकानन्द से प्रेम करने को यदि उपासना समझते हो तो कर सकते हो. 
प्रश्न : धार्मिक मनुष्य (Religious) और धर्म-निरपेक्ष (Secular) मनुष्य में क्या अंतर होता है ?
उत्तर : अंग्रेजी का रिलिजन शब्द ग्रीक रूट ' Rejoining ' से हुआ है, हमलोग ईश्वर से आये  हैं, और धर्म के मार्ग पर चलकर उनसे पुनः मिल जायेंगे। Secular का अर्थ है धर्म से अलग रहना ' To shun Religion' . धर्म निरपेक्षता शब्द का अविष्कार धूर्त कांग्रेसियों ने हिन्दू-मुसलमानों के बीच झगड़ा करवाने के लिये किया है. ठाकुर ने कहा है- मनुष्य को अपने जीवन आदर्श के रूप में ' सर्वधर्म समन्वय ' को अपनाना  चाहिये; Secular अर्थात ' सर्वधर्म समभाव ' की वकालत करने वाले राजनीतिज्ञ सोचते हैं- सभी धर्म बेकार हैं - इसलिये धर्म या आध्यात्मिकता और रूहानियत की बातों से जनता को दूर रखना चाहिये। ऐसा भाव मनुष्य को पशु या राक्षस बना देता है. 
प्रश्न: ईश्वर बनने की सम्भावना समस्याओं में दब कैसे जाती है ? 
उत्तर : ईश्वर छुपने और छुपाने के खेल में निपुण या expert है. वह मनुष्य की संभावना को समस्याओं के आवरण में छुपा देता है. बिलियर्ड बॉल की तरह समस्याओं से टकराते टकराते उन्हीं समस्याओं के बीच से ईश्वर स्वयं प्रकट हो जाता है. समस्याओं को हल करने के प्रयत्न में ईश्वरत्व प्रकट हो जाता है. अपने ही अनादर वह आनन्द को छुपाये हुए है, किन्तु मनुष्य को लगता है, नये साल को मनाने के लिये शराब पीने से आनन्द होगा। किन्तु जो विवेकी होता है, वह जानता है कि ' नशा शराब में होता तो नाचती बोतल ! ' किन्तु बोतल नहीं नाचती मनुष्य नाचने लगता है. 
रूहानियत के नशे में सूफ़ी फ़क़ीर लोग भी नाचने लगते हैं. हमलोगों के ह्रदय के अन्दर वह ईश्वर ही प्रेम (आनन्द) का चुम्बक बन कर छुप गया है; वही चुम्बक दूसरों के ह्रदय को खीँच रहा है. वास्तव में समस्यायें नहीं, आनन्द और प्रेम ही हमें खीँच रहा है; किन्तु हम दूसरों को अपना बनाने की कला नहीं जानते इसीलिये अपने रिश्तेदारों में., सास-बहु एक दूसरे में ईश्वर को देखना नहीं जानते। यदि मानव मात्र में वही विद्यमान हैं, इस सत्य को अपनी उपलब्धि से कोई नहीं जान लेता तो समस्याओं को देखकर उसका विश्वास डोल जाता है, और वह डर कर पहले ही आक्रमण कर देता है. गुगली वाले गेन्द को देखकर जैसे बैट्स मैन डर जाता है. और जल्दी रन पूरा करने मत दौड़ो गेन्द को खेल देना ही काफी है. गेन्द को स्वीकार कर लेना ही काफी है. हमने जो आर्डर दिया था, वही पार्सल आ रहा है. पार्सल को खोलकर देखो, धैर्य है तो समस्याओं को दूर हटकर संभावनाएँ खुल जायेंगी; ईश्वर की लीला समझ में आ जाएगी। इसके अन्दर किसको छुपाया है, बाहर से देखकर समझ ही नहीं आता. नव वर्ष की शुभकामना में बहुत कुछ छुपा हुआ है. हमें यह विचार करना चाहिये कि इस वर्ष हमने अपनी कितनी और कौन कौन सी संभावनाओं को अभिव्यक्त कर लिया है ? ' well begun is half done ' कोई जाग्रत व्यक्ति ही इस कहावत का वास्तविक अर्थ समझ सकता है. 
यदि सही दिशा में चलना शुरू कर दिया तो अब हमारे आगे मन का नाटक और अधिक चलने वाला नहीं है. कम परिश्रम से ज्यादा आनन्द मिलने वाला है. अब हमलोग समस्या रूपी गुगली बॉल से घबड़ाने वाले नहीं हैं. क्या हममें अपने आप पर अकंप विश्वास है ? अटल विश्वास कभी काँप नहीं सकता है. हर समस्या के आने पर उसको खोलकर देखने की स्वीकारता ही उसकी चाभी है, जब तक कोई समस्या डरावनी लग रही है, हमारी प्रार्थना भी चलती रहनी चाहिये। जलालुद्दीन रूमी की कविता है 
The Guest House

This being human is a guest house.
Every morning a new arrival.

A joy, a depression, a meanness,
some momentary awareness comes
As an unexpected visitor.

Welcome and entertain them all!
Even if they're a crowd of sorrows,
who violently sweep your house
empty of its furniture,
still treat each guest honorably.
He may be clearing you out
for some new delight.

The dark thought, the shame, the malice,
meet them at the door laughing,
and invite them in.

Be grateful for whoever comes,
because each has been sent
as a guide from beyond.

From Essential Rumi

पुरे वर्ष के लिये ३६५ प्रार्थनायें बनानी हैं, रोज एक नई प्रार्थना करनी है. हमारे A.C. से रूहानी हवा आनी चाहिये, राहत वाली हवा हमें नहीं चाहिये। "Believe, and You are Saved"(John 6:40)
For this is the will of God, that every one who sees the Son and believes in him should have eternal life; and I will raise him up at the last day." स्वरुप के उपर जो निगेटिव राख जमा हो गया है, वह प्रार्थना के बल पर उड़ जायेगा। जो प्रार्थना हमारे ह्रदय चुम्बक को छू जाती हैं, वे अवश्य ही विश्वास की अनुभूति करता है -सेल्फ को रियालाइज करता है. 'You are light of my life; you are sleeper of my soul '
पैर के तलवे को भी सोल Sole कहा जाता है. चरित्रवान मनुष्य वही है, जिसका विवेक सदा जाग्रत रहता है, स्वप्न में भी उससे कोई बुरा कार्य नहीं हो सकता है. आदत ही परिपक्व होकर व्यसन बन जाता है. व्यसन की गुलामी ही पशु बनाये रखती है. एक एक कर के समस्त व्यसनों को तोड़ डालो। प्रचण्ड इच्छा शक्ति और दृढ संकल्प के बल पर मनुष्य बन जाओ ! 
*' सामूहिक ध्यान ' नहीं हो सकता, 'सामूहिक प्रार्थना' की जा सकती है. काली और नरेन्द्र एक साथ बैठकर ध्यान कर रहे थे, नरेन्द्र ने काली के शरीर को स्पर्श कर दिया तो उनका सारा भाव नष्ट हो गया. ठाकुर को जब यह समाचार मिला तो उन्होंने नरेन्द्र को डांट लगाई थी - उसका अपना भाव क्यों खराब करते हो. समूह में बैठकर ध्यान करते समय यदि हम दूसरों को शरीर से न भी स्पर्श करें तो भी विचार तरंगों का प्रभाव दूसरों के मन पर पड़ता है. मोबाईल के जमाने में ह्मोग ध्वनी तरंगों के माध्यम से ही तो बात करते हैं. यदि एक साथ कई लोग ध्यान में बैठेंगे तो उनकी विचार तरंगे आपस में टकराएंगी। इसलिये ग्रुप में बैठकर ध्यान करने को सही नहीं कहा जा सकता, अभी सुनने में आया कि भुनेश्वर में एक लाख लोग एक साथ बैठकर ध्यान किया। पर उनको मिला क्या होगा ?
* महामण्डल का एक भी कार्यकर्ता paid worker या (वेतन भोगी कर्मी )नहीं है. इस तरह की एक भी संस्था विश्व में कहीं नहीं है, जिसके ३१५ शाखायें हैं. आज से केवल १० साल पहले ऐसी एक संस्था आस्ट्रेलिया में खुली है. 
* आग का धर्म है जला देना, बर्फ का धर्म शीतलता है- किन्तु यह उनकी विशिष्टता या Individuality नहीं है, यह तो उनकी Natural Quality या प्राकृतिक गुणवत्ता है. किन्तु प्रत्येक मनुष्य को अपना जीवन गठित करने या चरित्र का निर्माण करने के लिये स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है. चरित्र मनुष्य का जन्मजात या स्वाभाविक गुण नहीं है, उसमें परिवर्तन लाया जा सकता है, अंश से पूर्ण बनना पड़ता है. पशु-पक्षी-वृक्ष आदि तो पहले से पूर्ण होते हैं, आग, पानी, बिजली आदि भी पहले से पूर्ण होते हैं, किन्तु मनुष्य को अपना विवेक-प्रयोग करके प्रचण्ड इच्छा शक्ति और दृढ़ संकल्प के बल पर मनः संयोग सीखकर चरित्रवान मनुष्य बनना पड़ता है. किसी मनुष्य में जन्म से ही धर्म नहीं होता। चरित्रवान मनुष्य को ही शिक्षित या धार्मिक मनुष्य कहा जाता है.
* 'चरैवेति चरैवेति'- का अर्थ है; और आगे जाओ ! और आगे जाओ ! किसी गरीब लकड़हारे से संसयासी ने कहा था-जंगल में लकड़ी काटते हुए और आगे जाओ- उसकी बात मान कर आगे बढ़ने से आगे उसे चन्दन का वन मिला, और आगे जाने पर चाँदी -सोना-हिरा आदि का खान मिला और वह लकड़हारा मालामाल हो गया; किन्तु उस संन्यासी ने लकड़हारे को कहा और आगे जाओ, एक साधू की कुटिया मिलेगी-वहाँ तुम उस परम चैतन्य को प्राप्त कर लोगे जिससे सबकुछ निकला है, जिसमें अवस्थित है, और जिसमें लीन हो जाता है. संसारी क्षण-भंगुर विषयों को  भोगने में अपना जीवन व्यर्थ न करो, अपनी 3H की शक्तियों का वृथा क्षय करने से कोई लाभ नहीं होगा। पहले एक दीपक जलता है, फिर उससे दूसरा दीपक जलता है; किन्तु एक दीपक से एक साथ १००० दीपक नहीं जल सकता है. सामूहिक ध्यान के द्वारा एक साथ १००० मन को प्रदीप्त नहीं किया जा सकता है-उनको electrocute किया जा सकता है-अर्थात विद्युत् के झटके से मारा जा सकता है. जैसे एक ही स्विच को दबाने से १००० टुन्नी बल्ब जल जाते हैं, किन्तु यदि हाई वोल्ट का करेन्ट निकला तो, एक विद्युत् के एक ही झटके कितने ही बल्ब फ्यूज भी हो सकते हैं. इसीलिये सभी को चैतन्य एक साथ मिल जाय -यह आवश्यक नहीं है; पहले योग्य पात्र बनो चरित्र निर्माण करो !
* राजनीतिज्ञ और गिरगिट एक जैसे होते हैं ! राजनीतीक नेता बनने का अर्थ है - मनुष्य से गिरगिट बनजना ! एक-आध अपवाद भी हो सकते हैं - जैसे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ! किन्तु दर्जी से खादी का कुर्ता-पैजामा सिलवाकर कोई नेता नहीं बना जाता है- मानवजाति का मार्गदर्शक नेता बनने के लिये पहले चरित्रवान मनुष्य बनना पड़ता है नहीं तो प्रधानमन्त्री बनने के बाद भी कोएले की कालिख से मुँह काला हो जाता है. आई. पी. एस. होकर सीबीआई के डिरेक्टर को भी तोता बन जाना पड़ता है ! एक ही राजनैतिक पार्टी में हरा-पीला-लाल-नीला रंग के नेता होते हैं, या कोई सेप्रेटिस्ट, कोई बाम पंथी कोई दक्षिण पंथी भी हो सकता है. लेकिन सभी राजनीतिज्ञ लोग गिरगिट ही होते हैं- लाभ होता देखने से, अवसर देखकर गिरगिट के जैसा रंग बदल लेते हैं.  इसीलिये महामण्डल में राजनीति का प्रवेश पूरी तरह से निषिद्ध है !! जो बात स्वयं समझ में आ गया है, वही बोलता हूँ, पुस्तक में अच्छी बाते हैं, उनको रट कर नहीं बोलता हूँ.
* डंके की चोट पर कह सकता हूँ कि -' स्वामी विवेकानन्द के जैसा दूसरा मनुष्य आजतक पृथ्वी पर नहीं जन्मा है ! ' ठाकुर-माँ-स्वामीजी चुम्बक के बहुत बड़े पहाड़-Great Magnet  जैसे है उनके सामने यह शरीर रूपी नौका जैसे ही पहुँचेगी इसमें लोहे से बने जितने भी नट -बोल्ट लगे हैं सभी खुल जायेंगे ! अर्थात मन इन्द्रिय विषयों में आसक्त रहना छोड़ देगा, इन्द्रियों की समस्त जंजीरे टूट जाएँगी ! जैसे कोई शिप यदि किसी चुम्बक के पहाड़ के निकट से गुजरेगा -तो जिन पटरों को लोहे की कील ठोक कर जोड़ा गया था, वे सभी कीलें उखड़ जाएँगी
* नेता को पूर्ण ह्रदयवान मनुष्य बनना पड़ता है - Be a heart whole Man ! स्वामीजी कहते हैं-' बनो और बनाओ ' Be and Make !' इतने बड़े काम को अकेला नहीं कर पाउँगा - इसीलिये जवानी की उर्जा से भरपूर युवाओं का एक संगठन बनाना होगा। आनन्द मठ के लेखक बंकिमचन्द्र ने कहा था- हे वर्षा की बूँदों ! तुम अकेले मत धरती पर गिरना। धरती पर गिरते समय सभी से कहो- आई भाइयों हम सभी एक साथ उतरें! इसीके लिये हम  ह्रदय एक सामान हो. आकूति - फल की प्राप्ति एक समान हों. हमलोग एक ही बात कहेंगे - भारत का कल्याण ! चरित्र-निर्माण और मनुष्य निर्माण ! तुम बंकिमचन्द्र द्वारा कथित वर्षा की बून्द बनो ! अपने साथ पढने वाले सभी युवाओं को स्वाती नक्षत्र की बून्द पीने के लिये इस कैम्प में लेकर आओ ! देश की अवस्था बहुत खराब है. शक्ति को ही वीर्य कहते हैं, शक्ति को बर्बाद मत करो ! तुम युवा लोग चरित्रवान मनुष्य बनकर देश की हालत को सुधारो ! आतंकवादी हिंसा या तोड़-फोड़ करने से देश नहीं बनेगा !
* चरित्र गठन के लिये डिग्री होना आवश्यक नहीं है: अभी हाल ही में Value Education  " मूल्य-आधारित शिक्षा" के नाम पर ' Art of Living ' की पुस्तिकाओं को बहुत सी स्कूलों में वितरित किया जा रहा है. किन्तु किसी हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक ने पूछा है कि -इन पुस्तकों को पढ़ने वाले शिक्षक कहा से आयेंगे ? इसमें केवल संकेत भर दिये गये हैं - किन्तु इसकी व्याख्या कौन करेगा ? मैं एकबार पाठ चक्र में जाने के लिये स्टेसन पर खड़ा था एक शिक्षक भी पास में खड़ा था, उसका एक छात्र जब वहाँ आया तो अपने ही छात्र को जेब से निकाल कर एक सिगरेट दिया और दोनों ने एकसाथ प्लेटफ़ॉर्म पर ही सिगरेट पीना शुरू कर दिया। हमलोगों ने पढ़ा था - माता पिता अतिथि भी नारायण नारायणी हैं, गुरु माथा के मणि हैं, ये सभी साक्षात् नारायण हैं ! किन्तु चित्त विनोद के चक्कर में पड़कर शिक्षकों का चित्त ही जड़ हो रहा है, विनोद क्या है- यह शिक्षक क्या जानेगा ?
चरित्र गठन के लिये डिग्री होना आवश्यक नहीं है, जिस व्यक्ति के पास कोई डिग्री नहीं है-वह भी चरित्रवान मनुष्य बन सकता है. चैतन्य देव बहुत बड़े विद्वान् थे लेकिन ठाकुर के पास कोई शिक्षा नहीं थी, पुराणों में जितने महापुरुष हुए हैं-उनका चरित्र महान था, किन्तु शिक्षा साधारण ही थी. Values का अर्थ होता है- सदभाव या जीवन-मूल्य किन्तु हमारे नेताओं को Value Education किसे कहते हैं-यह भी पता नहीं है.
* Intellect is the function of Manas  or mind but Heart is the seat of feeling. मन के चार कार्य -संशयो, निश्चयो, गर्वं, स्मरणं च धारणा. चित्त है संचित स्मृतियों का गोदाम या भण्डार घर, यही  अहं या कर्तापन अहंकार बन कर स्मरण करता और धारणा करता है, चित्त ही मन-वस्तु mind stuff है-  चित्त तरंगायित होकर जब मन बन जाता है, तब वह  संकल्प-विकल्प करता है या संशय करता है।  बुद्धि का कार्य है निश्चय करना, किन्तु अहं के बिना संशय कौन करेगा? कर्ता के बिना कर्म नहीं हो सकता यहाँ अहंकार का अर्थ डींगे हाँकना या boasting नहीं है. किन्तु 3H में आत्मा के लिये Heart क्यों कहा है ? स्वामीजी ने एक दिन विचार किया कि मानव शरीर में आत्मा का आसन कहाँ होना चाहिये ? शरीर विज्ञान की सहायता से यह समझे कि Physical Heart तो blood pumping मशीन है, यह रक्त संचार को नियंत्रित करता है; उसके नजदीक ही एक ग्रन्थि है जिसका नाम ही ' Sympathetic ganglia ' या सहानुभूति ग्रन्थि है. पता नहीं किस वैज्ञानिक ने क्या सोचकर इसका यह नाम रख दिया होगा ? लेकिन आत्मा का काम भी तो सहनुभूति करना है. विज्ञान के बिना धर्म अन्धा है, धर्म के बिना विज्ञान पंगु है. अपने हृदय को जानो तुम्हें अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जायेगा।
* प्रवृत्ति और निवृत्ति भगवान ने जब इतनी सुन्दर सृष्टि बनाई और उसमें स्वयं छुप गये तथा इतने विवेकी मनुष्यों को बनाया जो अपने बनाने वाले को भी जान सकता है, तब उन्होंने स्वयं को जानने के दो मार्ग बनाये - प्रवृति और निवृत्ति। जब सृष्टि बनी तभी से प्रवृत्ति मार्ग बना - yes, I want to be engaged in the world; मैं इस जगत के आनन्द का उपभोग करूँगा, और जी भरकर उपभोग करने के बाद जिस जन्म में गुरु मिलेंगे इसको निस्सार समझने के बाद इसको त्याग कर भगवान को पकड लूँगा ! प्रवृत्ति का अर्थ है- आनन्द पाने के लिये जगत को स्वीकार करना। निवृत्ति का अर्थ है - त्याग - इस जगत में जिसे तुम सुख समझ रहे हो, वो तो दुःख कारण है, इसलिये निवृत्ति मार्गी ऋषि स्वामी विवेकानन्द एवं हमारे उपनिषद मनुष्यों के त्याग पूर्वक भोग करने का उपदेश देते हैं. जब ठाकुर ने बंकिम चन्द्र से पूछा कि तुम क्या करते हो ? इसके उत्तर में आनन्द मठ के रचयिता बंकिम चन्द्र बोले- आहार,निद्रा, भय और मैथुन ! तन ठाकुर ने  उन्हें धिक्कारते हुए कहा था- देखता हूँ तुम नाम से ही नहीं अक्ल से भी टेढ़े ही हो, छेछड़ा आदमी हो क्या ? ये वही बंकिम चन्द्र हैं, जिन्होंने वन्दे मातरम रचा था. उनको हमलोग प्रवृत्ति मार्ग के ऋषि समझ सकते हैं.


Wednesday, August 14, 2013

" संगच्छध्वं संवदध्वं " राष्ट्रीय एकता और स्वामी विवेकानन्द {National unity and Swami Vivekananda} sarisa camp 29.12.2005


'चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है।'  
'ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी' के अनुसार " Nation" (राष्ट्र) की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है- ‘एक विशाल व्यक्ति–समूह, जिसकी भाषिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों, तथा जो एक सरकार के अधीन हो, ‘राष्ट्र’ के अंतर्गत आता है।’ ‘ब्रिटानिका रेडी रिफरेंस इनसाइक्लोपीडिया’ में राष्ट्र (Nation) शब्द का अर्थ इस प्रकार है– ऐसे लोगों का समूह जिनकी साझा पहचान उनके अंदर एक मनोवैज्ञानिक बोध और राजनीतिक इकाई का निर्माण करती है।
'ऑक्सफोर्ड डिक्सनरी' में ही 'National' (राष्ट्रीय) शब्द को परिभाषित करते हुए कहा गया है- " relating to or characteristic of a nation; common to a whole nation:this policy may have been in the national interest." - अर्थात किसी राष्ट्र या कौम से सम्बद्ध कोई विशेषता जो किसी एक पूरे देश या जाति के हित में सामान्य रूप अपनाई जाती हो। उदहारण के लिये - राष्ट्रिय विदेश नीति, राष्ट्रिय वेश-भूषा (नेशनल ड्रेस), राष्ट्रिय सम्पत्ति, राष्ट्रिय ध्वज, राष्ट्र-गान, राष्ट्रिय चरित्र आदि; इस दृष्टि से National का पर्यायवाची शब्द है- कौमी, जातीय, राष्ट्रीय, सर्व साधारण का या  सारे देश का।
१५ अगस्त १९४७ को जो भारतवर्ष को तीन टुकड़ों में बाँट कर जो राष्ट्र गठित हुआ था, उसके पहले क्या भारत का अस्तित्व नहीं था ? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है ! -एक लंबी अवधि तक भारत एक राष्ट्र न होकर बहुत से राज्यों के रूप में था। वैदिक कालीन भारतवर्ष की सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था बहुत उन्नत अवस्था में थी। यहाँ गणतन्त्र भी प्रतिष्ठित था। कृषि, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, शिल्प हर क्षेत्र में भारतवर्ष एक उन्नत राष्ट्र था।  भौतिक से रूप से उन्नत होने के साथ साथ भारतीय लोगों की आध्यात्मिक जिज्ञाषा भी जाग्रत हुई. 
भारतीय वाङ्मय में सम्पूर्ण भारत की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र के रूप में की गयी है, जिसका भू–खंड भारत और इसमें रहनेवाली जनता भारतीय है–
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
 वर्ष तद्भारतं नाम भारती यत्र संततिः। 
आदिकाव्य ‘रामायण’ में भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक स्वरूप को ‘राष्ट्र’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है. श्रीराम के मुख से आदिकवि वाल्मीकि की पंक्तियां हैं–
नेयं स्वर्णपुरी लंका रोचते मम् लक्ष्मणः। 
जननी–जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। 
भारतीय राष्ट्रीय चेतना के सम्यक् स्वरूप के साक्षात्कार हेतु ‘अथर्ववेद’ के ‘भूमिसूक्त’ का अध्ययन–अनुशीलन भी सहायक है। भूमिसूक्त’ भारत–भूमि की विशालता और उसके नानाविध प्राकृतिक वैभव का विराट गौरवान्वयन है। इसमें हमारी मातृभूमि की गरिमा का अभिज्ञापन है। राष्ट्रीय चेतना के आधारभूत तत्त्व–देशप्रेम और जन्मभूमि के प्रति रागात्मक संवेदन का बड़े उदात्त शब्दों में प्रकटीकरण है. इसी ‘भूमि सूक्त’ के आधार पर डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने ‘दि फंडामेंटल यूनिटी ऑफ इंडिया’ नामक पुस्तक में भारत की राष्ट्रीय चेतना को पश्चिम से आयातित मानने की अवधारणा को सतर्क खंडित किया है. इस भूमि-सूक्त के एक मंत्र में  कहा गया है –
‘सानो भूमिर्विसृजतां माता पुत्राय मे पयः। ’ 
 'सा नः भूमिः मे पयः विसृजताम् माता पुत्राय' -अर्थात यह भूमि हमारी माता है, हम इसके पुत्र–जो जन इस सम्बंध का अनुभव करता है, उसी के लिए माता दूध (कल्याण) का विसर्जन करती है।  
इसी आधार पर भारतीय विद्वानों ने भी ‘राष्ट्र’ शब्द को परिभाषित किया है। डॉ. सुधींद्र के अनुसार, ‘भूमि, भूमिवासी जन और जन–संस्कृति; इन तीनों के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है। ’‘भूमि’- अर्थात भौगोलिक एकता, ‘जन’- अर्थात जनगण की राजनीतिक एकता, ‘जन–संस्कृति’ अर्थात सांस्कृतिक एकता–तीनों के समुच्चय का नाम ‘राष्ट्र’ है। आगे वे पुनः लिखते हैं– ‘भूमि उसका (राष्ट्र का) कलेवर है, जन उसका प्राण है और संस्कृति उसका मानस है.’ श्री वासुदेव शरण अग्रवाल ने ‘राष्ट्र’ शब्द को अर्थित करते हुए लिखा है– ‘राष्ट्र का सम्मिलित अर्थ पृथ्वी, उसपर रहनेवाली जनता और उस जनता की संस्कृति है.’ राष्ट्र को परिभाषित करते हुए रविन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था - " वैसे लोगों के समूह को राष्ट्र कहते हैं, जो विभिन्न प्रकार के रंग-रूप, भाषा, और वेश-भूषा में रहते हुए भी आपसी समानता और भाईचारा के बुनियाद पर एक एक साथ सुख-शांति पूर्वक निवास करते हैं। " सारतः ‘राष्ट्र’ शब्द का सम्मिलित अर्थ है- पृथ्वी, उस पर बसनेवाली जनता और जन-संस्कृति. जब ये तीनों स्वर एकमेक होते हैं, तब ‘राष्ट्र’ का जन्म होता है.
क्या इस परिवर्तनशील जगत के पीछे क्या कोई अपरिवर्तनशील सत्ता भी है ? जीवन का उद्देश्य क्या है ? जिस प्रकार आज के पाश्चात्य वैज्ञानिक वाह्य जगत में ब्रह्माण्ड की रचना के रहस्यों को खोजने में लगे हुए हैं, उसी प्रकार भारत ने भी इन प्रश्नों के उत्तर वाह्य जगत में ही खोजने की चेष्टा की थी. किन्तु कुछ धीर मनुष्यों (ऋषियों) ने नेत्रों को अंतर्मुखी बना कर अपने ही अन्तर्जगत में स्थित शाश्वत चैतन्य सत्ता का आविष्कार किया और सिद्धान्त दिया कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” अर्थात जिन पंचमहाभूतों से पूर्ण ब्रह्मांड संरचित है उन्हीं तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है, तथा जो सत्ता हमारे शरीर को चला रही है, वही चैतन्य सत्ता वाह्य जगत के पीछे रहकर उसे भी चला रही है ! सबसे पहले यह सत्य भारत में ही आविष्कृत हुआ था कि एक ही ब्रह्म इस विश्व-ब्रह्माण्ड के पीछे अवस्थित हैं. इसलिये अनासक्ति के साथ इसका उपभोग करो, किसी दूसरे के धन की आकांक्षा मत करो. तुम केवल मरण धर्म शरीर ही नहीं हो. तुम तो अमृत के पुत्र हो, तुम मृत्यु को भी जीत सकते हो।  
भारत का यही ज्ञान हजारों वर्षों से राष्ट्रीय एकता को अखण्ड बनाये हुए थी. बहु-भाषीय, बहु-जातीय, बहु-धर्मीय व्यवस्था के बावजूद भारत -ऋग्वेद के ऋषियों के द्वारा आविष्कृत सत्य  - ' एकम सत विप्राः बहुधा वदन्ति!' हमारी राष्ट्रिय अखण्डता को अक्षुण बनाये हुए थी.  इसी सिद्धान्त- ' सत्य तो एक ही है ! बुद्धिमान लोग उसका वर्णन अनेक प्रकार से करते हैं' को आधार मान कर भारत के लोग आपस में मिल-जुल कर रहते आ रहे थे. किन्तु बाद में पुरोहितों ने अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिये साधारण जनता को आध्यात्मिकता या तात्विक-दर्शन से वंचित करने के लिये केवल कर्म-काण्ड द्वारा पूजा अनुष्ठान को ही धर्म कहकर प्रचारित कर दिया। धर्म के दुर्बल हो जाने से ही राष्ट्रीय एकता खण्डित हो गयी और मुट्ठीभर विदेशी आक्रमण कारियों से पराजित होकर भारत पराधीन हो गया.
ऐसे भी समय आये जब इस उपमहाद्वीप का बहुत बड़ा भाग एक साम्राज्य के अधीन रहा; इस बार अनेक बार विदेशियों ने हमले किये। उनमें से कुछ यहाँ बस गये और भारतीय हो गये; और राजा या सम्राट के रूप में शासन किया। कुछ ने देश को लूटा-खसोटा और धन संपत्ति बटोर कर वापस चले गये। महान उपलब्धियों के भी वक्त आये और देश को जड़ता और दुख के भी अनेक दौरों से गुजरना पड़ा। और जब हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं तब हमारा तात्पर्य भारतीय इतिहास के उस दौर से होता है जिसमें भारत पर अंग्रेजों का शासन था और यहां के लोग विदेशी आधिपत्य को समाप्त करके स्वाधीन हो जाना चाहते थे।  हिन्दू-मुस्लिम सैनिकों ने मिलकर लार्ड क्लाइव से पलासी युद्ध किया था, तब से हम हिन्दू-मुसलमान लोग अपने को भारतीय कौम और अंग्रेजों को विदेशी समझते हैं। 
स्वामीजी ने ऋग्वेद के दसवें मण्डल का अंतिम सूक्त को उद्धरित करते हुए कहा था " एकचित्त हो जाना ही समाज गठन का रहस्य है।भारत के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिये राष्ट्रीय एकता आवश्यक है।  स्वतंत्र सामाजिक चेतना ही राष्ट्रीयता में परिणत हो जाती है।  राष्ट्र के समस्त नागरिकों की भाषागत, वंशगत, धर्मगत एकात्मकता ही राष्ट्रीय एकता के प्रमुख अवयव हैं। इसीलिये महामण्डल का संघगीत है -
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। 
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते || 
ईश्वर हमें उपदेश दे रहे हैं कि जीवन में मिल कर रहना, संगठित होकर काम करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। हम मिलकर चलें, एक सी ही बात कहें और हमारे सोचने विचारने में समानता हो, तभी हमारा काम ठीक होता है, काम में सफलता मिलती है अन्यथा हम लक्ष्य से कोसो दूर अपनी अपनी डफली अपना अपना राग अलापते रह जाते हैं। हम अपना स्वार्थ साधते रहते हैं और लड़ाइयां होती रहती हैं। यह समय की पुकार है कि हम मिल कर रहें। मिलकर चलें, मिलकर बोलें और समानरूप से सोचे। ऋग्वेद के दसवें मण्डल का अंतिम सूक्त है यह संगठन सूक्त। यह मंत्र उस सूक्त का एक भाग है। निश्चित रूप से अंत में कही गई बात पूरी बात का सार होती है। 
तुम समान ज्ञान प्राप्त करो, अर्थात शिक्षापद्धति में कोई भेदभाव न हो, क्योंकि शिक्षार्थी ज्ञान तो अपनी योग्यता  तथा क्षमता के अनुसार अलग अलग प्राप्त करेंगे। समानता से एक दूसरे के साथ संबंध जोड़ो, समता भाव से मिल जाओ। तुम्हारे मन समान संस्कारों से युक्त हों। कभी एक दूसरे के साथ हीनता का भाव न रखो। जैसे अपने प्राचीन श्रेष्ठ लोक के समय ज्ञानी लोग अपना कर्तव्य पालन करते रहे, वैसे तुम भी अपना कर्तव्य पूरा करो। समानता की अवधारणा कठिन है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई छोटा और बड़ा नहीं होता, सब बराबर हैं। छोटे और बड़े तो अपने कर्मों के अनुसार होते ही‌ हैं। किन्तु समानता का अर्थ है कि बिना  पक्षपात के, सब के साथ उनकी‌ क्षमता, योग्यता तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुसार व्यवहार करना। 
मंत्र में बहुत मनोवैज्ञानिक ढंग से उपदेश दिया गया है। हमारा चलना दिखाई देता है, बोलना सुनाई देता है – पर इन सब का आधार मन ही है ! मन सूक्ष्म है,वह दिखाई नही देता किन्तु, एक साथ अनुशासन बद्ध होकर बोलने और कदम से कदम मिलाकर चलने की प्रेरणा देने वाला तो मन ही है ! वशीभूत मन ही इस पर नियंत्रण रखता है कि हम साथ चलें और एक सा बोलें। सैनिको के कदम-ताल चलने में क्यों अधिक बल रहता है क्योंकि अभ्यास कराते समय बोलते भी हैं दाएं-बाएं या लेफ्ट-राईट-लेफ्ट-राईट-लेफ्ट। अनपढ़ को भी सिखाते हैं - बायाँ हाथ में घाँस-दायाँ में माटी, बोलो 'घाँस-माटी-घाँस-माटी-घाँस।  तो इस तरह पैरो को उठाना, मुख से बोलना और मन की प्रेरणा यह सब एक ही उद्देश्य के लिए काम करते हैं इसलिए शक्ति का प्रतीक बन जाते हैं। 
आज समाज की, देश की स्थिति इससे विपरीत चल रही है। हमें पता है कि संगठन में शक्ति है – ' संघे शक्ति कलौयुगे'। परंतु आज नेतृत्व ऐसे लोगो के पास है जो जनता (या संगठन) को धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर प्रांत के नाम पर बांट रहे हैं। 'नेताओ का चुनाव' भी उनकी योग्यता के आधार पर नही होता जाति या घर्म के नाम पर होता है। अपने मानव समाज और उसकी व्यवस्था को एक मशीन की तरह मानें तो जैसे मशीन के हर पुर्ज़े का महत्व है, हर पुर्ज़े का अपना काम है। सब पुर्ज़े ठीक से अपना अपना काम कर रहे हैं तो मशीन ठीक से चलती रहती है यदि कोई एक छोटा सा पुर्ज़ा भी काम न करे तो मशीन रुक जाती है। 

इसी तरह मानव समाज या  संगठन ठीक से चलता रहे , मिलकर काम करें इसके लिए ईश्वर का आदेश है मिलकर चलो , मिलकर बोलो और एक ही तरह सोचो ताकि लक्ष्य की प्राप्ति हो सके। इस मिलकर चलने की प्रक्रिया में मनुष्य को अपना स्वार्थ छोड़ना होगा, पद का लालच और घमण्ड छोड़ना होगा। क्योंकि, ये विरोधी विचार हैं, नकारात्मक चिंतन को उपजाते हैं। हम सभी दीवार के कंगूरे नही बन सकते हैं किसी को नींव का पत्थर भी बनना है। और यह भी सत्य है, कि नींव के पत्थर की मज़बूती पर ही भवन की मज़बूती निर्भर करती है। 
समाज या संगठन में भी कोई काम छोटा या कोई बड़ा नहीं है। इसके लिए ज़रुरी है कि सब अपना काम सुव्यवस्थित ढंग से करते रहें। एक दूसरे की सहायता करते हुए आगे बढ़ते रहें। अंधे और लंगड़े का सहयोग भी अच्छा उदाहरण है। अंधा देख नहीं पाता, चल सकता है और लगड़ा देख पाता है चल नहीं सकता। अंधे ने लगड़े को अपने कंधे पर बैठाया । अंधा चल रहा था और लंगड़ा मार्ग दिखा रहा था। दोनों ही लक्ष्य तक पहुँच गए। ये कहानियां तो केवल उदाहरण है। सत्य तो यही है कि एक दूसरे की सहायता करते हुए मिलकर चलो। सारे सांसारिक सुख व सम्पत्तियाँ तुम्हारे लिए है।
समानो मन्त्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम्। 
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ||


 तुम्हारे विचार समान हों अर्थात तुम्हारे लक्ष्य एक हों तथा उनके प्राप्त करने के लिये विचार भी एक समान हों। तुम्हारी सभा सबके लिए समान हो, अर्थात सभा में किसी के साथ पक्षपात न हो और सबको यथा योग्य सम्मान प्राप्त हो। तुम सबका संकल्प एक समान हो। तुम सबका चित्त एक समान-भाव से भरा हो। एक विचार होकर किसी भी कार्य में एक मन से लगो। इसीलिए तुम सबको समान छवि या मौलिक शक्ति मिली है। 

समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:|
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ||

 तुम सबका संकल्प एक जैसा हो। तुम्हारा हृदय समान हो, तुम्हारा मन समान हो। तुममें परस्पर मतभेद न हो। तुम्हारे मन के विचार भी समता युक्त हों। यदि तुमने इस प्रकार अपनी एकता और संगठन स्थापित की तो तुम यहां उत्तम रीति से आनंदपूर्वक रह सकते हो और कोई शत्रु तुम्हारे राष्ट्र को हानि नही पहुंचा सकता है।
अंग्रेजों ने कभी भी युद्ध करके भारत में किसी राज्य को नहीं जीता था वो हमेशा छल और साजिस से ये काम करते थे। अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने का अधिकार जहाँगीर ने 1618 में दिया था और 1618 से लेकर 1750 तक भारत के अधिकांश रजवाड़ों को अंग्रेजों ने छल से कब्जे में ले लिया था। बंगाल उनसे उस समय तक अछूता था। और उस समय बंगाल का नवाब था सिराजुदौला (१७३७-१७५७ ) । बहुत ही अच्छा शासक था, बहुत संस्कारवान था । उसने अंग्रेजों को व्यापार की इज़ाज़त कभी नहीं दी । अंग्रेजों ने कई बार बंगाल पर हमला किया लेकिन हमेशा हारे। 
भारत में ब्रितानी राज का प्रारंभ सन् 1757 से माना जा सकता है जब ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पलासी- युद्ध में पराजित कर दिया था। अंग्रेजों के पास प्लासी के युद्ध के समय मात्र 300 सिपाही थे और सिराजुदौला के पास 18 हजार सिपाही । अंग्रेजी सेना का सेनापति था रोबर्ट क्लाइव और सिराजुदौला का सेनापति था मीरजाफर । रोबर्ट क्लाइव ये जानता था की आमने सामने का युद्ध हुआ तो एक घंटा भी नहीं लगेगा और हम युद्ध हार जायेंगे। रोबर्ट क्लाइव ने तब अपने दो जासूस लगाये और उनसे कहा की जा के पता लगाओ की सिराजुदौला के फ़ौज में कोई ऐसा आदमी है जिसे हम रिश्वत दे लालच दे और रिश्वत के लालच में अपने देश से गद्दारी कर सके । उसके जासूसों ने ये पता लगा के बताया की हाँ उसकी सेना का सेनापति ही ऐसा आदमी है जो रिश्वत के नाम पर बंगाल को बेच सकता है और अगर आप उसे कुर्सी का लालच दे तो वो बंगाल के सात पुश्तों को भी बेच सकता है। और वो आदमी था मीरजाफर, वह प्लासी के युद्ध में रोबर्ट क्लाइव के साथ मिल गया क्योकि रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाने का लालच दे दिया था। आगे चलकर मीर जाफ़र का नाम भारतीय उपमहाद्वीप में 'देशद्रोही' व 'ग़द्दार' का पर्रयायवाची बन गया।  इस प्रकार जितने भूभाग पर ब्रिटिस राज स्थापित था उतने ही भूभाग को हमलोग भारत कहते हैं,
 किन्तु ब्रिटिश शासन काल में पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के चका-चौन्ध या आडम्बरी जीवन को देखकर भारत चकित हो गया, और भारत का पढ़ा-लिखा अभिजात्य वर्ग अंग्रेजी सभ्यता का अन्धानुकरण करने लगा. और अंग्रेजों के कथनानुसार वेदों-उपनिषदों के ज्ञान को गड़ेड़ीयों का गीत समझकर अंग्रेजी शिक्षापद्धति में पले-बढ़े आधुनिक भारत ने अपनी आत्मश्रद्धा को ही खो दिया। सनातन धर्म को भूलकर ये लोग शराब, क्लब, नाच को ही सभ्यता समझ बैठे। भोगवादी सभ्यता को अपना लेने से आजाद भारत में प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा का बोलबाला हो गया.
आजाद भारत के नेताओं ने स्वामीजी के परामर्श -'पहले मनुष्य बनो और बनाओ ' पर कभी ध्यान नही दिया जिसके फलस्वरूप स्वामीजी का नया भारत गढ़ने का स्वप्न पूरा नहीं हुआ. भारत चावल-गेहूँ के उत्पादन में विश्व का दूसरा बड़ा राष्ट्र है. दुग्ध-उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम स्थान रखता है. अन्तरिक्ष में उपग्रह को भेजने वाले क्रायोजेनिक इंजन का स्वदेश में निर्माण कर लिया गया है. फिर भी क्या कारण है कि आज भी भारत की ६० % आबादी गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन बिताने को मजबूर है ? शिक्षा का दर पुरुषों में ६० % और स्त्रियों में २७ % ही क्यों है ? एक ओर धनियों के लिये जहाँ बड़े बड़े महल हैं वहीं दरिद्रों की टूटी फूटी झोपड़ियाँ भी हैं. शिशु को पौष्टिक आहार नहीं मिलता है, एक ओर पाँचतारा सुविधा से युक्त हॉस्पिटल हैं, वहीँ बीमार होने पर  गरीबों को उचित उपचार की सुविधा भी नहीं है. 
इन्हीं  विरोधाभासों के कारण भारत की राष्ट्रीय एकता में बाधा पहुँचती है. भारत को छोटे छोटे टुकड़ों में बाँटने की साजिशें चलती रहती है. हमलोग मानवाधिकार को लेकर तो बहुत व्यस्त रहते हैं, किन्तु मनष्यों का कुछ कर्तव्य भी होता है, जिसका पालन करने से ही उसके अधिकार सुरक्षित रह सकते हैं. उन कर्तव्यों को सूचीबद्ध करने की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता ? कुछ स्वार्थी लोग अधिक भोग के लालच में सत्ता की कुर्सी पाने के लिये जिन राज्यों को बाँट कर उनकी संख्या में वृद्धि तो कर रहे हैं, किन्तु झारखण्ड आदि राज्यों में केवल कुर्सी-कुर्सी का खेल चल रहा है, आम जनता की  स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. जबकि स्वामीजी ने बहुत पहले ही कहा था -  
" याद रखो की राष्ट्र झोपड़ी में बसा है; परन्तु हाय! उन लोगों लिये कभी किसी ने कुछ किया नहीं। हमारे आधुनिक सुधारक विधवाओं के पुनर्विवाह कराने में बड़े व्यस्त हैं. निश्चय ही मुझे प्रत्येक सुधार से सहानभूति है; परन्तु राष्ट्र की भावी उन्नति उसकी विधवाओं को मिले पतियों की संख्या पर नहीं, बल्कि ' आम जनता की हालत ' पर निर्भर है. क्या तुम जनता की उन्नति कर सकते हो ? उनकी स्वाभाविक आध्यात्मिक वृत्ति (पूजा और नमाज की पद्धति) को बनाये रखते हुए, क्या तुम उनके खोये हुए व्यक्तित्व (individuality या आत्मश्रद्धा) उन्हें वापस दे सकते हो ? क्या समता, स्वतंत्रता; कार्य-कौशल तथा पौरुष में तुम पाश्चात्यों के भी गुरु बन सकते हो ? क्या तुम उसी के साथ साथ स्वाभाविक आध्यात्मिक अन्तःप्रेरणा तथा आध्यात्म-साधनाओं में कट्टर सनातनी हिन्दू भी हो सकते हो ? यह काम हमें करना है, और हम इसे करेंगे ही !
 (" Yes, We Can ! We Will Do !) तुम सबने इसीके लिये जन्म लिया है."
 उन्होंने कहा था -" जनसाधारण की उपेक्षा ही राष्ट्रीय-महापाप है ! उन्हें कौन प्रकाश देगा, कौन उन्हें शिक्षित बनाने के लिये द्वारा द्वार तक घूमेगा? उसी को मैं महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिये रोता है, अन्यथा वह तो दुरात्मा है. जब तक करोड़ो देश-वासी भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूँगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ, परन्तु सत्ता की कुर्सी या सरकारी नौकरी मिल जाने के बाद उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता। 
केवल स्वामीजी द्वारा निर्देशित 'चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा ' के बल पर ही भारत एक उन्नत राष्ट्र बन सकता है, तथा राष्ट्रिय एकता भी अखण्ड रह सकती है. स्वामीजी ने कहा था धर्म के दो पहलु हैं, एक उसका आनुष्ठानिक पक्ष है- जैसे पूजा और नमाज; दूसरा उसका अध्यात्मिक पक्ष है-'एक नूर से सब जग उपजा' इस सत्य को समझकर पृथ्वी के सभी संप्रदाय के लोगों से प्रेम और क्षमा का व्यवहार रखना। स्वामीजी का मानना था कि विश्व के सभी धर्म एक ही बात कहते हैं- " To do good and to be good ! this is whole of Religion. " धर्म वह वस्तु है, जो पशु-मानव  को मनुष्य में तथा मनुष्य को देवता में उन्नत करा देता है " धार्मिक मनुष्य का अर्थ है चरित्रवान, पवित्र जीवन और प्रेमपूर्ण ह्रदय वाला मनुष्य। विभिन्न जाति-संप्रदाय के मनुष्यों की पूजा या नमाज की पद्धतियों, बाहरी वेश-भूषा, आचार-अनुष्ठान में अंतर रहना बहुत स्वाभाविक है. यदि बगीचे में एक ही रंग के फूल खिले हों, तो शोभा नहीं होती, रंग-बिरंगे फूलों से ही बगीचे की शोभा बढती है। किसी शायर ने कहा है - चमन की शोभा फूलों के विविध रंग और खुशबू के मेल-जोल से बढ़ती है:  
चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है। 
हम ही हम हैं तो क्या हम हैं,  तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो। 
 (चमन = बगीचा), (इख़्तिलात = मेल-जोल),(इख़्तिलात-ए -रंग-ओ-बू = रंग और ख़ुशबू का मेल-जोल)
 किन्तु क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता का सहारा लेकर हिन्दू-मुसलमानों में झगड़ा कराने वाली एक पार्टी जिसकी स्थापना एक विदेशी ने भारत में अंग्रेजी राज्य को स्थायी बनाने के लिए किया था वह एक संप्रदाय-विशेष को अपना वोट-बैंक बनाने के लिये दंगे करवाती रहती है. इसीलिये श्रीरामकृष्ण ने ' सर्वधर्म समन्वय ' को स्थापित करते हुए कहा था -जितने मत उतने पथ ! जिस  किसी भी साधन-पद्धति (पूजा- नमाज ) को अपनाकर मनुष्य निःस्वार्थी बन जाता हो, वही धर्म है! क्योंकि स्वार्थी मनुष्य ही अशिक्षित और गरीब लोगों का शोषण करते हैं. इसीलिये चाहे हम किसी भी संप्रदाय में जन्म ग्रहण किये हों, निःस्वार्थी मनुष्य बनना ही हमारा प्रथम कर्तव्य है. स्वामीजी कहते थे, विभिन्न लेबल या ब्राण्ड से चिपके तथाकथित धार्मिक लोग जी ' त्रिपुण्ड और टोपी ' धारण करने को ही धर्म समझते हैं,और वैज्ञानिक तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते वैसे ही क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले राजनितिक पार्टियाँ सत्ता की कुर्सी पाने के लिये धर्मों के बीच भाईचारे और सौहार्द को नष्ट कर देते हैं. जब मनुष्य " मेरा धर्म बड़ा है, नहीं तेरा धर्म नहीं- मेरा धर्म बड़ा है !"  कहकर आपस में झगड़ा करने लगता है तो वह निःस्वार्थी बनने के बजाये - राक्षस जैसा बन जाता है और शैतान की तरह उन्मादी आचरण करने लगता है, अगर क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता की प्रतिमूर्ति दिगविजय सिंह के शब्दों में कहें तो - ' आदरणीय हफ़िज सईदजी ' जैसा बन जाता है जो २६/११ का मास्टर माइण्ड था.
 इसीलिये स्वामीजी ने कहा था, सम्पूर्ण भारत को आध्यात्मिकता या रूहानियत से प्लावित कर दिया जायेगा; जब सभी धर्म के लोग एक दुसरे की अनुष्ठानिक पद्धति पूजा-नमाज पर न झगड़ कर; समस्त धर्मों की सार बात निःस्वार्थपरता और प्रेम को जीवन में धारण कर लेंगे तो यह राष्ट्रिय एकता ही विश्व-शान्ति या वसुधैव कुटुम्बकम का रूप धारण कर लेगी।
स्वामीजी ने कहा था- अद्वैत-वेदान्त के सागर में विश्व के समस्त धर्म -'हिन्दू-मुसलमान-पारसी-सिख-ईसाई ' एक हो जाते हैं, वेदान्त की भूमि पर खड़े होकर देखने से वेद-कुरान और बाइबिल में कोई विरोध नजर नहीं आता है। उनहोंने कहा था कि सर्व-धर्म समन्वय की बुनियाद पर जो नया भारत बनेगा-उसका ह्रदय आध्यात्मिकता या रूहानियत जन्य प्रेम से परिपूर्ण होगा, उसका शरीर इस्लामिक भाईचारे द्वारा गठित और मस्तिष्क वेदान्त द्वारा गठित होगा। वेदान्तिक मस्तिष्क और इस्लामिक शरीर के साथ हृदय की रूहानियत या प्रेम को मिला देने से जब विभिन्न मतावलंबियों में अभेद भाव स्थापित हो जायेगा, तो राष्ट्रीय एकता भी स्थापित हो जाएगी। क्योंकि ह्रदय का प्रेम ही एकता का वह सूत्र है, जिसमे राष्ट्रीय एकता की भावना को पिरोया जा सकता है.  
[जलपाईगुड़ी महामण्डल के भाई समीर दासगुप्ता, सचिव; उत्तर बंगाल विवेकानन्द युवा महामण्डल के बंगला भाषण का १० मिनट का हिन्दी सारांश ]
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कँगूरा=चोटी, शिखर, कलश। गुंबद, बुर्ज=turret/ किले की दीवार में थोड़ी-थोड़ी दूर पर बने हुए ऊँचे स्थान, जहाँ से खड़े होकर सिपाही लड़ते हैं। 
वह जो चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत - इस महामण्डल को आप देख रहे हैं; वह किस पर टिकी है ? 
इसके कंगूरों (शिखर) को आप देखा करते हैं, क्या आपने कभी इसकी नींव की ओर ध्यान दिया है?  दुनिया चकमक देखती है, ऊपर का आवरण देखती है, आवरण के नीचे जो ठोस सत्य है, उस पर कितने लोगों का ध्यान जाता है ?
ठोस 'सत्य' सदा  'शिवम्' होता ही है, किंतु वह हमेशा 'सुंदरम्' भी हो यह आवश्यक नहीं है। सत्य कठोर होता है, कठोरता और भद्दापन साथ-साथ जन्मा करते हैं, जिया करते हैं। हम कठोरता से भागते हैं, भद्देपन से मुख मोड़ते हैं - इसीलिए सत्य से भी भागते हैं। नहीं तो इमारत के गीत हम नींव के गीत से ही प्रारंभ करते। 
वह ईंट महान है, जो कट-छँटकर कंगूरे पर चढ़ती है और बरबस लोक-लोचनों को आकृष्ट करती है। किंतु, धन्य है वह ईंट, जो  ज़मीन के सात हाथ नीचे जाकर गड़ गई और इमारत की पहली ईंट बनी! क्योंकि उसी पहली ईंट पर, उसकी मज़बूती और पुख़्तेपन पर- सारी इमारत की अस्ति-नास्ति निर्भर करती है।उस ईंट को हिला दीजिए, कंगूरा बेतहाशा ज़मीन पर आ गिरेगा। कंगूरे के गीत गानेवाले हम, आइए, अब नींव के (महामण्डल शिविर में डी.सी.सी.फिल्ड के) गीत गाएँ। 
वह ईंट जो ज़मीन में इसलिए गड़ गई कि दुनिया को इमारत मिले, कंगूरा मिले! वह ईंट जो सब ईंटों से ज़्यादा पक्की थी, जो ऊपर लगी होती तो कंगूरे की शोभा सौ गुनी कर देती! किंतु जिस ईंट ने यह समझ लिया कि इमारत की पायदारी (टिकाऊपन) उसकी नींव पर मुनहसिर (निर्भर) होती है, इसलिए उसने अपने को नींव में अर्पित किया। वह ईंट जिसने अपने को सात हाथ ज़मीन के अंदर इसलिए गाड़ दिया कि इमारत सौ हाथ ऊपर तक जा सके। वह ईंट जिसने अपने लिए अंधकूप इसलिए कबूल किया कि ऊपर के उसके साथियों को स्वच्छ हवा मिलती रहे, सुनहली रोशनी मिलती रहे। वह ईंट जिसने अपना अस्तित्व इसलिये विलीन कर दिया कि संसार एक सुंदर सृष्टि देखे। 
सुंदर सृष्टि सुंदर सृष्टि (संगठन) हमेशा से ही बलिदान खोजती है, बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का। हमारा समाज (या संगठन) सुंदर बने, इसलिए कुछ तपे-तपाए लोगों को 'मौन-मूक शहादत का लाल सेहरा' पहनना ही पड़ता है। शहादत भी (मार्टर्डम, स्वधर्मार्थ प्राण त्यागवही सच्ची है जो और मौन-मूक हो ! (जैसे नवनीदा ने खड़दह से कोननगर में आकर दी थी। और कोननगर से खड़दह तक की शवयात्रा में, विभिन्न राज्यों से आये महामण्डल के हजारों अनुशासित कर्मी 'मौन-मूक' होकर चल रहे थे, किसी भी अख़बार ने उनकी शहादत की खबर नहीं छापी ! पर वे अमर हैं ! )  जिस शहादत (गाँधी की शहादत) को शोहरत मिलती है, जिस बलिदान को प्रसिद्धि प्राप्त होती है, उसको ही इमारत का कंगूरा, या मंदिर का कलश कहते हैं। हाँ, सच्ची शहादत तो वही है, जो मौन और मूक होती है! (जैसे नेताजी, नवनीदा जैसी शहादत) ऐसी शहादत ही सुन्दर समाज (या सुन्दर संगठन) की आधारशिला यही होती है। 
कुछ लोग सोचते हैं कि ईसा की शहादत ने ईसाई धर्म को अमर बना दिया ; वे कहते हों तो कहें। किंतु मेरी समझ से ईसाई धर्म को अमर बनाया उन लोगों ने, जिन्होंने उस धर्म के प्रचार में अपने को अनाम उत्सर्ग (कुर्बान) कर दिया। उनमें से कितने ज़िंदा जलाए गए, कितने सूली पर चढ़ाए गए, कितने वन-वन की ख़ाक छानते हुए जंगली जानवरों का शिकार हुए, कितने उससे भी भयानक भूख-प्यास के शिकार हुए। उनके नाम शायद ही कहीं लिखे गए हों - उनकी चर्चा शायद ही कहीं होती हो। किंतु ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य प्रताप से फल-फूल रहा है। वे नींव की ईंट थे, गिरजाघर के कलश उन्हीं की शहादत से चमकते हैं। 
यदि आज हमारा देश आज़ाद हुआ है, तो सिर्फ़ उन लोगों के बलिदानों के कारण नहीं, जिन्होंने इतिहास में स्थान पा लिया है। देश का शायद ही कोई ऐसा कोना हो, जहाँ कुछ ऐसे दधीचि नहीं हुए हों, जिनकी हड्डियों के दान ने ही विदेशी वृत्रासुर का नाश किया। जब तक मनुष्य भ्रम में रहता है, अज्ञान या हिप्नोटाइज्ड अवस्था में रहता है, वह पंचेन्द्रियग्राह्य जगत को ही सत्य समझता है। हमलोग बचपन में यही देखते और समझते थे कि सूर्य घूमता है, और पृथ्वी स्थिर है। और हम यह मान बैठे थे कि जिसे हम देख नहीं सकें वह सत्य नहीं है, किन्तु बड़े होने पर पता चलता है कि यह तो हमारी भ्रान्त धारणा थी ! बुद्धि की मूढ़ धारणा थी ! सत्य (अविनाशी आत्मा या ईश्वर या 3rd 'H') तो ढूँढ़ने से ही प्राप्त होता है। या यूँ कहें की कोई विरला 'एथेन्स का सत्यार्थी' सत्य की खोज करता है, और एक दिन उस सत्य को अपने भीतर ही आविष्कृत कर लेता है ! वह सत्यार्थी 'अन्तःप्रकृति पर विजय प्राप्त करके अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करता है,और मुक्त (डीहिप्नोटाइज्ड) हो जाता है'। स्वामी जी कहते हैं -" बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मतवाद (डॉक्ट्रिन्स), अनुष्ठान-पद्धति, शास्त्र, मन्दिर या मूर्तियाँ (forms) तो उसके गौण ब्योरे मात्र हैं!"   
 (This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details.) 
हमारा कर्तव्य है,अर्थात धर्म है, ऐसी नींव की ईटों की ओर ध्यान देना। सदियों के बाद हमने नई समाज की सृष्टि की ओर कदम बढ़ाया है। इस नए समाज (सुन्दर संगठन) के निर्माण के लिये भी हमें नींव की ईंट चाहिए।अफ़सोस कंगूरा बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है, नींव की ईंट बनने की कामना लुप्त हो रही है। सात लाख़ गाँवों का नव-निर्माण! हज़ारों शहरों और कारखानों का नव-निर्माण! कोई शासक इसे संभव नहीं कर सकता। ज़रूरत है ऐसे नौजवानों की, जो इस काम में अपने को चुपचाप खपा दें।जो एक नई प्रेरणा से अनुप्राणित हों, एक नई चेतना से अभीभूत, जो शाबाशियों से दूर हों, दलबंदियों से अलग।जिनमें कंगूरा बनने की कामना न हो, कलश कहलाने की जिनमें वासना न हो। सभी कामनाओं से दूर - सभी वासनाओं से दूर। 
उदय के लिये आतुर हमारा समाज (संगठन के वुड बी लीडर्स) चिल्ला रहा है। हमारी नींव की ईंटें किधर हैं? देश के नौजवानों को यह चुनौती है!--रामवृक्ष बेनीपुरी 
(रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म सन 1902 में बिहार के मुज़फ़्फरपुर जनपद के अंतर्गत बेनीपुर गाँव में हुआ था।प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हि हुई, किंतु मैट्रिक पास करने से पहले ही वह गाँधी जी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा।  छोटी उम्र से ही वे अख़बारों में लिखने लग गए थे।उन्होंने 'तरुण भारत','किसान-मित्र','बालक','युवक','कर्मवीर','हिमालय' और 'नई धारा' जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी किया। )
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के अनुसार - ‘किसी भी सरकार का एक ही धर्मग्रंथ होता है और वह है हमारा संविधान। एक ही प्रार्थना होती है वह है भारत-भक्ति। सरकार की एक ही शक्ति है वह है उसके 125 करोड़ भारतवासी और किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होनी चाहिए।
’मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य समीक्षामहे।। 
सब व्यक्ति मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सभी व्यक्तियों को मित्र (भगवती-भगवान) की दृष्टि से देखूं। सभी परस्पर मित्र की दृष्टि से देखा करें। हे दृढ़ता के देव ! आप हमें दृढ़ता दीजिये। शुक्ल यजुर्वेद ३६-१८.
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कलश और नींव का पत्‍थर 
(हरिवंशराय बच्चन)
अभी कल ही पंचमहले पर कलश था,
और चौमहले,तिमहले,दुमहले से खिसकता अब हो गया हूँ नींव का पत्थर !
काल ने धोखा दिया,या फिर दिशा ने,या कि दोनों में विपर्यय;
एक ने ऊपर चढ़ाया,दूसरे ने खींच नीचे को गिराया,
अवस्था तो बढ़ी, लेकिन व्यवस्थित हूँ कहाँ घटकर !
आज के साथी सभी मेरे कलश थे, आज के सब कलश कल साथी बनेंगे। 
हम इमारत,जो कि ऊपर से उठा करती बराबर और नीचे को धँसी जाती निरंतर। 
यह कविता निम्नलिखित व्याख्या के साथ सन १९६१ में आकाशवाणी केन्द्र, नई दिल्ली से प्रसारित की गयी थी।  
 "यहाँ कलश किसी भवन के ऊँचे भाग का प्रतीक है--हालाँकि आधुनिक भवन निर्माण कला में कलश नहीं रक्खा जाता पर प्रतीक अपना अर्थ त्यागने को तैयार नहीं। नींव का पत्थर ईमारत का सबसे निचला भाग हुआ। जीवन के किसी भी क्षेत्र की उपलब्धि को इमारत का रूपक दिया जा सकता है। 
हर क्षेत्र में कुछ चीजें नींव के पत्थर की जगह होती हैं। उन्हीं के ऊपर सारी इमारत का दामोदर होता है, पर वे दिखाई नहीं देतीं। कलश भले ही ऊपर दिखाई दे, भवन का श्रृंगार हो, पर उसपर निर्भर नहीं रहा जा सकता; वही सारी इमारत पर निर्भर रहता है।
पर गतिमान जीवन की कोई उपलब्धि स्थिर नहीं। जो कलश बनकर ऊपर ऊपर रहता है, उसे समय पा कर बल संचित करना, और ऊपर के कलशों को संभालना पड़ता है। यह विचित्र है कि अधिक बल पाकर, अधिक महत्वपूर्ण बनकर उसे नीचे जाना पड़ता है। और, दिखावटी और निर्बल ऊपर आते जाते हैं।  किसी स्थिति पर नींव की ओर जाने वाले को असन्तोष भी हो सकता है -जो हल्के दिखावटी हैं, वे तो ऊपर हैं; जो भारी और ठोस हैं, वे नीचे ! इस कविता में इस असन्तोष को समझा और दूर किया गया है।