Wednesday, February 8, 2012

" विवेकानन्द और युवा आन्दोलन " (समस्त ४२ निबन्ध )

 प्रकाशक का निवेदन : 
स्वामी विवेकानन्द को अपने संघ का आदर्श स्वीकार करते हुए वर्ष १९६७ में अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की स्थापना हुई थी. वर्तमान समय में भारतवर्ष के १२ राज्यों के ३१५ से अधिक केन्द्रों के माध्यम से महामण्डल का कार्य चल रहा है. महामण्डल की संवाद पत्रिका Vivek-Jivan, में तथा महामण्डल द्वारा हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला, ओरिया, तेलगु इत्यादि विभिन्न भाषाओँ में जो पुस्तिकाएं प्रकाशित हुई हैं- उन पुस्तिकाओं में   एवं युवा प्रशिक्षण शिविरों में- महामण्डल का आदर्श, उद्देश्य, कार्यपद्धति, चरित्र-गठन की व्यावहारिक पद्धति, मनः संयोग इत्यादि विषयों पर विस्तार से चर्चा होती रहती है.
महामण्डल की द्विभाषी संवाद पत्रिका (अंग्रेजी और बंगला ) Vivek-Jivan में प्रकाशित सम्पादकीय निबन्ध के चुने हुए संकलनों का हिन्दी अनुवाद यहाँ झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल के सौजन्य से पुस्तकाकर में प्रकाशित किया जा रहा है.  
इस पुस्तक में महामण्डल के संस्थापक एवं अध्यक्ष श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ने महामण्डल कर्मियों को परस्पर एकात्मबोध के सूत्र में बंध कर, भारतवर्ष के पुनरुत्थान के लिए जिन महत्वपूर्ण कार्यों को अविलम्ब सम्पन्न करने के सुझाव दिए हैं, उनके उपर पाठ-चक्र में विस्तार से चर्चा करके उन्हें भली-भाँति समझ लेना नितान्त आवश्यक है. इस ग्रन्थ में ' चरित्र-गठन एवं मनुष्यत्व की जागृति ' के कार्य को भारतवर्ष के गाँव गाँव तक एक आन्दोलन के रूप में फैलादेने की अनिवार्यता तथा उपाय को बहुत सुंदर ढंग से समझाया गया है|
  इस पुस्तक में प्रकाशित समस्त ४२ निबन्ध इतने बहुमूल्य हैं कि उनका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता है. महामण्डल के सदस्यगण तथा महामण्डल की भावधारा के अनुसार संचालित दूसरे संगठन अपने अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, समस्त कार्य को किस प्रकार सफलता पूर्वक संचालित कर सकते हैं, उसका  मार्गदर्शन इस पुस्तिका में प्राप्त किया जा सकता है. 
प्रकाशक 
श्री तनुलाल पाल
(उपाध्यक्ष, अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल.)

 
१. 
विवेकानन्द और युवा आन्दोलन 
इनदिनों हमलोग अपने देश में अक्सर कई प्रकार के आंदोलनों की चर्चा सुनते रहते हैं, इनमें से प्रत्येक आन्दोलन- ' हमारी माँगें पूरी करो, नहीं तो चक्का जाम रहेगा ' की बुनियाद पर ही संचालित होते हैं. जैसे छात्र आन्दोलन, श्रमिक आन्दोलन, सरकारी कर्मचारियों की वेतनवृद्धि का आन्दोलन, समाज के विभिन्न पेशों से जुड़े लोगों का अपने अपने पेशागत अधिकार एवं सुविधाओं में वृद्धि पाने का आन्दोलन आदि. इन विभिन्न सिलसिलेवार आन्दोलनों के दबाव में सरकार या मालिक की ओर से प्रबन्धन पक्ष कभी कभी इनकी कुछ माँगों को पूरी अवश्य कर देते हैं, फिर भी इनके समक्ष जीवन निर्वाह हेतु न्यूनतम सुविधाओं का आभाव मानो किसी अटल-चट्टान की भाँति जस की तस खड़ी ही रहती है. 
किसी भी स्वाधीन देश के नागरिक यदि लम्बे समय तक अपना न्यायोचित अधिकार पाने से लगातार वंचित होते रहें, तो यह बहुत स्वाभाविक है कि उनमें विद्रोह का भाव पनपने लगता है. अब प्रश्न यह है कि आखिर क्यों वे लोग अब भी शोषित और वंचित किये जा रहे हैं ? और वे कौन लोग हैं, जो स्वाधीनता प्राप्त होने के सातवें दशक में भी उनका शोषण करने का दुस्साहस कर रहे हैं ?
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारत एक प्रजातान्त्रिक देश बन गया है, इसका अपना संविधान है, संसद है, जहाँ जन हित में कानून बनाये जाते हैं, योजना आयोग ( Planning Commission ) विभिन्न प्रकार के विकास योजनाओं को कार्यान्वित कर रहा है.फिर भी शोषित वंचित साधारण जनता तक उसका फल क्यों नहीं पहुँच पता है ? ठीक उसी प्रकार नहीं पहुँच पाता जिस प्रकार किसानों के खेत तक पहुँचने के पहले ही , सिंचाई का सारा जल छिद्रयुक्त मेढ़ से होकर बह जाता है,उसी प्रकार सरकारी योजनाओं का सारा धन भी लाभुकों तक पहुँचने के पहले ही पाइप-लाइन से चू जाता है, या सोख  लिया जाता है. 
हमारी योजनाओं के लिखित प्रलेखों एवं उनके क्रियान्वन के बीच आकाश-पाताल का सा अन्तर क्यों रह जाता है ?समाज में सर्वत्र ही एक प्रकार का नैराश्य छाया हुआ है तथा यह नैराश्य उच्च-शिक्षितों (बबुआन लोगों ) के बीच अधिक फैला हुआ है. इसीलिए उनकी अपेक्षा कम पढे-लिखे, या अर्ध-शिक्षित, किन्तु आत्मविश्वासी मनुष्य  बहुत अच्छे एवं अधिक कर्योपयोगी होते हैं. 
सच्चा पुनरुद्धार का आन्दोलन करने करने के लिये हमलोगों को तीन शर्तें पूरी करनी होंगी. सबसे पहली शर्त है- सहानुभूति ! ( या हृदय की अनुभव-शक्ति ) क्या सचमुच अपने शोषित और वंचित भाइयों के दुःख और पीड़ा को देख कर मेरे प्राण छटपटा रहे हैं ? क्या हमलोग सचमुच यह अनुभव करते हैं कि संसार में इतना दुःख-कष्ट,  अज्ञान, एवं कुसंस्कार फैला हुआ है ? क्या सचमुच मुझे ऐसा बोध होता है कि - ' मनुष्य ' मात्र ही मेरा भाई है ? क्या यह बोध मेरे रोम रोम में विद्यमान है ? क्या यह संवेदना मेरे रक्त से मिलकर मेरी नस नाड़ियों में संचारित हो रही है ? क्या तीव्र सहानुभूति से मेरा हृदय भर गया है ? क्या देश की दुर्दशा की चिन्ता ही मेरे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है ? यदि सचमुच में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाय तो समझना चाहिए कि मैंने अभी समाज संस्कारक बनने के केवल प्रथम सोपान पर ही कदम रखा है.      
उसके बाद यह देखना होगा कि क्या मैंने इसके प्रतिकार का कोई त्रुटिरहित सही उपाय- भी खोज निकाला है या नहीं ? यह संभव है कि प्राचीन धारणाओं के भीतर कई कुसंस्कार प्रविष्ट कर गए हों, किन्तु, उन्हीं कुसंस्कारों के भीतर या आस-पास ही ' स्वर्ण-बेर ' (Gold Plum ) जैसे ढेरों चिरन्तन सत्य भी दबे पड़े हो सकते हैं.क्या मैं, उन चिरन्तन सत्य स्वरूप ' स्वर्ण-खंडों ' के उपर जम चुके कुसंस्कार की परतों को धो-पोंछ कर उनके अंदर दबे दैदीप्यमान स्वर्णिम-फल रूपी ' शाश्वत-सत्य ' को बाहर निकालने का कोई उपाय- खोज पाया हूँ?
  सबसे अन्त में यह देखना होगा कि, स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में चलाये जाने वाले
इस ' चरित्र-गठन एवं मनुष्यत्व उन्मेषक ' आन्दोलन का कार्यकर्ता बनने के पीछे मेरा असली उद्देश्य भी उन्हीं की तरह-यथार्थतः महान है है या नहीं ? देशप्रेमी होने या महामण्डल द्वारा चलाये जाने वाले आन्दोलन का नेतृत्व देने की लालसा के पीछे मेरा असली अभिप्राय है ? आत्मसमीक्षा करके देखना होगा -कि मैं भी कहीं, धन, नाम-यश, पद-प्रतिष्ठा पाने की इच्छा के वशीभूत होकर, इस भारत-पुनरुद्धार आन्दोलन का एक व्रती तो नहीं बनना चाहता हूँ?
 इन दिनों मुहल्ले-मुहल्ले में प्रायः विभिन्न प्रकार के ' नवयुवक-संघ ' या ' युवा-समिति  ' का गठन होता  रहता है, जिनमें से अधिकांश संघों का संचालन किसी न किसी राजनैतिक दल के नेता ही करते हैं. ये धुरंधर नेता-गण अपने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए, इसके माध्यम से विशेष ढंग के सांस्कृतिक  कार्यकर्मों का आयोजन भी करते रहते हैं. कहना न होगा कि ऐसे आमोद-प्रमोद वाले सांस्कृतिक अनुष्ठानों के माध्यम से युवाओं का चरित्र-निर्माण नहीं हो सकता है. इस प्रकार के स्वार्थपर आंदोलनों से इतर ' युवा आन्दोलन ' का एक अलग वैशिष्ट्य एवं उद्देश्य होता है. अतेव तरुणों या तरुणियों के द्वारा स्थापित किसी भी संघ या समिति द्वारा संचालित कार्य को ' युवा-आन्दोलन ' की संज्ञा नहीं दी जा सकती है. इसीलिए यथार्थ युवा आन्दोलन का अपना एक पूर्व निर्धारित आदर्श, उद्देश्य एवं कार्यपद्धति अवश्य होना चाहिए.
यथार्थ युवा आन्दोलन की पहचान है-' पुराने लीक पर चलना छोड़ कर नये राह की खोज करना !' समाज का नवनिर्माण, राज्य का नवनिर्माण, राष्ट्र का पुनर्निर्माण करना या नयी अर्थव्यवस्था का प्रारम्भ आदि के द्वारा मनुष्यों के अन्तर्मन को किसी नवीन और उच्चतर आदर्श के प्रति उत्प्रेरित कर उसे मनुष्यत्व के उच्चतर सोपान में आरुढ़ करा देना.
जो तरुण या युवा नयी राह का अनुसन्धान करने के लिए, लीक से हट कर महत्तर (शाश्वत) जीवन जीने की राह खोजने के लिए पागलों जैसा हुआ हो, ऐसी (नचिकेता के जैसी ) महत्वाकांक्षा जिस तरुण या युवक के भीतर जाग उठी हो, वह कभी  ' सामयिक और इन्द्रियगोचर यथार्थ '  के विरुद्ध विद्रोही हुए बिना रह ही नहीं सकता.
ऐसा अशांत और विद्रोही मन जिस किसी के पास हो तथा उसने यदि ' सामयिक और इन्द्रियगोचर यथार्थ ' दिखने वाले भ्रम-गाँठ को काट कर महत्तर जीवन- दृष्टि (ज्ञानमयी-दृष्टि) तथा परमानन्द के स्वाद को भी चख लिया है, केवल उसी व्यक्ति ने युवा आन्दोलन के मर्म को जाना है ( जिसे नचिकेता के जैसा जीवित अवस्था में ही यमराज का साक्षात्कार हो चूका हो ), तथा केवल वैसा ही व्यक्ति यथार्थ युवा-संगठन या नवयुवक-संघ  गठित करने का अधिकारी है ! यदि अन्यान्य तरह के आंदोलनों से हमारी अन्तर-क्षुधा भी शांत हो गयी होती, तो ' चरित्र-गठन एवं मनुष्यत्व-बोध की जागृति ' करने में समर्थ इस नये ढंग के ' युवा-महामण्डल ' रूपी-  युवा आन्दोलन का कभी जन्म भी न हुआ होता.
यथार्थ युवा- आन्दोलन केवल व्यक्ति या समाज को ही नहीं,बल्कि पूरी मानव-सभ्यता को ही ' जरा ' (Decrepitude) एवं ' वार्धक्य ' (उम्र के आधार पर सेवानिवृत्ति की बाध्यता ) के पंजों से छुटकारा दिलाना चाहता है तथा मनुष्य-मात्र के ' तारुण्य ' को अमरता प्रदान कर उसे अक्षुन्न बनाये रखना चाहता है. तभी तो युगों युगों से तरुणों का प्राण (हृदय का रक्त), हर प्रकार के अन्याय (नाइंसाफी) एवं अधर्म के विरुद्ध, कायरता के विरुद्ध, क्लैव्यता के विरुद्ध, अज्ञानता के विरुद्ध, तथा सभी तरह के बन्धनों के विरुद्ध संग्राम ही करता चला आ रहा है. 
बहुत से लोग ऐसा मानते हैं, कि जर्मनी के कार्ल फीसर ने १८९७ ई० में इस प्रकार के युवा-आन्दोलन के जनक हैं, किन्तु यह बात सत्य नहीं है ! ( भारत में प्रह्लाद का आन्दोलन, ध्रुव का आन्दोलन भागवत में तथा नचिकेता का आन्दोलन कठोपनिषद में लीपिबद्ध है.) जब-जब मानव-सभ्यता ' जरा एवं वार्धक्य ' की व्याधि से ग्रस्त होगी, तब तब उसे ' जरा एवं वार्धक्य ' के पंजों से छुटकारा दिलाने के लिए एक अभिनव
 'युवा-आन्दोलन' भी आविर्भूत होता रहेगा ! अति प्राचीन युग में हमारे पूर्वज ' राम-राज्य ' स्थापित करने का स्वप्न देखा करते थे. ग्रीस के लोग एक ' आदर्श प्रजातंत्र ' को स्थापित करने का स्वप्न देखते थे. 
मानव-सभ्यता एवं संस्कृति के जन्म के समय से ही मनुष्य के मन में प्रश्न उठता रहा है- कि आखिर उसके जीवन का उद्देश्य क्या है ? वह क्यों जीवित है, तथा जीवन-ज्योति की समाप्ति के पूर्व ही इस जीवन को सार्थक कैसे बना सकता है ?  इस प्रश्न का यथार्थ उत्तर, जिस व्यक्ति को नहीं मिल पाता, वह अपने जीवन में उन्नति करने  की शक्ति भी खो देता है. वैसा व्यक्ति अपना जीवन निरर्थक या निष्फल प्रतीत होने लगता है, तथा वह अपनी आत्म-शक्ति  का उद्घाटन करने में असफल हो जाता है.
विश्व के समस्त देशों के मनीषियों तथा चिंतनशील विद्वानों ने तरुणों का जयगान किया है. बर्लिन विश्व विद्यालय के प्राध्यापक पौल्सन अपनी पुस्तक ' दर्शन-भूमिका ' में कहते हैं- " धरती के वक्षस्थल पर सम्पूर्ण विश्व में जितनी बार भी क्रांतियाँ घटित हुई हैं, उतनी ही बार उसके अग्रदूत (प्रणेता) के रूप में ' महान युवक संघ ' ही आविर्भूत हुआ है. 
विख्यात मानव-विज्ञानी (Anthropologist ) डॉ ० भूपेन्द्रनाथ दत्त कहते हैं- " बालकों एवं तरुणों का कार्य ही स्वप्न देखना है. तथा जो लोग बाल्यकाल के स्वप्नों को मूर्त रूप देने की प्रचेष्टा में अपना सारा जीवन न्योछावर कर देते हैं, आगे चलकर वैसे ही लोगों को इतिहास समाज-सुधारक या क्रन्तिकारी कहता है तथा उनमें से जो व्यक्ति अपने सपनों को साकार करने में सफल हो जाते हैं, उन्हें युग-प्रवर्तक या ' युगावतार ' की संज्ञा देकर उनके प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करता है.
  " प्रख्यात मनीषी विनय सरकार लिखते हैं- " युगों युगों से विश्व के समस्त देशों में वहाँ के १६ से २० वर्ष के एवं  २६ से ३० वर्ष के तरुणों-तरुणियों की मुट्ठियों में ही उस देश की उन्नति की चाभियाँ झनझनाया करती हैं ! " जापान के डॉ मतोदा कहते हैं- " युवाओं का ' जीवन-व्रत '  वर्तमान में तथा ' लक्ष्य ' भविष्य में टिका होता है. "
आधुनिक युग में हमलोगों ने ऐसे ही एक युवा-नेता श्रीरामकृष्ण को एक अभूतपूर्व ' युवा-संगठन ' गढ़ते हुए देखते हैं. वे दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में अपने कमरे की छत पर खड़े होकर युवाओं को ही अपना सबसे नजदीकी सहायक मानते हुए आह्वान करते हैं- " तुम सब कौन, कहाँ हो रे -आओ ." एवं इस तथ्य से विश्व का कोई भी वैज्ञानिक तर्कबुद्धि से सम्पन्न व्यक्ति अस्वीकार नहीं कर सकता, कि उनके उस आह्वान के प्रतिउत्तर में उनके पास- प्राण उर्जा से परिपूर्ण, ( नरेंद्र-काली प्रमुख ) कुछ युवा एकत्र हो जाते हैं, एवं उन्हीं के निर्देशन में युवाओं का वह संगठन धार्मिक कट्टरता तथा अधर्म के विरुद्ध आन्दोलन चलाकर एक अभिनव 
 ' रामकृष्ण- साम्रज्य ' की स्थापना कर देते हैं !
आज महामण्डल भी अपने नेता स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में एक अखिल भारतीय युवा संगठन का गठन करने में जुटा हुआ है. यह आन्दोलन ' हमारी माँगें पूरी करो ! ' का नारा लगाने वाले अन्य आंदोलनों के जैसा कोई निजी-स्वार्थ पूर्ति की बुनियाद पर खड़ा आन्दोलन नहीं है.  और न ही यह आन्दोलन किसी प्रकार के अधिकार-प्राप्ति का आन्दोलन ही है. यह आन्दोलन स्वयं ' मनुष्य बनने और बनाने का आन्दोलन ' है, चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन है. आज के प्रबुद्ध युवा यह समझ चुके हैं कि किसी दिशाहीन एवं बिखरे हुए छुट-पुट आंदोलनों से देश की समस्याओं का समाधान कभी  नहीं होने वाला है. 
अतः आज वैश्विक और सार्वभौमिक कल्याण की बुनियाद पर एक राष्ट्रव्यापी  ' मनुष्यत्व उद्घाटक एवं चरित्र-निर्माणकारी ' आन्दोलन खड़ा करना होगा, जिसके उपादान हमें ' रामकृष्ण-विवेकानन्द विचार-धारा ' के अंतर्गत ही प्राप्त करने होंगे. इसीलिए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- ' भारत माता कम से कम १००० युवकों का बलिदान चाहती है- मस्तिष्क वाले युवकों का पशुओं का नहीं ' (१/३३९) क्योंकि जो व्यक्ति साहसी, विश्वासी, चरित्रवान, निःस्वार्थी तथा बुद्धिमान होते हैं, वैसे ही लोग इतिहास की रचना करते हैं. तथा महामण्डल इस तथ्य को भली भाँति जान चुका है कि ' चरित्र-निर्माण ' एवं ' मनुष्यत्व-बोध की जागृति ' के भीतर ही सार्वभौमिक कल्याण की कुंजी है.  
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२. 
स्वामीजी की दृष्टि में आदर्श मनुष्य !

स्वामी विवेकानन्द की विचार-धारा को कलम-बंद करते समय भी भय होता है. किन्तु इन दिनों पत्र-पत्रिकाओं तथा राजनैतिक सभाओं में उनके विषय में इतना कुछ लिखा और बोला जा रहा है, कि जो लोग केवल उन्हीं सब बातों को पढ़-सुन कर, उनके जीवन तथा सन्देश के विषय में कोई धारणा बनाने की चेष्टा करते हैं, वे अक्सर भ्रमित ही रह जाते हैं.
 स्वामीजी ने डरने से मना किया है, उनकी इसी उक्ति को ढाल बनाकर, जो जी में आये उसी को निडरता के साथ स्वामीजी का विचार कहकर लिख देना या बोल देना उचित नहीं है. फिर भी ऐसा अक्सर होता रहता है. इसलिए भय होता है, कहीं इस लेखनी से भी तो वैसा ही कुछ नहीं लिखा जायेगा.इसीलिए उनके सम्बन्ध में लिखना या बोलना कम करके, स्वयं स्वामीजी के द्वारा ( विवेकानन्द साहित्य १० खंड में ) जो लिखा और बोला गया है, उसे ही पचा लेने की चेष्टा की जाय तो अधिक लाभ होने की संभावना है. किसी के पुरजोर अनुरोध करने पर यदि कोई तलछँट भी निगल लेने की चेष्टा करें, और वह गले में अटक जाय, तो वह भारी संकट में भी फंस सकता है.
प्रायः ऐसा सुनने को मिलता है कि स्वामीजी की शिक्षाओं का केन्द्रीय बिंदु ( Spotlight ) है- ' मनुष्य !' तथा इस बात से हमसभी लोग परिचित हैं कि- ' मनुष्य-योनी ही सर्वश्रेष्ठ योनी है !' महाभारत में भी कहा गया है-
" गुह्यंब्रह्म तदिदं वो ब्रवीमि । न मनुष्यात श्रेष्ठतरम हि किंचित । ।
इसीलिए हम समझ सकते हैं कि मनुष्य हि सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, उससे बड़ा और कुछ नहीं है. स्वामीजी भी मनुष्य का ही जयगान करते हैं, उन्होंने तो मनुष्य को ही ईश्वर कहा है. किन्तु क्या इस बात को समझ पाना इतना आसान है ?
 शायद नहीं. राग-विवेकानन्द के सुर का वादीस्वर क्या मनुष्य है ? कोई बिल्कुल नया गवैया यदि मनुष्य को ही वादीस्वर बनाकर गाने लगे तो निपुण-गवैया हो सकता है कहेंगे- ' राग विवेकानन्द ' में वादीस्वर ब्रह्म (ईश्वर या भगवान ) हैं और मनुष्य है संवादी स्वर; उस स्वर में गाने से ही विवेकानन्द-संगीत का मर्म ठीक से समझ में आ सकेगा. यह बात बिल्कुल सही है कि मनुष्य श्रेष्ठ प्राणी है, उससे बड़ा और कुछ नहीं है. किन्तु इस बात को भी समझना पड़ेगा कि यह बात किस परिपेक्ष्य में कही गयी है ? 
अश्वत्थ वृक्षरूप इस सृष्ट जगत में मनुष्य श्रेष्ठ है, उस बड़ा और कुछ नहीं है. श्रीमद भागवत महापुराण में भी इस बात को बहुत अच्छी तरह समझाया गया है, तथा यह भी स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि मनुष्य को ही क्यों श्रेष्ठतम प्राणी कहा गया है ?
सृष्ट्वा पुराणि विविध अन्यजया आत्मशक्या, ' वृक्षान-सरीसृप-पशुन-खग-दंश-मत्स्यान ' ।
तैस्तर तुष्ट हृदय पुरुषं विधाय; ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः ।। (भागवत ११/९/२८ )
स्रष्टा ब्रह्मा ने पहले स्थावर, जंगम, पशु-पक्षी, डंक मारने वाले, जलचर-नभचर आदि कई योनियों कि रचना की, किन्तु जब वे इनमें से किसी से भी संतुष्ट नहीं हो सके, तब सबसे अंत में उन्होंने मनुष्य की सृष्टि की. अपनी इस असाधारण सृष्टि को देखकर उन्हें बहुत आनंद हुआ, क्योंकि  मनुष्य का अन्तःकरण इतने उच्च कोटि का था, कि वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने या अपने सृष्टा को भी जान लेने में समर्थ था.
स्वमीजी भी बिल्कुल इसी असाधारण सामर्थ्य के लिए ही मनुष्य को श्रेष्ठतम कहते हैं.वे ईसाई एवं मुसलमानों के पुराणों से इसीसे मिलती-जुलती कहानी सुनाया करते थे- " युहुदियों और मुसलमानों के मतानुसार, ईश्वर ने फरिश्तों एवं अन्य जीवों की रचना करने के बाद, मनुष्य की सृष्टि की. अपने द्वारा सृष्ट ज्ञानलाभ के एकमात्र अधिकारी मनुष्य नामक जीव का निर्माण करने के बाद वे आनंद से पुलकित हो उठे ! उन्होंने समस्त फरिस्तों या देवदूतों को बुला कर आदेश दिया कि तुमलोग इस मनुष्य को सलाम करो, अपना सीश झुका कर इनका अभिनन्दन करो. इब्लीस को छोड़कर बाकी सभी फरिस्तों ने वैसा किया. अतेव, ईश्वर ने इब्लीस को अभिशाप दे दिया, जिससे वह शैतान बन गया. इस रूपक में यह महान सत्य नहित है कि मनुष्य ही अन्य समस्त योनियों की अपेक्षा श्रेष्ठ है. " (१/५३ )
स्वामीजी की इस उक्ति का समर्थन करते हुए अथर्ववेद में कहा गया है- 
" तस्मात वै विद्वान् पुरुषमिदं ब्रह्मेति मन्यते । " 
- इन्हीं सब कारणों से विद्वान व्यक्ति मानवमात्र को ब्रह्मस्वरूप ही जानते हैं. भगवान श्रीकृष्ण भी गीता (१५/१) में कहते हैं- ' इस संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष का मूल उपर ब्रह्म में है और शाखाएँ नीचे की ओर हैं. इस अश्वत्थ को (मनुष्य सहित सृष्ट जगत को ) जो समूल जानता है वही ' वेदवित् ' -अर्थात ज्ञानी है, और श्रीरामकृष्ण की भाषा में ' विज्ञानी ' है.
मनुष्य को ' समूल ' जान लेना ही मुख्य बात है. मनुष्य को या जगत को केवल उपरी तौर पर जान लेना ही काफी नहीं है, बल्कि इसको ' समूल ' -अर्थात कारण-सहित जानना होगा. अर्थात यह जान लेना होगा कि ' वे ' (सच्चिदानन्द,माँ काली, ईश्वर, अल्ला या God या ठाकुरदेव ) ही सबकुछ बने हुए हैं, ' मनुष्य '-रूप में भी वे स्वयं हैं ! 
यदि अपने जीवन में ऐसा बोध घटित नहीं हुआ, तो केवल ' ८४ लाख योनियों में मनुष्य योनी ही श्रेष्ट है ' रटते रहने से, हमलोग भी ' मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति ' बने रहेंगे, तथा मनुष्य के रूप में एक पशु के समान इधर-उधर मुँह मारते फिरेंगे. वैसे लोग धरती के बोझ ही बने रहेंगे, जिनकी संख्या हाल के दिनों में बढ़ती जा रही है.
इसीलिए राग-विवेकानन्द का समवेत स्वर  है- ' कैसा मनुष्य बनना होगा ? तथा मनुष्यत्व-बोध की जागृति कैसे होगी ?' केवल मनुष्य का ढांचा मिल जाने से ही कोई व्यक्ति मनुष्य नहीं बन जाता, उसमें के
भीतर ' मनुष्यत्व ' का जागरण या उन्मेष घटित होना भी आवश्यक है. यह हो जाने से समस्त समस्याओं का समाधान हो जायेगा.
ब हमलोग यह भली-भाँति समझ पाएंगे कि इस ' उर्ध्वमूल अधःशाख अश्वत्थरूप ' प्रकृति ने शाखाओं-टहनियों, कोटर( छेद ), पत्ते, फूल, फल के द्वारा समस्त जीवों के यथार्थ स्वरूप को आवृत ( बन्द ) कर रखा है. ऐसा होने पर भी, उसके यथार्थ स्वरूप में कोई फर्क नहीं पड़ता, वह ब्रह्मवान है- अर्थात केवल ब्रह्म ही सब  रूपों में विचरण कर रहे हैं. स्वामीजी ने इसीलिए तो कहा है - ' तुम्हारा समाज उस विराट महामाया की छाया (प्रतिबिंब ) मात्र है.' इसीलिए केवल मनुष्य ही इस ' ब्रह्मवृक्ष ' की कान्तिरूप ' बुद्धि ' की सहायता से 
' तत्वज्ञान ' के ' असी ' (तलवार) द्वारा उसको छिन्न-भिन्न या खंडित करके स्वयं को जन्म-मृत्यु, ' जरा- वार्धक्य ' के पाशों से मुक्त करने में समर्थ है. 
स्वामीजी कहते हैं- "प्रकृति के उपर विजय प्राप्त करने के लिए ही मनुष्य ने जन्म ग्रहण किया है, उसका दासत्व करने के लिए नहीं. मनुष्य को तभी तक मनुष्य कहा जा सकता है, जब तक वह प्रकृति से उपर उठने के लिए संग्राम करता है. " (२/१९७)  वे कहते हैं- " हमलोगों को केवल मनुष्य ही चाहिए, जितना अधिक संख्या में हो सके उतना ही अच्छा है. " प्रश्न है कैसा मनुष्य चाहिए ? 
सान फ्रांसिस्को में ९ अप्रैल १९०० के भाषण में स्वामीजी उत्तर देते हुए कहते हैं- " What we want is to see the man who is harmoniously developed ...great in heart, great in mind, [great in deed]...We want the man whose heart feels intensely the miseries and sorrows of the world...and we want the man who not only can feel but can find the meaning of things, who delves deeply into the heart of nature and understanding. We want the man who will not even stop here, but who wants to work out the feeling and meaning by actual deeds. Such a combination of head, heart and hand is what we want. " (C.W.6/49)
" हम उस मनुष्य को देखना चाहते हैं, जिसका विकास समन्वित रूप से हुआ हो...हृदय से विशाल, मन से उच्च, [ कर्म में महान ]... हम ऐसा मनुष्य चाहते हैं, जिसका हृदय संसार के दुःख-दर्दों को तीव्र संवेदनशीलता के साथ अनुभव करे...और हम चाहते हैं ऐसा मनुष्य-जो न केवल अनुभव कर सकता हो, वरन वस्तुओं के अर्थ का  भी पता लगा सके, जो प्रकृति और उसके बोध पर गहन शोध करके उसकी विशद जानकारी प्राप्त कर सकता हो. हम चाहते हैं ऐसा मनुष्य-जो यहाँ भी न रुके, वरन जो उस बोध या अनुभूति के अर्थ ( - ' अहं ब्रह्मास्मि !' )को यथार्थ कार्यों में रूपायित कर के दिखा सकता हो. हम प्रत्येक मनुष्य में हृदय,मस्तिष्क,और हाथों [Head, Heart and Hand -' 3H ' ] का ऐसा ही एक सुसमन्वित संयोजन देखना चाहते हैं. " (३/२१४)
वे पुनः कहते हैं- " There are many teachers in this world, but you will find that most of them are one-sided. One sees the glorious middy sun of intellect and sees nothing else. Another hears the beautiful music of love and can here nothing else. Another is immersed in activity, and has neither time to feel nor time to think. Why not have the giant who is equally active, equally knowing, and equally loving ? Is it impossible ? Certainly not. This is the man of the future, of whom there are only a few present. The number of such will increase until the whole world is humanised !(C.W. 6/50 ) 
" इस संसार में लोक शिक्षक ( जन-नेता या मार्गदर्शक या गुरु ) तो बहुत से हैं, पर तुम पाओगे कि उनमें से अधिकतर एकांगी हैं. एक को बुद्धि का देदीप्यमान मध्याह्न सूर्य दिखाई देता है और कुछ नहीं सूझता. दुसरे को प्रेम का सुंदर संगीत सुनाई देता है, और कुछ नहीं सुन पड़ता. एक काम में डूबा हुआ है, उसे न कुछ महसूस करने का समय है, न विचार करने का. फिर हम उस महामानव को क्यों न प्राप्त करें, जो समान रूप से क्रियाशील, ज्ञानवान और प्रेमवान हो ? क्या यह असम्भव है ? निश्चय ही नहीं. बल्कि भविष्य में ऐसे ही  मनुष्यों का निर्माण होने वाला है. वर्तमान समय में ऐसे मनुष्यों की संख्या थोड़ी ही है किन्तु निकट भविष्य में  ऐसे ही पूर्ण विकसित मनुष्यों की संख्या उस समय तक बढती जाएगी जब तक कि समस्त संसार का मानवीकरण नहीं हो जाता. " (३/२१५)
इसी बात को अपने भाषण ' विश्व धर्म का आदर्श ' में दूसरे ढंग से समझाते हुए स्वामीजी कहते हैं- " Would to God that all men were so constituted that in their minds all these elements of philosophy, mysticism, emotion and of work were equally present in full ! That is the ideal, my ideal of a perfect man. Everyone who has only one or two of these elements of character, I consider 'one-sided'.(C.W.2/388)
I would like to get extreme exponents of all these different sects, and shut them up in a room, and photograph their beautiful derisive smiles !"  (C.W.2/387)
" भगवान की इच्छा से यदि सब लोगों के मन में इस ज्ञान, योग, भक्ति और कर्म का प्रत्येक भाव ही पूर्ण मात्रा   में और साथ ही समभाव से विद्यमान रहे, तो मेरे मत से मानव का सर्वश्रेष्ठ आदर्श यही होगा. जिसके चरित्र में इन भावों में से एक या दो प्रस्फुटित हुए हैं, मैं उनको एकपक्षीय कहता हूँ...समभाव से विकास लाभ करना ही मेरे कहे हुए धर्म का आदर्श है. " (३/१५१) " 
मैं इन सब भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के चुने चुने धर्म-ध्वजियों (चरम व्याख्याताओं ) को एकत्र कर एक कमरे में बंद कर उनके सुंदर व्यंगात्मक मुस्कान (एक दूसरे पर कटाक्ष ) का फोटोग्राफ लेना चाहता हूँ !" (३/१५०)  
और इसीलिए स्वामीजी चरित्र को ही धर्म कहते हैं, और जब किसी व्यक्ति का चरित्र गठित हो जाता है, अर्थात उसे धर्मलाभ हो जाता है, तब वह धर्म (चरित्र) पशु को मनुष्यत्व में एवं मनुष्य को देवत्व में उन्नत कर देता है. वास्तव में धर्म का अर्थ -" अपने स्वरूप में लौट जाना मात्र है ! " इसीलिए यह सर्वोच्च संभावना सभी मनुष्यों में अंतर्निहित है. इसीलिए स्वामीजी कहते हैं- " साधारण मानव ' यथार्थ मनुष्य ' का अवनत रूप मात्र है. मनुष्य ही वास्तव में ईश्वर हैं, किन्तु भ्रमवश हमलोग उनको मनुष्य कह कर पुकारते हैं. मनुष्य ही ईश्वर है, मनुष्य ही नारायण है ! "
  महाभारत में भी श्रीकृष्ण अर्जुन से ठीक यही रहस्य उद्घाटित करते हुए कहते हैं -
" नरत्वं नारायणोSसि । " 
स्वामीजी कहा करते थे कि गीता के दो श्लोक उन्हें सबसे प्रिय लगते हैं, उनमें से पहला है-
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ।। 13/28।।
[ हि = क्योंकि ( वह पुरुष) ; सर्वत्र = सब में ; समवस्थितम् = सभभाव से स्थित हुए ; ईश्र्वरम् = परमेश्र्वर को ; समम् = समान ; पश्यन् = देखता हुआ ; आत्मना ; अपने द्वारा ; आत्मानम् = आपको ; न हिनस्ति = नष्ट नहीं करता है ; तत: = इससे (वह) ; पराम् = परम ; गतिम् = गति को ; याति = प्राप्त होता है ]
-जब मनुष्य सर्वत्र, अर्थात सभी जीवों में ईश्वर को अवस्थित देख लेता है, तब सबों के साथ एकत्व की अनुभूति के लिए फिर उसके द्वारा अन्य किसी के प्रति हिंसा करना संभव नहीं होता, क्योंकि यह अपने प्रति ही हिंसा होगी. ऐसा होने से ही मनुष्य की परमगति ( जीवन्मुक्ति ) होती है. जीवन में शांति पाने का यही उपाय है. उसी प्रकार भागवत में भी कहा है- 
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु मंगलम ।
समदृष्टेस्तदा पुंस: सर्वा: सुखमय दिश : ।।
- जब सर्वभूतों के प्रति समदृष्टि की सहायता से अमंगल का भाव पूरी तरह निवृत्त हो जाता है तब मनुष्य के लिए सब कुछ सुखमय हो उठता है. उसके बाद उस व्यक्ति को अपना जीवन किस प्रकार व्यतीत करना चाहिए ? उसे महाभारत में कहा गया है-
' तस्मात कल्याणं आचरेत ।' 
केवल किसी की हिंसा न करने या बुरी इच्छाओं को मन में न उठने देने में सक्षम बन जाने से ही जीवन सार्थक नहीं होगा, सर्वदा कल्याणकारी कार्यों के निष्पादन में लगे रहना होगा. इसीलिए स्वामीजी २३ जून १८९४ को मैसूर के राजा को लिखित एक पत्र में कहते हैं- " This life is short, the vanities of the world are transient, but they alone live who live for others, the rest are more dead than alive. " (cw4/363)  
 " यह जीवन क्षणस्थायी है, संसार के भोग-विलास की सामग्रियाँ या पद-प्रतिष्ठा जैसे जिन वस्तुओं को पाकर मनुष्य घमंड करता है, वे सब भी क्षणभंगुर हैं. वे ही यथार्थ जीवित हैं, जो दूसरों के लिए जीवन धारण करते हैं. बाकी लोग तो जिन्दा लाश ही हैं." (२/३७१) एक बहुत प्राचीन उक्ति है - 
    सुजनाः सुधनास्ते हि कृतन : सुखिनः तथा ।
        जन्तवो ये हि जीवन्ति परस्य हितकामया ।।
  - वे ही सुजन हैं, सच्चे मनुष्य हैं, वे ही यथार्थ धनवान और कीर्तिवान हैं और सब प्रकार से सुखी हैं जो दूसरों की हित कामना को लेकर ही जीवन धारण करते हैं. स्वामीजी के साँचे में ढला मनुष्य भी इसी प्रकार का
एक ' सुजन ' होगा.  
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३. 
चाहिए एक आदर्श -जीवन !
जब से केंद्र में नई सरकार गठित हुई है, तभी से यह ढिंढोरा पीटा जा रहा है, कि बस अब परिवर्तन की एक बड़ी लहर आने ही वाली है ! अब आर्थिक उदारीकरण की नीति को तेजी से लागु करके, शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाकर तथा नये नये क़ानूनी मसौदों ( R.T.I कानून या लोकपाल बिल आदि )  की सहायता से देश की समस्त समस्यायों का स्थायी समाधान बस होने ही वाला है. 
किन्तु यह बात हमलोगों को अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि, जब तक ' चरित्र गठन और मनुष्यत्व जागरण ' के कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तथा भारत के नागरिकों को देशवासियों के कल्याण की चिन्ता से उद्बुद्ध, ईमानदार एवं देशभक्त नहीं बनाया जा सकेगा, हमलोग चाहे जितना भी हो-हल्ला मचाते रहें, देश का पुनर्निर्माण कभी सम्भव नहीं होगा. 
इस सत्य को सर्वप्रथम स्वामीजी ने ही आविष्कृत किया था, कि  " भारतवर्ष के राष्ट्रिय-जीवन के स्पंदन को  शहरों में एवं शहरों की अट्टालिकाओं में नहीं सुना जा सकता है, यथार्थ भारत झोपड़ियों में निवास करता है. इसीलिए यदि भारतवर्ष के राष्ट्रिय जीवन का स्पंदन सुनना चाहते हों, तो हमें विकास को दरिद्र की झोपड़ियों  तक ले जाना होगा. केवल कुछ मध्यम-वित्तीय या उच्च-वित्तीय व्यक्तियों के लिए सुख, भोग, विलासिता की सामग्रियों को सुलभ बनाते रहने या उनके जीवन-यापन का स्तर ऊँचा हो जाने से ही देश की उन्नति नहीं हो सकती है. करोडों-करोड़ शोषित, वंचित, उत्पीड़ित, पददलित मनुष्य, करोड़ों-करोड़ खेती-मजदूरी करने भोजन जुटाने वाले मनुष्य; - युगों युगों से धनाड्य-मनुष्यों के पैरों तले कुचले जाने के कारण, अपने ' मनुष्यत्व ' तक को भूल गये हैं. अपने ऐसे सभी देशवासियों के लिए अन्न, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा आदि की समुचित व्यवस्था करके उनके विलुप्त मनुष्यत्व को वापस लौटा देने से ही यथार्थ राष्ट्रिय उन्नति संभव हो सकती है." 
अर्थात स्वामीजी के परामर्श को मानें तो, भारत की गरीब आमजनता का खोया हुआ ' मनुष्यत्व ' (Divinity) लौटा देना, ही किसी जनता के द्वारा चुनी गयी राष्ट्रिय सरकार का सबसे प्राथमिक कर्तव्य है. किन्तु यह अत्यंत दुःख का विषय है कि स्वाधीनता प्राप्ति के ६० वर्ष बीत जाने के बाद भी किसी भी सरकार का ध्यान इस कार्य की ओर गया ही नहीं है. जबकि इतना विराट कार्य सरकारी उद्द्य्म के अतिरिक्त, १०० करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले इस देश में, अन्य किसी गैर सरकारी संगठनों के द्वारा हो पाना संभव नहीं है. 
अब प्रश्न यह उठता है कि ' भारत-कल्याण ' जैसे महान कार्य में महामण्डल जैसे किसी गैर सरकारी संगठन की क्या भूमिका हो सकती है ? इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले- हमें इस प्रश्न का उत्तर ढूँढना होगा कि- जब यहाँ आम जनता के द्वारा चुनी हुई प्रजातान्त्रिक सरकार है, इसे चलाने के लिए विशाल सरकारी तंत्र एवं विपुल सम्पदा है, तो फिर इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इस देश की सरकारें, क्यों अभी तक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले करोड़ो दरिद्र, वंचित नागरिकों तक जीवित रहने के लिए जो न्यूनतम आवश्यकताये हैं, उतना भी नहीं पहुंचा पाई हैं ? 
इसका मूल कारण यह है कि सत्ता के शीर्ष पर जो लोग बैठे हैं, जो देश की नीतियों का निर्धारण करते हैं, उनमें से अधिकांश लोग न तो यथार्थ मनुष्य हैं और न वे अपने देश या देशवासियों से प्यार ही करते हैं. वे लोग घमंडी और घोर स्वर्थी हैं. अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए वे भ्रष्टाचार के किसी भी हद (एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ ) तक जा सकते हैं. 
देश की जनता उनके उपर विश्वास करके जब उनके हाथों में सत्ता की बागडोर सौंप देती है, तब वे उनको भूल जाते हैं, देश एवं देशवासियों की घोर दुर्दशा देख कर भी उनका हृदय द्रवीभूत नहीं होता है. किन्तु सत्ता की कुर्सी पर कब्जा जमाये रखने की कला के रूप में कई बार उन पत्थर-दिल नीतिनिर्धारकों को भी कुछ कल्याणकारी योजनाओं (जैसे मनरेगा, खाद्य-सुरक्षा योजना, पाँच रूपये में दाल-भात योजना आदि,आदि.)  का विज्ञापन देना ही पड़ता है. किन्तु किसी भी मौलिक कल्याणकारी योजना को जो लोग धरातल पर रूपायित करेंगे, वे लोग ही यदि ईमानदार और योग्य न हों तो वह योजना सही ढंग से रूपायित नहीं होगी, तथा आम जनता तक उसका लाभ नहीं पहुँच सकेगा. 
इसीलिए विधायिका और कार्यपालिका के सभी स्तरों पर काबिज व्यक्तियों में से अधिकांश को सच्चे मनुष्य के रूप में परिवर्तित करना होगा, ( उन्हें पशु-मानव से देव-मानव में रूपांतरित करना होगा ) जो अपने देश वासियों के दुःख से दुखी होकर उनकी कल्याण की चिंता के प्रति संवेदनशील तथा आम जनता का हित साधन करने में सक्षम होंगे. 
और यहीं पर सच्चे मनुष्य को निर्मित करने का कार्य नितान्त प्रयोजनीय हो जाता है. किन्तु इतने विराट देश के घोर-दरिद्र, अशिक्षा के अभिशाप से ग्रस्त करोडों-करोड़ नागरिकों की गरीबी को दूर करने या उनके बीच शिक्षा का प्रकाश फैला देने योग्य पर्याप्त जन-बल और धन-बल किसी गैर सरकारी संगठनों के हाथों में रहना संभव नहीं है.फिर भी वे यदि अपने अपने सामर्थ्य के अनुरूप ईमानदार, निःस्वार्थी, निष्ठावान, योग्य मनुष्यों का निर्माण कर सकें, तब इन्हीं मनुष्यों के बीच से नीति-निर्धारक (विधायिका ) और नीति- रुपायक ( कार्यपालिका ) में जाने योग्य सच्चे मनुष्य प्राप्त किये जा सकेंगे. 
जब सरकार के हर स्तर पर योग्य और सच्चे मनुष्य ही नियुक्त रहेंगे, तब उनके द्वारा जिन नीतियों का निर्धारण होगा, वे सच्चे हृदय से आम-जनता के कल्याण की चिंता को सामने रख कर निर्धारित होंगी, और उन नीतियों को जो लोग रूपायित करेंगे, वे लोग भी जनकल्याण की भावना से अनुप्रेरित होकर पूरी दक्षता के साथ उन सब योजनाओं को धरातल पर उतार कर देश का कल्याण करेंगे.
अतेव इस महान कार्य को पूरा करने के लिए हमलोग गैर सरकारी स्तर पर युवाओं को संगठित कर उन्हें इस कार्य में अनुप्रेरित कर सकते हैं. नकारात्मक मानसिकता के साथ देश एवं देशवासियों के दुःख-कष्टों का निवारण तथा देश की उन्नति नहीं की जा सकती है. इतने दिनों तक सब कुछ देख-सुन लेने के बाद अब तो हमलोगों को इतना समझ होना ही चाहिए कि देश के नागरिकों की कड़ी मिहनत, ईमानदारी, कर्तव्य-निष्ठा एवं त्याग के उपर ही राष्ट्र का भविष्य निर्भर करता है.
  स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से राष्ट्रिय नेतृत्व के सर्वोच्च स्तर से लेकर निचले स्तर तक जैसी अनैतिक, आत्मकेंद्रित, स्वार्थपर जीवन-प्रणाली चली आ रही है, उसमें यदि परिवर्तन नहीं हुआ तो कोई भी राजनैतिक विचारधारा, प्रशासनिक ढाँचा, या आर्थिक-उदारीकरण की नीति में परिवर्तन लाने से देश का कल्याण होने ही वाला है, इस आशा से उल्लसित होने का कोई कारण नहीं है.
जब तक देश के राजनेता, देश के सामान्य नागरिकों के समक्ष अपनी छवि एक ऐसे अनुकरणीय  जीवन आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित नहीं करा देते हैं, जो पुर्णतः ईमानदार, त्यागी, निःस्वार्थी, और देशवासियों के कल्याण की चिन्ता में ध्यान-मग्न हो, तब तक सरकारी प्रयास द्वारा देश का कोई कल्याण होगा-ऐसी आशा करना व्यर्थ है. तथा वर्तमान समय में जो लोग सत्ता का सुख भोगने वाले राजनेता हैं, उनके क्रिया-कलापों को देखने से ऐसा त्यागी अनुकरणीय जीवन तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा है. इसीलिए केवल सरकार के मुखापेक्षी न रह कर, हमलोगों को गैर सरकारी स्तर पर देश के कल्याण के लिए योग्य मनुष्यों का निर्माण करने में जितनी भूमिका निभानी चाहिए, उतना अवश्य करना होगा. 
महामण्डल ने इसी कार्य को चुन लिया है. महामण्डल की यह मान्यता है कि देश की दुरावस्था का ठीकरा किसी एक राजनितिक दल या व्यक्ति के सिर फोड़कर, अपने उत्तरदायित्व से भागने की चेष्टा करना एक आत्मघाती मानसिकता है. स्वामी विवेकानन्द के निष्कर्षों का अध्यन करने पर हम पते हैं कि - " व्यक्ति चरित्र का निर्माण ही राष्ट्रिय-चरित्र का निर्माण है, और यही राष्ट्र-निर्माण की नींव है." इसीलिए व्यक्ति-चरित्र का निर्माण करने की जो चेष्टा सरकारी स्तर पर इतने दिनों तक नहीं की गयी है, संघ-बद्ध होकर महामण्डल उसी कार्य को कर रहा है. 
बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि केवल समाज-सेवा करना ही देश सेवा है, इसीलिए वे लोग समाजसेवा मूलक संस्थाओं की स्थापना करते हैं, या किसी विदेशी समाज-सेवा मूलक क्लब के सदस्य बनने में अपना सौभाग्य समझते हैं. 
महामण्डल की यह स्पष्ट धारणा है कि जीवन-गठन की चेष्टा को ताक पर रख कर केवल समाजसेवा मूलक कार्यों से युक्त होने पर अहंकार, नाम-यश की आकांक्षा, पैसा वाला होने का घमंड बहुत बढ़ जाता है, और धीरे धीरे व्यक्तिगत स्वार्थपरता इतनी हावी हो जाती है, जिससे सारी प्रचेष्टा ही दिखावा बन कर रह जाती है. किन्तु किसी भी सेवा-मूलक कार्य को चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया का अंग मान कर किया जाय, तो वह सेवा-कार्य चरित्र-गठन या जीवन-गठन का एक उपाय बन जाता है. 
यदि देश के सभी नागरिक, जो चाहे किसी भी कार्य से जुड़े हैं, चाहे वह बिलकुल छोटा काम ही क्यों न हो, उसी को पूरी जिम्मेदारी और निष्ठा के साथ करें, तो उतने से भी राष्ट्रिय जागृति लायी जा सकती है. किन्तु हमलोग इतनी छोटी सी बात को समझना ही नहीं चाहते हैं. हमलोग इस बुनियादी कार्य ' मनुष्य बनो और बनाओ ' को छोड़ कर बड़े बड़े कार्यों की योजनायें बनाते हैं, तथा अक्सर अपने महान-संकल्पों को कार्यरूप देने में असमर्थ रह जाते हैं. 
किन्तु यदि हमलोग अपने अपने कर्तव्यों को चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न प्रतीत होता हो, पूरी निष्ठा और दक्षता के साथ करें तो उसका बहुत बड़ा परिणाम हो सकता है. और कर्तव्य-निष्ठा, ईमानदारी, दक्षता इत्यादि चारित्रिक-गुणों को अर्जित करना चाहते हों तो हमलोगों को पहले अपना चरित्र सुंदर ढंग से गठित करना चाहिए. किसी व्यक्ति के चरित्र का निर्णय उसके बड़े बड़े आँखों को चौंधिया देने वाले कार्यों से नहीं, बल्कि उसके द्वारा किये गये छोटे छोटे अति साधारण कार्यों की गुणवत्ता के द्वारा होता है. 
महामण्डल के कार्यकर्ताओं को अपना-अपना जीवन बहुत सुंदर तरीके से गठित करके देश के युवाओं के समक्ष एक ईमानदार, त्यागी जीवन की अनुकरणीय छवि प्रस्तुत करनी होगी. देश के युवाओं को यह बात समझा देनी होगी कि अनैतिक, घोर-स्वार्थपर, आत्मकेंद्रित, भोगवादी जीवन शैली ही देश के सर्वनाश की जड़ है. 
देश के उन्नति की एकमात्र शर्त है-देश और देशवासियों के कल्याण में समस्त भोग-विलास और सुख की इच्छाओं को विसर्जित कर मन वचन और कर्म से देश कल्याण की चिन्ता और कल्याण करने में लगे रहना. सरकारी प्रचार तंत्र या अखबारी शोरगुल पर कोई ध्यान दिए बिना चुपचाप महामण्डल के कार्यकर्ता यही कार्य विगत ४५ वर्षों से करते आ रहे हैं.
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 ४. 
" मनुष्य ' बनना पड़ता है !"
' मनुष्य - बनना ' क्या केवल मुख से निकला एक शब्द मात्र है ? यदि हमलोग मनुष्य बन गये, तो मानों सबकुछ प्राप्त हो गया. महाभारत में कहा गया है-
" न मनुष्यात श्रेष्ठतरं हि किंचित । " 
अर्थात ' मनुष्य ' से बढ़ कर, या श्रेष्ठतर और कुछ (देवता आदि) भी नहीं है. फिर भी मनुष्य बन जाने की इच्छा कौन करता है ? या कितने लोग यह जानते हैं या कभी सुने हैं-कि मनुष्य बनना पड़ता है ? हाँ, यह बात बिल्कुल सच है कि मनुष्य बना जा सकता है. किन्तु बिना स्वयं प्रयास किये कोई मनुष्य  बन नहीं सकता है, तथा दूसरा कोई चाह कर भी किसी को मनुष्य नहीं बना सकता है. बातचीत के क्रम में ऐसा कह दिया जाता है कि " श्री अमुकजी ने बेटे को बहुत अच्छा मनुष्य बनाया है. " किन्तु उन्होंने बेटे को जैसा उचित परामर्श तथा उपयुक्त परिवेश दिया था, यदि वह लड़का स्वयं उनका अनुसरण ही नहीं करता, तो लड़का जैसा मनुष्य बना है, वैसा नहीं बन सकता था. 
किसी किसी मनुष्य में मनुष्यत्व का जागरण ( या होश ) ठोकर खाने के बाद होता है, तथा कुछ लोग दूसरों को देख-सुन कर भी सीख सकते हैं. किन्तु कोई व्यक्ति यदि यह ठान ले, कि मैं तो ठोकर खाने के बाद ही मनुष्य बनना सीखूंगा. तो बहुत बार देखा जाता है कि उसको मनुष्य बनने के लिए अब और उम्र ही शेष नहीं बची है. क्योंकि  यदि जबर्दस्त ठोकर लग गयी और कई जगह से टेढ़े-मेढ़े हो गये तो फिर से सबकुछ सामान्य हो पाना दू:साध्य हो जाता है. इसीलिए जिन लोगों ने मनुष्य बनने का प्रयास ही नहीं किया, उनकी दशा देख-सुन कर ही सीखने कि चेष्टा करना बुद्धिमानी का काम होगा. विशेष तौर से मनुष्य बनने के क्षेत्र में तो यही वांछनीय है. 
मनुष्य अधिकांश बातें देख-सुन कर ही सीख लेता है. जैसे मातृभाषा का ज्ञान या खड़े होकर चलने का ज्ञान-यह सब वह देख-सुन कर ही सीख लेता है. जो बच्चा अपने घर में मार-पीट या कूवाक्य का प्रयोग होते अक्सर देखता-सुनता है,वह वैसा करना या गाली देना तुरंत सीख लेता है. उसी तरह जो बच्चा अपने घर में पूजा-अर्चा होते देखता है, वह भी वैसा ही करना चाहता है. इसीलिए कैसी चीजों को देखूंगा या सुनूंगा, या किसका अनुकरण करूंगा,-इन सब के उपर थोडा विवेक-विचार करना आना चाहिए. महाभारत में कहा भी गया है- 
यादृशै: सन्निवसति यादृशांश्चोपसेवते ।
यादृगइच्छेद भवितुं तादृग भवति पुरुषः ।। 
अर्थात मनुष्य जैसे लोगों की संगती में रहता है, जिन लोगों के साथ वास करता है, या जैसे लोगों की सेवा में लगा रहता है, और जो जैसा बनना चाहता है, वह वैसा ही बन जाता है.
आज का युवा अपने चारों ओर जब नजर दौड़ाता है तो क्या देखता है ? वह देखता है ( शायद अपने ही घर में ) कि कोई व्यक्ति झूठ, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, करके बहुत धन-संपत्ति, गाड़ी-बंगला, भोग, ऐश्वर्य, नाम, प्रतिष्ठा बहुत कमा रहा है, यह सब देख सुन कर उसीका अनुसरण करके हो सकता है कोई वैसा ही मनुष्य बन जाये. किन्तु क्या उसको विचार करके नहीं देखना चाहिए कि क्या इसी को मनुष्य बनना कहते हैं ? 
क्योंकि इस प्रकार के व्यक्तियों के जीवन की अंतिम परिणति कैसी होगी ? आज जिसको राजा का सम्मान मिल रहा है, हो सकता है कल उसको जेल जाना पड़े. (कनीमोझी,ए.राजा, मधुकोड़ा, लालू प्रसाद, चिदम्बरम ?)स्वामीजी ने तो वर्षों पहले कहा था- " जेलों को केवल सजा काटने का कारागार न बनाकर,' सुधारगृह ' बना देना चाहिए." उनके जाने के इतने दिनों बाद आज विश्व के कई देशों तथा भारतवर्ष के अनेक जेलों में भी कैदियों को अंतरविक्षन (ध्यान विशेष ) सिखाया जा रहा है.कुछ दिनों तक इस अंतरविक्षन का अभ्यास करने के बाद एक कैदी ने अभी हाल में ही बताया- 
" एक न्यायाधीश का खून करने की चेष्टा करने के दण्ड स्वरूप मैं जेल की सजा काट रहा हूँ, किन्तु आज मेरे मन में किसी का खून करने की प्रवृत्ति नहीं उठ रही है. " इस कैदी के मन में अभी एक प्रकार के शांति की अनुभूति हो रही है, तो इसका कारण क्या हो सकता है ? क्योंकि उसके मन से खून करने की प्रवृत्ति (तृष्णा) समाप्त हो गयी है. इसीलिए महाभारत में कहा गया है-
" यत यत त्यजति कामानं तत सुखस्यामिपूर्यते ।
कामस्य वसगो नित्यं दुःखमेव प्रपद्द्य्ते ।।
अर्थात जैसे जैसे कामनाओं का त्याग होता जायेगा, वही मानसिक सुख-शान्ति का कारण बनता जायेगा. जो जितना अधिक कामनाओं के पीछे दौड़ता रहेगा, उसको उतना ही अधिक दुःख-कष्ट भोगना पड़ेगा. आम विषयी लोग जिसे ( इन्द्रिय विषय भोगों को ) सुख समझते हैं, उसकी तुलना दाद-खाज से करते हुए किसी महान दार्शनिक ने कहा है-
कंडूयनेन यत कंडू सुखं तत किं भवेत सुखम ।
पाश्चादत्र महापीड़ा तथा वैषयीकम सुखम ।।
अर्थात दाद-खाज खुजलाते समय जिस क्षणिक सुख का अनुभव होता है, क्या उसे सच्चा सुख समझना कोई बुद्धिमानी है ? खुजला देने के बाद वहाँ जिस प्रकार के तीव्र जलन का अनुभव होता है, इन्द्रिय-विषय भोगों से मिलने वाले सुख को भी वैसा ही समझना चाहिए.
इस प्रकार से प्राप्त होने वाले सुख को गीता (१८/३७-३९) में राजसिक सुख कहा गया है. इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाला सुख पहले तो अमृत के समान मालूम पड़ता है, किन्तु उसका परिणाम विष के समान होता है. विवेक-विचार रहित बुद्धि को अति-विलासिता में जिस सुख का अनुभव होता है, वह मनुष्य को प्रारंभ एवं परिणाम में भी मोहित (अचेत) कर देता है, उसे तामसिक सुख कहा गया है. एवं जो सुख पहले तो दुःखदायी या कष्टकर प्रतीत होता है (प्रत्याहार का अभ्यास और वैराग्य ), किन्तु परिणाम में (परिपक्व ज्ञान-वैराग्य) अमृत जैसा प्रीतिकर लगता हो, उसे सात्विक सुख कहा जाता है.
सुख-प्राप्ति की इच्छा सभी मनुष्यों में स्वाभाविक तौर पर पाई जाती है मनुष्य धन कमाने के लिए जितनी भाग-दौड़ करता है, चेष्टा और श्रम करता है उस सब के पीछे कारण केवल सुख पाने की इच्छा ही होती है. किन्तु मोहित या अचेत-मनुष्य, विवेक-विचार रहित होने के कारण गलत जगह में सुख की खोज करता है, और इन्द्रिय-विषयों से मिलने सुखों के पीछे दौड़ते हुए अपने जीवन को ही व्यर्थ में गँवा देता है. 
 यथार्थ सुख क्या है, इसे (विवेक द्वारा) जानकर, ' सचेत-मनुष्य ' बनने की चेष्टा करते करते, जो यथार्थ मनुष्य बन गये हैं, ऐसे मनुष्यों को साधारण मनुष्य न कहकर भगवान (भगवान श्रीरामकृष्णदेव) कहने की इच्छा होती है !!-उनके जैसा बनने की चेष्टा करने से कम से कम मनुष्य कहलाने योग्य मनुष्य (सचेत-मनुष्य ) तो बना ही जा सकता है.
सचेत-मनुष्य बनने के लिए, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, वासना या कामनाओं के आधिक्य, स्वार्थपरता आदि दोषों को बिल्कुल ही त्याग देना चाहिए. तथा कुछ सदगुणों को भी जीवन में धारण करने की चेष्टा करनी चाहिए, जैसे- कोई पराया नहीं है, सबों को अपना बना लेने की पद्धति सीखनी चाहिए. 
परार्थ-बुद्धि (Vicarious) अर्थात जो दूसरों के बदले काम करे (नायक या जन-प्रतिनधि होने की चेतना ) कैसे प्राप्त होती है, उसे ' नेतृत्व का अर्थ एवं गुण ' नामक महामण्डल पुस्तिका को पढ़ कर सीख लेना चाहिए, सभी मनुष्यों के प्रति मन में सहानुभूति का भाव आना चाहिए, दूसरों के दुःख-कष्टों को दूर करने की तीव्र व्याकुलता होनी चाहिए. 
 अर्थात यदि एक लाइन में कहें तो, स्वामीजी की वह प्रसिद्द उक्ति जिसे हमलोग बार बार सुनते हैं- ' केवल वही जीवित है, जो दूसरों के लिए जीता है ! ' का अनुसरण करते हुए हमलोगों को भी केवल दूसरों के लिए जीना सीखना चाहिए. महाकवि कालिदास अपने एक नाटक में कहते हैं-
सुजनाः सुधनास्ते हि कृतनः सुखिनः तथा ।
जन्तवो ये हि जीवन्ति परस्य हितकामया ।।
-अर्थात इस जगत में उन्हीं को सज्जन, धनी, कीर्तिवान और सुखि मनुष्य समझना चाहिए जो केवल दूसरों का ही मंगल करने के लिए जीवन धारण करते हैं. जो लोग यथार्थ मनुष्य (सचेत-मनुष्य) बन जाते हैं, उनमें अपने लिए कोई कामना या तृष्णा नहीं रहती; इसीलिए उनके सुखों की भी कोई सीमा नहीं रहती ! मोह-निद्रा से जाग कर जो यथार्थ मनुष्य या सचेत-मनुष्य बन गया हो, उसको कितना आनन्द मिलता होगा, इस बात को केवल वही व्यक्ति समझ सकता है, जो वैसा बन गया है, दूसरों को उस असीम आनंद के बारे में मुख से कहकर समझाया नहीं जा सकता. इसी आनन्द की ओर इशारा करते हुए महाभारत में कहा गया है-
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत सुखम ।
तृष्णाक्षय सुखस्यते नाहर्तः षोडशीम कलाम ।।
-अर्थात जगत में काम-भोगों से प्राप्त होने वाले जितने भी सुख हैं, तथा स्वर्ग में जाने पर जितने महासुख प्राप्त होते हैं, उन सबको मिला देने से जितना सुख मिलता होगा, वह तृष्णा-क्षय ( या कामना त्याग ) से मिलने वाले सुख को यदि १६ कला माना जाय, तो उसका एक कला भी नहीं है.        
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५. 
मनुष्य बनना होगा !
आचार्य शंकर कहते हैं- " मनुष्य का मन ही सबसे बड़ा तीर्थ है ! " यदि किसी मनुष्य का मन ऐसा बन जाये- जहाँ (मन-वचन-कर्म की ) समस्त पवित्रता मिलकर एक हो गयी हो, उस मनोतीर्थ में जो कोई भी स्नान या  प्रक्षालन करता है, वह उस ' त्रिवेणी-संगम ' में डुबकी लगाते ही अमृत हो जाता है. अतः हमलोगों को भी सचेत-मनुष्य बनने के लिये, अपने मन को उसी तीर्थ के समान बनाने का प्रयत्न करना होगा, जहाँ समस्त पवित्रता मिलकर एक हो जाती है. इसीलिए मन को नियंत्रित करने की पद्धति अवश्य सीखनी होगी. यजुरवेद में बड़े सुंदर ढंग से कहा गया है- 
" तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ! "  
-अर्थात मेरा मन केवल शिव संकल्प ही करे ! कहने का तात्पर्य है, मेरा मन कल्याण के संकल्प से उत्प्रेरित होकर मोह-निद्रा से जाग्रत हो जाय ! यदि कोई इसी प्रयास में लगा रहे तो क्या इससे बढ़ कर भी कोई आध्यात्मिकता हो सकती है? या इससे बढ़ कर भी कोई धर्म है ? स्वामीजी के कुछ क्रांति-कारी विचारों से हमसभी लोग परिचित हैं-जैसे, टीका-चन्दन लगा लेने में धर्म नहीं है, रामनामी चादर ओढ़ कर घूमने में धर्म नहीं है, चारों धाम घूम लेने में धर्म नहीं है, कांसे का घड़ी-घंट को बजाने में धर्म नहीं है. धर्म तो वह वस्तु है जो मनुष्य को धारण करता है. और महाभारत में भी इस बात को बड़े सुंदर ढंग से कहा गया है, जिसको रविन्द्रनाथ भी अक्सर उधृत किया करते थे- जो एक गूढ़-पहेली( Enigma ) जैसी जान पड़ती है- 
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
- अर्थात् धर्म उसकी रक्षा करता है, जो धर्म कि रक्षा करता है।
(Dharm, when killed, kills and protects, when protected.)
- अर्थात धर्म एक ऐसी वस्तु है जिसकी रक्षा यदि तुम करो, तो वह तुम्हारी रक्षा करता है, और यदि तुम उसका विध्वंश करो तो वह भी तुम्हारा विध्वंश कर देगा- इसी को धर्म कहते हैं. 
धर्म का अर्थ टीका-चन्दन नहीं है, धर्म का अर्थ मन्दिर मस्जिद या गिरजे में जाना नहीं है. किसी मस्जिद में जाकर पाँच बार नमाज पढ़ने से ही धर्म नहीं हो जाता, या जोर जोर से संस्कृत मन्त्रों का उच्चारण करके थोड़ी देर तक पूजा करने से भी धर्म नहीं होता. यह भी ठीक है कि प्राथमिक अवस्था में इन चीजों की आवश्यकता होती है, किन्तु वर्तमान युग में - आधुनिक समाज में इस प्रकार का धार्मिक आचार-अनुष्ठान करना हर किसी के लिये संभव नहीं होता. 
 जो लोग इस प्रकार के औपचारिक बाह्य-अनुष्ठानिक धर्म में अपना समय बिताते हैं, उनकी अपेक्षा महामण्डल के युवा धर्म की जैसी व्याख्या सुनते हैं, जिन अध्यात्मिक बातों को सुनते हैं, उसको यदि वे अपने जीवन में भी उतारने का अभ्यास करते रहें, तो वे उनसे किसी हाल में पीछे तो नहीं ही रहेंगे, बल्कि उनसे बहुत आगे निकल जायेंगे. 
जब तक हमलोग, स्वयं को दूसरों से बिल्कुल भिन्न समझ कर, अपने मिथ्या अहं (कच्चा मैं) को ही सब कुछ मानते हैं,तथा जगत को अपने से पृथक मानकर सोचते हैं- ' जो कुछ है, सो ' मैं ' ही है ! ' तब तक हम अपने को सीमित दायरे में कैद करके बिल्कुल कूपमण्डूक के समान बैठे रहते हैं, और तब हमारा अध्यात्मिक विकास रुक जाता है.
किन्तु जब किन्तु जब हम अन्तर-दर्शन की विद्या अर्जित करके - ' जीवमात्र में शिव को देखना ' सीख लेते हैं, तथा अपने इस संकीर्ण घेरे ( स्त्री-पुरुष का नाम-रूपात्मक देहाध्यास को ) या सीमा को तोड़ कर, जब हमलोग व्यापक बन जाते हैं, मनुष्य-मात्र में उसी चैतन्य को देखना सीख कर सर्वग्राही बन जाते हैं,सबों के भीतर स्वयं को ही देखने में समर्थ हो जाते हैं, तब उसीको धर्म कहा जाता है. तब हमलोग अध्यात्मिक रूप से उन्नत हो जाते हैं, एवं दूसरों के भीतर स्वयं को प्रसारित करने (परकाया-प्रवेश) में  भी समर्थ हो जाते है.
यही तो विकास है, इसी को तो अध्यात्मिक उन्नति कहते हैं, यही तो है मनुष्यत्व का उन्मेष या हृदय-कमल का खिल जाना ! यही तो है मोहग्रस्त-मनुष्य (या अचेत-मनुष्य ) से यथार्थ मनुष्य (या सचेत-मनुष्य) में रूपान्तरित हो जाना !
यही तो है ठाकुर-स्वामीजी-माँ की शिक्षा ! कई बार उन्होंने ऐसा ही निर्देश दिया है, ठाकुर ने यही उपदेश दिया है, माँ ने भी यही शिष्टता सिखाई है, स्वामीजी का भी यही आदेश है. क्या माँ ने ऐसा नहीं कहा- ' कोई पराया नहीं जगत तुम्हारा अपना है.' ठाकुर देव भी यही शिक्षा देते हैं, यही उपदेश स्वामीजी का भी है. स्वामीजी कहते हैं- ' सभी देशों के सभी तरह के मनुष्य, सभी वर्ण और नस्ल के मनुष्यों में चाहे कोई पागल हो या कोई लुच्चा (पाजी और बेअदब आदमी ) हो, वे भी मेरे भगवान हैं ! " ऐसी बात क्या अन्य किसी के मुख से निकली है ? उनके इस कथन का तात्पर्य क्या है ?
इसका अर्थ है स्वयं को व्यापक बना लेना, स्वयं को दूसरों में बोने या प्रसारित कर देने (परकाया-प्रवेश ?) में समर्थ हो जाना. ह्रदय की ऐसी विशालता कैसे प्राप्त होती होगी ? इन्हीं विचारों- ठाकुर, माँ, स्वामीजी के इन्हीं उपदेशों को जीवन में उतारने से होगी.अपने हृदय को इतना उदार, इतना ही विशाल बना लेने के लिये, हमलोगों को इन्हीं भावों के उपर चर्चा करनी होगी.
किन्तु  इस कार्य को बहुत सावधानीपूर्वक करना उचित होगा. हमलोगों को बहुत सतर्क होकर अन्तर-दर्शन का अभ्यास करना होगा, आत्म-अवलोकन करके देखते रहना होगा-कि हमलोग केवल दूसरों को दिखाने के लिये ही तो कहीं अच्छा मनुष्य बनने का ढोंग नहीं कर रहे हैं ? हमलोग कहीं अपने-आप को ही तो धोखा नहीं दे रहे हैं, या स्वयं के ही साथ कहीं छल तो नहीं कर रहे हैं ? कहीं दूसरों को यह समझाने की चेष्टा तो नहीं कर रहे हैं, कि देखो हमलोग कितने भीमकाय मनुष्य बन गये हैं, और दूसरों की अपेक्षा बहुत अधिक जानते हैं, और कितना बड़ा कार्य कर रहे हैं ?
- नहीं ! विनम्रता पूर्वक हमलोगों को केवल इतना ही सोचना चाहिए कि हम अपने हृदय को विशाल बनाने एवं सचेत-मनुष्य बनने का प्रयास कर रहे हैं, और यह एक अच्छी बात है. किन्तु इसके साथ साथ सतर्क होकर यह भी देखते रहना चाहिए कि यथार्थ मनुष्य बन जाने के लिए जितने प्रयास की आवश्यकता है, उतना प्रयास हमलोग कर पा रहे हैं या नहीं ?
-यदि कहीं (विवेक-प्रयोग में ) कमी दिख रही है, तो और अधिक प्रयास करना होगा. महामण्डल द्वारा निर्दिष्ट पाँच नित्य करनीय अभ्यासों यथा - प्रार्थना, मनः संयोग, व्यायाम, स्वाध्याय और विवेक-प्रयोग का आत्ममूल्यांकन को और निष्ठापूर्वक करना होगा. नियमित करना होगा, किसी भी अभ्यास को एक भी दिन नहीं छोडूंगा. किसी भी कार्य के विषय में सोचने, बोलने, करने के पहले विवेक-प्रयोग अवश्य करना होगा, एवं वैसा करने से उसका फल प्राप्त न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. 
जिस प्रकार गणित में २ में २ जोड़ने से ४ ही होता है, दो में दो जोड़ने का फल ३ कभी नहीं हो सकता, उसी प्रकार महामण्डल द्वारा निर्दिष्ट पांचो अभ्यास भी एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है,यह अपने निर्दिष्ट रूप से थोडा भी इधर-उधर नहीं होता, इसका निश्चित फल प्राप्त होना अवश्यम्भावी है. इसीलिए स्वामीजी की इस उक्ति को हम यहाँ भी उपयोग में ला सकते हैं- " यदि किसी प्रयास में तुम असफल हो जाते हो, तो इसका मतलब ये हुआ कि उस कार्य को सफल करने के लिए, तुम्हें अपने भीतर से जितनी शक्ति लगाकर चेष्टा करनी चाहिए थी, या उस कार्य को पूरा करने के लिए जितनी शक्ति अपेक्षित थी, उस परिमाण में तुम अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं कर सके. " इसीलिए अब से उसी परिमाण में शक्ति लगाकर अभ्यास करते जाना होगा.
हमलोग इतने दिनों से अपने मन को पवित्र करने की चेष्टा कर रहे हैं, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि अभी तक हमलोग इस कार्य में बहुत सफल नहीं हो सके हैं, फिर भी लोगों के उपर प्रभाव जताने के लिए यूँ ही थोड़ा कह देते हैं, अरे हमलोग तो कबके ' यथार्थ-मनुष्य ' बन चुके हैं ! किन्तु मन ही मन जानते हैं, जितना सचेत होकर हमलोगों को सदैव विवेक-प्रयोग करना चाहिए, उतना सचेत-मनुष्य अभी तक बन नहीं सके हैं. क्योंकि आत्म-सचेतन मनुष्य बन जाने पर, हमारा हृदय हर समय जिस आनन्द से जितना प्रफुल्लित रहना चाहिए था, उतनी प्रफुल्लता अभी तक नहीं आ सकी है.
महामण्डल द्वारा निर्दिष्ट पाँच कार्यों के नियमित अभ्यास को धर्म कहें, आध्यात्मिकता कहें या चरित्र-गठन कहें, इसमें सफल हो जाने का एकमात्र प्रमाण यह है, कि हृदय आनन्द से भर उठेगा ! उसी आनन्द से मन भी   सदा आनन्दित बना रहेगा, मन में कभी संकीर्णता (ओछापन) का विचार नहीं उठेगा, मन कभी थका-थका या मुरझाया सा नहीं रहेगा, कोई भी उदासी, खिन्नता या अवसाद कभी मन को अभिभूत नहीं कर सकेगी. कोई भी आभाव, कोई कष्ट- चाहे शारीरिक हो या मानसिक- मन के आनन्द को दबा नहीं सकेगा. किसी भी प्रकार की कठिनाई, किसी भी तरह की कमी या निर्धनता, किसी भी तरह का दुःख, किसी प्रकार का मानसिक संताप, मन के आनन्द को कभी दबा नहीं सकेगा. घोर विषम परिस्थितिओं में भी एक अद्भुत आनन्द का फव्वारा उन सबों को बहा ले जायेगा. 
यही है एकमात्र प्रमाण जिसको देख कर हम समझ सकते हैं, कि अपने अभ्यास में हमलोग कितने सफल हुए हैं. थोड़ी बहुत आत्म-समीक्षा तो हर कोई कर सकता है. कोई हमारा महाशत्रु ही क्यों न हो, उसके भी अमंगल की कामना कभी नहीं करनी चाहिए. या किसी महाशत्रु का कुछ बुरा हो गया, या मुसीबत में फंस गया हो तो उसे देख कर कभी हर्षित नहीं होना होना चाहिए. कोई महाशत्रु भी यदि दुःख में पड़ कर कराह रहा हो, तो उसको देख कर आँखों में अश्रु छलक आना उचित है. हमें ऐसा सोचना चाहिए कि ओह, वो बिचारा जानता नहीं था, उसको कभी अच्छी बातें सुनने को नहीं मिली होंगी, वह अपने जीवन के उद्देश्य को समझ नहीं सका, इसीलिए उसने अपना जीवन गठन नहीं किया, चरित्र-निर्माण नहीं कर सका, इसीलिए यथार्थ मनुष्य बनने की चेष्टा में वह सफल नहीं हो सका. इसलिए उससे कई गलतियाँ हो गयी हैं, इसीके फलस्वरूप आज उसको इतना कष्ट भोगना पड़ रहा है. उसके लिए तो और भी अधिक दुखी होना उचित है, ऐसी सहानुभूति, हृदय का ऐसा विस्तार यदि अभी तक नहीं हुआ, तो इतने दिनों तक हम कर क्या रहे थे ? ठाकुर-माँ-स्वामीजी से हमने क्या सीखा, किस प्रकार हम अपने को उनका अनुयायी या भक्त समझ सकते हैं ? 
दूसरों को तुच्छ समझ कर, दूसरों को छोटा मान कर कि अमुक व्यक्ति का ज्ञान तो मुझसे बहुत कम है, उसकी शिक्षा मेरे जितनी नहीं है, वह मेरे जैसा दूसरों के दोषों को ढूंढ़ नहीं पाता है, ये सब आरोप मढ़ कर उसको अपने संगठन से निकाल दो, इसको भी अपने संगठन से निकाल देना चाहिए- क्या ऐसा करते रहने से हमलोग कभी मनुष्य बन सकते हैं ? इस प्रकार की घटनाएँ किसी किसी केंद्र में देखी जाती है, यह बड़े दुःख का विषय है. यह तो क्षय रोग से भी बुरा रोग है, बिकुल कैंसर जैसा है. इस रोग का छोटा सा ट्यूमर भी किसी संगठन में प्रविष्ट हो गया, तो उसको हटाया नहीं जा सकता, यह पूरे संगठन को ही नष्ट कर देगा. 
बहुत से कार्यकर्ताओं में यह भाव आ जाता है कि मैं सबसे बड़ा हूँ, मैं बहुत बुद्धिमान हूँ, मैं बड़ा भारी विद्वान हूँ, मैं अच्छा वक्ता हूँ, मैं अच्छा गवैया हूँ, मैं कुशल प्रबन्धन का विशेषग्य हूँ, मैं अच्छा उद्घोषक हूँ, और वे लोग तो कुछ भी नहीं जानते. मेरी तुलना में एकदम तुच्छ हैं. किन्तु हमलोग यह भूल जाते हैं कि इस प्रकार दूसरों को अपने से छोटा समझने वाला कभी बड़ा नहीं बन सकता.
तुमलोग स्वामीजी के जीवन की बहुत सी घटनाओं को जानते हो, निश्चय ही तुमने अमेरिका के एक बड़े होटल की घटना के सम्बन्ध में पढ़ा या सुना होगा- वहाँ कोई ऐसा होटल था जिसमें कालों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी, नीग्रो-टिग्रो को देखते ही बाहर निकाल दिया जाता था.स्वामीजी को तो बाहर निकलने नहीं बोला, किन्तु उनके सामने ही एक नीग्रो को होटल से बाहर निकाल दिया. यह देख कर स्वामीजी भी उस होटल से बाहर निकल गये. उनहोंने सोचा नहीं नहीं नहीं, जब मेरे ही जैसे किसी अन्य मनुष्य को इन्होंने प्रवेश नहीं करने दिया तो मैं भी इस होटल में नहीं जाऊंगा. 
इसीसे मिलती-जुलती घटना कुछ दिनों पूर्व कोलकाता में भी घटित हो चुकी है. तुमलोगों ने भी अख़बारों में देखा या सुना होगा, सरकार की ओर से कोई Award दिया जाने वाला था. पश्चिम बंगाल के विभिन्न स्थानों से बेशुमार लोग आये थे, इसका आयोजन किसी विशाल होटल या समारोह-भवन में हुआ था, सभी लोग उसी ओर जा रहे थे. उन्ही पुरस्कार पाने वालों में कुछ ग्रामीण लोग भी थे.
उनके कपड़े लत्ते अच्छे नहीं थे, मैले-कुचैले तो थे ही, उनके पैरों में जूते भी नहीं थे. उन्हें अंदर नहीं जाने दिया. इसके बाद कुछ लोगों ने वहाँ के कर्मचारियों को जब समझाया कि इन लोगों को भी यहाँ पुरस्कार देने के लिए बुलवाया गया है, तब बहुत अनिच्छा पूर्वक बोले-तुमलोग पिछले दरवाजे से जाओ. तब वे लोग किसी प्रकार पिछले दरवाजे से भीतर जा सके. ऐसा भेद-भाव अब भी हो रहा है, यहाँ कलकत्ते में हो रहा है. उस स्थान पर हो रहा है, जहाँ सरकार की ओर से पुरस्कार दिया जाने वाला है. सरकारी कार्यक्रमों में ऐसा भेद-भाव बर्ता जा रहा है !
ऐसी घटना यदि अबभी हो रही है, तो कहना पड़ेगा कि हमलोग अभी तक मनुष्य नहीं बन सके हैं. हमलोग क्या अपने समस्त देशवासियों को अपने ही जैसा मनुष्य समझ सकते हैं ? क्या हम अपने से निम्न स्तर पर खड़े अपने भाई-बहनों से उनके स्तर पर उतर कर पूरी अन्तरंगता के साथ उनका सुख-दुःख बाँट सकते हैं ? सबों के स्तर पर स्वयं को उतारने में सक्षम होने का अर्थ छोटा बन जाना नहीं है.
स्वामीजी कहते हैं-" जो लोग अभी तक तुमसे निचले पौदान पर खड़े हैं, क्या तुम अपने हाथों का सहारा देकर उनको उपर उठा सकते हो ? तुम यदि उनके स्तर पर उतर कर, उनके ही जैसे बन कर, उनके मित्र बन कर, तुम यदि उनको बिल्कुल अपना भाई समझ कर यदि उनको सत परामर्श दो, उनके भीतर भी विवेक और श्रद्धा का भाव जाग्रत करा सको, तभी कहा जा सकता है, कि तुम सबों को आत्म-रूप देखने या अपने ही जैसा एक मनुष्य की आकृति प्रदान करने का प्रयत्न कर सकते हो."
स्वामीजी बहुत दुःख के साथ आह्वान करते हैं- ' इस प्रकार के असहाय मनुष्यों को अपने हाथों का सहारा देकर उपर उठा देने में समर्थ मनुष्य कहीं दिखाई नहीं देते, क्या तुम वैसा कर सकोगे ? तुमको वैसा मनुष्य (मार्गदर्शक नेता ) बनने के लिए, स्वयं को कितना ऊँचा उठाना होगा, अपने मन को कितना पवित्र बनाना होगा, अपने हृदय को कितना विस्तृत करना होगा ! ' 
भारत को महान बनाने के लिए हमें ऐसे ही मनुष्यों का निर्माण करना होगा. ऐसे मनुष्यों के निर्माण का उपाय क्या है ? इसका एकमात्र उपाय है, महामण्डल द्वारा निर्देशित मनुष्य-निर्माणकारी पद्धति ( पाँच कार्यों का नियमित अभ्यास ) से अपना जीवन गठित कर लेना. महामण्डल की यह मनुष्य-निर्माणकारी पद्धति केवल महामण्डल को महान बनाने के लिए नहीं है, महामण्डल का और अधिक विस्तार करने के लिए नहीं है. यह पद्धति स्वयं को यथार्थ मनुष्य या सचेत-मनुष्य में रूपान्तरित करने के लिए है, ताकि जिस मनुष्यत्व-जागरण की अपेक्षा स्वामीजी अपने अनुयायियों से करते थे, वैसा ही यथार्थ मनुष्यत्व हमलोगों के अपने जीवन से विकीर्ण हो सके. यही लक्ष्य समस्त महामण्डल कर्मियों का रहेगा.      
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६. 
जीवन-गठन की साधना  
आज से ४५ वर्ष पूर्व (१९६७ में ) जब देश के समक्ष एक संकट-काल उपस्थित हुआ था, उस समय देशवासियों के यथार्थ-कल्याण हेतु स्वामी विवेकानन्द द्वारा आविष्कृत भारत पुनर्निर्माण-सूत्र,' मनुष्य बनो और मनुष्य बनाओ ' को व्यक्ति, समाज, तथा राष्ट्रिय जीवन-गठन के लिए उपयोग में लाकर ' भारत-माता ' को पुनः उसकी गौरवमय सिंहासन पर बैठाने के उद्देश्य से ही कोलकाता में अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल  का अविर्भाव हुआ था.
 इन ४५ वर्षों में देश के अनेकों नये नये स्थानों में महामण्डल का क्रिया-कलाप प्रसारित हुआ है. बहुत से नये नये युवा महामण्डल के कार्य को आगे बढ़ाने में अपना योगदान कर रहे हैं. इनदिनों अखिल भारतीय, राज्य स्तरीय, आंचलिक, जिला एवं स्थानिक स्तर पर महामण्डल द्वारा आयोजित युवा प्रशिक्षण शिविरों में नवयुवक बड़े उत्साह से भाग लेते हैं, तथा दिनों-दिन उनकी संख्या में वृद्धि हो रही है. आज से ४५ वर्ष पूर्व जिस समय महामण्डल की स्थापना हुई थी, उस समय देशवासियों के मन में स्वामी विवेकानन्द के प्रति श्रद्धा  रहने पर भी, स्वामीजी के आदर्शों की जड़ें बहुत थोड़े से ही युवाओं के मन की गहराई में प्रविष्ट हो सकी थीं.
 उस समय देश के अधिकांश युवा यह मानने को तैयार नहीं थे, कि स्वामीजी के आदर्शों को प्रयोग में लाने से देश से शोषण, भ्रष्टाचार, गरीबी, भूख, अशिक्षा आदि को दूर हटा कर सचमुच एक भ्रष्टाचार मुक्त, समृद्ध तथा उन्नत भारतवर्ष का निर्माण भी संभव हो सकता है. 
स्वामीजी की ' मनुष्यत्व-जागृति ' एवं ' राष्ट्र-निर्माणकारी ' विचारधारा के विभिन्न पहलुओं से युवाओं का परिचय लगभग नहीं के बराबर था. तर्क-वितर्क की श्रृंखला के माध्यम से, कई लोग यह समझ ही नहीं पाते थे कि ' मनुष्य बनो और मनुष्य बनाओ ' - " Be and Make " जैसा छोटा सा सूत्र (मन्त्र ) भला किस प्रकार सम्पूर्ण देश से, शोषण, भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा जैसी अनगिनत समस्याओं को दूर हटा कर एक सुखी, समृद्ध और उन्नत भारतवर्ष का निर्माण कर सकता है ? 
 अधिकांश युवाओं के मन में यही अंधविश्वास और पूर्वाग्रह की जड़े गहराई तक प्रविष्ट हो चुकी थीं, कि केवल कुछ तथाकथित प्रगतिशील राजनैतिक विचारधारा या आर्थिक सिद्धान्त को अपनाने से ही देशवासियों का कल्याण या सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव लाना संभव है! किन्तु आज ( 2G Spectrum घोटाला आदि देख लेने के बाद ) युवाओं की मानसिकता में व्यापक परिवर्तन आ चुका है. अब देश के अधिकांश लोगों के मन से यह विश्वास हट चुका है कि राजनैतिक सिद्धान्त, राजनैतिक दल या राजनैतिक आंदोलनों द्वारा समाज में कोई परिवर्तन या देश का भला हो सकता है.
 " आज ईमानदार, चरित्रवान, सच्चे मनुष्यों का घोर अभाव हो गया है, और यही देश की दुर्दशा का मूल कारण है; और जब तक यथार्थ मनुष्यों का निर्माण नहीं किया जायेगा, तब तक सब कुछ रहने के बावजूद देश का यथार्थ कल्याण होना संभव नहीं है; इसलिए मनुष्य निर्माण करना ही भारत की समस्त समस्यायों का मूल समाधान है " -आज का आम आदमी भी स्वामी विवेकानन्द के इस सिद्धान्त को बिल्कुल आसानी से समझ सकता है !
आज का भारतीय नागरिक (२०१२ में) इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझ सकता है है कि ' सच्चे मनुष्य का अभाव के साथ-साथ देश का अधोपतन ' तथा ' मनुष्य बनने और मनुष्य बनाने के साथ-साथ देश की उन्नति ' का संबंध कार्य-कारण सम्बन्ध ( Cause and Effect ) के जैसा एक ' अनन्यो-आश्रय ' संबंध है. इसलिए आज की परिस्थिति और परिवेश महामण्डल का कार्य - ' मनुष्य बनना और मनुष्य बनाना ' के पक्ष में अधिक अनुकूल है. और जो लोग इतने दिनों से महामण्डल के कार्य को रूपायित करने में जुटे हुए हैं, उनके लिए यह अनुकूल वातावरण सचमुच उनके हृदय को उत्साह से भर देने वाला कारण हो सकता है. 
किन्तु महामण्डल जैसे एक आदर्शवादी आन्दोलन के सहकर्मियों को ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि जब परिस्थिति अनुकूल होगी तब आन्दोलन की प्रगति अधिक होगी और परिस्थिति के प्रतिकूल होने से आन्दोलन धीमा हो जायेगा. जैसे किसी झरने की प्रचंड धारा के मार्ग में कोई रुकावट आ जाती है, तो वह और भी प्रबल वेग से उस अवरोध का अतिक्रमण कर आगे बढ़ जाती है. उसी प्रकार जब कोई आदर्शवादी आन्दोलन प्रतिकूल परिस्थिति के सम्मुखीन होता है, या बाहर से कोई व्यवधान आता है, उस समय वैसे आन्दोलन के सैनिकों की अपने आदर्श के प्रति प्रतिबद्धता तथा संग्रामी मनोभाव और भी अधिक बढ़ जाती है. वे लोग उन प्रतिकूल परिस्थितिओं या बाहरी व्यवधानों पर जीत हासिल करके, आन्दोलन को आगे ले जाते हैं. 
किन्तु अनुकूल परिस्थिति रहने पर, कई बार एक प्रकार के आत्म-सन्तुष्टि का भाव प्रविष्ट हो जाने से आदर्श के प्रति विचलन और प्रयास में क्षरण आने लगता है, जिसके कारण आन्दोलन बर्बाद भी हो सकता है.
इसीलिए अपने आदर्श के प्रति अटूट प्रतिबद्धता रखते हुए, हम महामण्डल कर्मियों को आज अपना अपना जीवन गठित करने के लिए और अधिक सावधानी के साथ अनवरत उद्द्य्म करने की आवश्यकता है.
 यदि हमलोग हिमाचल से कन्याकुमारी तक समस्त भारतवर्ष के युवाओं के भीतर स्वामी विवेकानन्द के विचारों को प्रविष्ट कराकर उनको नया भारतवर्ष गठित करने का व्रती बनने के लिए उद्बुद्ध करना चाहते हों, ऐसा महान कार्य केवल स्वामीजी की पुस्तकों को पढ़ कर उनके ' मनुष्य बनना और मनुष्य बनाना ' के विषय पर पांडित्य अर्जित कर तर्क-वितर्क, विचार-विश्लेष्ण, वाकपटुता के द्वारा इस सिद्धान्त की सत्यता को प्रमाणित करने से ही संभव नहीं होगा. बल्कि महामण्डल के कार्य में सफलता अर्जित करने के लिए अधिक आवश्यक है-स्वामीजी के विचारों को आत्मसात करके अपने जीवन को सुंदर ढंग से गठित कर लेना.
जिस प्रकार स्वामी विवेकानन्द अपने द्वारा प्रचारित आदर्श ( Model श्रीरामकृष्ण ) की प्रतिबिम्ब थे, उसी प्रकार हमलोगों को भी स्वामीजी के आदर्श को अपने आचार व्यवहार से जीवन के हर क्षण में प्रतिबिम्बित करने में समर्थ बन जाना आवश्यक है ! स्वामीजी ने सत्य-प्रेम-पवित्रता के उपर केवल भाषण ही नहीं दिया था, उनका अपना जीवन भी उनके गुरुदेव, उनके आदर्श- के ही जैसा सत्य-स्वरूप था, प्रेम-स्वरूप था, पवित्रता स्वरूप था. अतः महामण्डल के कर्मियों को भी अपना जीवन, उनके प्रचारित आदर्श (स्वामी विवेकानन्द ) के जैसा उदाहरण स्वरूप बनाना होगा.  
जिस समय महामण्डल कर्मियों के जीवन से सचमुच सत्य-प्रेम-पवित्रता विकीर्ण होने लगेगी, तब उनको भाषण के द्वारा युवाओं को अनुप्राणित करने की चेष्टा नहीं करनी होगी, उनका चरित्र ही युवाओं को महामण्डल आन्दोलन में खीँच लायेगा.
  यदि हमलोग भी स्वामीजी के जैसा अपने हृदय को अनन्त तक प्रसारित करने में समर्थ मनुष्य बन कर, अपने ह्तश्री, विगत भाग्य, लूप्त-बुद्धि, हिंसक बनने की हद तक भूखे, झगड़ालू देशवासियों को अपने जीवन जितना प्रेम कर सकें, यदि हमलोग भी जीवन-गठन की साधना के द्वारा अपने इस क्षूद्र आत्म-केन्द्रित जीवन को महाजीवन में परिणत कर के विलासिता, भोग-सुख की इच्छा का परित्याग करके, हमारे जो करोडों-करोड़ भारतवासी, निर्धनता और अज्ञानता के तीव्र भंवर में क्रमशः धीरे धीरे डूबते जा रहे हैं, उनके कल्याण की चेष्टा में स्वयं को नियोजित कर सकें, तब हमलोगों के ऐसे जीवन के प्रति आकर्षित होकर और भी सैंकड़ो आदर्शवादी युवा हमलोगों के साथ जुट जायेंगे एवं एक शक्तिशाली तथा महिमामन्डित भारतवर्ष का निर्माण करने के कार्य में अपने-आप को समर्पित कर देंगे. 
इसीलिए आज के अनुकूल परिस्थिति में अपने जीवन को गठित करने की साधना को और भी जोरदार ढंग से चलाने की जरूरत है. इस जीवन-गठन की साधना में यदि हमलोग कृत-कार्य हो सकें, तो परिवेश -परिस्थिति की अनुकूलता या प्रतिकूलता हमलोगों के लिए अप्रासंगिक हो जाएगी. प्रतिकूल परिस्थिति में चिंतित या अनुकूल परिस्थिति में हमलोग आत्मसंतुष्ट नहीं होंगे, हमलोग केवल नया भारत निर्माण करने के कार्य में दृढ कदमो के साथ आगे बढ़ते जायेंगे.   
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७.
 " आओ, भाइयों मनुष्य बनें ! "
युवाओं को सदैव आशावादी एवं रचनात्मक मानसिकता रखते हुए लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना उचित होता है. इसीलिए उन्हें सदैव सावधान होकर यह देखना चाहिए कि कहीं कोई नकारात्मक या विनाशकारी सोंच उनके मन में प्रविष्ट तो नहीं हो रही है ? 
अपने चारों ओर के परिवेश तथा परिस्थितियों के अनुरूप ही हमलोगों के मन में विचार या भाव प्रविष्ट होते हैं.  वर्तमान समय में हमें अपने चारों ओर केवल आत्मकेन्द्रित एवं स्वार्थी व्यक्तियों की भीड़ ही दिखाई पडती है. इसीलिए ऐसे परिवेश से प्रभावित युवाओं के मन में नकारात्मक विचारों के उठने की संभावना अधिक होती है.यद्यपि ह्मोलोगों के समाज में नकारात्मक विचारों का ही प्रभुत्व है, अभी हमलोगों को अपने चारों ओर स्वार्थी व्यक्तियों की भीड़ दिखाई पड़ती है, तथापि युवाओं के मन में सकारात्मक विचारों के लिए एक प्रकार की उत्सुकता भी सदैव बनी रहती है.
 हमलोग यह जानते हैं कि सकारात्मक तथा रचनात्मक भाव केवल निःस्वार्थी मनुष्यों से ही प्राप्त होते हैं. इसीलिए युवाओं को उन्हीं विशाल-हृदय, निःस्वार्थी महापुरुषों से, जो अपने व्यक्तिगत भोगसुख से अधिक दूसरों की भलाई एवं देश के कल्याण की बात सोचते हैं- से सकारात्मक और रचनात्मक विचारों को ग्रहण करना चाहिए. तथा उन महापुरुषों से रचनात्मक विचारों को ग्रहण कर अपने जीवन को सुंदर रूप से गठित करना चाहिए.
युवाओं के मन में जो सबसे बड़ा सकारात्मक भाव प्रविष्ट कराना है, वह है- प्रत्येक युवा यह सोचने लगे कि क्या करने से मैं सच्चा मनुष्य ( या निरन्तर-सचेत मनुष्य ) बन सकता हूँ ? इस साहसी अभियान (निरन्तर विवेक-प्रयोग ) के लिए उन्हें उत्प्रेरित कर देना ही हमलोगों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है. 
आज के युवा मानसिकता का सर्वेक्षण करने से पता चलेगा कि, अधिकांश युवाओं का मन ऐसे ही विचारों से भरा रहता है कि  कौन सी वाणिज्यिक और शैक्षिक विद्या ग्रहण की जाय जिससे कम से कम समय में अधिक से अधिक धन अर्जित करके जीवन को भोग-विलासिता में व्यतीत करने की स्वछन्दता प्राप्त हो सकती है.किन्तु, ' क्या करने से मैं यथार्थ मनुष्य बन सकता हूँ ?'- ऐसा कोई प्रश्न उनके मन में कभी नहीं उठता है. क्योंकि, शुरू शुरू में जीवन क्या है, सच्चा सुख क्या है, तथा किस प्रकार का जीवन-गठन करने से सच्चा सुख पाया जाता है- इन सब बातों के संबंध में अधिकांश युवाओं के मन में कोई स्पष्ट धारणा नहीं होती.
क्योंकि हम व्यस्क लोगों ने (अपने स्वयं के जीवन से ) उनको कभी सकारात्मक-विचार और यथार्थ जीवन-बोध ( या जीवन क्या है ? की समझ) देने का प्रयास ही नहीं किया है.इसीलिए इस अवस्था के लिए आज के युवाओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. ऐसी परिस्थिति में जब हमें अपने चारों ओर एक भी ऐसा अनुकरणीय आदर्श देखने को नहीं मिलता जिसमें समस्त उत्कृष्ट-भाव भरे हुए हों, तब वैसे किसी अवतारी महापुरुषों के जीवन से जीवन-गठन के उपादान स्वरूप समस्त उत्कृष्ट भावों ग्रहण करने की चेष्टा करनी चाहिए, जो अभी अपने स्थूल शरीर में नहीं हैं. 
      स्वामी विवेकानन्द भी ऐसे ही एक अवतारी पुरुष हैं, जो अपने स्थूल शरीर में न रहते हुए भी युवाओं के लिए एक प्रेरक प्रकाश-स्तम्भ बन कर, आजभी उनका पथ प्रदर्शन कर रहे हैं. उनका सम्पूर्ण जीवन ही पूर्णतया निःस्वार्थपर था, वे सत्य एवं प्रेम के मूर्तिमान स्वरूप थे. अपने सम्पूर्ण  जीवन में उन्होंने कभी अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कुछ नहीं किया, केवल लोक-कल्याण के लिए ही उनहोंने अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित कर दिया था. उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था- " आओ, भाइयों मनुष्य बनें ! " उनके इस पुकार में कैसी अद्भुत आत्मीयता झलकती है ! 
किन्तु हम युवा लोग प्रायः उनके इस पुकार को अनसुना कर देते हैं, तथा दूसरे प्रकार के चित्ताकर्षक निमंत्रणों को सुनते रहते हैं, और उसके प्रतिउत्तर में बिना विवेक-विचार किये तुरंत अपने सम्पूर्ण उत्साह एवं शक्ति का दुरूपयोग प्रायः विनाशकारी कार्यों में करते रहते हैं.
 जैसे, हमलोगों में से ही कुछ युवा राजनैतिक दलों के झंडों को हाथों में लेकर रोड-शो करते हैं या राजनैतिक-रैलियों में शामिल होते हैं, या कभी कभी बस, रेल, स्कूल, कॉलेज को आग के भी हवाले कर देते हैं. हमलोग अपनी शक्ति एवं उत्साह को इस प्रकार के व्यर्थ के कार्यों में अपव्यय कर देते हैं, इसीलिए उन्हें समाज की अधिक से अधिक भलाई करने के कार्य में नियोजित नहीं कर पाते हैं.जिसके फलस्वरूप केवल समाज को ही हानी नहीं पहुँचाते बल्कि स्वयं के जीवन में भी दुःख को बुला लेते हैं.
प्रकृति से हमने ऐसा दुर्लभ मानव-शरीर प्राप्त किया है, जिसमें धारणा करने के लिए मस्तिष्क एवं अनुभव करने के लिए हृदय भी साथ-साथ प्राप्त हो गया है. इसके अतिरिक्त प्रकृति ने हमलोगों के भीतर (मन में)अनंत शक्ति एवं संभावनाओं ( ब्रह्म को जान लेने की संभवना ) को संचित कर रखा है. अतेव हमलोगों के भीतर जो अनंत शक्ति अंतर्निहित है, उसका प्रकटीकरण और उद्घाटन करना ही हमारा अनिवार्य कर्तव्य है ! यदि हम अपने इसी अंतर्निहित शक्ति एवं संभावनाओं को अभिव्यक्त करने में समर्थ हो जाएँ तो हम अपना, समाज का एवं समस्त मानव-जाती का असीम कल्याण कर सकते हैं. 
 किन्तु यदि हमलोग अपनी इस अंतर्निहित शक्ति और संभावना को स्वयं के प्रयत्न से उद्घाटित करने की चेष्टा न कर, इसे प्रकृति के उपर ही छोड़ दें, तो हो सकता है, स्वतः ही कभी वह शक्ति प्रकट हो जाये. किन्तु यह कोई जरुरी नहीं कि वह सदैव मनुष्यों के कल्याण में ही खर्च हो. 
परन्तु यदि हमलोग अपने शरीर, मन और हृदय की शक्ति के संतुलित अभिव्यक्ति के लिए सचेत प्रयास करें तो उस शक्ति के संतुलित अभिव्यक्ति के फलस्वरूप हमलोग यथार्थ मनुष्य बनकर समाज और देशवासियों के कल्याण में अवश्य लग पाएंगे.
उदाहरण के लिए किसी उपजाऊ भूखण्ड में कई प्रकार की फसलों के होने की संभावना रहती है. हमलोग यदि उस भू-खण्ड की सही ढंग से जुताई-बोआई करके मनुष्यों की आवश्यकता के अनुरूप फसलों को उपजाने का प्रयत्न करें, तो उस भू-खण्ड की संभावना को उपयोग में लाकर, कई प्रकार की फसलों को उपजा कर, मनुष्यों का कल्याण कर सकते हैं. किन्तु यदि उसी भू-खण्ड को एक निश्चित योजना के अनुसार जुताई-बोआई नहीं करके वैसे ही परती-भूमि जैसा पड़े रहने दिया जाय, तो उस उपजाऊ भू-खण्ड पर स्वतः ही विभिन्न प्रजातियों के घास फूस और झाड़ियाँ और हो सकता है उन्हीं में पार्थेनियम के जैसा विषयला पौधा भी उग आये, जिससे मनुष्य का अमंगल भी हो सकता है.
 परन्तु हमलोग अपने जीवन को, इस मानव-शरीर रूपी भूखण्ड की सही ढंग से जुताई-बोआई करके, यदि अपनी अंतर्निहित अनंत संभावनाओं को विकसित करने का प्रयत्न करें, तो हमलोगों का जीवन सुंदर रूप में गठित हो उठेगा. दूसरी ओर यदि हमलोग अपनी अंतर्निहित संभावना को उद्घाटित करने की चेष्टा न कर, इस दुर्लभ मानव-जीवन को बंजर भूमि की तरह परती छोड़ दें, तो भी हमलोगों की अंतर्निहित शक्ति अभिव्यक्त होती रहेगी, किन्तु उस शक्ति की अनियंत्रित अभिव्यक्ति हमलोगों को एक पशु-मानव में परिणत कर देगी, और हमलोग समाज के लिए एक विषयला पौधा या कंटीली झाड़ी के रूप में तैयार होकर समाज की असीम हानी का कारण बन जायेंगे.
  इसलिए हमलोगों को अपने शरीर की शक्ति, मन की शक्ति और हृदय की शक्ति को उद्घाटित करने के लिए सचेतन-प्रयास करना अनिवार्य है. ताकि हमलोग यथार्थ (सचेत) मनुष्य बन कर अपने परिवार, समाज और देश के काम आ सकें. हममें से अधिकांश युवा इस शक्ति का दुरूपयोग करते हैं. हमलोग यदि इन शक्तियों का सदुपयोग करें, तो हमलोग अपने इस शरीर से मनुष्यों का बहुत कल्याण कर सकते हैं.
 हम अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का प्रयोग करके प्रकृति के कई रहस्यों को उद्घाटित कर सकते हैं, कई समस्यायों का समाधान कर सकते हैं. एवं अपने हृदय के द्वारा समस्त मनुष्यों के दुःख-दर्द को अनुभव कर के उनका दुःख दूर करने का प्रयास कर सकते हैं. हमारे शरीर, मन और हृदय (3H)  का इससे बढ़ कर सदुपयोग और क्या हो सकता है ?
इसीलिए हमारे लिए यही उचित है कि जो आह्वान हमलोगों के इस अंतर्निहित शक्ति को अभिव्यक्त करा कर हमें सच्चा मनुष्य बनने में सहायता करता हो, हम केवल उसी आह्वान को सुनें. किन्तु यदि हम अपनी आन्तरिक शक्ति का सदुपयोग न कर, उसे व्यर्थ के कामों में बर्बाद करके अपना जीवन नष्ट कर लें, तो उसके लिए अन्य कोई नहीं,हमलोग स्वयं दोषी होंगे !
 स्वामीजी कहते हैं- " अधिकांश मनुष्य अपने दुःख-कष्टों के लिए दूसरों को ही जिम्मेवार ठहराते हैं, अपनी असफलताओं का दोष दूसरों के उपर मढ़ते रहते हैं. जबकि सच्चाई यही है कि हमलोग अपने ही भूल से, अपने ही कर्म-दोष से ऐसी परिस्थिति में आ गये हैं, पर अब इसके लिए दूसरों को दोषी ठहरा रहे हैं. किन्तु ' दूसरों को दोषी साबित करने वाली इस मनोवृत्ति के कारण ' - हमलोगों का कुछ भी भला नहीं होता, उल्टे यह मनोवृत्ति हमें दिन पर दिन और अधिक दुर्बल बना देती है." (२/१२०) 
इसीलिए आज हमलोगों को स्वामीजी के उस महा आह्वान - ' आओ, भाइयों मनुष्य बनें !' को सुनना ही पड़ेगा. यदि हमलोग अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदार और सच्ची निष्ठा रखते हुए, स्वामीजी का अनुसरण करें, एवं अपनी अंतर्निहित संभावना को अभिव्यक्त कर जीवन-गठन की चेष्टा करें, तो हमलोग भी यथार्थ मनुष्य बन कर समाज का कल्याण करने में अवश्य सक्षम हो पाएंगे. हमलोग इस बात को भी अच्छी तरह से समझ लेंगे कि सार्थक-जीवन कहने से क्या अर्थ निकलता है,तथा यथार्थ सुख किसको कहते हैं ?
 और तब हमलोगों के जीवन से आनंद स्वतः विकीर्ण होने लगेगा, हमलोग यह देख पाएंगे कि शरीर, मन. हृदय की शक्तियों का संतुलित विकास करने से यथार्थ मनुष्य (या निरन्तर-सचेत मनुष्य) बन कर मनुष्य के कल्याण का कार्य करना ही सबसे बड़ा आनंद है, एवं इसीमें जीवन की सम्पूर्णता है.   

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८.
 गहना कर्मणो गतिः 
कर्म की गति समझ लेना अत्यंत कठिन कार्य है. जितनी बातें शास्त्रोचित कर्म-विधान के संबन्ध में कही गयी हैं, उन्हें भी सही रूप से समझ पाना आसान नहीं है. फिर भी कर्म-विधान के उपर थोड़ी चर्चा करना एवं उसको समझने की चेष्टा करना अत्यन्त आवश्यक है. क्योंकि हमलोग एक पल के लिए भी कर्म किये बिना नहीं रह सकते. तथा यह भी तय है कि कर्म-विधान के रहस्य से बिल्कुल अनजान व्यक्ति को भी नासमझी वश किये गये कार्यों का परिणाम अवश्य भोगना पड़ता है.
 इसीलिए कर्म-विधान को समझने की चेष्टा करने से संभवतः कर्म के अनेकों दुष्परिणामों तथा उसके कारण अवश्यमेव प्राप्त होने वाले कई दुःख-कष्टों से बचा जा सकता है. हमलोग जानते हैं कि मन, वचन और शरीर के माध्यम से जो भी कुछ किया जाता है, उसी को कर्म कहते हैं. हमलोग अपने मन में जिस प्रकार के विचारों को उठने की अनुमति देते हैं, उसका भी एक फल होता है. वाणी से जो कुछ बोलते हैं, उसका भी फल प्राप्त होता है. शरीर के द्वारा जैसी क्रियाएँ करते हैं, तदानुसार उसका भी फल प्राप्त होता है. 
 भौतिक-विज्ञान का एक सरल किन्तु अत्यन्त मूल्यवान सिद्धान्त है, जिसके अनुसार- " प्रत्येक क्रिया के बराबर ( Tantamount ) एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है ". इसको किसी भी तरह से रोका नहीं जा सकता है. उसी प्रकार मनोविज्ञान के अंतर्गत भी एक " प्रतिशोध (बदला) का नियम " ( The Law of Retaliation ) है. इसके अनुसार यह माना जाता है कि- " आप जैसा करेंगे, वैसा ही आपके पास वापस लौट आएगा. "
श्रीमद भागवत में भी ऐसा उदाहरण देखा जा सकता है. बालक ध्रुव की कथा में उल्लेख मिलता है कि जब ध्रुव किसी प्रकार अपने पिता की गोद में बैठ गया था, उसी समय उसकी सौतेली माता सुरुचि वहां पहुँच कर उसे अपने पिता की गोद से उतार देती है. इससे ध्रुव के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुँचती है, और क्रोध-अभिमान से उसको आँखें लाल हो जाती हैं. वह रोते हुए अपनी माता सुनीति के पास पहुँच कर सारी घटना सुनाता है. तब उसकी माँ उसको शांत कराते हुए कुछ नैतिक परामर्श देते हुए कहती हैं-
" माम अमंगलम तात परेषु मंस्था
       भूक्तंगे जनो यत परदुःखदस्तत । "
'- मेरे बेटे, दूसरों के अमंगल का विचार भी अपने मन में नहीं लाना चाहिए,क्योंकि जो व्यक्ति दुसरों को जितना दुःख पहुँचाता है, बदले में उसको भी ठीक उतना ही दुःख भोगना पड़ता है.' 
श्रीरामकृष्णदेव ने भी कहा  है-" जिसने जैसा कर्म किया है, उसको वैसा ही फल प्राप्त होगा." स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " विभिन्न सार्वभौमिक भाव-वाचक शब्दों की तरह ' कर्तव्य ' शब्द को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करना असंभव है. व्यावहारिक जीवन में उसकी परिणति तथा परिणाम के लक्षणों को देखने के बाद ही हमें उसके संबन्ध में कुछ धारणा हो सकती है. " (३/३८)
 यह जगत एक विराट कारखाना है. इस कारखाने में हर जगह पर निरन्तर कार्य हो रहा है, कभी और कहीं अवकाश के लिए समय नहीं है. और प्रत्येक कार्य का फल भी अनिवार्य रूप से प्राप्त होता रहता है.यहाँ की सभी वस्तुएँ एक अटूट अदृश्य बंधन में आबद्ध हैं. इसीलिए वैज्ञानिक ' जेम्स जीनस ' के समान स्वामी विवेकानन्द भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे थे, कि
" समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड के उपर एक खिंचाव उत्पन्न किये बिना 
आप अपनी एक अंगुली भी नहीं हिला सकते हैं. "
 इसीलिए बहुत सतर्कता के साथ विवेक-प्रयोग करने के बाद ही, हमें कोई कार्य करना चाहिए, क्योंकि हमारे द्वारा कृत कार्यों का प्रभाव पूरे विश्व के उपर पड़ता है. गहराई से विचार करने पर पता चलेगा कि हमलोग केवल अपने शरीर के द्वारा ही कार्य नहीं करते, बल्कि जब बोलते हैं- तो बोलना भी एक कार्य है, या जब विचार करते हैं- तो चिन्तन करना भी एक कार्य है. हमलोग केवल जागते समय ही कार्य नहीं करते हैं, बल्कि नींद में सोना भी एक कार्य है और स्वप्न देखना भी एक कार्य ही है.
कई कार्यों को हमलोग होशपूर्वक या सचेत होकर करते हैं, परिणाम के उपर सोच-विचार करके ही कुछ करने का संकल्प लेते है. किन्तु इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे कार्यों को भी हम करते हैं, जिन्हें करते समय हमें यह बोध भी नहीं रहता कि अभी मैं कुछ कर रहा था-जैसे पलकों को उठाना-गिराना. या स्वाभाव के वशीभूत होकर एक ही कार्य को बार बार दुहराते रहने की आदत के कारण हमलोग उसी कार्य को पुनः पुनः करते रहते हैं. किन्तु प्रत्येक कार्य का फल मिलता ही है, जिसको भोगने के सिवा हमलोगों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है. फिरभी जाने या अनजाने एक पल के लिए भी बिना कोई कार्य किये हमलोग रह नहीं सकते हैं.
 इसीलिए हमलोगों को अपने मन, वचन और शरीर द्वारा कोई भी कार्य करने के पहले, एक विशेष पद्धति से निर्णय करना उचित होगा, जिससे कि हमारे द्वारा कृत कार्य शुरू से अन्त तक अच्छा फल दे, हमें कोई नुकसान न उठाना पड़े. इसीलिए नीति-उपदेश में कहा गया है-
दृष्टिपूतं न्यसेत पादंग, वस्त्रपूतं जलं पिवेत ।
सत्यपूतं वदेत वाक्यं, मनस्पूतं समाचरेत ।।
- अर्थात अपनी आँखों से देख-सुन लेने के बाद ही अपने कदमों को आगे बढ़ाना उचित है, जल को कपड़े से छान कर पीना उचित है, वाणी से सत्य कहना उचित है, विवेक-पूर्ण निर्णय द्वारा मन को पवित्र रखते हुए ही आचरण करना चाहिए.
क्योंकि प्रत्येक कार्य का अलग अलग परिणाम होता है, इसीलिए हमलोगों को इस प्रकार कर करना आवश्यक है, जिससे कि हमलोग अपनी योजनाबद्ध प्रक्रिया ( Planned - Process)  का अनुसरण करते हुए  अपने अभिलक्षित उद्देश्य (Selected -Goal ) की दिशा में अग्रसर होते रहें ! इसीलिए सर्वप्रथम हमें अपने जीवन का एक सर्वोच्च उद्देश्य निर्धारित कर लेना चाहिए.
 हमारे जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य किसी महान-आदर्श के अनुरूप ही होना चाहिए. हमलोग कहा करते हैं कि महामण्डल के आदर्श हैं - ' चिर-युवा स्वामी विवेकानन्द !' किन्तु कोई प्रश्न उठा सकते हैं कि भारत की धरती तो रत्न-गर्भा है, यहाँ आदर्श महापुरुष तो अनेकों हुए हैं, फिर स्वामी विवेकानन्द को ही हमें आदर्श क्यों चुनना चाहिए ? इस बात को भी समझ लेना बहुत जरुरी है.
स्वामी विवेकानन्द इसीलिए सबसे स्वाभाविक युवा आदर्श इसीलिए प्रतीत होते हैं कि, उन्हीं के शब्दों में - उन्होंने सामान्य जनों को भी उनके बोधगम्य भाषा में मनुष्य जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य को प्राप्त करने का उपाय बताया है. वे वास्तव में ह्मोगों के समकालीन महापुरुष थे. वे केवल एक शास्त्रज्ञ सिद्ध महापुरुष ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने समस्त जाति के मनुष्यों को अपना बना कर सबों के दुःख को अपने हृदय में अनुभव कर के उनके दुःख को दूर करने का उपाय बताया है. और वह उपाय जंगल या पहाड़ों की गुफा में बैठ कर कठोर साधना करने में नहीं है, बल्कि इसी कर्म-संकुल संसार रूपी जन-आरण्य में, घर-परिवार में रहते हुए समस्त मानव जाति के कल्याण में अपने जीवन की सम्पूर्ण शक्ति न्योछावर कर देने की योग्यता अर्जित करना है. 
इसके साथ ही साथ वे आधुनिक दृष्टिकोण एवं वैज्ञानिक सोच रखने वाले व्यक्ति थे, इसीलिए विद्यमान समाज को अस्वीकृत कर के किसी कल्पना-लोक (Utopia) की सृजन का प्रस्ताव उन्होंने हमारे समक्ष नहीं रखा है. समस्त मानव समाज किस प्रकार सही रूप से मनुष्यों के रहने योग्य बन सकता है, उसी का उपाय बताया है. ( पाश्चात्य देशों से आयातित प्रजातांत्रिक-व्यवस्था और संविधान के उपर हमें  संदेह या तर्क-वितर्क करना आता ही नहीं है. यही हमारी अवैज्ञानिकता है. यदि हममें वैज्ञानिक सोच होती तो किसी के छींक देने पर, बिल्ली रास्ता कट देने पर, मंगल-शनी को दाढ़ी बनाने जैसा प्रश्न को लेकर इक्कीसवीं सदी में भी माथापच्ची नहीं कर रहे होते.)
जबकि स्वामी विवेकानन्द बिल्कुल एक वैज्ञानिक की भाँति सोच सकते थे. वे जानते थे कि जो देश जितनी तेज गति से विकास (3H निर्माण ) करेगा, वह उतना आगे निकल जायेगा. जबतक भौतिक चीजें, रोटी,कपड़े और मकान पर्याप्त मात्रा में नहों , अध्यात्मिक विकास भी नहीं हो सकेगा. हमलोग तर्क नहीं करते हैं. संदेह नहीं करते हैं, जो कहा जाता है वह मान लेते हैं. इसी सोच ने हमें अवैज्ञानिक बना दिया है. जब तक यह अवैज्ञानिक सोच रहेगी, तब तक हम हारते पिटते रहेंगे. यदि हमें विकास करना है तो वैज्ञानिक सोच को अपनाना होगा. हमें भाग्यवाद का पल्ला छोड़ना पड़ेगा. 
अब हमें यह तय करना पड़ेगा कि जो होना है (२०१२ में मानव-सभ्यता का अंत होने वाला है ),वह नहीं होगा ! बल्कि हम भारतवासी ( श्रीरामकृष्ण देव की संतानें ) जिस कार्य को पूरा करने का संकल्प अपने मन में ठान लेंगे उसे अवश्य पूरा करके रहेंगे. 
' यथार्थ मनुष्य ' बनना और बनाना हमलोगों के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है, तथा इसकी श्रीरामकृष्ण द्वारा आविष्कृत एवं स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित ' मनुष्य निर्माण ' की नई तकनीक है वे पाँच नित्य करनीय कार्य  जिन्हें करने के लिए महामंडल के प्रत्येक कर्मियों को वैज्ञानिक-पद्धति से प्रशिक्षित किया जाता है.  नई शिक्षा नीति में महामंडल की
 योजनाबद्ध प्रक्रिया ( Planned - Process)  का अनुसरण करके 
एवं अपने अभिलक्षित उद्देश्य (Selected -Goal ) की दिशा में 
अग्रसर होते रहने की ' श्रीरामकृष्ण-तकनीक ' !
 को अपनाना होगा. महामंडल में नेतृत्व-प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं को गांव गांव में युवा प्रशिक्षण शिविर लगाने होंगे. नई सोच पैदा करनी होगी. दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलना ही नहीं होगा, उसका नेतृत्व करने योग्य भी बनना पड़ेगा. 
 तभी हम विकास कर पाएंगे, अन्यथा हाथ पर हाथ धरे, रहने से कुछ नहीं होगा. जापान पुनः उठ खड़ा हुआ, उसने वैज्ञानिक सोच से हिरोशिमा व् नागासाकी का नक्शा बदल दिया. वे जानते थे कि आदमी जो चाहता है, वह करके बता देता है. विज्ञान से हर चीज संभव है, अन्यथा आज हम चाँद पर नहीं जा पाते. यह हमारी वैज्ञानिक सोच का नतीजा है कि आज हम रॉकेट और कम्प्यूटर जैसी तकनीक विकसित कर सके हैं.
जब तक हम मनः संयोग का अभ्यास करके तकनीकी सोच और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि प्राप्त करने का प्रयास नहीं करेंगे तब तक हम यूँ ही गरीब, दरिद्र और भिखमंगे बने रहेंगे. क्योंकि वही देश तरक्की करता है जहाँ कि जनता तरक्कीपसन्द और विकास (३ H निर्माण ) को शीघ्र गले लगाती हो अन्यथा हम योग्य होते हुए भी इसी तरह हारते रहेंगे.) 
आज विश्व के किसी भी देश का मानव-समाज, सच्चे मनुष्यों के रहने योग्य अवस्था में नहीं है. मानव समाज लगभग पशु के समाज में परिणत हो गया है. ' समाज के कल्याण के लिए एक एक जन को सच्चे मनुष्य के सांचे में ढाल देना होगा ! '- यही स्वामी विवेकानन्द की मुख्य शिक्षा है. उन्होंने कहा है - " दुनिया तभी पवित्र और अच्छी हो सकती है, जब हम स्वयं पवित्र और अच्छे हों. वह ' कार्य ' है और हम उसके ' कारण '- इसीलिए आओ, भाइयों !  हमलोग अपने को पवित्र बना लें. आओ हम अपने को पूर्ण बना लें. " (९/१८२) उनके इस आह्वान को सुन कर हमलोगों को सचेत-मनुष्य या यथार्थ मनुष्य बनने की साधना में जुट जाना है.
 आज सम्पूर्ण विश्व में मानव समाज की जैसी दुर्दशा है- उसको देख कर देश-विदेश के कई विचारशील और  मानव-जाति के कल्याण के लिए उत्सुक व्यक्ति हैं जो अपने हृदय में गहरी वेदना का अनुभव करते हैं तथा इससे बाहर निकलने के लिए अलग अलग योजनओं की सही रुपरेखा भी निर्धारित करना चाहते हैं. इन लोगों के प्रत्येक नये विचारों, एवं शब्दजालों की खबर हमलोग भी रखते हैं, किन्तु इन तथाकथित बुद्धिजीवियों में से किसी भी व्यक्ति ने मनुष्य को यथार्थ रूपसे निर्मित करने का उपदेश अभी तक नहीं दिया है.
वैसे स्वनाम धन्य लोगों के नाम बताना उचित नहीं होता, नहीं तो उनके नामों को उजागर भी किया जा सकता था. इन आधुनिक तथा-कथित बुद्धिजीवियों के दिमाग में ' विश्व सरकार ', ' विश्व संगठन ', ' वैश्विक- आन्दोलन ', जैसे बड़ी बड़ी योजनायें तो आती हैं, किन्तु अंग्रेजी का प्रसिद्द मुहाबरा -' बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधेगा ? '  इसकी कोई खबर इन लोगों के पास नहीं है. इन्हें तो बस जिस किसी भी तरह हो सत्ता की कुर्सी मिलनी चाहिए तथा एन-केन -प्रकारेण विदेशों में ' श्याम-अर्थ ' संचय का लोभ ही समाज-सेवक बने रहने पर मजबूर किये रहता है. आज के प्रजातंत्र का प्राण, ऊँचे ओहदे पर बैठने का स्वप्न को साकार करने के लिए चाहे जिस प्रकार की नीचता, हिंसा-वृत्ति, झूठ का सहारा, जो अश्लीलता का नग्न नृत्य समाज के स्वांस-नलिका को बंद करने पर उतारू है, उसी में बसते हैं. 
 ऐसी परिस्थिति में यदि मेरा कर्तव्य क्या है, इसका निर्धारण करना हो, तो केवल स्वामी विवेकानन्द का सन्देश ही प्रणिधान योग्य है- " यदि हमारी वर्तमान अवस्था हमारे ही पूर्व कर्मों का फल है, तो निश्चित है कि जो कुछ हम भविष्य में होना चाहते हैं, वह हमारे वर्तमान कर्मों के द्वारा ही निर्धारित किया जा सकता है. अतेव, यह जान लेना आवश्यक है कि कर्म किस प्रकार किये जाएँ ? " (३/७)  
          
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९ .
कर्मी बनना 
हमलोगों में ऐसा कौन है, जो कर्मी न हो ? हम सभी लोग कुछ न कुछ कर्म तो करते ही रहते हैं. इसीलिए यह कहा जा सकता है कि हम सभी लोग कर्मी हैं. हाँ, शब्दार्थ के अनुसार ऐसा कहा जा सकता है, लेकिन किसी भी कार्य के कर्मी - जैसे जीवन अवलम्बन के लिए जो अवश्य करनीय या अर्थोपार्जन हेतु कोई कार्य करते हों- तो वैसे कार्यों के ' कर्मी ' के उपर यहाँ चर्चा नहीं हो रही है. 
अथवा शिल्प-कर्मी, कृषि-कर्मी, कर्मी-छटनी, कर्मी-प्रतिवाद, इत्यदि शब्दों को देख कर यदि सोचें कि इन सब क्षेत्रों में कर्मी का जो अर्थ निकलता है, वैसा ही कोई कर्मी बनने की बात हो रही है, तो यह गलत होगा. इन सबसे भिन्न बड़े अर्थ में कर्म और कर्मी होते हैं. यहाँ हमारी चर्चा का विषय वैसे ही कर्मी हैं.
केवल अपने या परिवार के खाने-पहनने, भोग-सुख के लिए- बाध्य होकर किसी कार्य को करना, और बिना किसी बाध्यता के,अनेक लोगों के कल्याण एवं शुभकामनाओं द्वारा अनुप्रेरित होकर, अपने या परिवार के सुख-भोग के लिए नहीं, बल्कि किसी उच्च आदर्श से अनुप्रेरित होकर, एक विशिष्ट मनोभाव रखते हुए किसी कर्म में प्रवृत होना- इन दोनों प्रकार के कर्मों को एक समान कर्म नहीं कहा जा सकता है.
 प्रथमोक्त कर्म की अपेक्षा दूसरे प्रकार का कर्म निश्चय ही भिन्न तथा विशेष महत्व का हो जाता है. क्योंकि बिना किसी बाध्यता के किया जाने वाला कर्म स्वार्थपरता की सीमा को लाँघ जाता है, और ऐसे कर्मी का हृदय विशाल होता जाता है, उसकी सहानभूति और संवेदना गहरी होती जाती है. उसके हृदय में दूसरों के प्रति प्रेम का ऐसा झरना फूट पड़ता है, कि वह अपने कर्म में किसी थकान या कष्ट का अनुभव नहीं करता, बल्कि उसका कर्म आनंददायक हो जाता है. 
 ऐसे कार्यों में स्वेच्छा से युक्त कर्मी अपने आचरण एवं चरित्र को उन्नत करता रहता है, इसकी परिणति उस कर्मी के अध्यात्मिक उन्नति में होती है. वैसा कर्म जो अनेक लोगों के कल्याण की कामना से, बिना किसी बाध्यता के स्वेच्छा पूर्वक किया जाता है, आगे चल कर ' कर्मयोग ' बन जाता है. क्योंकि तब वह कर्मी, कर्म के माध्यम से अनेकों के साथ युक्त हो जाता है !
इसके आलावा एक परम वस्तु अनेकों के साथ युक्त हैं, इसीलिए वह कर्मी अनेकों के माध्यम से उन परम वस्तु के साथ भी युक्त होकर कह सकता है-
 " সবার সাথে যোগে যেথায় বিহারো, সেইখানে যোগ তোমার সাথে আমারও । "
" सबार साथे योगे जेथाय विहारो, सेइखाने योगे तोमार साथे आमारो ।"
- हे प्रभु, तुम सबों के साथ युक्त रहते हुए जहाँ कहीं भी विहार करते हो, वहीँ पर तुम्हारे साथ मैं भी जुड़ जाता हूँ, तुम्हारे साथ मेरा योग बना ही रहता है. श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है-
 "  तुम्हारे लिए कर्म का त्याग करना संभव नहीं. तुम्हारी इच्छा हो या न हो, तुम्हारा स्वभाव तुमसे कर्म करवाएगा. इसके आलावा तुम जो भी कर्म करो, फल की आकांक्षा का त्याग करके, कामनाशून्य या अनासक्त हो कर कर सके तो उनके (ठाकुर के) साथ योग होता है. ईश्वरलाभ जीवन का उद्देश्य है और निष्काम कर्म उसका उपाय."
अनेक लोगों के कल्याण के लिए कर्म कोई व्यक्ति चाहे तो अकेले भी कर सकता है, और अपने साथ कुछ लोगों को जोड़ कर सम्मिलित रूप से भी कर सकता है. जो व्यक्ति अकेले ही अनेक लोगों का कल्याण करने में समर्थ होते हैं, उन्हें (अवतारी ) महापुरुष कहा जाता है. इनके अतिरिक्त वैसे दो-चार व्यक्ति जो यह सोचने लगते हैं कि वे भी अकेले ही अनेक लोगों का कल्याण कर रहे हैं, वे कल्याण के सच्चे अर्थ में कल्याण कर पाते हैं या नहीं इसमें संदेह है.
 वास्तव में वे जो करते हैं वह दूसरों की थोड़ी-बहुत भलाई (favor) भर ही करते हैं. यदि कोई व्यक्ति मन में सेवा का भाव रख कर दूसरों को थोड़ा-बहुत लाभ भी पहुँचाने का कार्य कर पाता हो, तो यह बहुत अच्छी बात है. किन्तु कल्याण (Welfare) का अर्थ दूसरों को कुछ लाभ पहुँचा देना (या धर्मादा या ज़कात निकाल देना ) ही  नहीं है. इसका वास्तविक अर्थ है- समग्र रूप से या ' सर्वछादी-प्रवर्धन ( Overall Amplification ) ' अर्थात जीवन को सार्थक करने की दिशा में अनेक लोगों को अग्रसर करा देना. और सामान्य मनुष्य ऐसे कार्य को सामूहिक रूप से ही कर सकता है. 
[ " जीवन में मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि एक ऐसे चक्र का प्रवर्तन कर दूँ, जो उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों को सबके द्वारों तक पहुँचा दे और फिर स्त्री-पुरुष अपने भाग्य का निर्णय स्वयं कर लें...याद रखो कि राष्ट्र झोपड़ी में बसा हुआ है; परन्तु शोक ! उन लोगों के लिये कभी किसीने कुछ किया नहीं...क्या तुम साधारण जनता की उन्नति कर सकते हो ? क्या उनका खोया हुआ व्यक्तित्व, बिना उनकी स्वाभाविक अध्यात्मिक वृत्ति को नष्ट किये, उन्हें वापस दिला सकते हो ? क्या समता, स्वतंत्रता, कार्य-कौशल, पौरुष में तुम पाश्चात्यों के भी गुरु बन सकते हो ? क्या तुम उसीके साथ-साथ... आध्यात्म-साधनाओं में एक कट्टर सनातनी हिन्दू भी हो सकते हो ? यह काम करना है और हम इसे करेंगे ही. " (२/३२१)" वर्ण-व्यवस्था तभी हटेगी, जब लोगों को उनका खोया हुआ सामाजिक व्यक्तित्व पुनः प्राप्त हो जायेगा." (२/३११) "]
जिस संगठन में सामूहिक रूप से मिलजुल कर ' सर्वछादी प्रवर्धन 
 ( Overall Amplification ) ' या सम्पूर्ण-कल्याण करने की बात हो, वहाँ सर्वप्रथम एक सामान्य आदर्श, उद्देश्य तथा कार्य-पद्धति का निर्धारण करना अनिवार्य हो जाता है. उस संगठन के समस्त कर्मी अपने निजी विचार को महत्व न देकर, अपने संगठन के पूर्व निर्धारित आदर्श,उद्देश्य और कार्यपद्धति में पूरा भरोसा एवं विश्वास रखते हुए, उनमें कोई बदलाव किये बिना,अपने व्यक्तिगत स्वार्थ या नाम-यश-प्रतिष्ठा की ओर नजर न देकर,संगठन के उद्देश्य को सफल करने के लिए आनंद के साथ आपस में मिलजुल कर कार्य करते रहते हैं. 
 उस महान कार्य से जुड़े समस्त कर्मियों की वांछित वस्तु व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करना न होकर, सामूहिक प्रयास में सफलता प्राप्त करना होता है. वैसे संगठन में व्यक्तिगत उन्नति या ऊँचा पद ( ओहदा ) पाने के लिए कर्मियों के बीच आपस में कोई प्रतिद्वंदिता या स्पर्धा नहीं रहती. सभी कर्मियों द्वारा स्वीकृत उद्देश्य की सफलता के लिए कर्मियों के बीच यह प्रतिद्वंदिता वांछनीय है कि कौन कितना सहयोग कर सकता है.
अच्छे कर्मियों में कुछ गुण भी रहने चाहिए, यदि नहीं हैं, तो उन गुणों को अर्जित करने का प्रयास करना चाहिए. सभी कर्मियों में कर्तव्यनिष्ठा,आज्ञाकारिता, अनुशासन की भावना, अथक-परिश्रम करने की क्षमता, ईमानदारी, दायित्व बोध या जिम्मेदारी, उद्देश्य के प्रति पूर्ण निष्ठा, स्वच्छता -आदि गुण रहने चाहिए. कार्य करने में आलसीपन बील्कुल नहीं रहेगा, यथासंभव तेज गति से, फिर भी सारे कार्य त्रुटी रहित तथा सर्वांग सुंदर होने चाहिए. चाहे जैसा भी काम सामने आ जाये, उसे पूरा कर दिखाने का साहस सभी कर्मियों में होना चाहिए, आवश्यकता होने पर उसे सीख लेने की क्षमता भी रहनी चाहिए. आपस में सहयोग करने का भाव रहना चाहिए, यह कार्य मेरा है, वह कार्य दूसरे का है-किसी को अपने मन में ऐसे तुच्छ विचार नहीं आने देना चाहिए.
 हमलोगों को सदैव यह याद रखना चाहिए कि, इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य केवल एक है, और वह है- जो व्यक्ति चाहे जिस कार्य को भी कर रहा है, उस कार्य के माध्यम से उसकी अध्यात्मिक उन्नति हो रही है या नहीं उसी ओर अपनी दृष्टि को एकाग्र रखना. [ " पूर्णता का मार्ग यह है कि स्वयं पूर्णता को प्राप्त होना, तथा कुछ थोड़े से स्त्री-पुरुषों को पूर्णता को प्राप्त कराना." (२/३३२) " जब तक कोई वास्तव में अध्यात्मिक न हो जाय, अर्थात जब तक किसीको आत्मस्वरूप ( सच्चिदानन्द ) में वास्तविक अन्तर्दृष्टि नहीं प्राप्त हो जाती और आत्मा के जगत की (अर्थात शाश्वत चैतन्य की) एक झाँकी नहीं मिल जाती, तब तक वह बीज को भूसे से, गहराई को थोथी बातों से पृथक नहीं कर सकता. " (२/३३३)]
 सभी कर्मियों के बीच परस्पर प्रेम का अटूट बंधन भी रहना चाहिए. क्योंकि जो कर्मी एक ही आदर्श और उद्देश्य के प्रति समर्पित होकर कार्य कर रहे हों, यदि उन्हीं कर्मियों के मन में अपने सहयोगी भाइयों के लिए प्रेम नहीं रहे, तो हमलोग अपने साथ बाहर के व्यक्तियों को जोड़ पाने में कैसे सफल हो पाएंगे ? इसीलिए सर्वप्रथम अपने हृदय को विशाल बनाने का प्रयोग, तो जो सामूहिक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए समर्पण की भावना के साथ कार्य रहे हों, उन्हीं कर्मियों के बीच होना चाहिए. यदि ऐसे महान संगठन से जुड़े कर्मी भी अपसा में ही किसी से घृणा करें, या किसी से ईर्ष्या करें, तो यह कैसे समझ में आयेगा कि हमलोग मनुष्य कहलाने योग्य मनुष्य बनना चाहते हैं, और दूसरों को भी वैसा बन जाने में सहायता करने के लिए इस कार्य को कर रहे हैं ?
[ " क्या कारण है कि हिन्दू राष्ट्र अपनी अद्भुत बुद्धि एवं अन्यान्य गुणों के रहते हुए भी टुकड़े टुकड़े हो गया ? मेरा उत्तर होगा -ईर्ष्या ! भारत में तीन मनुष्य एक साथ मिलकर पाँच मिनट के लिये भी कोई काम नहीं कर सकते. हर एक मनुष्य अधिकार प्राप्त करने के लिये प्रयास करता है, ..ऐसे व्यक्तियों के एक संगठन का निर्माण करना जो परस्पर मतभेद रखते हुए भी अटल प्रेमसूत्र से बँधे हुए हों, क्या एक आश्चर्यजनक बात नहीं ? "(२/३२५) "]
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- " हमें जो चाहिए वह है, मन के साथ हृदय का पूर्ण समन्वय." अच्छा कर्मी बनने के लिए यह परमावश्यक है. वे आगे कहते हैं- " प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अनंत सहानुभूति हो, और साथ ही साथ उसमें अनंत परिमाण में तार्किक बुद्धि भी रहे. " (२/१४९) वे अपने आन्दोलन के सहकर्मियों को संबोधित करते हुए कहते हैं- " तुम्हारे मन में किसी भी प्रकार की स्वार्थपरता- चाहे नाम कमाने की या यश प्राप्त करने की, बील्कुल नहीं रहनी चाहिए. इस कार्य में -तुम्हारे नाम की या मेरे नाम की या मेरे गुरुदेव तक के नाम की भी आवश्यकता नहीं है. जिससे कि उनके (मनुष्य-निर्माणकारी ) विचारों की अभिव्यक्ति एवं दृढ संकल्प को कार्य में रूपायित किया जा सकता हो, उसी के लिए प्रयत्न करो. मेरे बालकों, मेरे वीरों ! पहिये पर जा लगो, उसपर अपने कंधे लगा दो. नाम,यश अथवा अन्य तुच्छ विषयों के लिये पीछे मत देखो; स्वार्थ को उखाड़ फेंको और कार्य में जुट जाओ !" (२/३५६)
यथार्थ कर्मी बनने में एक खतरा और है- ' किसी व्यक्ति के मन में इच्छा हुई मैं किसी गुरु का शिष्य बनूंगा. बहुत खोज-बिन करने पर एक गुरु का पता लगा, किन्तु जब उनके आश्रम में पहुंचा तो देख कर दंग रह गया ! गुरूजी के तो बड़े ठाठ थे ! रहने के लिये सुंदर घर-द्वार, माल-असबाब ( फर्नीचर आदि ), गणमान्य भक्त-मंडली, शिष्य लोग सेवा कर रहे थे. उसने गुरु से पूछा चेला बनने के लिये क्या करना पड़ता है ? गुरूजी ने कहा, आश्रम गौशाले आदि की सफाई करनी पड़ेगी, लकड़ी चुन कर लाना होगा, बर्तन आदि मांजने पड़ेंगे. गुरु ने उस व्यक्ति को समझाया कि चेला बनना बहुत कठिन कार्य है. तब उस व्यक्ति ने कहा कि यदि चेला बनना कठिन है, तो मुझे सीधा गुरु ही बना दीजिये !' 
इसीलिए स्वामीजी कहते हैं- " अपने भाइयों का नेता बनने की कोशिश मत करो, बल्कि उनकी सेवा करते रहो. नेता बनने की इस पाशविक प्रवृत्ति ने जीवनरूपी समुद्र में अनेक बड़े बड़े जहाजों को डूबा दिया है. इसीलिए इस विषय में विशेष रूप से सतर्क रहो, अर्थात जान की बाजी भी लगा देने की नौबत आ जाये तो उसे एक खेल समझ कर निःस्वार्थता पूर्वक काम करते रहो ! " (२/३५७) " नेता बनना बहुत कठिन कार्य है. नेता को अपने संघ के चरणों में अपना सबकुछ यहाँ तक कि अपनी सत्ता तक को विसर्जित कर देना पड़ता है. " " जिसके प्रेम में छोटे-बड़े का भेद हो, वह कभी भी अग्रणी नहीं बन सकता. जिसके प्रेम की सीमा नहीं हो, उंच-नीच का भेद नहीं हो, वह प्रेम के बल पर सम्पूर्ण जगत को जीत लेता है ! " 
इसलिए जो व्यक्ति सही रूप में कर्मी बन सकता हो, उसी के भीतर ऐसा नेतृत्व करने अधिकार जन्म लेता है. 
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[ " यदि तुम शासक बनना चाहते हो, तो सबके दास बनो. यही सच्चा रहस्य है. तुम्हारे वचन यदि कठोर भी होंगे, तब भी तुम्हारा प्रेम अपना प्रभाव दिखायेगा. मनुष्य प्रेम को पहचानता है, चाहे वह किसी भी भाषा में व्यक्त हुआ हो."(२/३५९)
" सभी से पूछना -क्या सभी लोग ईर्ष्या त्यागकर एकत्र रह सकेंगे या नहीं ? यदि नहीं, तो जो ईर्ष्या किये बिना नहीं रह सकता, उसके लिये वापस घर चले जाना ही अच्छा होगा. वही हमारा जातिगत दोष है. इस देश (अमेरिका) में वह नहीं है, इसीसे ये इतने बड़े हैं .हम जैसे कूपमण्डूक दुनिया भर में नहीं हैं. " (२/३३९)       
 " प्रतिदिन मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु मेरे साथ हैं और मैं उनके आदेशानुसार चल रहा हूँ. उनकी इच्छा पूर्ण हो. हमलोग संसार के लिये बड़े महत्वपूर्ण कार्य करेंगे और वे सब निःस्वार्थ भाव से किये जायेंगे, नाम अथवा यश के लिये नहीं...इस बात का विश्वास रखो कि प्रभु ने बड़े-बड़े कार्य करने के लिये हमलोगों को चुना है और हम उन्हें करके ही रहेंगे. उसके लिये तैयार रहो, अर्थात पवित्र, विशुद्ध एवं निःस्वार्थ - प्रेमसंपन्न बनो. दरिद्रों, दुःखियों और दलितों से प्रेम करो, प्रभु का आशीर्वाद तुम पर वर्षेगा.
 (जिस जादूगर-दर्जी ने इस शरीर रूपी चोले को बनाया- उसने ऐसे अद्भुत चोले की सिलाई कैसे की होगी? पानी की सूइया, और पवन का धागा से इस चोले को सीया ?- जिस चोले को सीने में ९ माह का समय लगा, वह जादूगर-दर्जी या परमात्मा कौन है ? मैं कौन हूँ ? इसकी जो परीक्षा करे उसको परीक्षित कहते हैं. मुमुक्षु मनुष्य को मार्ग बताने वाला संत महापुरुष जो त्रय दुर्लभं क्या है, यह किसी को बतला दे- संत मत )                
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१० . 
आदर्श कर्मी को कैसा होना चाहिए ?
भारत माता की सच्ची सेवा करने के कार्य में समर्पित कार्यकर्ताओं को हृदयवान बनना चाहिए, तथा अपने देश वासियों के प्रति सच्ची सहानुभूति रखनी चाहिए. वह सहानुभूति मेरे हृदय को इतनी गहराई तक स्पर्श करेगी, कि मैं स्वयं को भी भूल जाऊंगा. स्वयं को भूल जाने का अर्थ है, यह सीख लेना कि व्यक्तिगत भोग-सुख या स्वार्थपूर्ण क्षुद्र इच्छाओं को तुच्छ समझ कर कैसे मन से कैसे हटा दिया जाता है. 
[' तद विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः ' मुं २.२.७ 
 ' सत्यस्य सत्यं ' बृह ० २.३.६/
 प्रतिमा, मूर्ति आदि में भी देवता तत्व-बुद्धि से ही फल देता है, न कि देवता की तादात्म्य-बुद्धि से- इसीलिए जिस सच्चे कर्मी की शव रूपी (कफ-वात-पित्त ) त्रैधातुक शरीर में आत्मबुद्धि, स्त्री-पुत्र आदि में स्वियत्व-बुद्धि (मेरा है !)   पार्थिव मृन्मय मूर्ति आदि में आराध्य-बुद्धि तथा जल में तीर्थ-बुद्धि कभी नहीं होती, अभिज्ञ पुरुषों में वही श्रेष्ठ माना जाता है.] ऐसा कर्मी अपना शरीर, नाम, यश, अपनी स्त्री, पुत्र, परिवार, इत्यादि की चिन्ता को गौण रख कर अपने जीवन को देशवासियों के कल्याण के लिए न्योछावर कर देने के लिए तत्पर हो जाता है.लेकिन स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- " जो लोग वैसी सहानुभूति नहीं जगा पाएंगे, वे शुरू शुरू में नाम कमाने की इच्छा से ही करें, बाद में धीरे धीरे सही भाव स्वतः जाग्रत हो जायेगा." 
जिस कर्मी का हृदय मनुष्य के लिए रुदन करेगा, मनुष्य की दुःख दुर्दशा दूर करने के लिए जिसका हृदय कचोटता रहेगा, जिसके अन्तर में कसक उठती रहती है; वैसा व्यक्ति यदि अपने मन में दूसरों के दुःख-कष्ट को हटाने का दृढ संकल्प करले, फिर इसी विषय पर मन को एकाग्र करके उन्हें दूर करने का उपाय को भी आविष्कृत कर सके; तथा उस सूनिश्चित उपाय को प्रयोग में लाकर अपने संकल्प को कार्यान्वित भी कर सके- तभी उस कर्मी द्वारा देशवासियों का सच्चा कल्याण संभव हो सकता है. 
युवाओं का आह्वान करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-[ " जीवन में मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि एक ऐसे चक्र का प्रवर्तन कर दूँ, जो उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों को सबके द्वारों तक पहुँचा दे और फिर स्त्री-पुरुष अपने भाग्य का निर्णय स्वयं कर लें...याद रखो कि राष्ट्र झोपड़ी में बसा हुआ है; परन्तु शोक ! उन लोगों के लिये कभी किसीने कुछ किया नहीं...क्या तुम साधारण जनता की उन्नति कर सकते हो ? क्या उनका खोया हुआ व्यक्तित्व, बिना उनकी स्वाभाविक अध्यात्मिक वृत्ति को नष्ट किये, उन्हें वापस दिला सकते हो ? क्या समता, स्वतंत्रता, कार्य-कौशल, पौरुष में तुम पाश्चात्यों के भी गुरु बन सकते हो ? क्या तुम उसीके साथ-साथ... आध्यात्म-साधनाओं में एक कट्टर सनातनी हिन्दू भी हो सकते हो ? यह काम करना है और हम इसे करेंगे ही. " (२/३२१)" वर्ण-व्यवस्था तभी हटेगी, जब लोगों को उनका खोया हुआ सामाजिक व्यक्तित्व पुनः प्राप्त हो जायेगा." (२/३११) "]
" हे साहसी, महान, दृढ़ युवक गण तुम लोग काम किये जाओ..शिक्षित युवकों को प्रभावित करो, उन्हें एकत्र करो और संघबद्ध होकर मेरी योजनाओं को कार्यान्वित करो. नाम-यश अथवा अन्य किसी तुच्छ चीजों के लिए पीछे मत देखो. इस मूर्खतापूर्ण ' मैं , मैं ' के भाव से ( शरीर या नाम-रूप को ही अपना सच्चा स्वरुप समझने की बेवकूफी से ) सम्पूर्ण रूप से छुटकारा प्राप्त कर लो तथा काम किये जाओ ![ ( शिवजी ने जिस कामदेव को भष्म किया था वह बाहर नहीं था, मन के भीतर था, इसीलिए  ' मनः संयोग ' सीख कर, शिव के तीसरी आँख को खोलो और ' श्रेय- राम/ प्रेय-काम में  ' में  विवेक-प्रयोग करके कामनाओं (कामदेव) को भष्म कर दो.] हमें जो चाहिए वह है- अनन्त साहस, अनन्त धैर्य, अनन्त शक्ति, अनन्त उत्साह ! केवल तभी महान कार्य किये जा सकते हैं. " (२/३५६)
ऐसे युवाओं का मन किन उपादानों से गठित होगा ? स्वामीजी कहते हैं- ' इन लोगों का मन वज्र के उपादानों से गठित होगा ! ' मन के किस्म (Sort )उपर बोलते हुए स्वामीजी ने अन्यत्र कहा है- ' मन होगा कठोर और परिशुद्ध !' क्योंकि महामण्डल कर्मियों का मन यदि ढीला-ढाला (बिखरा हुआ) रहेगा या हमेशा कूद-फांद करता रहेगा, तो वैसे नरम मन में सभी प्रकार के विषयों की परछाई (Image) बनेगी, जो भी वस्तु या विषय सामने आएगा उसी का चिन्ह या छाप मन में पड़ जायेगा.
एवं ऐसे कठोर (सशक्त ) मन का अर्थ है- अपरिवर्तनशील, सदा एक समान रहने वाला (Uniform), स्थिर, अटल मन ! उस मन में उद्विग्नता (Distraction या Perturbed) विकृति (Distortion ) आना संभव नहीं होगा. तथा वह मन संदेह से मुक्त ( Free from doubts ) एक पुर्णतः आश्वस्त 
( Convinced ) मन होगा ! उस मन में आत्म-विश्वास, इच्छाशक्ति, संतोष आदि सदगुण पूरी तरह से- ध्रुव के समान अचल ( Constant ) रहेंगे !
 पुनः ' वज्र के समान मन ' - कहने से महर्षि दधिची की कहानी याद आती है. जो मन अपने को लेकर कभी चिंतित नहीं रहता, जो मन केवल दूसरों के कल्याण की चिंता करता है, जो मन अपने ' कच्चा मैं ' (मिथ्या नाम-रूप का अहं ) के प्रति कठोर होकर ' कच्चा मैं ' की कामना-वासना को निर्मम भाव से [ मिथ्यादेहाध्यास की इच्छाओं को (कामदेव को ) अपने ' पक्का मैं ' की इच्छा ( राम ) से- शिवजी की तीसरी आँख ( विवेक-प्रयोग ) से भष्म कर सकता हो ] दूर कर सकता हो-  स्वामी विवेकानन्द ' दधिची के मन ' का उल्लेख करके इसी बात को स्पष्ट करना चाहते हैं.
महामण्डल कर्मी कभी दूसरों के प्रति कठोर नहीं होगा, कठोर होगा तो अपने प्रति- अपने ' कच्चा मैं ' के प्रति. परन्तु दूसरों के प्रति [ शिव ज्ञान से जीव को देखने में समर्थ वह कर्मी- अपने समस्त सहकर्मियों को भी शिव रूप में देखेगा तथा - शिव होकर भी अभी तक तीसरा नेत्र नहीं खोला-कामदेव को भष्म नहीं किया है- यही विचार कर ] सदैव कोमल होगा. उसके मन में दूसरों के प्रति सदा अनन्त सहानुभूति [ कामदेव को कहाँ भष्म करना है ? यह बात समझ पाना ही कितना कठिन है, फिर मन को वश में करना तीसरी आँख खोलना (माने विवेक-प्रयोग ) कितना कठिन है ! यह सब याद आने के कारण ] रहेगी. स्वयं को अनित्य शरीर 
( physical body M/F) मानने से जिन तुच्छ क्षण-स्थायी विषय-सुखों को भोगने की इच्छाओं का जन्म मन में होने लगता है, उन छोटी  छोटी अनित्य इच्छाओं को भष्म करके राख बना देने के लिए (शिव के समान) कठोर बनना होगा.इसीलिए किसी भी परिस्थिति में महामण्डल कर्मी अपने ' सत्य-संकल्प ' (शिव-संकल्प) से पथभ्रष्ट (विच्युत या Aberrant ) नहीं हो इसके लिए, पक्का मैं में स्थित मनुष्य, सचेत मनुष्य या देहभाव से उपर उठा " मनुष्य " बनने का जो उपादान है- ' मन ', इस मन को वज्र के समान दृढ़ बना लेना चाहिए ! 
 तत्पश्चात, जैसा ' क्षात्र-वीर्य '  एवं ' ब्रह्म-तेज ' स्वामी विवेकानन्द ( रूपी शिवजी ) में था, उसके मूल्य को समझने में सक्षम बनना या उस बोध-क्षमता को अर्जित करना प्रत्येक महामण्डल कर्मी के लिए- आवश्यक है !क्योंकि वेदों में कहा गया है- " जहाँ ' क्षात्र-वीर्य ' एवं ' ब्रह्म-तेज ' संयुक्त रूप में रहता है, वहाँ देवगण सहाग्नि वास करते हैं ! "
' ब्रह्म-तेज ' का अर्थ वह तेज है, जो ब्रह्मदृष्टि प्राप्त होने से उत्पन्न होता है.[नेह नानास्ति किञ्चन " बृह० ४.४.१९] अर्थात, समस्त सृष्टि एक है- इस समदृष्टि के प्राप्त होने पर (नेत्रों में) जो तेज या शक्ति उत्पन्न होती है.[स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " जब मनुष्य अपने मन का विश्लेष्ण करते करते ऐसी एक वस्तु का साक्षात् दर्शन कर लेता है, जिसका किसी काल में नाश नहीं, जो स्वरूपतः नित्य, पूर्ण और शुद्ध है, तब उसको फिर दुःख नहीं रह जाता, उसका सारा विषाद न जाने कहाँ गायब हो जाता है. भय और अपूर्ण वासना ही समस्त दुखों का मूल  है. अपने को पूर्ण समझ सकने पर असार वासनाएँ फिर नहीं रहतीं. पूर्वोक्त कारण-द्वै का आभाव हो जाने पर फिर कोई दुःख नहीं रह जाता. उसकी जगह इसी देह में परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है. इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए एकमात्र उपाय है एकाग्रता. " (१/४० )
  " भिद्द्ते हृद्यग्रन्थिश्छिद्द्नते सर्वसंशया: तस्मिन दृष्टे परावरे " मुं० २.२.८ ] जिसको सम-दर्शन मिला है, उसका भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है.[" उदरमन्तरं कुरुते अथ (जो व्यक्ति ब्रह्म से अपना ' उत ', माने थोड़ा भी अंतर-भेद समझता है) तस्य भयं भवति " तै ० उ० २.१.१/ २.७.१]
" द्वितीयाद्वै भयं भवति "   " तस्मादेकाकी बिभेति " बृह०१.४.२/ १.४.३
 द्वीतीय मात्र के दर्शन से भय होने लगता है, अतः अतत्वज्ञ व्यक्ति अकेला डरता है. (अभेद दृष्टि मिल जाने)  दो जन का भाव नहीं रहने पर मन में भय कभी उत्पन्न ही नहीं होता, मन में भिन्नता का बोध या (भेद-दृष्टि) रहने से ही भय उत्पन्न होता है.
 जिस व्यक्ति में समदृष्टि या अभिन्न-दृष्टि आ जाती है, उसके लिए दो कह कर कोई वस्तु (जन्म-मृत्यु,जीव-शिव, ब्रह्म-जगत, M /F  का भेद) नहीं रह जाती है ! इसीलिए उसका भय भी समाप्त हो जाता है. जिसको किसी का भी भय नहीं होगा, जो किसी भी चीज से नहीं डरेंगे, उनका तेज अधिक होना तो अनिवार्य ही है. 
इसीलिए देश माता का सच्चा सेवक बन कर जो लोग कार्य करना चाहते हों, उन्हें भी समदर्शी बनना होगा. तब वे लोग भी ब्रह्मतेज के स्पर्श का अनुभव कर सकेंगे. इसके साथ-साथ सेवा करने के लिए जिस रजोगुण की आवश्यकता होती है, उसे कहते हैं- ' क्षात्र-वीर्य '! गीता के अंतिम श्लोक में इस विषय के महत्व को बतलाते हुए कहा गया है-
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
                        तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ गीता१८ / ७८॥  
भावार्थ :  हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है.
 योगस्थ रहने का अर्थ है, सबों के प्रति समदृष्टि तथा एकत्व-बोध में स्थित रहना. श्रीकृष्ण इसी अवस्था के प्रतिक हैं, वे सदैव योग में प्रतिष्ठित रहते हैं. धनुर्धर पार्थ कार्य के प्रतिक हैं. यहाँ सामग्रिक रूप से जो कार्य हो रहा है, वह है योग की अवस्था में समदृष्टि रखते हुए कार्य करने में लगे रहना. इशावास्योपनिषद के प्रथम श्लोक में ही कहा गया है- " तेन त्यक्तेन भुँजिथाः...." 
उस अवस्था में व्यक्ति इस प्रकार के त्याग का भाव [कर्तापन के अहं (कच्चा मैं )  को त्याग कर निमित्त मात्र बन कर] मन में रख कर कार्य करता है कि वह कार्य उसके बंधन का कारण नहीं होता. जो ऐसी दृष्टि रखते हुए कार्य करता है, उसके उपर कार्य का कोई परिणाम नहीं होता.
इसी प्रसंग में श्रीकृष्ण ने कहा है, ' कर्म के विष-दन्त को तोड़ देना '. यदि किसी कर्मी के हृदय में दूसरों के प्रति प्रेम रहने के कारण कार्य करने की प्रेरणा मिलती हो, अर्थात ' रजोगुण मिश्रित सत्वगुण ' के साथ यदि कर्म किया जाय, तो वह कार्य सबसे उत्तम माना जाता है. स्वामीजी का कार्य करने के लिए ऐसे ही युवाओं की आवश्यकता है. 
आधुनिक काल में श्रीरामकृष्ण एवं स्वामी विवेकानन्द ने आदर्श-कर्म धारा (शैली) को अपने जीवन के माध्यम से स्थापित किया है. उनहोंने अपने जीवन के माध्यम से यह समझा दिया है कि ' कर्म-त्याग ' का अर्थ निकम्मा होकर चुपचाप बैठे रहना बिलकुल नहीं है. इसका अर्थ होता है- ' कर्म का फलत्याग '- अर्थात मैं जो कार्य कर रहा हूँ, उसका फल मुझे प्राप्त हो, इस आकांक्षा का त्याग.
 ऐसे कर्मी का जीवन आनन्द से भर जाता है. जिसकी वाणी और कर्म या जीवन के सभी क्षेत्रों में आनन्द की धारा सदैव बहती रहे वह मनुष्य(सचेत-मनुष्य), क्या कभी ' ठूँठा-जगन्नाथ '  बन कर रह सकता है ? नहीं ऐसे मनुष्य (संत-कर्मी ) तीनों भुवनों को उपकार की श्रेणी से तृप्त करते हैं. वे ही आदर्श कर्मी हैं, जो सचमुच नैष्कर्म-सिद्धि में स्थित हो चुके हैं.
 वस्तुतः वे स्वयं किसी भी कार्य का निष्पादन नहीं करते, किन्तु उपर से देखने पर वे बहुत बड़े कर्मी दिखते हैं. वह आदर्श कर्मी कर्म में अ-कर्म, तथा अ-कर्म में कर्म करता है. इसीलिए कर्म का फल, उनको थोड़ा भी डरा नहीं पाता, उनको अपने लक्ष्य से कण मात्र भी विचलित नहीं कर पाता. जो लोग ऐसा आदर्श कर्मी बन कर भारत माता की सच्ची सेवा करना चाहते हैं, उन्हें आदर्श कर्मी बनने के संकल्प को पूरा करने के लिए - हृदयवत्ता, सहानुभूति, ' कठोर-कोमल ' मन, समदर्शिता, कर्मशीलता आदि गुणों को अर्जित करना होगा. युवाओं को ये शर्तें याद रहनी चाहिए !
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११ .
' छोटे छोटे कार्यों का महत्व '
वर्तमान युग आडम्बरपूर्ण बड़ी बड़ी बातें बनाने का युग है. बड़ी बड़ी बातें करने में हमलोगों का जोड़ नहीं है. हमलोगों की बड़ी बड़ी योजनायें आसमान से बातें करती हैं.मौखिक रूप से हमलोग क्षण भर में विश्व-विजय कर लेते हैं. जहाँ कहीं शेखी बघारने, बड़प्पन दिखाने का अवसर रहता है, जहाँ वैभव की प्रदर्शनी लगी होती हो, हमारी दृष्टि झट से उसी ओर आकृष्ट हो जाती है. डींग हांकने में खर्च हो जाने के पश्चात् यदि हमलोगों के उत्साह तथा प्रयास का जितना कुछ अवशेष बचा रह जाता है, उसे खर्च करने से जितना अल्प कार्य हो पाता है, वह मनुष्य की दृष्टि को आकृष्ट नहीं कर पाता.
 जिन कार्यों के द्वारा बहुत आसानी से सभी लोगों की वाहवाही मिल जाती है, अक्सर ऐसा नहीं दीखता कि उन सब कार्यों के परिणाम स्वरूप समाज, राष्ट्र या यहाँ तक कि हमलोगों का अपना भी कोई यथार्थ कल्याण होता हो.इसके आलावा बहुत बड़े बड़े कार्यों में दृष्टि निबद्ध रहने से, एक अन्य प्रकार की मानसिकता भी दिखाई देने लगती है. बहुसंख्यक लोगों में कुछ अच्छा कर दिखाने की इच्छा तो रहती है, किन्तु कोई अच्छा कार्य करने में जुट जाना उन्हें इतना बड़ा कार्य प्रतीत होता है,  कि वे उसको अपने सामर्थ्य से परे की बात समझ लेते हैं. इसीलिए वे अपने आजीविका चलाने के लिए जो अपरिहार्य कार्य है, उसे छोड़ कर अन्य सभी बातों से आमतौर पर उदासीन हो जाते हैं.
 इसीलिए अक्सर  हमलोग इस बात को भूल जाते हैं कि बड़े बड़े बहुत से कार्यों के अलावे भी हमलोग कुछ कर सकते हैं. बड़े बड़े कार्यों में ध्यान संलग्न रहने के कारण हमलोगों की दृष्टि इस सच्चाई को नहीं देख पाती कि ऐसे कई छोटे छोटे, लेकिन अति मूल्यवान कार्य हैं - जिनको थोड़ा भी प्रयास करने से हमलोग सुंदर तरीके से सम्पन्न कर सकते हैं. तथा समाज एवं राष्ट्र के लिए उन्हीं सामान्य से दिखने वाले कार्यों का मूल्य असीम हो सकता है. 
एक उदाहरण देकर चर्चा करने से यह विषय स्पष्ट हो जायेगा. हमलोग देश की राजनीती के बड़े बड़े विषयों को लेकर बहुत हो-हल्ला मचाते हैं. किस प्रकार समाज एवं शासन प्रणाली में सुधार लाया जा सकता है, उसका अन्वेषण करने में हमलोग कितना समय नष्ट करते हैं. किन्तु राजनीती शास्त्र की जो बुनियादी सिद्धान्त है, जिसको मान कर चलने से सामाजिक जीवन स्वच्छ एवं सुंदरतर हो सकता है, उसको स्वीकार करते हुए उसका अनुसरण करने की थोड़ी भी चेष्टा नहीं करते. 
 हमसभी लोग यदि मिलजुल कर आमलोगों के द्वारा उपयोगी -सड़क एवं पुल-पुलिया, रेलगाड़ी, रेलवे-स्टेशन आदि विभिन्न स्थानों को स्वच्छ और सुंदर रखने की चेष्टा करें तो क्या यह बहुत कठिन कार्य होगा ? या पड़ोस में ही कोई बीमार व्यक्ति रहते हों, इसको जानते हुए भी टीवी-रेडिओ आदि को थोड़ा कम आवाज में नहीं चला सकते ? अथवा कम से कम परीक्षा के महीनों में, अपने उत्सव के आनंद को थोड़ा कम करके लाऊडिस्पीकर के उपयोग को थोड़ा कम नहीं कर सकते ? शहरी सभ्यता में अपने सह-नागरिकों के प्रति सहानुभूतिशील आचरण करके,अपने विवेक-विचार का थोड़ा सा परिचय देकर, बिना कोई विशेष कष्ट किये ही, क्या हमलोग समाज में थोड़ी सी शांति नहीं ला सकते हैं ? 
हमलोग नागरिक अधिकार प्राप्त करने के लिए कितने बड़े बड़े आन्दोलन चलते हैं, भाषण देते हैं, समाचार पत्रों में लेख आदि लिखते हैं. किन्तु देश, समाज या देशवासियों के प्रति हमलोगों का जो कर्तव्य है, उसके विषय में कितने लोग संवेदनशील या जागरूक रहते हैं ? हमलोगों के उपर जो दायित्व सौंपा गया है, उनका समुचित ढंग से पालन करने में क्या हमलोग समर्थ नहीं हैं ? , हम में से जो लोग कल-कारखाना, ऑफिस-अदालत, स्कुल-कॉलेज, जहाँ कहीं भी कार्य करते हों, उसी कार्य को सुंदर ढंग से,सम्पूर्ण निष्ठा के साथ सम्पन्न करना क्या बहुत कठिन है ? 
 थोड़ा धैर्य के साथ विचार करने से ही हमलोग यह समझ सकेंगे, कि हमलोगों को प्रति दिन प्रति मुहूर्त जो भी कार्य करना पड़ता है, उन्हीं कार्यों को केवल सही रूप में सम्पन्न कर सकने से, वे सभी कार्य स्वतः सामाजिक कल्याण का कार्य बन जाते है.  किन्तु जैसी कहावत प्रचलित है- ' चिराग तले अँधेरा '; उसी को चरितार्थ करते हुए उस ओर ध्यान न देकर, हमलोग दूर से ही वैभव पूर्ण दिखने वाले कार्यों की ओर दौड़ पड़ते हैं. हमलोग चूँकि केवल आँखों को चौंधिया देने वाले- बड़े बड़े कार्यों को ही महान कार्य कह कर, देखने में अभ्यस्त हो चुके हैं, इसीलिए इन सब छोटे छोटे कार्यों के भीतर महानता का परिचय ढूँढना भूल जाते हैं. 
किन्तु स्वामीजी चाहते थे,कि हमलोग अपने दैनन्दिन जीवन के छोटे छोटे कार्यों को करते हुए, उन कार्यों की  अहमियत या मूल्य को समझना सीख जाएँ. जितने भी महान पुरुष हुए हैं,उन्होंने छोटे छोटे कार्यों के माध्यम से ही, अपनी महानता का परिचय दिया हैं.संभव है, उनके कार्य हमलोगों जैसे साधारण व्यक्तियों की दृष्टि से छूट जाये, किन्तु निर्विवाद रूप से वे छोटे छोटे कार्य ही सच्चे अर्थों में महान कार्य होते हैं.
 संभवतः इतिहास के पन्नो में उन   समस्त महापुरुषों के नाम का जिक्र न भी हुआ हो, किन्तु उन्हीं महापुरुषों की सामूहिक सधना-पूर्ण प्रयास के द्वारा ही ' राष्ट्र के भविष्य का इतिहास ' निर्मित होता है. हमलोग भी इन्हीं सब छोटे छोटे कार्यों को यदि पर्याप्त महत्व देते हुए, निष्ठा पूर्वक सम्पन्न करना सीख लें, तो हम भी ' अपने भविष्य के इतिहास ' को गौरव पूर्ण बनाने में सफल हो सकते हैं.  
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१२. 
संघ शक्ति 
महर्षि वेदव्यास ने कहा था- ' संघेशक्तिः कलौ युगे '! प्रत्येक युग में अलग अलग शक्तियाँ प्रभावकारी रहती हैं. कलियुग में, अर्थात वर्तमान समय में केवल संघबद्ध शक्ति ही कारगर हो सकती है. प्राचीन युग में अलग अलग व्यक्तियों की चेष्टा से समाज का बहुत कल्याणकारी कार्य सम्पन्न हुआ है. किन्तु इस समय समाज-कल्याण या उन्नति या उसको सही रूप से संचालित करने के लिए संघबद्ध प्रयास द्वारा ही संभव है. पृथ्वी पर जनसंख्या वृद्धि के साथ साथ वित्तीय संसाधनों, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के अध्यन पर आधारित नये नये अविष्कार- किसी भी राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों से अलग-थलग रहने का अवसर नहीं देते. विभिन्न संस्कृति पर आधारित अलग अलग राष्ट्रों की कोई भी नये विचार या नीति विभिन्न राष्ट्रों की नीतियों या विचारों को प्रभावित,अस्थिर एवं परिवर्तित करने की चेष्टा करते हैं.
अभी तो अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों की शक्ति ही सर्वाधिक प्रबल है. यह बात नहीं कही जा सकती कि दर्शन या धर्म मानव समाज को जितना कुछ प्रदान कर सकते थे, उतना दे दिया है. स्वामीजी की यह उक्ति क्या याद आती है- ' क्या तुम नहीं देखते, कि मनुष्य जब चलता है- उसका पेट उसके आगे चलता है!' समस्त दूसरे जीवों के जैसा ही मनुष्य भी भोगों के लिए ही लालायित रहता है, यह बात कितने मनुष्य सोचते हैं कि यथार्थ कल्याण क्या है, मनुष्य जीवन की सार्थकता किस बात पर निर्भर करती है? यथार्थ कल्याण चाहते हों तो पेट की अपेक्षा सिर को आगे बढ़ाना होगा. एवं उसी सिर में संघ-शक्ति के महत्व, दायित्व एवं उस शक्ति को कार्यकारी बनाने का उपाय जानना होगा. व्यासदेव के कहने के बावजूद ' राष्ट्रिय एकता एवं जातीय पहचान ' के आभाव के कारण ही भारतवर्ष हजार वर्षों तक पराधीन रहा था. संघशक्ति की महिमा को समझ कर अनेक देशों में विभिन्न संघ गठित हुए हैं. प्रशासन व्यवस्था का संचालन करने के लिए कई राजनैतिक समूहों (पार्टी) का गठन हुआ है. नेता बनने की परिपाटी, इस देश में भले ही स्वाधीनता प्राप्त करने के पहले से प्रारम्भ हो चुकी थी, किन्तु स्वाधीनता प्राप्त होने के बाद, तो जो भी व्यक्ति नेता बनना चाहता है, वह (क्षेत्रीयता-भाषा-धर्म या जाति के आधार पर ) एक ही दिन में  स्वतंत्र रूप से अपनी एक अलग राजनैतिक पार्टी खड़ी कर लेता है.
 जिसके परिणाम स्वरुप राष्ट्रिय-एकता के स्थान पर विघटन या अलगाव की भावना ही बढ़ती जा रही है. ऐसे नेताओं के भी सिर से पहले पेट ही आगे-आगे चलता है. इसी कारण हमारा समाज सबसे पहले तो सत्य, विवेकबोध एवं मानवता से वंचित होता जा रहा है. 
जिसके फलस्वरूप आध्यात्मिकता उपहास की वस्तु, चरित्र का महान आदर्श नष्ट, विभिन्न धर्मों के प्रति मधुर सहानुभूति का आभाव, चिन्तनशीलता लापता (अन्तर्धान), विविध राज्यों की राजधानियाँ विलासिता एवं कामुकता रूपी देव-देवियों के स्वतंत्र-उपनिवेश बनते जा रहे हैं, रुपया वहां के पुरोहित, प्रताड़ना, पाशविक शक्ति एवं प्रतिद्वन्दिता पूजा पद्धति, एवं मानव-आत्मा की बली चढ़ाई जा रही है. जबकि समाज का कल्याण करने की ईच्छा के कारण संघबद्ध होना बिल्कुल अलग बात है !
संघशक्ति के लिए प्रथम आवश्यकता है-समान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ' एकमन-एकप्राण ' होकर समान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कार्य में जुट जाना. एकमन हो कर सबसे पहले संघ के उद्देश्य को भली-भाँति समझने की चेष्टा करनी चाहिए. ऐसा होते ही, संघ के सभी कर्मियों के प्रति स्वाभाविक रूप से सच्चा प्रेम उत्पन्न होगा, परस्पर के प्रति श्रद्धा का भाव जन्म लेगा.
 ऐसा न होने से संघशक्ति का जागरण भी नहीं हो सकेगा. ऐसा होने से ही ' एक साथ एक राह पर चलना ' संभव हो सकता है. स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- " तुम्हारी जाति में संघबद्ध होकर कार्य करने की शक्ति का बुरी तरह से आभाव है. पाँच लोग एकसाथ मिलजुल कर किसी भी कार्य को करने को तैयार नहीं हैं. Organization की प्रथम अनिवार्यिता है- ' Obedience ' !." पुनः कहते हैं- " संघबद्ध होकर का भाव जिससे आ सके, उसके लिए प्रयत्न करना होगा. देश के प्रत्येक क्षेत्र में हमलोग आपस में मिलजुल कर शांति से कार्य कर सकें, इसके लिए प्रयास करना चाहिए. संघबद्ध होकर कार्य करने का गुप्त रहस्य यही है." 
इसको पढ़ कर बहुत लोग कह सकते हैं- यह सब तो मेरा पढ़ा हुआ है, मैं इसे जानता हूँ. किन्तु केवल जान लेना ही काफी नहीं होता, उनके परामर्श को मानना भी आवश्यक है. स्वामीजी एक कहानी सुनाया करते थे- " एक हिरणी नदी के किनारे चरते हुए अपने शावक को सीखा रही थी, देखो, बच्चे भय बहुत बुरी चीज है, कभी किसी से डरना नहीं चाहिए. उसी समय जंगल की ओर से एक बाघ का गर्जन सुनाई दिया. फिर देखता कौन है, हिरणी डर से उन्मादी होकर दिशाज्ञान भूल गयी और भाग खड़ी हुई. उसका शावक आश्चर्य से उस ओर देखता रह गया जिस तरफ हिरणी भागी थी. थोड़ी देर बाद पुनः हिरणी दौड़ते हुए वापस लौटी और उखड़ी हुई सांसों से हांफते हुए शावक से पूछा, कुछ हुआ तो नहीं ? शावक बोला मुझे तो कुछ नहीं हुआ, किन्तु मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है. अभी तो तुम कह रही थी, कभी डरना नहीं चाहिए, परन्तु तुम स्वयम डर से भागी क्यों ? 
हिरणी बोली मैं ने तुम से कहा तो ठीक था, किन्तु बाघ का गर्जना सुनते ही पता नहीं कैसे मेरा सारा ज्ञान चला जाता है. " हमलोगों के मन रूपी जंगल में भी मिथ्या अहंकार, ज्ञान और पांडित्व का घमंड, हिंसा,ईर्ष्या आदि बाघ के गर्जन बीच बीच सुनाई देते हैं. शंकराचार्य ने तो मन को ही महाव्याघ्र कहा है. उसका गर्जन सुन कर हमलोग, अपने संघ का उद्देश्य, संघशक्ति का रहस्य सब कुछ भूल जाते हैं. इसका नाम भी माया है. हमें केवल इसे माया के रूप में पहचान लेने की आवश्यकता है.
 श्रीरामकृष्ण कहते थे, माया लज्जावती है, उसको पहचान लेने से ही वह भाग खड़ी होती है. यदि हमलोग संघशक्ति को अक्षून्न रहना चाहते हों, तो हमें माया के हाथों से अपनी रक्षा करनी पड़ेगी. श्रीरामकृष्ण नारद द्वारा नारायण से माया के स्वरुप को समझने की जिज्ञाषा की कहानी कहा करते थे- " किसी समय महर्षि नारद ने भगवान विष्णु से कहा था, ' प्रभो, मुझे तुम्हारी अघटन-घटना-पटीयसी माया के दर्शन कराओ.' भगवान बोले, ' तथास्तु '. इसके कुछ दिनों बाद एक दिन नारद को साथ ले भगवान घुमने निकले. बहुत दूर घूमते हुए भगवान को प्यास लगी. प्यास के मारे वे अधीर हो गये और नारद से बोले, ' नारद, कहीं से पानी लाकर मेरी प्यास बुझाओ.' 
 नारद तुरन्त पानी लाने चल पड़े. पास कहीं पानी नहीं मिला. थोड़ी दूर पर एक नदी दिखाई दे रही थी. नारद ने नदी के समीप जाकर देखा, एक बड़ी सुंदर युवती बैठी हुई है. नारद उसका रूप देख मोहित हो गये. नारद के उसके निकट जाते ही वह रमणी उनके साथ मधुर वार्तालाप करने लगी. थोड़े ही समय में दोनों के बीच प्रणय हो गया. नारद ने उसके साथ विवाह कर वहीँ गृहस्थी बसा ली. धीरे धीरे उनके कई संतानें हुईं. नारद उन बाल-बच्चों के साथ सुख से गृहस्थी चलाने लगे.
कुछ दिनों में उस स्थान पर बड़ी महामारी फैली. चारों ओर लोग मरने लगे. नारद ने स्त्री-पुत्रों को ले उस स्थान को छोड़ दूर भाग जाने का विचार किया. उनकी स्त्री भी इस बात से सम्मत हुई. तब बच्चों को ले दोनों चलने लगे. पर जब वे नदी पर करने लगे तो जोरों से बाढ़ आ गयी और उसमें एक के बाद एक उनके सभी बच्चे बह गये. अन्त में पत्नी भी बह गयी. नारद उनके लिए शोक से व्याकुल हो क्रन्दन करने लगे.ऐसे समय भगवान ने आकर कहा, ' क्यों नारद, पानी कहाँ है ? और तुम रो क्यों रहे हो ?' भगवान के दर्शन पा नारद विस्मित हुए और सारी बात उनकी समझ में आ गयी. तब वे कहने लगे,' भगवन, तुम्हें प्रणाम और तुम्हारी माया को प्रणाम ! "
  हमलोग भी बीच बीच में मन-व्याघ्र की गर्जन को सुन कर, माया की परछाई में संगठन का उद्देश्य, संघशक्ति की स्मृति में भ्रम हो जाता है. जिसके फलस्वरूप संघशक्ति की क्षीणन के चलते लक्ष्य के पथ से भटक जाते है. 
भारतवर्ष के यथार्थ कल्याण के लिए समर्पित किसी संघ का 'उद्देश्य (Goal) एवं पद्धति (Means )' दोनों समान रूप से शुद्ध होना अनिवार्य है. उद्देश्य चाहे जितना भी महान क्यों न हो, कार्य को सफलता पूर्वक पूरा करने के उपाय या पद्धति को थोडा भी अशुद्ध होने देने से, तथा उस दोष 
को ' व्यवहारिक बुद्धि ' का नाम रूपी चाँदी के पत्तर से ढंकने की चेष्टा क्यों न की जाय,संघ का उद्देश्य कभी सिद्ध नहीं हो सकता. बहुत महान आदर्श को भी धरातल पर उतारने के समय छोटा नहीं किया जा सकता. कोई भी संघ यदि वैसा करने का प्रयास करेगा तो वह टिक नहीं पायेगा.
अन्य एक विषय पर ध्यान देना जरुरी है. वह है संघ के प्रत्येक कार्य को मनोयोगपूर्वक निर्दोष ढंग से करने की चेष्टा करना. बहुत से लोगों में ऐसी धारणा होती है कि विशुद्ध रूप से कोई कार्य नहीं होता. किन्तु ऐसा सोचना गलत है. बहुत से लोग ऐसा सोचते हैं कि मनुष्य तो भूल करता ही रहता है. इसीलिए भूल होने से या विशुद्ध रूप से कोई कार्य यदि न भी हुआ तो उसमें दोष क्या है ? इस प्रकार की मानसिकता कार्य के संबन्ध में भ्रान्त धारणा रहने से उत्पन्न होती है.
  स्वामीजी की यह उक्ति- ' प्रत्येक कार्य ईश्वर की उपासना है ' यदि याद रहे और सभी कर्मी संघ के समस्त कार्यों को उपासना में परिणत करने की चेष्टा करें तो उनके द्वारा कोई भूल या दोषयुक्त कार्य नहीं हो सकता. यदि संघ का उद्देश्य सर्वदा याद रहता हो, जोकि शायद नहीं रहता, तो संघ का प्रत्येक कार्य स्वयं को दोषरहित मनुष्य बनाने कि साधना में परिणत हो जायेगा. ऐसा होने से ही कार्य, कर्मी एवं संघ की सफलता आ सकती है. स्वयं को यथार्थ मनुष्य के रूप में गढ़ने के लिए सर्वदा प्रयत्नशील न रहने से ' स्वयं बनो तथा दूसरों को बनने में सहायता करो ' केवल मुख से कहने वाली बात रह जाएगी. 
संघ का आदर्श, उद्देश्य एवं कार्य-पद्धति चाहे जितना भी जाना हुआ हो, उनके उपर निरन्तर चर्चा एवं आत्मसातीकरण का प्रयास चलते रहना चाहिए. स्वामीजी की यह उक्ति यदि प्रत्येक कर्मी को याद रहे तो बहुत फायदा होगा- " वेदान्त के आलोक को घर घर तक पहुंचा दो, प्रत्येक घरों में वेदान्त के आदर्श के अनुरूप जीवन गठित हो, प्रत्येक जीवात्मा में जो ईश्वरत्व अन्तर्निहित है, उसे जाग्रत करो. यह हो जाने से ही, तुम्हारी सफलता का परिमाण चाहे जितना भी क्यों न हो- तुम्हारे मन में यह संतोष रहेगा कि तुमने एक महान कार्य कप पूरा करने में अपना जीवन व्यतीत किया है, तथा महान कार्य के लिए ही प्राणों को न्योछावर किया है. चाहे जिस रूप में हो, यह मूल्यवान कार्य सम्पन्न होने से ही मानव जाती का कल्याण होगा. " 
यह कहने की आवश्यकता महीन कि संघ के प्रति सच्ची निष्ठा एवं कठोर अनुशासन के बिना संघ शक्ति का प्रवाह संभव नहीं होता, सत्य से थोड़ा भी विचलित होने से संघ शक्ति में ह्रास होने लगता है. 
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१३. 
संघ चेतना 
परम देशभक्त स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए- ' व्यक्ति-मनुष्य का निर्माण ' के जिस कार्य को सबसे अधिक  आवश्यक माना है, महामण्डल उसी कार्य को विगत ४५ वर्षों से करता आ रहा है. क्योंकि मनुष्य निर्माण तथा चरित्र निर्माण के उपर ही राष्ट्र का पूरा भविष्य निर्भर करता है, अतः यही प्रथम आवश्यक कार्य है. आज जो किशोरावस्था में हैं, वे ही भविष्य के मनुष्य होंगे. जिस समय उनका जीवन गठित हो रहा हो, उसी समय उनको यदि जीवन को सुंदर ढंग से गठित करने के लिए आवश्यक अच्छे-अच्छे भाव प्राप्त हो सके, तभी उनका जीवन सुंदर रूप में गठित हो सकता है, और उसी के द्वारा राष्ट्र का भविष्य भी अच्छा बनाया जा सकता है.
यही है महामण्डल का कार्य. जिसे लोग आसानी से समझ नहीं पाते हैं. इसीलिए ४५ वर्षों बाद भी बहुत से लोग इसकी जानकारी नहीं रखते है. मत रखिये, प्रचार माध्यमों में नाम छपवा कर, लोगों की वाहवाही लूटने से हमारा कोई प्रयोजन नहीं है. किन्तु यह कार्य कितना महत्वपूर्ण है, इसे स्वयं जरुर समझना चाहिए. एक लाइन में कहें तो इसका उद्देश्य है- भविष्य के ' महभारत ' की रचना . किसी महाग्रन्थ की रचना नहीं, महा देश का निर्माण करना. और इसीके घटक-तत्व के रूप में एक एक व्यक्ति के जीवन को उत्कृष्ट ढंग से निर्मित करना.
जिस समय व्यासदेव महाभारत की रचना कर रहे थे, उस समय गणेशजी उसे सुन कर लिखते जाते थे. किन्तु आज की तरह समाचार माध्यमों पर किसी संवाददाता ने इस खबर को  रटवाया नहीं था. किन्तु कितने हजार वर्ष बीत जाने के बाद, ' महाभारत ' अक्षय वट की तरह अपनी शक्ति से स्वमहिमा में सिर ऊँचा किये आज भी खड़ा है. इसी प्रकार के राष्ट्र रूपी महाभारत का निर्माण करना हमारा कार्य है.
स्वामी विवेकानन्द के इंग्लैण्ड जाने के एक वर्ष पहले एक ब्रिज ( टावर ब्रिज ) का निर्माण हुआ था. उसमें लगे लोहे के बड़े बड़े शहतीरों में जब थोड़ा जंग लग गया, तो जो इंजीनियर लोग उसकी मरम्मत करने गये थे वे   यह देख कर आश्चर्यचकित हो रहे हैं कि उसके नींव में जो चबूतरे बने हैं, उसके उपर लगे नट-बोल्ट भी इतनी कुशलता से लगाये गये थे, कि १०० वर्ष बीत जाने के बाद भी उनको बदलने की जरुरत नहीं होगी. बुनियाद के कार्यों को इसी प्रकार ठोस बनाना आवश्यक है. उस समय के निर्माताओं ने यह अनुमान लगा लिया था कि कम से कम १०० वर्ष तक लोग इसका उपयोग अवश्य कर सकेंगे. अज भी भारतवर्ष में ऐसे कितने ही भव्य मन्दिर हैं जो हजार वर्षों से भी अधिक समय से स्व-महिमा में खड़े हैं. इसी प्रकार के विश्वास और मनोबल के साथ महामण्डल के कार्य को करना भी सीखना होगा.
महाभारत कि रचना करने के जैसा, जो  कार्य अनेक शताब्दियों तक प्राणवन्त तथा हर प्रकार से समृद्ध रहेगा, वैसा कार्य किसी अकेले व्यक्ति के प्रयत्न से, या भिन्न भिन्न बुद्धि रखने वाले बहुत सारे मनुष्यों के द्वारा भी हो पाना संभव नहीं हो सकता. ऐसे महान कार्य को संपन्न करने के लिए ' संघ ' बना लेना अनिवार्य हो जाता है. तथा संघ की सफलता का गूढ़ सिद्धान्त है- एक बुद्धि होकर कार्य करना ! संघ में अलग अलग प्रकार के मनुष्य तो रहेंगे ही, किन्तु यदि सभी अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार कार्य करने लगेंगे, तो संघ का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता. संघ के समस्त सदस्यों कि दृष्टि जिस प्रकार सदैव लक्ष्य में ही स्थिर रहनी चाहिए, उसी प्रकार बुद्धि में पूर्ण सामंजस्य बना लेना भी अत्यन्त आवश्यक है.
क्योंकि बुद्धि के द्वारा सही निर्णय लेने के बाद ही कोई संघ कार्वाई की सही दिशा तय कर सकता है. इसीलिए संघ के सभी कर्मियों में बुद्धि का सामंजस्य एवं स्थिरता रहना अनिवार्य हो जाता है. स्थिर-बुद्धि से तात्पर्य है, नित्य नूतन बुद्धि या कार्वाई की दिशा का अविष्कार करने की चेष्टा से परहेज करना. वैसा करते रहने से संघ कभी अपने उद्देश्य को सिद्ध नहीं कर सकता. आदर्श को ध्रुव तारा के जैसा अटल रख कर लक्ष्य और बुद्धि में स्थिर रहते हुए, समस्त हाथों को एक करके कार्य करना ही संघ की सफलता का उपाय है. संघ के इन विषयों को स्पष्ट रूप से समझ लेना  होगा, तथा इसके प्रति सदैव सचेत रहना होगा. इसीलिए समस्त कर्मियों को संघचेतना अर्जित कर लेना परम आवश्यक है. यदि ऐसा न हो सका तो आधार संरचना को दृढ कर पाना कभी संभव नहीं हो सकेगा. किसी भी कार्य में व्यस्त रहना, या समाजसेवी होने की बड़ाई लूटना एक बात है और देश के भविष्य का निर्माण करने में समस्त शक्तियों को लगाना एवं उसी उद्देश्य से संघ शक्ति को परिपूष्ट करना अलग बात है.
इसके लिए समस्त कर्मियों को महामण्डल द्वारा प्रकाशित पुस्तिकाओं को बार बार पढना एवं परस्पर चर्चा करना बहुत जरुरी है. पाठचक्र में भी इन्हीं बातों की चर्चा करने के उपर सबसे अधिक जोर देना आवश्यक है. सभी कर्मियों को समस्त ' शिक्षण-शिविरों ' में भाग लेना चाहिए, किन्तु संचालकों के लिए यह विशेष तौर पर आवश्यक है. वहाँ प्रश्न करके, संचालकों को समस्त विषयों के बारे में अपनी धारणा स्पष्ट बना लेनी चाहिए. यह बात याद रखनी चाहिए, कि बहुत से पुराने कर्मियों को भी प्रत्येक विषय में हर समय स्पष्ट धारणा नहीं रहती है. ऐसा होने से नए कर्मियों में स्पष्ट धारणा उत्पन्न करना संभव नहीं होगा. किसी भी क्षेत्र में आत्मसन्तुष्टि का भाव रख कर बैठे रहने से उन्नति रुक जाती है.
संघ में जब स्वाधीन विचारों कि मात्रा अधिक बढ़ने लगती है, तो उससे संघ शक्तिशाली बनने के कमजोर होने लगता है. विचारों में सामंजस्य रहना ही संघ के स्थायित्व एवं शक्ति वृद्धि का रहस्य है. हमलोगों का पहला कर्तव्य है-एक मन बन जाना . दूसरे समस्त कार्य बाद में करने होंगे. दूसरे काम को प्रतीक्षा की सूचि में डाल देने से कोई हानी नहीं है. किन्तु बुद्धि में सामंजस्य स्थापित करने के कार्य को पीछे छोड़ कर, अन्य कार्यों को करने से उर्जा व्यर्थ में नष्ट होगी तथा हानी भी हो सकती है. इसीलिए इस विषय में बहुत अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है.
भाव को समझने के साथ साथ प्रत्येक कर्मी को अपना जीवन गढ़ने के लिए ' आदि ( Ginger ) और पानी ' पी कर (ताम्बा-तुलसी का प्रण उठा कर ) जुट जाना होगा. किसी भी तरह की ' भाव के घर में चोरी ' नहीं चलेगी.    या हो रहा है - हो जायेगा न,ऐसा भाव भी नहीं चलेगा. जब तक हम अपने जीवन को उदाहरण स्वरुप नहीं बना लेते, तब तक महामण्डल के आदर्श, उद्देश्य और कार्य-पद्धति को स्वयं समझ लेने, या दूसरों को समझा सकने में समर्थ होने का भी कोई विशेष फल नहीं होगा. अतेव इस विषय में
 ( स्वयं यथार्थ मनुष्य बनने में ) किसी प्रकार की ढिलाई को प्रश्रय देने से संघ कमजोर होता रहेगा.
तत्पश्चात  जो विशेष आवश्यक है वह है परिपक्व नेतृत्व क्षमता. बहुत से सदस्यों में नेतृत्व करने की इच्छा रहती है. किन्तु नेतृत्व के विषय पर स्वामीजी के उपदेशों को बार बार याद करना आवश्यक है. कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि, किसी किसी को  इस विषय में स्वामीजी द्वारा कही गयीं समस्त उक्तियाँ तो कंठस्थ हैं, किन्तु व्यवहार उसके बिल्कुल विपरीत हो रहा है. इसके बावजूद नेतृत्व अत्यन्त आवश्यक वस्तु है, तथा नेतृत्व के बिना संघ का संचालन करना लगभग असम्भव जैसा है.
सभी कर्मी यदि ऐसा सोचें कि, हमलोग समान रूप से चरित्र के समस्त गुणों के अधिकारी बन कर समस्त कार्यों का बंटवारा कर लेंगे और जिसके जिम्मे जो कार्य होगा वह उसे संपन्न करके कार्य को पूरा कर लेंगे. किन्तु इस प्रकार अलग अलग बुद्धि से संघ के उद्देश्य को सफल करना कभी संभव नहीं पाता है. इसीलिए कर्मियों में जो लोग साधारण गुणों के अधिकारी होने के साथ-साथ, नेतृत्व के लिए आवश्यक अतिरिक्त गुणों के बारे में जागरूक हों, तथा उन्हें अर्जित करने के लिए प्रयत्नशील भी हों;  उनको अवश्य ही समस्त कर्मियों को एकत्र करके कार्य के प्रति उत्साहित करने की चेष्टा शरू कर देनी चाहिए. 
अपने जीवन को उदाहरण स्वरूप गठित करके ( Exemplary या अनुकरणीय बना कर ) अन्य  सभी कर्मियों को अपना अपना जीवन गठित करने के लिए उत्साही एवं प्रयत्नशील बना देना ही महामण्डल के नेता का कार्य है.  ऐसे नेतृत्व से पहली अपेक्षा यह होती है कि, उसे अहंकार के भाव को बिल्कुल ही त्याग देना होगा, तथा सबों से एकसमान प्रेम करना होगा. किसी नेता में इस प्रकार का एक निषेधात्मक तथा एक सकारात्मक गुण यदि न हो, या वह अपने जीवन-गठन के में लापरवाही करता हो, फिर भी नेतृत्व करने का दावा करे तो यह- " स्वयं  अँधा होकर. दूसरे अंधों को पथ दिखाने के जैसा ' नेतृत्व- संघ एवं नेता दोनों के लिए विफलता का कारण होगा.    
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१४. 
संघ मन्त्र 
संघ का अर्थ होता है- समूह, या दल. किन्तु केवल समूह बना लेना ही यथेष्ट नहीं होता, या बहुत सारे लोगों के झुण्ड को भी संघ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि संघ के समस्त कर्मियों के बीच सौहार्द (Cordiality) एवं मैत्री का बन्धन होना भी अनिवार्य है. फिर बहुत से व्यक्तियों को एकत्र क्यों होना चाहिए ? किसी एक सामान्य उद्देश्य के कार्यसिद्धि के लिए. तथा उस उद्देश्य को भी हर हाल में उचित तथा न्यायपूर्ण होना चाहिए. संघ शब्द के अन्तर्गत ये सारे भाव भी निहित हैं. क्योंकि हमलोग जो कोई कार्य करते हैं, उसका प्रभाव हमारे जीवन पर अवश्य पड़ता है. जब हमलोग कोई अनुचित कार्य करते हैं, तब उस कार्य के परिणाम वश अन्त तक कष्ट ही पाना पड़ता है. एवं उपयुक्त उपदेश सर्वदा उचित कार्य करने की ही प्रेरणा देता है.
संघबद्ध होकर कार्य करने का एक विशेष तरीका होता है. किसी उपयुक्त कार्य को अकेले दम पर जितना किया जा सकता है, उससे कई गुना अधिक संघबद्ध होकर किया जा सकता है. तथा ऐसे ही कार्यों द्वारा सम्पूर्ण समाज का भला भी हो सकता है. इसके अतिरिक्त संघबद्ध होकर कार्य करने से सभी कर्मी परस्पर एक दूसरे को प्रोत्साहित भी करते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप संयुक्त प्रयास द्वारा सम्पन्न कोई कार्य अधिक दोषरहित भी होता है. क्योंकि संयुक्त प्रयास में प्रत्येक सदस्य  का केवल दैहिक, बौद्धिक या कर्मपद्धति का  ज्ञान ही प्रेरणादायक नहीं होता, उसके साथ पूर्वनिर्धारित मंगलदायक उद्देश्य की सिद्धि के लिए ओजस्वी सामूहिक सदभावनाएँ भी जुड़ जाती हैं.
किन्तु संघबद्ध होने का अर्थ केवल शारीरिक रूप से कहीं एकत्र हो जाना नहीं है. मानसिक रूप से समूहबद्ध हुए बिना केवल झुण्ड एकत्र कर लेने ज्यादा कुछ हासिल नहीं होता. मानसिक रूप से एकताबद्ध होने के दो तरीके हैं. एक है बौद्धिक और दूसरा, अनुभूति के स्तर पर - अर्थात हृदय की समान-अनुभव क्षमता. यह नहीं होने से संघबद्ध कार्य में निर्दिष्ट सफलता प्राप्त नहीं होती. महामण्डल का संघ मन्त्र इसी प्रकार की मानसिक एकात्मकता के उपर बल देता है.
 जिसका मनन करने या जिस पर चिन्तन करने से त्राण ( Relief) प्राप्त हो, या उद्धार (बंधन से मुक्ति ) होता हो उसे मन्त्र कहा जाता है. कैसे बंधन से मुक्ति ? हमलोग अपने हृदय की संकीर्णता, दुःख, छोटापन के बंधन में बंधे हुए हैं, किन्तु संघमन्त्र का मनन करने से व्यक्ति-अहंकार की गाँठ कट जाती है, जिसके फलस्वरूप हमारा हृदय वृहद बन जाता है. यह मन्त्र ऋग्वेद के अन्तिम भाग में है, तथा हल्के से परिवर्तन के साथ अथर्ववेद में भी है. इस मन्त्र में जो भाव अंतर्निहित हैं, वह किसी भी संघ के, इसी देश का नहीं, विदेशों के भी किसी संघ के निर्देशित कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है.इतना ही नहीं, जिस किसी भी समाज के मंगल और उन्नति में इसके भाव सहायक हैं.
 संघमन्त्र में क्या कहा गया है ? कहा गया है, ' एक राह पर चलेंगे, एक बात बोलेंगे, हम अपने मन को एक भाव से गढ़ेंगे. ' हमलोग यदि एक ही मार्ग पर न चल कर अलग अलग मार्गों पर जाएँ, एक बात न कह कर, प्रत्येक सदस्य अलग अलग बातें कहने लगे, हमसभी लोगो का मन यदि एक भाव से गठित न होकर अलग अलग भाव से गठित हो, तो इस प्रकार क्या संघ का उद्देश्य कभी सफल हो सकता है ? हो सकता है, हममें से कोई सदस्य संघ के निर्वाचित उद्देश्य को भूल कर, अपनी प्रसिद्धि, नाम-बड़ाई, कर्तृत्व की महिमा-स्तुति चाह बैठे ! ऐसा हो सकता है. किन्तु हम सभी लोगों की वांछित वस्तु तो केवल ' एक ' है;  जिसे हमलोग संगीत की भाषा में इस प्रकार गाते हैं - " মানুষ করিয়া দাও গ আমায় আর কিছু আমি চাহিব না ।" 
"- माँ मुझे मनुष्य बना दो, यह विनती तेरे चरणों में- 
 तेरे बेटे होके फिर माँ दिन बीते ना धुल-कीचड़ में !
  " हमलोग संघमन्त्र का गान करते समय मुख से जो बोलते हैं, वह क्या मेरे मन की बात नहीं होगी ? यह क्या ' भावेर घरे चूरी ' होगी ? केवल आदमियों को सुना कर मोहित कर (भावविभोर बना) देने के लिए होगी ? वैसा होने से क्या ' हमारे संकल्प समान, हृदय भी समान, भावनाओं को एक एक करके परम-ऐक्य  ' - की प्राप्ति क्या हो सकेगी ? और ऐसा ' परम-ऐक्य ' प्राप्त किये बिना क्या संघ का उद्देश्य सफल हो सकेगा ? 
 {“যে ধ্রবপদ দিয়েছ বাঁধি বিশ্বতানে
মিলাব তাই জীবনগান গগনে তব বিমল নীল হৃদয়ে লব তাহারি মিল,শান্তিময়ী গভীর বাণী নীরব প্রানে।বাজায় উষা নিশীথকূলে যে গীতভাষা সে ধ্বনি নিয়ে জাগিবে মোর নবীন আশা।ফুলের মতো সহজ সুরে প্রভাত মম উঠিবে পুরে,সন্ধ্যা মম সে সুরে যেন মরিতে জানে।”}
एक कविता की पंक्ति है- " কি পাইনি তার হিসাব মিলাতে মন মোর নহে রাজি " -अर्थात ' क्या नहीं प्राप्त हो सका उसका हिसाब मिलाने के लिए मेरा मन राजी नहीं होता. ' किन्तु हमलोगों को ऐसा कहने से काम नहीं चलेगा, क्या नहीं प्राप्त कर सका- इसका एकदम सही हिसाब रखना पड़ेगा. आत्मसमीक्षा करके देखते रहना होगा. जिसे प्राप्त करने की आशा लेकर इस संघ के साथ जुड़ा हूँ, उसे प्राप्त किये बिना निश्चिन्त होकर बैठ जाना हमें शोभा नहीं देगा. हमलोगों को सच्चे मनुष्य (अचेत मनुष्य से सचेत-मनुष्य) के जैसा " मनुष्य " बनना होगा, उससे थोड़ा भी कम पाकर हमलोग संतुष्ट नहीं होंगे.
  हमलोगों को ' साधू ' बनना होगा. हाँ, साधू बनना होगा. साधू बनने से तात्पर्य है-पवित्र और ईमानदार बनना होगा. सन्यासी लोग तो सचमुच ' साधू ' (पवित्र -सत्यवादी-ईमानदार ) होते हैं, किन्तु हमलोगों को संसार में रहते हुए भी साधू (सच्चरित्र मनुष्य ) बनना होगा. साधू बन जाने की पहचान क्या है ? 
 " यथा चित्तं तथा वाक्यं यथा वाक्यं तथा क्रिया ।
         चित्त वाचि क्रियायांच साधुनाम एकरूपता ।। " 
- मन में जैसा सोच रहा हूँ, मुख से वही कहना होगा; मुख से जैसा कहता हूँ, वैसा ही कार्य में भी प्रतिफलित करना होगा. साधुओं के विचार, उपदेश और कर्म एकसमान ही होते हैं. अर्थात उनकी ' कथनी और करनी ' में कोई फर्क नहीं रहता. 
प्राचीन भारत में मूर्ति-पूजा का प्रचलन बिल्कुल नहीं था. अग्नि में घृताहूति डाल कर ही समस्त देवताओं की उपासना करने का प्रचलन था. यह भी कहा जाता है, कि देवताओं में से जिनको जो कुछ मिल जाता था उसे वे अपने पास ही नहीं रख लेते थे. समस्त देवताओं में जिनको जो कुछ मिल जाता था, उसे वे आपस में बाँट कर ही ग्रहण करते थे. उसी प्रकार, " हमसब सबकुछ बाँट कर ही लेंगे ". अर्थात स्वार्थी व्यक्ति के जैसा दूसरों से कुछ भी अधिक लेना नहीं चाहूँगा. " ऐक्य विधान के मन्त्र को गा कर " - इसी परम ऐक्य के संघ-मन्त्र का पाठ करते हुए हमलोग ऐसे सच्चरित्र मनुष्य बन जायेंगे, जो यह कहने में सक्षम होंगे कि-  "देवगण तुम्हें हम आहूति प्रदान करेंगे !" हमारे लिए ये ' देवगण ' कौन हैं ? ये हैं- 
" पिता माता गुरु, शिक्षादाता गुरु- त्रिदेव माथार मणि ;
अतिथियो जिनी, साधू सन्यासिनी- नारायण नारायणी ।" 
कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो जाने के बाद अर्जुन, जो बहुत हद तक हमलोगों के जैसे हैं, अच्छे अच्छे उपदेशों को सुनकर भी उन्हें याद नहीं रख पाते हैं- एक दिन श्रीकृष्ण को जा पकड़ते हैं; " अपने जो गीता सुनाया था, बहुत अच्छा लगा था, एक बार फिर से सुनाइए न ! " श्रीकृष्ण ने कहा-" उस समय योगस्थ होकर बोला था, वही बात इस समय नहीं कह सकता. फिर भी जब बोलने को कहते हो, तो कुछ कहता हूँ, सुनो - !" उनहोंने तब जो सुनाया था, वह महाभारत में ' उत्तरगीता ' के नाम से लिखा गया है. वहाँ पर श्रीकृष्ण ने कहा था-
 " नरसत्वं नारायणोSसी ।"     
- हे नर, तुम्ही नारायण हो ! स्वामीजी ने कहा था- 
" तुमने पढ़ा होगा-' मातृदेवो भव, पितृदेवो भव ' ;
 किन्तु मैं कहता हूँ- ' दरिद्रदेवो भव, मुर्खदेवो भव '।"
 अतेव हमलोग पिता, माता, शिक्षा-गुरु, अतिथि, साधू-सन्यासिनी एवं समस्त नर-नारियों को देवता समझ कर आहुति प्रदान करेंगे. होमाग्नि में घृत की (हवी ) आहूति दी जाती है. जिस समय चाणक्य भारतवर्ष के प्रधान मन्त्री थे, उस समय चावल के मूल्य की तुलना में घी का मूल्य सोलह गुना अधिक हुआ करता था, आज भी दोनों के मूल्य का अनुपात लगभग एक जैसा ही है. इसका तात्पर्य है, देवताओं को वे ही वस्तुएँ अर्पित करें जो मूल्यवान होती हों. अर्थात उनकी सेवा करने में कोई कंजूसी नहीं करनी चाहिए. हमें स्वयं को स्वार्थरहित बना कर, सभी मनुष्यों के प्रति श्रद्धा जन्य प्रेम से उत्साहित होकर सभी की सेवा में अपने को नियुक्त कर लेना होगा.इसी को मनुष्य जीवन की चरम सार्थकता कहते हैं. 
हमलोग पाठ-चक्र में जो चर्चा सुनते हैं, शिक्षण-शिविरों में जो भाषण सुनते हैं, नित्य करनीय कार्यों के अनुरूप जिन पुस्तिकाओं का अध्यन करते हैं, जिन गानों को गाते या सुनते हैं, जिस संघ-मन्त्र का बार बार उच्चारण करते हैं. वह यदि केवल बोलने एवं सुनने तक ही सीमित रह जाये, इन विचारों को यदि हमलोग निरन्तर मनन के द्वारा चरित्रगत नहीं करें, तो इस संघ के साथ हमारा युक्त रहना व्यर्थ है. सबों के ' জীবনে জীবন যোগ করা না হলে ব্যর্থ হয় গানের পশরা ' - अपने जीवन में दूसरों के जीवन को संयुक्त नहीं कर सके तो संघमन्त्र गाने से लाभ क्या हुआ ?             
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१५. 
अन्तर दर्शन
हमलोगों की सभी इन्द्रियाँ बाह्य-जगत के रूप,रस, गंध, शब्द, स्पर्श आदि विषयों को भोगने के लिए सदैव तत्परता के साथ प्रतीक्षा करती रहती हैं, इसीलिए सर्वदा बहिर्मुखी बने रहना ही इनका स्वाभाव बन चुका है. किन्तु अपने अन्तर-जगत के प्रति सचेत नहीं रहने के कारण, आन्तरिक-विषयों को जानने के लिए उनमें वैसा कोई आग्रह नहीं होता. परन्तु जो अन्तर-जगत के नियन्ता हैं, वे यदि वहाँ नहीं रहते तो वाह्य जगत के समस्त विषयों के बारे में कौन जानकारी ले सकता है ? इसीलिए बहिर्मुखी मन को अंतर्मुखी बनाने की पद्धति सीखनी होगी.
 हमारे अन्तर्जगत की संरचना ऐसी है कि बहिर्जगत की समस्त सूचनाएं, आंकड़े आदि अन्तर्जगत या मन में अंकित होते रहते हैं. उन्हीं अंकित छापों या संस्कारों का सामान्य रूप ही हमलोगों के चरित्र का घटक बन जाता है. चित्त में बैठे यही सारे संस्कार हमलोगों को लालसा, इच्छा, संकल्प लेने के लिए प्रेरित करते हैं, हमलोग उन्हें पूरा करने के लिए चेष्टा या कर्म करने में प्रवृत हो जाते हैं, अंत में हमलोगों के चाहने की वस्तुओं में विभिन्नता आ जाती है.
बाह्य जगत में दौड़ते हुए मन को समेट कर, मन की ज्योति (दृष्टि) को भीतर के जगत में डालने की चेष्टा करने से, मन की अँधेरी गुफा क्रमशः आलोकित (प्रबुद्ध ) हो जाती है. उसकी दीवालों पर दीर्घ काल से अंकित छवियाँ प्रकट हो उठती हैं. हम देखेंगे कि हमलोगों ने अभी तक जितना कुछ देखा, सुना, स्पर्श किया है, जिसका भी गंध या स्वाद लिया है, वे सभी मन की चारों दीवालों पर अंकित हैं, एवं वे ही मेरी कामनाओं, विचारों, इच्छाओं को प्रभावित कर रहे हैं.
 इसीलिए यदि हम अपना चरित्र गठित करना चाहते हों, तो बाहर से कुछ भी ग्रहण करने के पूर्व थोड़ा रुक कर यह विवेक-विचार कर लेना चाहिए कि वे मुझे कितनी हानी या लाभ पहुंचा सकते हैं. इसीलिए उपनिषदों की प्रार्थना है-  " ॐ भद्रं कर्णेभिः श्रणुयाम देवा भद्रं पश्येम अक्षभिः यजत्राः ।"
"-हे देवगण ! हम भगवान का यजन करते हुए कानों से कल्याणमय वचन सुनें, नेत्रों से कल्याण ही देखें. " इसके लिए आवश्यक है कि हम अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी बना कर, उसे मन के उपर ही केन्द्रित करके देखें कि वास्तव में हम क्या चाहते हैं ? हमलोग (3H का विकास करके ) जैसा मनुष्य बनना चाहते थे, उसमें से कितना मिला है, और कितना बिना चाहे ही मिल गया है ? चरित्र-गठन करने के लिए तथा चरित्र-निर्माण की चेष्टा को दोषरहित बनाने के लिए- मन में किस प्रकार की प्रवृत्ति उठ रही है, कौन सी प्रवृत्ति चित्त में गहराई तक जाकर बैठ गयी है- इत्यादि संस्कारों को अपने मन के भीतर देखने में समर्थ बनना होगा. अतः हम सभी लोगों के लिए ' आत्म-अवलोकन ' का अभ्यास करना - नितान्त आवश्यक है. 
बहुत से लोग ऐसा सोच सकते हैं कि मेरा ' चरित्र-गठन पर्व ' तो कभी का समाप्त हो चूका है, जब हमलोग दूसरों को चरित्र गठन करना सिखा रहे हैं, तो फिर हमें अन्तर-दर्शन करने की क्या आवश्यकता है ? ऐसा नहीं सोचना चाहिए. अन्तर दर्शन तो सभी के लिए आवश्यक है. चाहे कोई अभी चरित्र-निर्माण की दिशा में अग्रसर होना चाहता हो, या जो थोड़ा अग्रसर हो चुके हों उन सबों के लिए यह आवश्यक है. मेरे सीखने को अब बचा ही क्या है, इसके लिए कोई प्रयत्न करने की मुझे क्या आवश्यकता है- ऐसा भाव किसी में आ जाय तो यह बहुत बड़े भय का कारण हो सकता है. 
हमलोग देख सकते हैं कि एकबार किसी स्थान से समस्त झाड़-झंखाड़ को उखाड़ कर साफ कर देने के बाद, चुपचाप निश्चिन्त होकर बैठ जाने से, कुछ ही दिनों के भीतर वहाँ कुछ घास-फूस पुनः उग आते है. उसी प्रकार चरित्र-गठन हो गया है, ऐसा मान कर निश्चिन्त होकर बैठ जाने से भी हानी उठानी पड़ सकती है. हमलोगों का चरित्र अच्छा हो सकता है, किन्तु इसको और भी अधिक सुंदर बनाने की चेष्टा चलती रहनी चाहिए. हो सकता है कि मेरे चरित्र में कोई चीज अत्यंत बुरी न हो, किन्तु कुछ कुछ संशोधन करने योग्य दोष फिर भी बचे रह जाएँ, ऐसा हरेक व्यक्ति में होना संभव है. इसीलिए उनमें परिवर्तन की चेष्टा करने का उपाय सीखना जरुरी है. उसे जानने के लिए अपना आचरण तथा मन में उठने वाले विचारों को बहुत ध्यान से देखना आवश्यक है. किसी भी उम्र का व्यक्ति, प्रयत्न करके अपने छोटे छोटे दोषों को दूर हटा सकता है. 
हमारे लिए यही उचित होगा कि ध्यान से यह देखने की चेष्टा करें, कि क्या मेरे मन की गुफा के अंतिम छोर पर बरगद-पीपल के वृक्ष की मजबूत जड़ों के जैसा किसी पौधे की जड़ कहीं गहराई तक बढ़ तो नहीं रहा है ? वह है-अहंकार रूपी वृक्ष का जड़. अपनी बुद्धि, विद्या ( डिग्री ), ज्ञान, पद, विचार तथा और भी कितना कुछ गर्व करने योग्य भौतिक वस्तुओं को लेकर मन में सदैव एक प्रकार की खुशफहमी या आत्म-तृप्ति का भाव भरा रहता है. किन्तु दूसरों में क्या क्या अवगुण हैं, उसे खोजने में यह अहंकार सदैव तत्पर रहता है, क्योंकि परदोष-दर्शन की वृत्ति (Envy instinct) किसी लत्तर की तरह अहंकार रूपी मोटे बरगद के वृक्ष के उपर सदैव घनिष्टता के साथ चिपकी रहती है. ये दोनों- ' अहंकार एवं पर-दोषदर्शन की वृत्ति ' ही मन में उगने वाले विष-वृक्ष की गहरी-मोटी जड़ें हैं. इनको केवल काट देना ही काफी नहीं होगा, इनका मुलोत्पाटन करना  (जड़ सहित उखाड़ फेंकना ) होगा. क्योंकि थोड़ा भी प्रश्रय देने से ये दोनों बहुत तेज गति से बढ़ जाते हैं. 
अपने भीतर झांक कर देखना होगा- दूसरों के लिए मन में सहानुभूति है या नहीं ? विषय-भोग की भूख कितनी है, त्याग-सेवा के भाव हैं या नहीं ? विशेष रूप से तो यह देखना होगा कि प्रेम है या नहीं ? तथा वह प्रेम शुद्ध भी  है या नहीं ? यह प्रेम किसी झरने के समान सबों के उपर प्रवाहित हो रहा है या नहीं ? कहीं मैंने रत्ती भर घृणा, द्वेष या भेदबुद्धि के द्वारा उसके स्वच्छ प्रवाह को गन्दला तो नहीं बना दिया है ?  जब मन को लेकर मैं मनः संयोग का अभ्यास करने बैठता हूँ- उस समय अपने मन को देख कर मुझे आनन्द तो हो रहा है न ? या  ' मन ' के ही उपर केन्द्रित मन की दृष्टि रूपी ' ज्योति ' को " छिपो छिपो " कह कर उसी समय अंधकार में डुबो कर बुझा देना तो नहीं चाहता हूँ ? क्षणिक लज्जा का कम्पन थम जाने के बाद, अव्यक्त मीठा सा दर्द या अपने कर्मों का दोष जनित क्षोभ, कहीं मुझे जगत के उपर क्रोधित तो नहीं बना देता है ? उस क्रोध में विवेक खो जाता है, बुद्धि नष्ट होने से सबकुछ ध्वंस हो जाता है.  
मन ही मनुष्यों के बंधन और मुक्ति का कारण है. इसीलिए मन के उपर कड़ी दृष्टि रखनी चाहिए. ध्यान से देखना चाहिए कि कर्म करते समय हाथ, और मुख से निकली वाणी मन के भावों को उपयुक्त रूप से अभिव्यक्त कर रहे हैं या नहीं ? - अर्थात हमारी ' कथनी और करनी ' में कहीं कोई फर्क तो नहीं है ? ऐसा यदि होता हो, तो इसीको- ' भाव के घर में चोरी ' कहते हैं. 
यदि ऐसा होता हो, कि मन में जो नहीं है वही कह रहा हूँ, और वही कर भी रहा हूँ, तो स्वयं के साथ धोखाधड़ी करना हुआ. दूसरों को धोखा देना अत्यन्त घृणित कार्य है, जबकि स्वयं को धोखा देना तो आत्महत्या करने जैसा है. कोई भी व्यक्ति स्वयं को धोखा देकर जगत का थोड़ा भी कल्याण नहीं कर सकता.यदि कोई ऐसा कहना चाहता हो कि उसने तो जगत के कल्याण के कार्य में स्वयं को नियोजित कर दिया है, फिर भी वह स्वयं को ही धोखा देता हो तो यह कपटता होगी. तथा कपटी से बढ़ कर नीच, और कौन हो सकता है ? 
हमलोग कभी अधम नहीं हो सकते, कपटी नहीं हो सकते, कार्य में भले-बुरे का विवेक खो कर बुद्धि नष्ट करके अपने ही विनाश का कारण नहीं बन सकते हैं. यदि हम अपनी ' कथनी और करनी ' में थोड़ा भी फर्क नहीं 
रखें, ' भाव के घर में चोरी ' नहीं करें, तो इनमें से किसी जैसा निकृष्ट मनुष्य नहीं बनेंगे. 
इसीलिए ' भाव के घर '- अर्थात हमलोगों के ' मन की गुफा ' की ओर सतर्क होकर दृष्टि रखनी होगी. हजारों ग्रन्थों में हमलोग जो नहीं प्राप्त कर सकते वह केवल अन्तर-दर्शन के अभ्यास द्वारा प्राप्त हो सकता है.       
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१६. 
हमलोगों की आत्मसमीक्षा 
भारतीय सभ्यता एवम संस्कृति तथा स्वामी विवेकानन्द के आदर्श को अपनी नींव बनाकर सामाजिक परिवेश की अनिवार्यता के अनुरूप, लगभग ४५ वर्षों पूर्व महामण्डल आविर्भूत हुआ था. हमलोगों ने विगत ६४ वर्षों में भारत की राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक (घोटाला) संकट तथा भाँति भाँति के देशी-विदेशी आदर्शों के आक्रमणों को भी देखा है. सम्पूर्ण भारत में जब इस प्रकार की अवस्था हो गयी थी, उस समय " मैं एक अशारीरिक वाणी हूँ ! " को प्रमाणित करते हुए स्वामी विवेकानन्द की प्रेरक-शक्ति ने, कुछ युवाओं के मन को, झटका देकर उद्वेलित कर दिया था !
क्योंकि उद्यमी-युवा संकट देख कर घबड़ाता नहीं है, बल्कि वह उसे दूर हटा कर उठकर उठ-खड़ा होना चाहता है, इसी विचार को आधार बना कर ' अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' का जन्म हुआ था. यदि हमलोग इस संकट से छुटकारा पाना चाहते हों, तो देश के नागरिकों में राष्ट्रवाद, चरित्र-गठन तथा मनुष्यत्व को प्रस्फुटित करा देना आवश्यक होगा. अन्य कोई भी मतवाद या सिद्धान्त इस घोर-संकट छुटकारा नहीं दिला सकता है. अब प्रश्न उठा, " এই ভারতের মহামানবের সাগরতীরে " - जब भारत की धरती रत्न-गर्भा है, तो हमने केवल स्वामीजी का सन्देश एवं आदर्श को ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण क्यों माना ?
क्या समस्त भारत-वासियों ( विशेष रूप से शिक्षा-नीति के निर्धारकों ) ने तर्क-वितर्क या ज्ञान-बघारने की आदत को त्याग कर भक्ति-आप्लुत हृदय से स्वामीजी के संदेशों के तात्पर्य को समझने की चेष्टा कभी की है? नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है ! {क्योंकि भारत के हिन्दी भाषा-भाषियों को, " सम्पूर्ण विवेकानन्द साहित्य " अपनी राष्ट्रिय-भाषा में पढ़ने का सौभाग्य स्वामी विवेकानन्द की जन्मशती (१९६३-६४) के अवसर ही पर ही प्राप्त हो सका था. अंग्रेजी और बंगला भाषा में उपलब्ध विवेकानन्द की रचनाओं को पंडित सुमित्रानन्दन पन्त, डॉ० प्रभाकर माचवे, श्री फणीश्वरनाथ ' रेणु ' इत्यादि विद्वानों ने बहुत सुन्दर ढंग से राष्ट्रिय-भाषा हिन्दी में १० खण्डों में अनुवाद किया है.
स्वयं का आत्म-विकास करने के उद्देश्य को सामने रख कर- सम्पूर्ण विवेकानन्द-साहित्य (राज-योग, ज्ञान-योग,भक्ति-योग, कर्म-योग ) को भक्ति-आप्लुत हृदय से, नियमित श्रवण-मनन करने से ही यह बात समझ में आ सकती है, कि क्यों आधुनिक भारत के निर्माता स्वामीजी को ही युवा-आदर्श मानना अनिवार्य है !
सम्पूर्ण विवेकानन्द साहित्य का श्रवण-मनन करने पर यह अभिगम्यता प्राप्त होगी, कि उन्होंने एक मूलभूत सत्य के उपर आरुढ़ होकर ही " भारतवर्ष की अधोगति का कारण तथा उससे पुनरुत्थान के उपाय " को अत्यन्त बोधगम्य भाषा में समझाया है. वह मूलभूत सत्य है सम्पूर्ण विश्व के साथ उनकी एकात्मकता  बोध ! मात्र १० वर्षों के कर्ममय जीवन में आगामी डेढ़ हजार वर्षों तक का विचार करने योग्य खुराक जिन्होंने दिया है, उनके संदेशों को हँसी में उड़ा देना असंभव है. स्वामीजी के संदेशों एवं शिक्षाओं के भीतर ऐसा एक भी शब्द नहीं है, जिसको " नकारात्मक " कह कर अस्वीकार किया जा सकता हो.
उन्होंने देश-काल-पात्रता में अन्तर के अनुसार, मानवता के विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जितने भी उपदेश दिए हैं, उसमें से प्रत्येक सन्देश अकाट्य  तर्कों पर आधारित है. कहीं कहीं पर सापेक्षिक-विरोधाभास दिखाई देने पर भी उनके सन्देश स्व-विरोधी कदापि नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण विवेकानन्द साहित्य एक ही सूर में बंधा हुआ है.
हमलोग स्वयं को शिक्षित ( डाक्टरेट की डिग्री प्राप्त ) समझ कर, विवेकानन्द-साहित्य के थोड़े से अंश को पढ़ने के बाद ऐसा सोचने लगते हैं, कि हमने उनके संदेशों के सारतत्व को बिलकुल सही रूप में समझ लिया है. किन्तु यह बात सदैव यह याद रखना चाहिए, कि न समझ पाने (Incomprehension) की अपेक्षा अच्छी तरह से समझ गया की गलतफहमी (Misunderstanding ) का खतरा जानलेवा (Fatal) साबित हो सकता है.क्योंकि हो सकता है, यदि किसी को उनका यह सन्देश-
 " बहुरूपों में खड़े - तुम्हारे सम्मुख ! और कहाँ हैं ईश ? 
 व्यर्थ जंगल-गुफाओं की खोज, यहाँ प्रत्येक
 जीव को 
जो ईश-दृष्टि प्रेम करे- उसीने सेवा है जगदीश ! "
अभी समझ में नहीं आ सका, तो बाद में कभी ( पात्रता -philosophy का ज्ञान, या दर्शन-विद्या ) अर्जित होने के बाद) समझने का सुअवसर भी प्राप्त हो सकता है. किन्तु यदि मैंने स्वयं ही गलत समझ लिया, तो मैं भी
  ( तथाकथित दर्शन-शास्त्र के प्राध्यापकों की तरह -वे तो अमेरिका में १३ घन्टा तक केवल Zero पर ही भाषण दिए थे )बहुत सारे लोगों को उनके संदेशों की गलत व्याख्या ही समझता फिरूंगा; तथा इसका परिणाम हानिकारक होगा.
(कोई व्यक्ति केवल दर्शन शास्त्र में प्रोफेसर बन जाने से ही विवेकानन्द को नहीं समझ सकता ) विवेकानन्द की मानसिकता अर्जित कर लेने के बाद, कोई भी व्यक्ति स्वामी विवेकानन्द को  समझ सकता है.
  अब यह प्रश्न उठता है, कि इस प्रकार की मानसिकता अर्जित कैसे की जाती है ? स्वामीजी ने चरित्र-गठन तथा मनुष्यत्व के प्रस्फुटन की जिस शिक्षा को हमें प्रदान करना चाहा था, उसी शिक्षा के आदर्शवादी विचारों को स्वयं के जीवन में रूपायित करने का प्रयत्न करने से, स्वामीजी को ठीक ठीक समझने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है. हमलोग व्यक्तिगत रूप से उपर से आकर्षक दिखने वाला अच्छा-लड़का  ' Good Boy ' का भेष बना कर चुपचाप बैठे रहना नहीं चाहते, क्योंकि अच्छा-लड़का ' Good-Boy ' की अपेक्षा, लाभदायक ' Helpful-Boy ' की कीमत बहुत अधिक होती है.विगत ४५ वर्षों में कई हजार युवा महामण्डल के सदस्य बन चुके हैं. भारत के विभिन्न राज्यों में इसके ३१५ से भी अधिक केन्द्रों में इसका कार्य चल रहा है, जहाँ कुछ उत्कृष्ट प्रगति भी दिखाई दे रही है. तिस पर भी आशानुरूप कार्य क्यों नहीं हो पा रहा है ?
 इसका कारण यह है कि हमलोगों के प्रार्थना गीत के शब्दों का अर्थ तेजी के साथ कार्यान्वित नहीं हो रहे हैं. मन, वचन एवं कर्म में सामंजस्य (Consistence) नहीं रखने से, या ' कथनी और करनी ' में अंतर रहने से समस्त प्रचेष्टा विफल हो सकती है. महामण्डल मनुष्य-निर्माण आन्दोलन का व्रती (Votive) है, ( महामण्डल की -एकमात्र मनोकामना ( मन्नत ) इस आन्दोलन को भारत के गाँव गाँव तक फैला देने की है.) 
महामण्डल का उद्देश्य है - भारतवर्ष का अप्रतिबन्धित कल्याण ! 
इस लक्ष्य को प्राप्त करने का अचूक उपाय है-
 ' चरित्र-गठन एवं मनुष्यत्व का जागरण (पुनरुत्थान) ' 
तथा समाज-सेवा हमलोगों के चरित्र-निर्माण पद्धति का एक अंग (Component ) है. स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा का वैशिष्ट है- 
बुद्धि, हृदय एवं कार्यक्षमता (3H) का समकालिक (Simultaneous) प्रस्फुटन. 
कोई भी महान कार्य संघ-शक्ति के बिना कभी सम्पन्न नहीं हो सकता. समाज एवं देश के उपर किसी आदर्श का छाप अंकित करना चाहते हों, तो एक ही आदर्श में विश्वासी श्रद्धावान कार्यकर्ताओं में एकात्मकता बोध रहना नितान्त आवश्यक है. स्वामीजी कहते हैं- " तुम्हारे राष्ट्र में संघबद्ध होकर कार्य करने की शक्ति का घोर आभाव है. यही एकमात्र कमी समस्त अनर्थों का कारण है. किसी काम को पाँच आदमी मिल कर करने के लिए, एकदम राजी नहीं है. संघ के लिए पहली आवश्यकता है- आज्ञापालन. स्वयं तो कुछ करते नहीं हैं, किन्तु कोई दूसरा जब कुछ अच्छा कार्य करने का बीड़ा उठता है, तो सभी मिलकर उसका मजाक उड़ाते हैं, तथा उसके सामाजिक योगदान को हँसी में उड़ा देना चाहते हैं. इन्हीं दोषों के कारण हमारे राष्ट्र का सर्वनाश हुआ है. हृदयहीनता, भले कार्यों के प्रति भी उदासीन भाव रखना समस्त दुखों का कारण है. अतेव इन दोनों बातों का परित्याग करना होगा. " 
हमलोग हृदयहीन हो गये हैं (हमारा मनुष्यत्व जागृत नहीं है), इसीलिए दूसरों के दुःख से दुखी नहीं होते तथा दूसरों के सुख को देखकर सुखी होने के बजाय उनसे ईर्ष्या करने लगते हैं. समाज के प्रत्येक व्यक्ति का मैं भी एक अंश हूँ, तथा हमलोगों के बीच अनन्तकाल से जो एकात्मकता विद्यमान है, इस सत्य से हमलोग अनभिज्ञ हैं. इस सत्य का अनुभव नहीं हो सका है, इसीलिए परस्पर को अलग-थलग अनुभव करते हैं. इसीलिए हमलोग हृदयहीन बनते जा रहे हैं. आत्मविश्वास का सम्पूर्ण आभाव ही हमलोगों की उद्य्महीनता का कारण है. आत्मविश्वास नहीं रहने से उद्य्म कहाँ से आ सकता है ? 
स्वामीजी कहते हैं, " हमलोगों में संघबद्ध होकर कार्य करने की मानसिकता निर्मित हो सके, इसके लिए प्रयास करना होगा. इस मानसिकता को निर्मित करने का रहस्य है ईर्ष्या का आभाव. सर्वदा ही तुम्हें अपने भाइयों का दृष्टिकोण मान लेने के लिए तैयार रहना चाहिए- सर्वदा आपस में मिलजुल कर शांति के साथ कार्य कर सकें, इसके लिए सचेष्ट रहना होगा. संघबद्ध होकर कार्य करने का यही गुप्त रहस्य है. " यदि हमलोगों में परस्पर के प्रति विश्वास, श्रद्धा और प्रेम न हो, तो मिलजुल कर काम करना कभी संभव नहीं होगा.
कार्य करने का बाद, कार्य की गणना करने की एक प्रवृत्ति हमलोगों में रहती है. कार्य में उतरने से ही, उसमें सफलता एवं विफलता दोनों होती है. किन्तु आदर्श की ओर तीक्ष्ण दृष्टि केन्द्रित रखते हुए हमलोगों को आगे बढ़ते जाना होगा. जीवन में विफलता की भी आवश्यकता होती है. विफलता के कारणों को समझते ही सफलता की संभावना स्पष्ट हो जाती है. 
हमलोग स्वयं के प्रति कितने ईमानदार और गंभीर हैं, इसकी जाँच-पड़ताल केवल आत्म-समीक्षा के माध्यम से ही कर सकते हैं. आत्मावलोकन करके देखना होगा-  क्या हमलोग सचमुच ' मनुष्य ' बनना चाहते हैं ? क्या सचमुच हमलोग अपना ' चरित्र-गठन ' एवं ' मनुष्यत्व ' को प्रस्फुटित करना चाहते हैं ? यदि ऐसी ही बात हो, तो इस बात को जाँच करके देखना होगा कि इस दिशा में हमलोग अभी तक कितना आगे बढ़ सके हैं; यदि कुछ कमी हो तो गंभीरता से विचार करके देखना होगा कि किस कारण वश हम उन्नति नहीं कर पाए हैं ? फिर भी हताश हो जाने का कोई कारण नहीं है. यह एक ऐतिहासिक सत्य है, कि आत्मविश्वास, धैर्य एवं अध्यवसाय (3P) के बल पर जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कि जा सकती है. 
किसी महान संघ के रूप में भी आत्मविश्वास, धैर्य, अध्यवसाय रहना आवश्यक है, एक दुसरे को प्रेम पूर्वक समझने की चेष्टा, एवं परस्पर के प्रति विश्वास, श्रद्धा एवं प्रेम का होना अनिवार्य है. सर्वप्रथम आवश्यक है, एक होकर जीवन के अन्तिम साँस तक कार्यरत रहने की शक्ति अर्जित करने के लिए हमलोगों द्वारा निर्धारित उद्देश्य के प्रति अटल निष्ठा !
 हमलोगों का उद्देश्य समाज-सेवा मूलक कुछ परियोजनाओं को चलाना मात्र नहीं है, हमलोगों का उद्देश्य कुछ भाषण, वाद-विवाद या सांस्कृतिक कार्यक्रमों को आयोजित करना नहीं है. हमलोगों का उद्देश्य पुनः पुनः अध्यन, चर्चा, मनन, दैनंदिन अभ्यास, एवं स्वार्थहीन कार्यों के अनुपालन द्वारा व्यक्तिगत नाम यश या पद का लोभ इत्यादि तुच्छ आकांक्षाओं को तिलांजली देकर अपने व्यक्तिगत जीवन के दोषों को कम करते रहना, तथा सद्गुणों को बढ़ाते हुए चरित्रवान मनुष्य बन जाना है. हमारा लक्ष्य एक कर्तव्यपरायण, सहानुभूतिशील नागरिक बनना है; तथा देश के प्रति, देश-वासियों के प्रति प्रेम में बढ़ाते रहने का प्रयास करते जाना है.
इस आन्दोलन को भारत के गाँव गाँव तक फैला देने के लिए संघशक्ति को बढ़ाते जाना, तथा कार्य को सुंदर ढंग से सम्पन्न करने के लिए एकता के सूत्र में बंध कर, एक राह पर चलना, एक मन होकर कार्य करना, तथा कार्य करते करते उद्देश्य को और अधिक स्पष्ट रूप से समझने की चेष्टा करना आवश्यक है. इस प्रयास में स्वामी विवेकानन्द के विचारों तथा शिक्षा से स्वयं लाभान्वित होना विशेष रूप में आवश्यक है, . इस प्रयास में यदि हमलोगों में निष्ठा और ईमानदारी रहे, तो हमलोग निश्चय ही सफल होंगे, इस विषय कोई संदेह नहीं है ! 
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१७. 
आत्म-समीक्षा

हमलोग अक्सर दूसरों की समीक्षा करने के लिए तत्पर रहते हैं. दूसरों के दोष-अवगुण को आसानी से ढूंढ़ निकालते हैं. दूसरों की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगते रहते हैं, किन्तु अपने बारे में यही सोचते हैं कि हम तो सर्वगुण सम्पन्न हैं. मुझमें ईमानदारी, विवेक-शक्ति, निर्णय लेने की क्षमता, कार्यक्षमता किसी भी गुण का कोई आभाव नहीं है.  इसीलिए अब मेरे सीखने के योग्य कुछ भी शेष नहीं बचा है. मैं नेतृत्व के लिये आवश्यक समस्त गुणों के अधिकारी बन गया हूँ. इसीलिए अब मैं दूसरों को कार्य करने का आदेश दे सकता हूँ, दूसरों की गल्तियों को पकड़ सकता हूँ, आवश्यक हुआ तो सजा भी दे सकते हूँ. अब मेरे आदेश के अनुसार सभी को कार्य करना होगा, सभी को मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिए. 
किन्तु हमलोग यह विचार नहीं कर पाते, कि हमलोगों की ईमानदारी, निर्णय-क्षमता, या कार्यक्षमता में भी कुछ दोष रह सकता है. तदोपरान्त यदि किसी ने शैक्षणिक योग्यता या सामाजिक प्रतिष्ठा आदि भी दूसरों की अपेक्षा अधिक अर्जित कर लिया हो, तब तो उसका यह भ्रम उसी अनुपात में और अधिक बढ़ जाता है. किन्तु इस तरह के बहुत से लोग पहले भी थे, और आज भी हैं- जो शिक्षा और प्रतिष्ठा की दृष्टि से समाज में गणमान्य होने के बावजूद, अपने निजी जीवन में वे एक अत्यंत निम्न कोटि के मनुष्य होते हैं.इस तरह के लोग दूसरे क्षेत्रों (राजनीति, या बड़े बड़े क्लबों आदि ) में तो खप सकते हैं, किन्तु जिस संगठन का उद्देश्य
 ही ' मनुष्य-निर्माण ' तथा ' चरित्र-निर्माण ' करना हो, वहाँ ये नहीं चल पाते. 
ऐसा प्रतीत होता है, कि शायद इसी कारण श्रीरामकृष्ण देव ने स्वयं तो अधिक स्कूली शिक्षा प्राप्त करने से मना कर ही दिया था, तथा जब वे ऐसे किसी उपयुक्त आधार के लड़के को पहचान जाते, जिनके माध्यम से उनका कार्य होगा, तो उनको भी अधिक पढ़ने-लिखने के लिये प्रोत्साहित नहीं करते थे. वे अपनी संतानों में केवल शुद्ध पवित्र जीवन और उदार हृदय का विकास देखना चाहते थे.
 यदि किसी में पवित्र जीवन तथा प्रेमपूर्ण हृदय के साथ साथ अतिरिक्त शैक्षणिक योग्यता भी रहती, तो कहते - वह तो मानो स्वर्ण-जड़ित हाथी के दाँत के समान है. क्योंकि किसी मनुष्य-निर्माण कारी आन्दोलन के नेता का अपना जीवन निष्कलंक, पवित्र तथा हृदय सबों के प्रति प्रेम से परिपूर्ण, न रहे- तो क्या (केवल उच्च डिग्री के बल पर) उसके द्वारा यह कार्य होना सम्भव है ? हाथी का दाँत ही सत्य है, उसपर स्वर्ण की मढ़ाई नहीं. इसीलिए उपनिषद में प्रार्थना है- 
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम |
                         तत्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ||  (ईश०उ०१५)
अर्थात हिरण्मय पात्र से सत्य का मुख ढंका हुआ है, उस आवरण को आप कृपा करके हटा लीजिये, ताकि मैं सत्य का दर्शन कर सकूँ. केवल शुद्ध-चरित्र और पवित्र-जीवन ही सत्य है; और वही हाथी के दाँत जितना  मूल्यवान है.यदि कोई व्यक्ति बहुत पढ़-लिख कर, या बहुत सा ज्ञान एकत्रित कर लेने के बाद भी, उसे अपने जीवन और आचरण में रूपायित नहीं कर सके तो, क्या उसे ज्ञानी-मूर्ख नहीं समझना चाहिए ? उसी तरह कोई व्यक्ति यदि बहुत अधिक अध्यन न कर, या बहुत सा ज्ञान एकत्रित किये बिना, मनुष्य कहलाने योग्य सच्चा मनुष्य बन सके तो क्या विद्या का यथार्थ फल प्राप्त कर लेना नहीं कहा जायेगा ? 
 क्योंकि यथार्थ विद्या वही है, जिससे मुक्ति प्राप्त होती है. दूसरों को छोटा किये बिना, पर-दोष दर्शन किये बिना, दूसरों को भी अपना बना लेने, प्रेम-बन्धन में बाँध लेने से ही जीवन-मुक्ति का स्वाद प्राप्त होता है. और क्रमशः इस ओर अग्रसर हुए बिना,  मनुष्य बनना या मनुष्य-निर्माण करने कार्य में जुटे रहना सम्भव नहीं है.
मैंने ऐसे मनुष्य भी देखे हैं, जिनके पास किसी किसी व्यक्ति के बारे में अनेकों गम्भीर आरोप, जो बिल्कुल सत्य थे- बार बार लगाने पर भी; उनके मन में इनके विरुद्ध थोड़ा भी प्रतिकूल भाव उत्पन्न नहीं किया जा सकता था. उल्टे,उनके एक-दो सामान्य गुण को भी,बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ा कर उनकी प्रशंसा करते ही सुना गया है, उनके प्रति प्रेम ही अभिव्यक्त करते देखा गया है. यह बात मैं पुराणों या काल्पनिक कहानी से, या किसी महापुरुष की वाणी से उद्धृत नहीं कर रहा हूँ, बल्कि प्रत्यक्ष देखा हूँ; ऐसे एक-दो व्यक्ति नहीं, अनेक   व्यक्तियों को साक्षात् देखा हूँ. 
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः
त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः |
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यम्
          निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ||8||-भर्तृहरिः
कुछ सन्त ऐसे भी देखे जाते हैं, जिनका मन वचन और कर्म पुण्यरूप अमृत से परिपूर्ण हैं और जो विभिन्न उपकारों के द्वारा त्रिभुवन के प्रति प्रेम वितरण करते हुए, दूसरों के परमाणु तुल्य अर्थात अत्यन्त स्वल्प राई जितने गुण को भी पर्वतप्रमाण बढ़ाकर अपने हृदयों का विस्तार करने की साधना में रत रहते हैं ! (४/३०५)    
हमलोग यह तो चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारी बातों को मान कर, हमारे कहे अनुसार काम करें. किन्तु क्या हमलोग स्वयं, जो हमसे बड़े हैं, हमेशा उनके कहे अनुसार कार्य करते हैं, या उनके हर आदेश का पालन करने में तत्पर रहते हैं ? क्या हमलोग अपने से बड़ों के आदेश को सुन कर अक्सर उसके उपर टीका-टिप्पणी या तर्क-वितर्क नहीं करते ? 
स्वामीजी ने किसी व्यक्ति से कहा था- यदि छत से कूद जाने का आदेश दूँ तो क्या कूद सकोगे ? एक ने तो वैसा कर के दिखा भी दिया था, ' गाय के गले में बंधी रस्सी को मत छोड़ना ' यह आदेश जिसे मिला, उसने गाय के गंगा में कूद जाने के बाद भी रस्सी को न छोड़ कर यह दिखा दिया था कि आज्ञापालन करना किसे कहते हैं ! महान उद्देश्य वाले किसी संगठन के लिए स्वामीजी ने इसी श्रेणी की आज्ञा पालन को  आवश्यक माना है.
यदि प्रसन्नता के साथ बड़ों की आज्ञा का पालन नहीं किया जाय, तो उसका अच्छा फल चरित्र के साथ संयुक्त नहीं हो पाता. हमलोगों के पास जिसमें जितनी अधिक शक्ति रहती है, वह किसी भी कार्य में अपनी पूरी शक्ति  प्रयोग करना चाहता है. किन्तु शक्ति का प्रयोग करते समय जिसके पास संयम नहीं हो, वह शक्ति पाने का अधिकारी नहीं है.
हमलोगों में से कुछ व्यक्ति अपने मन-मर्जी से कार्य करना पसन्द करते हैं. किन्तु किसी संगठन से जुड़े सभी व्यक्ति यदि अपने-अपने मन-माने ढंग से कार्य करने लगें, तो कई बार वैसा करना संगठन के लिए हानिकारक भी हो सकता है. क्योंकि संगठन के आदर्श और उद्देश्य के बारे में संगठन के सभी सदस्यों की धारणा या समझ-बूझ, एक जैसी नहीं होती. संगठन के सिद्धांतों या आदर्श वाक्य आदि की व्याख्या सभी लोग एक समान नहीं कर सकते हैं. इसीलिए अपने से उपर के किसी वरिष्ठ सदस्य या किस जानकर व्यक्ति से परिचर्चा करके, या आवश्यकता पड़ने पर उनकी सलाह के अनुसार कार्य करना अच्छा होता है. कुछ लोग सोचते हैं, इस प्रकार पूछने से उनका महत्व कहीं घट तो नहीं जायेगा. किन्तु ऐसा सोचना बिलकुल गलत है. 
क्योंकि यह निजी कार्य नहीं, संगठन का कार्य है, और संगठन के कार्य को उपयुक्त ढंग और त्रुटिरहित तरीके से क्रियान्वित करना हमसभी लोगों का परम कर्तव्य है. जो लोग मनुष्य बनने और मनुष्य निर्माण करने के कार्य में संलग्न हुए हैं, उनके लिए तो आत्म-विवेचन करना अत्यन्त आवश्यक है. यह सुन कर कोई कह सकता है, उतना समय मेरे पास कहाँ है, कि मैं बैठ कर आत्म-विवेचना करता रहूँ, मेरी व्यस्तता दूसरे लोग समझ नहीं सकते. किन्तु यह जान लेना अच्छा होगा कि जिसके पास आत्म-विवेचन के लिए समय नहीं है, उसका कोई भी कार्य पूर्ण-सुन्दरता के साथ नहीं हो सकता, इसकी परीक्षा भी की जा सकती है.
कोई यह भी कह सकता है कि जो लोग अभी कम उम्र के लड़के हैं,नये-नये आये हैं, आत्म-समीक्षा तालिका को भरना केवल  उनके लिए आवश्यक है, इसके बारे में केवल उन्हीं को सुनाना चाहिए. नहीं, ऐसा नहीं है, यह सबों के लिए आवश्यक है, बल्कि वरिष्ठ सदस्योंके के लिए तो और भी ज्यादा आवश्यक है, क्योंकि उनके उपर बहुत से दायित्व रहते हैं. 
प्रत्येक निष्ठावान कार्यकर्ता को समय-समय पर, आत्म-मुल्यांकन करके देखते रहना चाहिए, कि मुझमें संगठन के आदर्श,उद्देश्य तथा कार्य-पद्धति के बारे में अब तक ठीक ठीक अवधारणा हुई है या नहीं?  विवेक-प्रयोग करके अपने निर्णय पर अटल रहने की क्षमता, तथा कार्यक्षमता ( अर्थात लगातार कार्यरत रहने के साथ साथ दक्षतापूर्वक कार्य को सम्पादित करने की योग्यता ) में उतरोत्तर प्रगति हो रही या नहीं ? मेरा स्वभाव  अपने सहकर्मियों में केवल दोष ढूंढने, के बदले गुण देखने वाला बन सका है या नहीं? यदि मैं अपने भीतर के ' भोग और त्याग ' तथा ' स्वार्थ और परहित की भावना ' को तराजू के दोनों पलड़ों पर रख कर तौलूं,  तो किधर का पलड़ा ऊँचा-नीचा होगा और कितना होगा ?
क्षमा बहुत बड़ा गुण है, किन्तु अपने दोषों के प्रति क्षमाहीन होने में ही लाभ होता है. क्यों कि दोष हर किसी में रहता है, मेरे में भी कुछ दोष हैं, या मैं किसी भी कार्य को सर्वांग सुन्दर ढंग से नहीं कर पाता हूँ, पर उससे क्या हुआ- इतना तो रहेगा ही. पर इस तरह का मनोभाव रहने से चरित्र का विकास नहीं होता.आत्म-मुल्यांकन करके देखना होगा, कि मैं जब इस आन्दोलन के साथ जुड़ा था, उस समय मैं जैसा था, आज भी क्या वैसा ही हूँ, या मेरा चरित्र पहले से उन्नत हुआ है ? 
 हो सकता है कि इस संगठन के लिए मैंने बहुत से कार्य किये हों, किन्तु चरित्र के गुण-तालिका की दृष्टि से कुछ विशेष अंतर नहीं आया हो. यदि ऐसी बात है, तब तो आत्म-समीक्षा करके देखना ही पड़ेगा. हो सकता है, यह दिख जाये कि ' चरित्र-निर्माण की पद्धति ' या ' मनः संयोग ' के उपर दूसरों को सिखाने के लिए जो बोला हूँ, उसको स्वयं अमल में नहीं ला सका हूँ. 
 या ऐसा भी सोच सकता हूँ, कि मैं तो उसी समय बना-बनाया मनुष्य था- जब पहली बार इस आन्दोलन से जुड़ा था, फिर मुझे मनुष्य बनने की प्रक्रिया से गुजरने की क्या जरूरत है? पर ऐसा होता नहीं है. मनुष्य के विकास की या उन्नति की कोई सीमा नहीं है. स्वामीजी कहते थे- तुम अवश्य पहले से अच्छे बन सके हो, किन्तु तुम्हें इससे भी अच्छा बन कर दिखाना है. अपने जीवन में और जो व्यवसाय करता हूँ, दोनों क्षेत्रों में क्रमशः प्रगति दिखाई देनी चाहिए.
कई लोग आत्म-मुल्यांकन करने को उतना महत्वपूर्ण नहीं मानते, किन्तु यह भयावह स्थिति है. सदैव सावधान रहने तथा बेहतर मनुष्य बनने के नियमों का पालन करना सबों के लिए आवश्यक है. अपनी समीक्षा करके, स्वयं को दण्डित करने का भाव श्रीरामकृष्ण एवं स्वामी विवेकानन्द के जीवन में भी देखा जा सकता है.
 रामायण में एक कहानी है, एक गरीब ब्राह्मण भिक्षा नहीं पाने के कारण क्रोध के वशीभूत होकर एक कुत्ते अकारण मार बैठा. कुत्ते ने रामचन्द्र की सभा में पहुँच कर फरियाद किया. श्रीराम ने ब्राह्मण से पूछा इतने विद्वान होकर भी क्या अपने ऐसी गलती की है ? बताइए आपको क्या सजा दी जाये ? इस पर वह ब्राह्मण अपना दोष स्वीकार कर के प्राणदण्ड देने की प्रार्थना किये.  किन्तु उस कुत्ते ने कहा- नहीं, नहीं, यह तो हल्की सजा होगी, मेरी मांग हा कि इनको कपिन्जर मठ का महन्त (सचिव) बना दिया जाय. तब बात बात पर ये इतना क्रोध करेंगे, अगली जन्म में इनको भी मेरे जैसा एक कुत्ता बनना होगा. क्योंकि वह कुत्ता पिछले जन्म में उसी मठ का महन्त था.  इस प्रकार हम देख सकते हैं कि आत्म-समीक्षा करते रहने से, जीवन-गठन में सर्वाधिक सहायता प्राप्त होती है. 
यदि इस आन्दोलन से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं को आत्म-समीक्षा करने की आदत डाल लेनी चाहिए, इसकी सहायता से सबों के जीवन की अनेक दोष-अवगुण दूर हो जायेंगे, तथा उनक जीवन की महिमा और भी उज्ज्वल हो उठेगी. संगठन भी शक्तिशाली और जीवन्त हो उठेगा. संगठन के सभी सदस्यों के बीच प्रेम बढ़ेगा, कार्य सुचारू रूप से चलने लगेगा. केवल व्यावहारिक विनम्रता ही नहीं, जीवन में निरहंकारिता का भाव स्वाभविक हो जायेगा, श्रद्धा, बुद्धि की तेजस्विता के साथ कर्मकुशलता, उद्द्य्म, ईमानदारी आदि के साथ यदि सभी सदस्य मिलजुल कर कार्य करेंगे तो कितना बड़ा काम होगा, जो स्वामीजी का स्वप्न था वह पूरा हो सकेगा. मन की संकीर्णता, परदोष दर्शन, असूया, प्रेम का आभाव, आदि शुभ कर्मों में बहुत बड़े बाधक हैं. 
आत्म-समीक्षा के द्वारा अपने अपने दोषों के विषय में जानकर, दोषशून्य होने के लिये हमलोगों को जी-जान से संग्राम करना होगा. याद रखना होगा कि युगों युगों तक साधना करने से एक चरित्र निर्मित होता है. बहुत से कार्यों में स्वयं को उलझा कर, कहीं ये भी न भूल जाएँ, कि स्वयं को चरित्र-वान मनुष्य बना लेना ही हमलोगों का प्रथम और प्रधान कार्य है; इसके बाद यदि सम्भव हुआ, तो इस विषय में दूसरों कि सहायता की जा सकती है. 
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१८.
 आत्म विश्लेष्ण 
महामण्डल को स्थापित हुए ४५ वर्ष बीत चुके हैं. इसका बाह्य-प्रचार न रहने से भी लोगों के मुख से सुन कर या किसी प्रकार व्यक्तिगत सम्पर्क हो जाने के कारण बहुत से लोग इसके अस्तित्व को जानने लगे हैं. कई लोग इसके साथ सम्बद्ध रहने पश्चात् क्रमशः विभिन्न क्षेत्रों में या विभिन्न स्थानों में भी चले गये हैं, इसके अतिरिक्त कुछ लड़के तो सन्यासी भी बने हैं.
किन्तु जो लोग अन्यत्र चले गये हैं, वे आज भी सम्पर्क होने पर यह कहते हैं कि महामण्डल के साथ जुड़ने के कारण उनको व्यक्तिगत जीवन में बहुत लाभ पहुँचा है. और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो प्रारंभ से ही इसके साथ सम्बद्ध रहते हुए अभी तक इस आन्दोलन को फ़ैलाने में सक्रीय हैं.कुछ लोग दो-चार वर्ष, कुछ दस वर्ष, कुछ बीस-तीस वर्ष या कोई कोई और भी अधिक वर्षों से इसके साथ जुड़े ही हुए हैं. ये लोग महामण्डल के उद्देश्य के साथ ओतप्रोत हो कर जुड़े हुए हैं. 
 वे लोग स्थानीय या केन्द्रीय संगठन के कार्यों का संचालन करना, पाठ-चक्र, शिशु-विभाग, साहित्यिक ग्रंथालय, विवेकानन्द जन्म समारोह, युवा प्रशिक्षण शिविर का आयोजन तथा पथ-प्रदर्शन इत्यादि कार्य करते रहते हैं.ये शिविर स्थानीय, जिला, आंचलिक, राज्य-स्तरीय एवं सर्वभारतीय स्तर पर आयोजित किये जाते हैं. बहुत से लोगों को एक साथ सभी क्षेत्रों का कार्य देखना पड़ता है. बहुत से लोग जी-जान लगाकर कार्य करते हैं और आनन्द भी पाते हैं.
किसी भी कार्य में वर्षों तक लगे रहने से थोड़ी उदासीनता आ जाती है, थोडा ढीले पड़ जाना भी अस्वाभाविक नहीं है. ऐसे सद्कर्म करने में आत्मश्लाघा भी उत्पन्न हो सकती है. संगठन के आदर्श उद्देश्य और नीतियों को विशुद्ध रूप से कार्यान्वित करने में बिना चाहे ही आलस्य या तन्द्रा आना असंभव नहीं है. इस परिस्थिति में कार्य का बाह्य आवरण तो बना रहता है, किन्तु प्राण निस्तेज पड़ जाता है. 
किन्तु हमारा कार्य ही है अपने प्राण के पीछे की सत्ता को जाग्रत करने की चेष्टा करना, प्राण को पुष्पित करना. यह रहस्य यदि सहज-गम्य न हो तो लक्ष्य-भ्रष्ट होने की सम्भावना दिखने लगती है. महामण्डल कोई साधारण समाज-सेवी संस्था नहीं है- इस बात को कई बार विस्तार से समझाया जा चुका है.  साधारण प्रकार से समाज सेवा का कार्य करने से कार्यकर्ताओं का अहं बहुत अधिक बढ़ जाता है, वे दम्भ का प्रदर्शन करने लगते हैं.किन्तु यहाँ कार्य को करते समय केवल उतना ही अहं रखना होगा, जितना किसी क्रिया के कर्ता के रूप रहना आवश्यक है.अर्थात अपने अहंकार को यदि क्षीण नहीं कर सकें, तो इस कार्य को करने की पात्रता ही नहीं प्राप्त होगी, महामण्डल कर्मी बनने के योग्य ही नहीं रहेंगे. ( ठाकुर की नौकरी निरहंकारी हुए बिना नहीं की जा सकती). इसी कारण यदि इस ' मनुष्य निर्माणकारी आन्दोलन ' के साथ संयुक्त रहना चाहते हों तो जिस निति को अपरिहार्य रूप से पालन करना होगा- वह है ' आत्म-विश्लेष्ण '.
यदि दूसरों को धोखा देना हो तो कई तरह से धोखा दिया जा सकता है. किन्तु अपने मन को धोखा नहीं दिया जा सकता. हमें बहुत तन्मयता के साथ यह देखना होगा, कि क्या अब भी हमारे मन के भीतर अनाहत ध्वनी की तरह ' अहं, अहं ' की ध्वनी तो नहीं उठ रही है ? इसे निःशब्द होकर कान लगा कर सुनने की आवश्यकता है. हो सकता है, मन के भीतर अनकहा शब्द उठे - ' वाह रे मैं ! ' यदि ऐसा होता है, तब तो इस संस्था का संग करना ही व्यर्थ हो गया.
स्वयं को बहुत बड़ा दिखाने की चेष्टा करने से, सत्ता (अस्तित्व) लज्जा से संकुचित हो जाते हैं, क्योंकि एक ही सत्ता सबों में अन्तर्निहित हैं. त्ता जितने अधिक जाग्रत होते जायेंगे, उतना ही अधिक सभी लोग अपने लगने लगेंगे. दूसरों को यथार्थतः (सत्य निश्चय के साथ ) अपना महसूस कर पाने से, दूसरों को अधम, ईर्ष्या का पात्र, उपेक्षा का पात्र - ऐसा कैसे सोच पाएंगे ? परस्पर एक दूसरे के प्रति कल्याण कामना रखते हुए सबों को श्रेयप्राप्ति (या धन्यता प्राप्त करने) की चेष्टा करनी होगी. सरल शब्दों में इसीको स्वयं मनुष्य बनना और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करना कहा जाता है.
नासमझ अहं से ही स्वार्थ-बुद्धि का जन्म होता है. व्यक्तिगत स्वार्थपरता बहुत अधिक बढ़ जाने से नैतिकता और सदाचार का मानांक नीचे गिर जाता है. अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए नैतिकता और सदाचार को तिलांजली देने में भी कुंठा का बोध नहीं होता. इसीलिए नैतिकता परार्थ को स्वार्थ के उपर स्थान देती है. उधर नैतिकता सत्य के साथ ओतप्रोत रूप में जड़ित होती है. इसीलिए स्वार्थबोध केवल नैतिकता को ही नष्ट नहीं करती, बल्कि  सत्य को भी अस्वीकार करती है. जबकि सबकुछ सत्य के उपर ही खड़ा है.
  सत्य के जाने से सबकुछ चला जाता है; सत्य सबों के भीतर, सबकुछ में अन्तर्निहित है, इसीलिए सत्य को खो देने से सबकुछ खोना पड़ता है. वह सर्वव्यापी सत्य ही हमलोगों के अस्तित्व (सत्ता) हैं, उनको बहुत बड़ा बना कर अभिव्यक्त करने को ही मनुष्य बनना कहते हैं- और यही हमारा लक्ष्य है.
व्यर्थ के अहंकार को, व्यक्तिगत स्वार्थपरता को बिसर्जित करके जितना हमलोग सबों को अपना बनाने का प्रयास करेंगे, दूसरों को तुच्छ न समझ कर हमलोग स्वयं जितना अच्छा और पवित्र बनाने की चेष्टा करेंगे, उतना ही नैतिकता को कस कर पकड़े हुए हमलोग अपनी यथार्थ सत्ता की अग्रसर होते रहेंगे, हमलोग उतना ही उस सर्वगत सत्ता के निकट होते जायेंगे. इसके साथ ही वह सत्ता पवित्र है इसीलिए हमलोग अपने को भी पवित्र अनुभव करने लगेंगे. तब संकीर्णता, अपवित्रता, असत्य, अनैतिक विचार आदि हमलोगों के मन में छुपने की जगह नहीं प्राप्त कर सकेंगे.
हमलोग जब दूसरों के भीतर स्वयं को देखना सीखते है, तब दूसरों का दुःख, दूसरों का सुख अपना लगने लगता है- हमलोग (आदमी से इन्सान या ) यथार्थ मनुष्य बन जाते हैं, तथा उस अवस्था को प्राप्त करने की ओर अग्रसर होते रहते हैं, जहाँ यह अनुभव होता है कि मनुष्य ही ईश्वर है. इसिलए इस कार्य के साथ जुड़े रहना ही ईश्वर प्राप्ति की साधना है- जहाँ पहुँच जाने पर हिन्दुओं का ईश्वर, ईसाईयों का ईश्वर, मुसलमानों का ईश्वर - ऐसा पृथकत्व (भेद) नहीं रह जाता.
यदि महामण्डल का ' आदर्श उद्देश्य और नीति ', हमलोगों के आन्दोलन का लक्ष्य- ऐसे से ईश्वरस्वरुप मनुष्यों का निर्माण करना है, इस बात को हमसभी लोग ठीक ठीक आत्मसात कर सकें, तब हम यह समझ जायेंगे कि प्रत्येक महामण्डल कर्मी (को यह देखने के लिए मेरा मन कहीं मुझे ही तो ठग नही रहा?)  के लिए 'आत्म-विश्लेष्ण ' करना कितना महत्वपूर्ण है.क्योंकि इसके बिना हम दूसरों को धोखा से अधिक स्वयं को ही धोखे में रखेंगे और सारा श्रम विफल हो जायेगा. इसीलिए कार्य से जुड़ कर दूसरों का कल्याण करना चाहें तो पहले स्वयं को उसके योग्य बनाना होगा.
यदि आत्म-विश्लेष्ण करते समय, हमलोग स्वयं के साथ धोखाधड़ी न करें, केवल तभी सत्य, नैतिकता, परार्थता, निरहंकारिता, पवित्रता हमलोगों के जीवन को सार्थक कर सकते हैं. आत्म-विश्लेषन करके देखना होगा कि जिस समय मैं इस मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन से जुड़ा था, उस समय जैसा मैं था क्या अब भी वैसा ही हूँ, या परिवर्तन हुआ है ? यदि हुआ है तो किस दिशा में ?
मेरा स्वाभाव पहले जितना नम्र (कठोर ) था अभी क्या और भी विनम्र हुआ है ? सबों के प्रति प्रेम, सबों को अपना बना लेने का भाव में वृद्धि हुई है, या ' नेता बनने की पाशविक प्रवृत्ति ' तो नहीं दिखाई देने लगी है? मैं कहीं हठी और अक्खड़ तो नहीं बन गया हूँ? आदेश देकर दूसरों से कार्य करवाने तथा उसमें भी केवल दोष दिखाने, और किसी भूल के लिये कठोर वाक्य कहने या कोई दूसरी व्यवस्था करने की बात तो मन में नहीं उठती है? 
यदि यही सब हो गया हो तो, मेरा कुछ भी नहीं हुआ. नये सीरे से अपने जीवन को गठित करने की ओर ध्यान देना होगा. पद का मोह तो कहीं मन को पीड़ित नहीं कर रहा है? यदि करता हो मैं यहाँ आ कर भी कुछ सीख नहीं सका हूँ. प्रतिस्पर्धा, तर्क-वितर्क या कलह की प्रवृत्ति, स्वयं के मान-प्रतिष्ठा के विषय में अधिक जागरूक हो गया हूँ, किन्तु दूसरों को मान-प्रतिष्ठा देने में यदि कुंठा होती हो स्वयं में सुधार लाने की नितान्त आवश्यकता है.
देखना होगा नित्य-करणीय जो अभ्यास महामण्डल में बताये गये हैं, उनका नियमित अभ्यास मैं स्वयं कर रहा हूँ या नहीं ? " जीवन-गठन करने का संकल्प-सूत्र " क्या मैं स्वयं को सुनाता हूँ? थोड़ा व्यायाम, मनः संयोग, सबों के प्रति मंगल-कामना की प्रार्थना करने का अभ्यास क्या परिपक्व हो कर मेरा स्वभाव बन गया है? स्वामी विवेकानन्द के शक्तिदायी विचारों का नियमित पाठ या स्वाध्याय क्या निष्ठापूर्वक करता हूँ? आत्म-विश्लेषण करके  चरित्र के गुणों की तालिका में पीछे पड़े न रह कर आगे बढ़ने का प्रयत्न ही हमलोगों को योग्यतर बनाएगा और यही अपने तथा संगठन के लिये कल्याणकारी है.                         
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१९. आत्म -दोषानुसंधान (Self-Criticism )
अपने मन में छुपे दोषों का अनुसन्धान करना या अपने गुण-दोषों पर चिन्तन करना चरित्र-गठन या आत्म-विकास का एक अपरिहार्य अंग है. किन्तु अपने गुण-दोषों के समबन्ध में खोज-बीन करना उतना सहज भी नहीं है. क्योंकि हमलोगों में बचपन से ही दूसरों के गुण-दोष को देखने की आदत रहती है. दूसरों के चरित्र की सर्वांगसमता अथवा विषमता - दूसरों का हावभाव, चाल-चलन, सम्भाषण, क्रिया-कलापों का ताल मेल या विसंगति को हमारी आँखें बिल्कुल आसानी से ढूंढ़ निकालती हैं. किन्तु हमारे अपने चरित्र की वाह्य अभिव्यक्ति प्रायः हमारी दृष्टि के अगोचर ही रह जाती है. 
दूसरों को क्रोधित होने, लालच में फंसने, या अहंकार का प्रदर्शन करने उनके कार्य या बातों की ये सभी विसंगतियाँ हमलोग तुरन्त ताड़ लेते हैं; किन्तु स्वयं क्रोधित होने, लालच करने, या अहंकार के प्रदर्शन को प्रायः देख नहीं पाते हैं. रिपुओं (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर आदि ) के प्रभाव में आकर हमलोग अपनी  इन्द्रियों की स्वाभाविक शक्तियों को व्यर्थ में नष्ट कर देते हैं. इसके अलावे रिपुओं के वशीभूत रहने के कारण हमारे अपने चरित्र की वाह्य अभिव्यक्ति किस रूप में हो रही है उसको हमलोग सही तरीके से देख नहीं पाते हैं या समझ भी नहीं पाते हैं. किन्तु हमारी इन्द्रियों के समक्ष  दूसरों के चरित्र की विसंगतियाँ आसानी से उजागर हो जातीं हैं. 
यदि एक वाक्य में कहें तो स्वयं के क्षेत्र में शरीर, मन, इन्द्रियाँ सभी एकाकार होकर रहतीं हैं, जिसके फलस्वरूप चारित्रिक विसंगति दिखाई देने पर भी हमारा मन साधारणतः शरीर और इन्द्रियों से चरित्र को पृथक करके उसकी विसंगतियों को देख नहीं पाता है, किन्तु दूसरों के चरित्र में विसंगति देखने से हमारी इन्द्रियाँ और मन दूसरों के शरीर-मन-इन्द्रिय की सीमा से बाहर रहते हुए पर्याप्त रूप से दूरों के चरित्र की विसंगतियों को पकड़ लेता है. 
रिपुओं के वशीभूत होने पर चरित्र में दिखने वाली विसंगतियों के अतिरिक्त स्वाभाविक अवस्था में भी, हमलोगों के चरित्र में विभिन्न प्रकार की विसंगतियां उत्पन्न होती हैं. अच्छी आदतों के कमी के कारण ही हमारे चरित्र में इस प्रकार इस प्रकार की विसंगतियां प्रकट होती हैं. जैसे मान लो कि लम्बे समय से मेरी आदत सुबह में देरी से उठने की रही है, जिसके फलस्वरूप मैं अब भी सुबह ७ बजे के पहले बिस्तर छोड़ कर उठ नहीं पाता हूँ. हो सकता है घर में मेरे छोटे छोटे भाई बहन भी हों, या मैं नौकरी के क्षेत्र में किसी दायित्वपूर्ण पद पर नियुक्त हूँ, किन्तु छोटे भाई-बहन का अस्तित्व या दायित्वपूर्ण पद कोई मुझे सुबह ७ बजे के पहले बिस्तर छोड़ कर उठ जाने को मजबूर नहीं करते, जबकि भाई-बहनों के नींद से उठ जाने के बाद मेरी नींद टूटती है और ऑफिस जाने में रोज मुझे देर हो जाती है, जिसके कारण घर एवं ऑफिस के लोगों के साथ अक्सर मेरा विवाद होता रहता है. 
समयानुवर्तिता, नियमानुवर्तिता, संकल्प, आत्मविश्वास, आत्म-संयम, सत्यनिष्ठा, उद्द्य्म, सहानुभूति, श्रमशीलता आदि सद्गुणों का नियमित अनुशीलन या नित्य प्रयोग के आभाव में उपरोक्त प्रकार की बुरी आदतें  हमलोगों के चरित्र में जिन विसंगतियों या कमियों को जन्म देती हैं, उनको हमलोग प्रायः देख ही नहीं पाते हैं. किन्तु जब हमलोग दूसरों के चरित्र में इन कमियों को देख कर उनके छिद्रान्वेषण में मुखर हो उठते हैं, तब हमें यह समझ में आता है कि सचमुच ये सब गन्दी आदतें बिल्कुल ही त्याज्य हैं. अतएव, अपने भीतर की इन कमियों को दूर करने का एकमात्र उपाय है, दूसरों के भीतर इन दोषों का अनुसन्धान करना छोड़ कर अपने भीतर के इन दोषों का अनुसन्धान करना. 
जब हमलोग अपना चारित्रिक-दोष देखने या कमियों को ढूंढने का प्रयास करने लगेंगे, तब क्रमशः अपने चरित्र की उन कमियों को हम देख पाएंगे, और तब इन कमियों के लिए हम दूसरों को उत्तरदायी नहीं ठहराएंगे, यहाँ तक कि यदि कोई दूसरा व्यक्ति हमलोगों के प्रति कोई दुर्व्यवहार भी कर बैठेगा तो, उसके लिये भी हम उनपर दोषारोपण किये बिना स्वयं को ही दोषी ठहराएंगे. इसी प्रसंग में स्वामी विवेकानन्द की एक उक्ति अत्यन्त सारगर्भित है- " भाइयो ! मैं तुमलोगों को दो चार कठोर सत्य से अवगत कराना चाहता हूँ. समाचार पत्रों में पढने में आया कि हमारे यहाँ के एक व्यक्ति को किसी अंग्रेज ने मार डाला है अथवा उसके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया है. बस, यह खबर पढ़ते ही सारे देश में हो-हल्ला मच गया, इस समाचार को पढ़ कर मैंने भी आँसू बहाय; पर थोड़े ही देर बाद मेरे मन में यह सवाल पैदा हुआ कि इस प्रकार की घटना के लिए उत्तरदायी कौन है ? चूँकि मैं वेदान्तवादी हूँ, मैं स्वयं अपने से यह प्रश्न किये बिना नहीं रह सकता...जब कभी मैं अपने मन से यह प्रश्न करता हूँ कि इसके लिए कौन उत्तरदायी है, तभी मेरा मन बार बार यह जवाब देता है कि इसके लिए अंग्रेज उत्तरदायी नहीं हैं; बल्कि अपनी इस दुरवस्था के लिए, अपनी इस अवनति और इन सारे दुःख-कष्टों के लिए, एक मात्र हमीं उत्तरदायी हैं.." (वि० सा० ख० ५: ' वेदान्त का उद्देश्य ' ८७-८८).
इससे से यह अस्पष्ट हो जाता है कि बार बार स्वयं से इसी प्रकार के प्रश्न करने की आदत डाल लेने से हमलोग अपने चरित्र की विसंगति या कमी को अवश्य पकड़ सकेंगे, और तब हमारी व्यक्तिगत या सामाजिक दुर्दशा, अधोपतन और दुःख-कष्ट के लिये दूसरों को उत्तरदायी न ठहराकर स्वयं को ही उत्तरदायी ठहराएंगे. फलस्वरूप, तब हमलोग दूसरों के चरित्र के दोषों या कमियों को दूर करने के बजाय अपने चरित्र के दोषों को दूर हटाने के लिये अधिक प्रयत्नशील रहेंगे.
इस प्रसंग में स्वामीजी हमलोगों की दुर्दशा और दुःख-कष्टों के लिये अंग्रेजों को ही मूल रूप से दोषी नहीं ठहराते जबकि हमलोग इस देश पर अंग्रेजों द्वारा किये गए अत्याचार और उत्पीड़न के बारे में प्रचुर उदाहरण देखते हैं. वास्तविकता यही है कि यदि हमलोग अपनी आत्मशक्ति के प्रति जाग्रत होकर अपनी अलग अलग बिखरी हुई शक्तियों को संयुक्त करने के प्रति सचेष्ट रहते तो, अंग्रेज ही क्या, इस प्रकार की कोई भी विदेशी शक्ति हमलोगों को इतने लम्बे समय तक गुलाम बना कर नहीं रख सकती थी. 

अर्थात इस प्रसंग में स्वामीजी का मूल वक्तव्य हमलोगों की आत्म-दोषानुसंधान की प्रवृति के आभाव को ही उजागर करता है. यदि हमलोग पहले ही सही रूप में आत्म-दोषानुसंधान करने में प्रवृत हो जाते तो, हमलोगों को निश्चय ही अपने चरित्र की कमियों का पता चल जाता, और तब हमलोग अवश्य ही इन कमियों को दूर करने के लिये दृढ-प्रतिज्ञ होते.
  कहना न होगा कि, आत्म-दोषानुसंधान की उपरोक्त पद्धति का अनुसरण करने से हमलोग निश्चय ही अपने चरित्र की कमियों को या दोषों की संख्या एवं परिमाण को कम करके अपने भीतर विभिन्न गुणों के क्रम-विकास की उपलब्धी कर सकेंगे.          
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२०. 
दूसरों का दोष न देखो : अपना सुधार करो 
इन दिनों राष्ट्रिय जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में सफलता के बजाये विफलता की विजय यात्रा ही अधिक दृष्टिगोचर हो रही है. सभी क्षेत्रों में जैसा होना अच्छा होता, वैसा हो नहीं रहा है. वैसे तो हमलोगों की मांग और आपूर्ति के बीच सदैव एक अंतर सदा बना ही रहता है. दूसरे शब्दों में यूँ भी कहा जा सकता है कि हमारी मांग और आपूर्ति के बीच अंतर अवश्य ही सदैव बना रहेगा, क्योंकि किसी भी वस्तु की मांग पूरी होते ही, हमारी मांग की परिधि और भी अधिक बड़ी होती जाती है.
किन्तु यहाँ उस परिपेक्ष्य में चर्चा नहीं हो रही है- आज भारत की साधारण जनता को जितना न्यूनतम भी मिलना चाहिए था, कठिन परिश्रम करने के बावजूद उतना भी नहीं मिल पा रहा है. हमलोग अपनी राष्ट्रिय-योजनाओं में जिस लक्ष्य को सामने रख कर, उसे पाने का जितना भी प्रयास करते हैं, उसका परिणाम बिल्कुल उल्टा हो रहा है. 
ऐसा सोच कर ( सर्वशिक्षा अभियान के तहत ) बहुत सारे स्कूल-कॉलेज स्थापित किये जा रहे हैं, कि शिक्षा का क्षेत्र और विस्तृत हो जायेगा; किन्तु धरातल पर ऐसा होता हुआ दिख नहीं रहा है. लगता है मानो शिक्षा की अपेक्षा अशिक्षा ही बढ़ती जा रही है. गोदाम-फैक्ट्री आदि स्थापित किये जा रहे हैं, उसमें हिसाब करके श्रमिक और मूलधन भी (मनरेगा-योजना ) नियोजित किये जा रहे हैं, किन्तु उत्पादन का न्यूनतम लक्ष्य भी प्राप्त नहीं हो पाता है. सभी क्षेत्रों की हालत एक ही जैसी है. 
हम साधारण मनुष्य विचारशील प्राणी होने के नाते स्वाभाविक रूप से इस विफलता के बाद किसका कितना दोष या दायित्व है- इसपर विचार करने बैठ जाते हैं. और इस कार्य में- इसके लिए जिम्मेदार प्रत्येक व्यक्ति के दोषों को हमलोग आश्चर्यजनक रूप में सफलता के साथ ढूंढ़ निकालते हैं. किसी भी व्यक्ति की थोड़ी सी त्रुटी भी हमलोगों की दृष्टि से छुपी नहीं रह पाती है. मैं जिस समय अपने दोषों पर ध्यान दिये बिना दूसरों की दोषों की ओर ऊँगली उठा रहा होता हूँ ठीक उसी समय हो सकता है कोई दूसरा व्यक्ति भी ठीक मेरे ही समान अपने दोषों को नहीं देख पाने के कारण विफलता के लिए मुझको ही जिम्मेवार ठहरा रहा होता है.
हमलोगों में से कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में शिक्षक है, कोई छात्र है; कोई मजदूर है तो कोई मालिक है, कोई किसी की नौकरी कर रहा है तो कोई और किसी धंधे में लगा हुआ है. कोई रेलकर्मी है तो कोई रेलयात्री है- इसी प्रकार से कितने व्यक्ति कितने क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं.
  शिक्षक के रूप में मैं अपने कर्तव्य पालन में लापरवाही के संबन्ध में थोड़ी भी जागरूकता न दिखला कर शिक्षा की अवनति के लिए समाज के अन्य लोगों पर इसका दायित्व थोपना चाहता हूँ
छात्र के रूप में मैं स्वयं किसी नियम-कानून का पालन न कर या पढने लिखने का प्रयत्न न कर शिक्षा की विफलता के लिये सारा दोष शिक्षक महोदय के सिर पर मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता हूँ. मालिक के रूप में रिश्वतखोरी को प्रश्रय देता हूँ, एवं मजदूरों को उनके हक से वंचित करके सर्वदा अत्यधिक मुनाफा कमाने की चेष्टा में रत रहता हूँ.
फिर मजदूर के रूप में मैं अपने उचित कर्तव्य का पालन किये बिना अधिकार पाने का संग्राम चलाते रहना ही अपना एकमात्र कर्तव्य समझता हूँ. सही समय पर गाड़ी नहीं चलाने के लिये जो लोग रेलकर्मियों के उपर दोषारोपण करने में मुखर रहते हैं, हो सकता है अपने अपने कर्मक्षेत्र के कर्तव्यपालन के प्रति बिल्कुल ही उदासीन रहते हों. 
 ठीक इसीप्रकार कोई कर्तव्यच्यूत रेलकर्मी भी निश्चित रूप से क्षण भर में अपने को छोड़ कर संसार के अन्य सभी लोगों के दोषों की लम्बी फेहरिस्त मुह्जबानी सुना सकता है. किसी सरकारी महकमें में कार्यरत कोई कर्मचारी स्वयं शायद घूस लेना छोड़ कर अन्य कोई कार्य नही करना चाहता हो, किन्तु कभी अपने कार्यवश किसी दूसरे दफ्तर में जाकर अपने जैसे किसी कर्मचारी को घूस दिये बिना कार्य नहीं करा पाते तब हो सकता है, वह स्वयं भ्रष्टाचार में डूबे देश के भविष्य के बारे में हताशा प्रकट करने लगते हों. तथापि स्वयं घूस लेते समय यह बात उसके मन में उठती ही नहीं है, सारा देश इसी प्रकार चल रहा है.
हम सभीलोग राष्ट्रिय जीवन की समस्त विफलताओं के लिये स्वयं को छोड़ कर दूसरे सभी लोगों पर इसका दायित्व थोपने में व्यस्त रहते हैं
जबकि यह देश हमलोगों ही जैसे एक एक व्यक्तियों से मिलकर बना है. हम सभी लोग यदि केवल दूसरों के ही दोषों को देखते रहें, तथा अपने को दोषरहित समझें, तो कभी भी इन दोषों का निराकरण सम्भव नहीं होगा, तथा देश की वर्तमान दशा में कोई परिवर्तन न हो सकेगा. जितने उत्साह और उद्यम से हमलोग दूसरों के दोषों का अन्वेषण करते हैं, उसका थोड़ा अंश यदि हमलोग अपने दोषों का अनुसन्धान करने में खर्च करें तो पारस्परिक दोषारोपण के फलस्वरूप उत्पन्न मात्र विद्वेष ही दूर नहीं होगा, वरण प्रत्येक व्यक्ति का प्रत्येक कार्य दोषमुक्त हो सकेगा एवं उसके परिणामतः स्वाभाविक रूप में देश, जाती यहाँ तक कि व्यक्तिगत रूप में से भी हमसभी लोगों का सर्वाधिक कल्याण होगा.
रामकृष्ण-विवेकानन्द भावधारा का एक महत्वपूर्ण पक्ष है- दूसरों के दोषों को देखने की आदत को त्याग कर अपने दोषों को दूर करने के विषय में सर्वदा जागरूक रहना. क्योंकि इसी मार्ग पर चलने से हमलोगों की लौकिक और आध्यात्मिक उन्नति हो सकती है. इसीलिए हममें से जो लोग स्वयं को स्वामीजी के मनुष्य निर्माणकारी आन्दोलन के जो ध्वजा वाहक सैनिक समझते हों, उन्हें प्रतिक्षण आत्म-दोषानुसंधान कर के देखते रहना चाहिए कि किसी कार्य में कहीं उनकी अपनी कोई लापरवाही या दोष-त्रुटी तो नहीं हो रही है? यदि कोई हो, तो उसी क्षण उसे सुधार लेंगे, दूसरों का छिद्रान्वेषण करने कि ईच्छा या थोड़ा सा समय भी उनके पास नहीं होगा.
अपनी आत्मशक्ति में अनास्था रहने के फलस्वरूप ही, दूसरों के दोषों का अनुसन्धान करने की प्रवृति उत्पन्न होती है. जो लोग सचमुच आत्मशक्ति से शक्तिमान हैं, वे अपने पवित्र स्वरूप पर पूर्ण आस्था रखेंगे, तथा  पहले स्वयं अपना चरित्र-निर्माण करके एक राष्ट्र-निर्माण की मजबूत नींव रखेंगे.  
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२१. 
प्रबन्धन योग्यता 
इन दिनों किसी भी कार्य को वैज्ञानिक ढंग से सम्पादित पर जोर दिया जाने लगा है,चाहे वैसा करना पूर्णतया सम्भव हो या नहीं. इन दिनों उद्द्योग-व्यवसाय के क्षेत्र में प्रबंधन-विज्ञान की चर्चा सर्वाधिक होती है. इसके अतिरिक्त प्रबन्धन-विज्ञान-विशारद की आवश्यकता- स्कूल- कॉलेज में, बड़े पुस्तकालय, विश्वविद्यालय, अनुसन्धान केन्द्र, समाज सेवा प्रतिष्ठान, राष्ट्रिय खेल-कूद या किसी भी समुदाय या संस्था में, यहाँ तक कि धार्मिक प्रतिष्ठानों के संचालन में भी होती है.
इस विज्ञान की शिक्षा देने के लिए कई संस्थान अस्तित्व में आये हैं, इसके पाठ्यक्रम बने हैं, इस शिक्षा को ग्रहण करने में बहुत धन भी व्यय करना पड़ता है. दक्ष प्रबन्धक सम्पूर्ण संगठन-तन्त्र को बड़े कौशल के साथ संचालित करते हैं, और उसके उद्देश्य को सर्वाधिक सफलता प्रदान करने की चेष्टा करते हैं. इस विज्ञान का सर्वाधिक व्यव्हार उद्द्योग-व्यापार के क्षेत्र में इसी कारण किया जाता है कि, इन क्षेत्रों में संस्थाओं की सफलता अधिक मुनाफा उत्पन्न करती है. इन क्षेत्रों में अधिक आर्थिक लाभ ही प्रधान उद्देश्य है. दूसरे क्षेत्रों में आर्थिक लाभ उतना महत्वपूर्ण नहीं होने से प्रबन्धन के उपर उतना ध्यान नहीं रहता है.
किन्तु जहाँ कहीं भी यन्त्र-उपकरण, मूलधन, मानव श्रम का विनियोग होता हो वहाँ पर प्रबन्धन के उपर गुरुत्व देना उचित है. कुछ संस्थाएँ ऐसी भी होतीं हैं जहाँ यन्त्र-उपकरण तो नहीं होते, किन्तु बहुत बड़ी संख्या में मनुष्यों को लगाकर किसी उद्देश्य को प्राप्त करने का कार्य किया जाता है. उन सब क्षेत्रों में भी मनुष्य के अलावा अर्थ का उपयोग होता है तथा कुशल प्रबन्धन के अभाव में संस्था का उद्देश्य उपयुक्त सफलता नहीं प्राप्त कर सकता है. किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के कार्य में बहुत बड़ी संख्या में संलग्न मनुष्यों को सही ढंग से परिचालित करना  यन्त्र-उपकरण या अर्थ का प्रबन्धन करने से भी अधिक कठिन कार्य है.
आजकल इस प्रबंधन-विज्ञान के साथ एक नया भाव भी जुड़ गया है. वह है, जो व्यक्ति पहले से जिस किसी संस्था में कार्यरत हैं, उनकी योग्यता, दक्षता को किस प्रकार बढ़ाई जाय जिससे उनकी निजी प्रबन्धन योग्यता में वृद्धि के साथ साथ, उस संस्था का उद्देश्य या उत्पादन का लक्ष्य और भी अच्छे ढंग से प्राप्त किया जा सके. प्रबंधन-विज्ञान के इस नये विभाग को,  मानव-सम्पद-विकास (Human Resource Development ) का नाम दिया गया है.
किन्तु, इतना भारी-भरकम नाम रखने के बाद भी इस प्रबंधन-विज्ञान का असली उद्देश्य है, किसी संसथान के लक्ष्य को प्राप्त करना, जिसका अर्थ अधिकांश संस्थानों के लिए अधिकाधिक मुनाफा कमाना ही होता है. जिसके फलस्वरूप  ' मानव-सम्पदा ' का यथार्थ विकास उपेक्षित ही रह जाता है.
ऐसे प्रबंधन-प्रशिक्षण के द्वारा, कर्मियों की दक्षता (नैपुण्य ) में वृद्धि, एवं किस प्रकार कार्यक्षेत्र में अधिकाधिक मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है, वह सब सीख कर, केवल संस्था ही नहीं, हो सकता है कुछ व्यक्ति भी अधिक अर्थोपार्जन करने लगें. किन्तु वे अपने निजी जीवन को कभी यथार्थ रूप में गठित नहीं कर सकते. जो लोग इस विज्ञान के खोजकर्ता, प्रचारक और शिक्षक हैं, वे इस बात पर थोड़ा भी विचार नहीं करते, कि इसका कैसा हानिकारक परिणाम होने वाला है? या यदि वे उससे जुड़े व्यक्तियों के यथार्थ मानवोचित गुणों के विकास में यदि वे सच्ची सहायता दे पाते, तो उसका शुभ परिणाम कितना विस्तृत और दूरगामी हो सकता था ? वे यदि, अब भी इस बात को समझ लें, तो व्यक्ति और सम्पूर्ण समाज ही उससे लाभान्वित हो सकता है.
आज, केवल इसी देश के ही नहीं बल्कि विदेशों के समाज में भी, हर स्तर पर जितना भ्रष्टाचार दिखाई दे रहा है, उसके लिए मूल रूप से ऐसे ही व्यवसायीक प्रबंधन के प्रशिक्षण प्रतिष्ठान जिम्मेदार हैं. आधुनिक आर्थिक घोटालों, (सांसद खरीद-बिक्री के मामलों में भी ) में से प्रत्येक के पीछे देखा जायेगा कि यही लोग इससे जड़ित हैं. क्योंकि समस्त व्यावसायिक प्रबन्धन प्रतिष्ठानों का एकमात्र दर्शन, एकमात्र नीति है- " जो कुछ करने से अधिक रुपया प्राप्त होता हो, वही करणीय है ". 
 अब प्रबन्धन-विज्ञान- विशारद लोग भी,  इसबात को कुछ कुछ समझने लगे हैं. इसीलिए कुछ वर्षों पूर्व ज़ोंका के प्रबन्धन शिक्षण प्रतिष्ठान (IIM Jonka) में विवेकानन्द की शिक्षाओं को पढ़ाने का पाठ्यक्रम शुरू हुआ है. पश्चिम बंगाल के आर्थिक प्रबन्धन संस्था की कोलकाता शाखा ने हाल में ही एक परिचर्चा आयोजित की थी, जिसमें गीता को उद्धृत करते हुए लोभ की निन्दा की गयी, और विवेक-विचार का आश्रय लेने का परामर्श दिया गया था. तथा इस बात के उपर भी चर्चा हुई कि, कैसे ईमानदारी और नैतिकता के सहारे ही प्रबन्धन-योग्यता के चरमोत्कर्ष को प्राप्त किया जा सकता है. 
इन सब विचारों के उत्पन्न होने से बहुत पहले से महामण्डल में प्रबन्धक ( नेता ) निर्माण करने की पद्धति, तथा कुशल प्रबंधन( नेतृत्व ) के गुणों के उपर केवल चर्चा ही नहीं हुई है, इसी विषय के उपर एक पुस्तक भी प्रकाशित की गयी है.
' मनुष्य बन जाना ' एक अत्यन्त कठिन तथा चुनौतीपूर्ण कार्य है, पढाई-लिखाई में बहुत अच्छा रिजल्ट करने या अन्य किसी प्रकार से बहुत धन कमा लेने की अपेक्षा, मनुष्य बनने के लिए, बहुत अधिक और लम्बे समय तक कठोर परिश्रम करना पड़ता है.किन्तु मनुष्य बन जाने के बाद, ईमानदारी के साथ रोजगार-व्यापार करना,  या अपनी रोटी आप कमा लेना बहुत कठिन नहीं होता. 
परन्तु किसी व्यक्ति को यदि बहुत से लोगों को मनुष्य बनने में सहायता करने के लिए, किसी  संघबद्ध प्रचेष्टा को सफल करने की प्रबंधन-योग्यता अर्जित करनी हो, तो इसके लिए कठोरतर प्रयत्न की आवश्यकता होती है.वर्तमान परिस्थिति को देख कर, क्या हम इतना नहीं समझ सकते कि, ' मनुष्य ' बने बिना राजनीति करने, मनुष्य बने बिना वाणिज्य-व्यापर करने, मनुष्य बने बिना शिक्षकता करने, मनुष्य बने बिना समाज-सेवा करने या किसी संस्था का प्रबंधन-भार ग्रहण करने का परिणाम क्या होता है ? इसीलिए ' मनुष्य ' बन जाने  का प्रयत्न करना- जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है. और इसके लिए पहले चाहिए- उपयुक्त जीवनबोध, एक आदर्श जीवन-दर्शन, सदा जाग्रत विवेक, अटल संकल्प और अथक प्रयास.
संगठन  भी किसी  ' जीव '  के संघटित शरीर रचना- की तरह होता है. उसे भी प्राणवन्त होना चाहिए, उसके समस्त अंग में रक्त संचारित होना चाहिए, प्रत्येक अंगप्रत्यंग क्रियाशील रहना चाहिए, उद्देश्य सर्वदा स्पष्ट रूप से सामने दिखाई पड़ना चाहिए, उद्देश्य और उपाय में मनःसंयोग चाहिए, संगठन के उद्देश्य के महत्व की स्पष्ट धारणा रहने के साथ-साथ इसकी सफलता के प्रति दृढ निश्चय भी रहना चाहिए. हृदय में प्रेम, मस्तिष्क में बुद्धि, हाथों में बल- के साथ मन में अभय रहना चाहिए. निन्दा, आलोचना, अपमान सहने की शक्ति रहनी चाहिए. सत्य, नैतिकता, ईमानदारी, पवित्रता को कस कर पकड़े रहना होगा. इन सब विषयों पर नित्य स्वाध्याय करना चाहिए, आन्तरिक निष्ठा रहनी चाहिए. संगठन का उद्देश्य और कार्यपद्धति को ठीक से समझ कर उसका एक निपुण जानकर बनना चाहिए और दूसरों के भीतर भी इस भाव को संचारित करना चाहिए. नाम, पद, प्रतिष्ठा, सभी प्रकार की दुर्बलता को बिल्कुल त्याग देना चाहिए. सदा यह याद रखना चाहिए कि किसी को छोटा करके, घृणा करके, ईर्ष्या करके बड़ा नहीं बना जा सकता है. आदर्श, उद्देश्य, उपाय के उपर निरन्तर विचार करते रहने से योग्यता बढ़ जाएगी. मन, वचन और कर्मों में सामंजस्य रहना चाहिए. ' भाव के घर में चोरी ' रहने से, खुद ही धोखा खाना पड़ता है. दृढ संकल्प रखते हुए प्रयास करने से सफलता निश्चित है. 
मनुष्य बनने की चेष्टा के साथ-साथ, संगठन के समस्त कार्यों को पूरी निपुणता के साथ सम्पादित करने की योग्यता अर्जित करना भी अत्यन्त आवश्यक है. किन्तु लगभग सभी सदस्यों के भीतर एक बहुत बड़ा दोष दिखाई देता है, हमलोग कहते हैं-  मैं यह काम तो कर सकता हूँ, किन्तु वह काम या फलां-फलां काम मुझसे नहीं हो सकता. साधारणतया किसी संगठन के प्रबन्धन-योग्यता में कमी का मौलिक  कारण यही होता है. 
यदि संगठन के अलग अलग कार्यों को सम्पादित करने के लिए, उसके योग्य व्यक्ति मिल जाएँ,  तो उनको उनके पसन्दीदा कार्य में नियोजित कर के, संगठन के सभी कार्यों को समय पर पूरा कर लेना भी कम दक्षता नहीं है.
  परन्तु किसी नेता या प्रबन्धक में, स्वयं संगठन के लिए उपयोगी किसी खास विषय को सही ढंग से करने की योग्यता न हो, साथ ही उस संगठनों में ' Man-power ' (निष्ठावान कर्मियों की संख्या भी ) कम हो, तो ऐसी परीस्थिति में कुशल प्रबन्धक को उस खास विशेष को पूर्ण निपुणता के साथ सम्पादित करने दक्षता, पहले स्वयं अर्जित करनी चाहिए, फिर उस गुण को अन्य किसी सदस्य में संचारित करने का प्रयास करने से, वैसे संगठन का कार्य भी अत्यन्त सुंदर ढंग से संचालित किया जा सकता है. इस प्रकार से संगठन का सारा कार्य समय पर पूरा करने की ओर संगठन के सभी निष्ठावान कर्मियों तथा प्रबन्धक (नेता )का ध्यान रहना चाहिए, किन्तु प्रायः इसकी कमी दिखाई देती है. किन्तु यदि संगठन के हर सदस्य के मन में, हर समय संगठन का आदर्श, उद्देश्य तथा संगठन का ' आदर्श-वाक्य ' स्वर्णाक्षरों में दहकता-चमचमाता रहे, तो उस संगठन लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग में ऐसी कोई बाधा नहीं आ सकती , जिसे पार न किया जा सकता हो. 
समस्त कार्यों को स्वच्छता, एवं त्रुटी-रहित तरीके से करने की आदत डालनी चाहिए. बहुत से लोग कार्यों को जैसे तैसे निपटा देना चाहते हैं.किसी भी कार्य को स्वच्छता से करने से चरित्र गठन में सहायता मिलती है. संगठन के समस्त चीजों को उपयुक्त तरीके से संभाल कररखना चाहिए, प्रत्येक कार्य को समय के अनुसार पूरा करना चाहिए. भविष्य में किये जाने वाले कार्यों को पहले से लिख कर रखना चाहिए. बहुत से लोग यह कहते सुने जाते हैं- भूल गया हूँ, कागज कहाँ रखा था, मिल नहीं रहा है. ऐसा होना चरित्र गठन में बाधक है. चित्र-निर्माण की पद्धतियों का उपयुक्त तरीके से पालन किया जाय तो ऐसी भूल नहीं हो सकती. जो कुछ भी लिखना हो स्वच्छता के साथ लिखना चाहिए.
सबों में भाषाज्ञान एक जैसा नहीं होता. उसको सीखने के लिए परिश्रम करना उचित है. उपयुक्त भाषा, लिखावट और बोली में स्वच्छता नहीं रहने से, विचारों का आदान-प्रदान ठीक से नहीं हो पाता. संगठन के कुशल प्रबन्धन के लिए ये सभी विषय अपरिहार्य हैं. प्रत्येक को इन बातों की तरफ ध्यान देना चाहिए, तथा प्रबन्धक को विशेष रूप से इस ओर नजर रखना, सहायता एवं उत्साह देना उचित है.
केवल अपनी मातृभाषा में ही नहीं अंग्रेजी में भी बोलने का अभ्यास रहना चाहिए. पाठ-चक्र में ' विवेक-जीवन ' के अंग्रेजी अंश को पढ़ने और सभी सदस्यों द्वारा उस पर अंग्रेजी में चर्चा करने से इस विषय में लाभ होगा. महामण्डल की समस्त पुस्तकों को बार बार पढ़ने से कई विषयों में स्पष्ट धारणा बनाई जा सकती है. अर्थात हमलोगों को मिलजुल कर अपना जीवन-गठन करने तथा संगठन का प्रंबधन करने की योग्यता अर्जित कर के देश के इस दुरावस्था के समय देश को पुरुज्जिवित करने के शुभकर्म में जी-जान से जुट जाने की आवश्यकता है.               
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२२.
 प्रबन्धन का कौशल 
कुशल प्रबन्धन के अभाव में कोई भी शक्ति प्रभावकारी नहीं हो सकती. किसी किसी व्यक्ति में,स्वाभाविक रूप से प्रबन्धन दक्षता, दूसरों की अपेक्षा अधिक रहती है. इसीलिए संगठन की शक्ति को अधिक फलप्रसु बनाने के लिए, उसके प्रबन्धन का दायित्व ऐसे ही किसी दक्ष व्यक्ति या व्यक्तियों के उपर सौपना अच्छा है. किन्तु संगठन के अन्य सदस्यों को भी प्रबन्धन के कौशल को सीखने की चेष्टा करनी चाहिए. 
किन्तु इसमें दो बाधाएँ सामने आ खड़ी होती हैं. कुशल-प्रबन्धन सीखने में पहली बाधा है- मुझमें प्रबंधन-दक्षता नहीं है, किन्तु मैं यह सोचता हूँ कि मैं बड़ा कुशल प्रबंधक हूँ, और संस्था का सारा कार्य मेरे ही निर्देशन में चलना चाहिए. इस जिद के कारण संगठन की शक्ति नष्ट होती है, और संगठन जो करना चाहता है, या जो कर सकता था, वैसा हो नहीं पाता.
दूसरी बाधा : कोई कोई सोचते हैं, अब नए ढंग क्या सीखूंगा ? जितना जानता हूँ, वही काफी है. मुझे कुछ सीखना पड़ेगा, ऐसा विचार आते ही, अपने को छोटा या हीन सोचने लगता है. यह अत्यन्त आदत गलत है. सीखने क्या कभी अन्त हो सकता है ? श्रीरामकृष्ण कहते थे- " যাবত বাঁচি তাবত শিখি "| अर्थात " जब तक जीवित रहूँ, तब तक सीखता रहूँ. " यह कोटेशन भाषण देते समय या वाद-विवाद के समय मैं स्वयं भी उद्धृत करता हूँ, किन्तु अपने क्षेत्र में- यही मानता हूँ कि, श्रीरामकृष्ण की यह उक्ति मेरे लिए नहीं है.  
 किसी भी व्यक्ति के लिए, हर समय सीखने योग्य बहुत कुछ रहता है. जिसमें सीखने की उत्कंठा होती है, वह जो चाहे सीख सकता है. अतः संगठन के सभी सदस्यों में, संगठन की शक्ति को प्रभावशाली बनाने के लिए, प्रबन्धन दक्षता अर्जन करने की चेष्टा, और नई नई तकनीक सीखने की उत्कंठा, अवश्य रहनी चाहिए. स्वामी विवेकानन्द जी अपने अनुयायियों को प्रबन्धन-कौशल अर्जित करने के लिए कितने ही सुझाव  दिए हैं, जिसके फलस्वरूप उनमें से कुछ ने तो आश्चर्यजनक प्रबंधन-दक्षता अर्जित भी कर लिया था. उनके इन सुझावों को पढ़ने, उसके उपर चर्चा करने, और उन्हें सीख लेने हमलोग भी अपनी प्रबन्धन-दक्षता को कई गुना बढ़ा सकते हैं. 
जिस प्रकार श्रीरामकृष्ण किया करते थे, स्वामी विवेकानन्द भी एक ही बात को, कितिनी ही बार और कितने प्रकार से बोल बोल कर अपने शिष्यों के भीतर प्रविष्ट करा देते थे. किसी संगठन का ' प्रबन्ध-निदेशक ' होने के लिए सबसे पहले अपने जीवन को सुन्दर तरीके से गठित करना चाहिए. अपने जीवन को ' आदर्श-स्वरूप ' बनाने के लिए, निष्ठापूर्वक निरन्तर विवेक को जाग्रत रखने का प्रयत्न करना चाहिए. उसके बाद अपने संगठन के आदर्श, उद्देश्य और कार्यपद्धति को ठीक ठीक समझ कर उसमें दक्षता प्राप्त करनी चाहिए. बहुत से संगठन के कार्यकर्ताओं तथा प्रबंधकों में अक्सर इसकी कमी रह जाती है, जिसके फलस्वरूप संगठन की कार्यक्षमता पर आघात पहुँचता है.
इसके अतिरिक्त संगठन के आदर्श और उद्देश्य को समझने में भिन्नता रहने के कारण मतभेद और प्रतिद्वन्दिता इतनी अधिक बढ़ जाती है कि नेतृत्व को लेकर झगड़ा होने लगता है, जिसके फलस्वरूप संगठन में दरार आ जाता है. सत्य एवं ईमानदारी को हर हाल में कस कर पकड़े रहना होगा. कुछ सदस्य, संगठन के स्वार्थ के नाम पर, ईमानदारी का विसर्जन कर देते हैं, या कभी कभी अपनी कमियों को छुपाने के लिए असत्य का सहारा लेने से भी नहीं हिचकिचाते. इस प्रकार के व्यक्ति के हाथ में संगठन के प्रबन्धन का भार रहने से संगठन के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है. 
 स्वामीजी ने कहा था, " महान कार्यों को चालाकी से पूरा नहीं किया जा सकता " ; किन्तु यह जानते हुए भी, कुछ संचालकों में हर काम को चालाकी से पूरा करने की प्रवृत्ति रहती है, और कई बार यह प्रवृत्ति जीवन पर्यन्त बनी रहती  है. उनलोगों की धारणा यह होती है कि संगठन के हित में यदि चालाकी से भी काम लिया जाय तो उसमें क्या गलत है ? किन्तु चालाकी दिखाने में झूठ-कपट का सहारा लेने से कर्मी का अपना चरित्र तो खराब होता ही है, संगठन का आदर्श भी नीचे गिर जाता है.
फिर संगठन में कुछ सदस्य ऐसे भी होते हैं जो कुछ खास सदस्यों को  बिल्कुल भी सहन नहीं कर पाते, वे बिना कुछ सोचे-समझे ही उनके समस्त परामर्शों की उपेक्षा कर देते हैं, या उनकी हर बात का विरोध करते हैं. जिसके फलस्वरूप आपस में अश्रद्धा, विद्वेष और रंज बढ़ने लगता है. जिसके कारण उनके चरित्र और संगठन की शक्ति, दोनों को क्षति पहुँचती है.
इसीलिए नेता (प्रबंधकों ) को गहरी दृष्टि (ज्ञानमयी-दृष्टि) का अधिकारी होना नितान्त प्रयोजनीय है. किसी भी व्यक्ति या घटना को उपरी तौर से देखने पर, सन्गठन के प्रबंधन में व्यावहारिक कुशलता नहीं आ पाती. इसीलिए किसी संस्था के नेता या प्रबंधक को बड़े धैर्य के साथ, हर बात पर गहराई से सोच-विचार कर के ही किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए. प्रबंधक ( या नेता ) को दूसरे सभी सदस्यों के मानसिक-गठन (Psycho मनोरोग या अहंकार की अवस्था) और स्वभाव की जानकारी आवश्यक है.
दक्ष-प्रबन्धन ( व्यव्हार-कुशल नेतृत्व ) प्रदान करने के लिए, किसी भी निर्णय या कार्य का तात्कालिक एवं दीर्घकालिक परिणाम स्पष्ट रूप से जान लेने की क्षमता भी प्रबंधकों (नेताओं ) में रहनी चाहिए. वरना, उसके द्वारा लिए गये किसी निर्णय या कार्य से,  उस संस्था को लाभ होने के बजाये, हानी ही होगी. एक वाक्य में कहें तो, सूक्ष्म बुद्धि रहने पर ही, संगठन की आने वाली दशा और दिशा की स्पष्ट अवधारणा होती है, इसीलिए नेताओं में दूर-दृष्टि, अर्थात भविष्य को भी स्पष्ट रूप से देखने का सामर्थ्य रहना आवश्यक है. इसके लिए  चिन्तन-शक्ति के साथ विवेक का रहना भी अनिवार्य होता है. किसी दक्ष नेता के लिए अपने संगठन को अक्षुण बनाये रखना और संघ की सेवा, ही सबसे महत्वपूर्ण विषय रहना चाहिए. अतः उनको अपना जीवन सुख-भोग में नष्ट नहीं करना चाहिए, उन्हें अपने जीवन का मान क्रमशः बढ़ाते रहने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए,  अपने जीवन को अनादर या लापरवाही की वस्तु नहीं समझनी चाहिए.
किसी संगठन का आदर्श-उद्देश्य अच्छा लगने पर, उसका  सदस्य बन जाना ही यथेष्ट नहीं है. सभी सदस्यों को उस संगठन का पहले एक निष्ठावान कार्यकर्ता बनने की चेष्टा करनी चाहिए, और कालान्तर में उसका प्रबन्धक होने की योग्यता भी अर्जित करना उचित होगा. जो संगठन दीर्घकाल तक कार्य करता है, उसमें नए कार्यकर्ता और नये प्रबन्धक की जरूरत पड़ती ही रहती है. 
किन्तु बहुत लोग ऐसा सोचते हैं कि किसी नये व्यक्ति को प्रबन्धक बना देने से, संगठन का कार्य अच्छी तरह चलने लगेगा. किन्तु यह एक भ्रान्त धारणा है. केवल नया होना ही, योग्यता नहीं है. उसके प्रबन्धन का कौशल देखने के बाद ही उसकी योग्यता का निर्णय हो सकता है. किसी किसी व्यक्ति व्यव्हार-कुशलता जन्मजात तरीके से भी रहती है, या इसको अर्जित भी किया जा सकता है. किसी भी नेता में, कुशल-नेतृत्व के समस्त गुण पहले से ही नहीं रहते. बहुत कुछ बाद में अर्जित करना पड़ता है. 
किसी आदर्श-संगठन के महान उद्देश्य और कार्यपद्धति के विषय में, सभी सदस्यों की अवधारणा प्रारंभ से ही   बिल्कुल स्पष्ट हो, ऐसा नहीं भी हो सकता है.क्योंकि सभी आदर्श-संगठनों के उद्देश्य और कार्यपद्धति में स्वतन्त्रता रहती ही है. बहुत से सदस्य तो दीर्घ काल तक संगठन के साथ संयुक्त रहने पर भी, संस्था के आदर्श-उद्देश्य को स्पष्ट रूप में समझ नहीं पाते हैं. तोते के समान दो-चार वाक्य सुना देना और आदर्श-उद्देश्य को समझ लेना- दोनों में बहुत अन्तर  है. संस्था के उद्देश्य एवं कार्यपद्धति को ठीक-ठीक समझ लेने के लिए, बहुत धैर्य के साथ, निरंतर प्रयास करना पड़ता है. समझ लेने के बाद, उस सदस्य के जीवन, आचरण, निर्णय-क्षमता, व्यव्हार-कुशलता आदि में, एक नया ही रूप झलकने लगता है. किसी महान उद्देश्य वाले संगठन से जुड़ कर, पहले उस संगठन का एक निष्ठावान कार्यकर्ता बन जाना ही, दक्ष-प्रबन्धक बनने का प्रथम सोपान है
नेता में अपने समस्त कार्यों को बिल्कुल नियमानुसार, साफ-सुथरे ढंग से, एकदम पूर्णता के साथ सम्पादित  करने की योग्यता रहनी चाहिए. नेताओं में, अपने सभी प्रकार के सहकर्मियों को, प्रेम के बल पर कार्य में नियोजित करने की क्षमता रहनी चाहिए, तथा हार्दिक सौहार्द के द्वारा, सबों  को अपने साथ में लेकर चलने की सामर्थ्य रहना चाहिए. सभी के व्यक्तिगत विचारों को धैर्य पूर्वक सुनना आना चाहिए, सबों को प्यार से समझा-बुझा कर सही निर्णय लेने की क्षमता भी अर्जित करनी चाहिए. 
जिस निष्ठावान कार्यकर्ता की योग्यताओं के बारे में सभी लोगों को जानकारी हो जाएगी, समय आने पर आवश्यकता के अनुसार सभी उसे अपना नेता मानने लगेंगे. किन्तु किसी महान आदर्श और उद्देश्य वाले संगठन में अपनी तरफ से, नेता बनने का आग्रह किसी भी सदस्य में रहना उचित नहीं है. क्योंकि वैसे संगठनों में स्वार्थ और अहंकार को फलने-फूलने देने से, ऐसी लालसा रखने वाले कायकर्ता के व्यक्ति चरित्र में तो गिरावट आती ही है, संगठन को भी हानी उठानी पड़ती है. हमें यह बात सदैव स्मरण रखना चाहिए कि- ' व्यक्ति बड़ा नहीं होता, संगठन ही बड़ा होता है. ' 
किसी महान उद्देश्य वाले संगठन, के उद्देश्य को सफल बनाने के कार्य में जुट जाना ही बड़े भाग्य की बात है, चाहे वह, साधारण कार्यकर्ता के रूप में हो या नेता के रूप में. क्योंकि इसी प्रकार के कार्य में जुड़े रहने से एक 
" व्यक्ति-चरित्र " का गठन होता है, और जब बहुत से लोग इस प्रकार के निष्ठावान कार्यकर्ता या कुशल- प्रबन्धक ( के रूप में चरित्रवान मनुष्य ) बन जाते हैं, तो उससे देश का सर्वाधिक मंगल होता है.                         =================
२३.
" शिक्षितों का पुनः शिक्षा-प्रारंभ में नवीनीकरण ! "
आजकल के विद्यार्थी गण पत्र-पत्रिकाओं में बहुत कुछ लिखने लगें हैं, अन्य माध्यमों पर भाषण आदि भी दे लेते हैं। वे लोग सोच सकते हैं- हमलोग सही-गलत क्या है, अच्छी तरह से जानते हैं। किन्तु शिक्षा के सम्बन्ध में वे लोग जैसा लिखते या बोलते हैं, यदि वह सब शिक्षा-मंत्री के दृष्टी में आता या कान में सुनाई पड़ता तो वे अपना सिर पीट लिए होते.
 आजकल के पढ़े लिखे लोग भी जो कुछ बोल रहे हैं या कर रहे हैं, (आमिर खान का ' सत्यमेव जयते ' में ३ करोड़ कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध आदि अदि ....) उसको देखने -सुनने के बाद सार रूप में जो समझ में आता है, वह यही कि वर्तमान में जो शिक्षा-व्यवस्था लागू है, उसके माध्यम से वे कुछ भी नहीं सीख पा रहे हैं. निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था में अपने बच्चों को भेजने वाले माता-पिता को मुफ्त में ही, आंत्र दर्द, दांत दर्द, सिर दर्द भी मिल रहा है. वे यदि घर पर हों, तो माँ-बाप त्रस्त, ऑफिस में हैं- तो बड़ाबाबु पस्त, संगठन- समिति में हैं- सबकुछ ध्वस्त. हरकोई यही प्रश्न पूछ रहा है- क्या किया जाय ? क्या करने से इस समस्या का इलाज हो सकता है? 
इन दिनों साहित्य, नाटक, निबन्ध, भाषण आदि में एक नया चलन बहुत ज्यादा दिखाई पड़ रहा है, वह है अपने चारों ओर फैले विभिन्न तरह की घटनाओं को देखकर ये स्वयं तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते है, और बेचारे दर्शकों, पाठकों, या श्रोताओं के समक्ष कठिन कठिन प्रश्नों के पहाड़ खड़ा कर, उन सबका समाधान, उन्हें ही तलाशने का उपदेश देकर- इनके लेखक और वक्तागण स्वयं अंतर्धान हो जाते हैं. क्या हमलोग परीक्षार्थी  हैं, और ये तथाकथित बुद्धिजीवी हमारे प्रश्नकर्ता कोई अधिकारी हैं ?
 हम तो आम आदमी हैं, खुद ही सैंकड़ो समस्यायों के बोझ तले दबे हुए हैं. हमलोग चुप्पी साधकर दिन-रात प्रश्न पर प्रश्न पूछते जा रहे हैं. आपलोग तो समाज के माननीय ज्ञानी-गुनी, पता नहीं कौन कौन से नाम वाले पुरष्कार-प्राप्त, दिमागी आदमी हैं, कहाँ तो आप लोगों को हमें मार्ग दिखलाना चाहिए था; वैसा न करके यदि आप ही लोग, जटिल प्रश्नों से हमारे बोझिल दिमाग पर और अधिक बोझ डाल देंगे, तो हम लोग भला जायेंगे कहाँ ?  

यह जो - " क्या किया जाय ? क्या करने से इस समस्या का इलाज हो सकता है? " का प्रश्न है, उसका एक ही उत्तर है. किन्तु आप सुनकर ही बोल पड़ेंगे, यह संभव नहीं है, यह कोई बात हुई ! बूढ़ा तोता क्या राम-राम सीख सकता है? किन्तु वास्तव में जिस बात की आवश्यकता है, वह है- शिक्षितों का पुनः शिक्षा प्रारंभ में नवीनीकरण ! अर्थात सबकुछ को ही नए सीरे से सीखना होगा, क्योंकि अबतक कुछ सीख ही नहीं सके हैं. 
मेरी बात मान कर कम से कम एक व्यक्ति तो ऐसा मिला है, जिसने पुनः सीखना प्रारम्भ कर दिया है; यह देख कर मैं अब सोचता हूँ कि यही बात यदि और पाँच-दस लोगों से कहूँ तो अच्छा ही रहेगा. वह व्यक्ति शादी-शुदा है, नौकरी भी करता है. परन्तु ऑफिस जाने के बाद, पहले वह हाथ से एक पृष्ठ, सुन्दर अक्षरों में सुलेख-लेखन का अभ्यास करता है, उसके बाद ही अपना काम प्रारम्भ करता है. हाथों की सुंदर लिखावट को देख कर जिसे 
' सूलेखन ' कहा जा सके, वैसी लिखावट तो अब कहीं देखने को भी नहीं मिलती. बहुत से (पढ़े-लिखे ) लोग तो हिन्दी (बंगला या अंग्रेजी ) वर्णमाला के  सभी अक्षरों को सही सही लिख भी नहीं सकते. उनके द्वारा लिखे गये संयुक्ताक्षर तो देखने में भी भयंकर लगते हैं. व्यावसायिक सुविधा की दृष्टि से छपाई के अक्षरों में, क्रमशः बहुत अधिक बदलाव आ चुका है.
प्राचीन समय में बंगला अक्षर की जो शोभा थी, उसको सीखने के अवसर भी बहुत कम हो गये हैं. अब कोई भाषा सीखने पर उतना ध्यान भी नहीं देता.बंगला भाषा के सम्बन्ध में रवीन्द्रनाथ ने अपनी कितनी ही रचनाओं में, विचारणीय तथ्य और भाषा की विकृति को दूर हटाने का उपाय बताये हैं.लेकिन वह सब कौन पढता, विचार करता है ? हमलोगों ने (बंगाल में ) यही सोच लिया है कि, बिना अर्थ समझे - सिर हिला हिला कर  ' रवीन्द्र संगीत ' सुनते रहना ही रवीन्द्रनाथ के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धा है. हममें से बहुत लोग यह बात नहीं जानते कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा लिखित बंगला रचनाओं को पढ़ कर रवीन्द्रनाथ भी दंग रह गये थे. यदि स्वामीजी का भाषा पर अधिकार न रहा होता तो, उनकी रचनाओं से उतनी ओज शक्ति कैसे मिल सकती थी ?
इसीलिए एक बार फिर से गोल-गोल अक्षर में हस्त-लेखन का अभ्यास, वर्ण-परिचय, व्याकरण पर आधारित भाषा सीखने से लेकर सम्पूर्ण शिक्षा को ही प्रारंभ करने की आवश्यकता है. बहुत उम्र बीत जाने के बाद कुछ व्यक्तियों को नई भाषा में निपुणता प्राप्त करते हुए देखा है. फिर क्या नये सीरे से प्रयास करके क्या कोई अपनी मातृभाषा भी अच्छे ढंग से नहीं सीख सकता है ? इसके साथ ही साथ एक बार फिर अच्छी तरह से अंग्रेजी भी सीखना होगा. एक बी.ए. पास व्यक्ति अंग्रेजी लिखने और बोलने में बिल्कुल ही असमर्थ था, मेरे आग्रह पर पुनः अभ्यास करने से उसमें अच्छी उन्नति हुई है. ऐसा सोचना बिल्कुल ठीक नहीं है कि मेरा तो पढाई-लिखाई सब समाप्त हो चूका है, अब क्या पढूंगा ? किन्तु याद रहे कि समय रहते प्रयास नहीं किया, तो मौका आने पर बहुत मिहनत करनी होगी या हाथ मल कर रह जाना होगा.
 सस्ते उपन्यास आदि नहीं पढ़ कर अच्छी लाइब्रेरी से चुन चुन कर अच्छी अच्छी पुस्तकों को पढ़ने की आदत डालनी चाहिए. किसी किसी से स्कुल-कॉलेज की पाठ्य पुस्तकों को मांग कर पढने से भी बहुत कुछ जाना जा सकता है. भूगोल का भी थोड़ा ज्ञान रखना आवश्यक है. कोई पूछे कि होलीउड और होनोलूलू में क्या अन्तर है ? और बी.ए. पास करके इतना भी नहीं बता सके तो कैसा लगेगा ? एकबार एक अफसर ने यह जानना चाह था कि मद्रास मेल से वे हैदराबाद जा सकते हैं या नहीं ? विश्व के इतिहास का थोड़ा परिचय रहना विशेष रूप से आवश्यक है. विश्व के किस देश में अभी कौन सा परिवर्तन हो रहा है, इसे समझना भी जरुरी है. मनुष्य की विचार धारा में क्रमविकास का इतिहास भी पढ़ना चाहिए.
यह जानना भी आवश्यक है कि हमारे देश का ज्ञान विभिन्न देशों में किस प्रकार फैला था ? हमलोगों का दर्शन, भारत के विभिन्न धर्मों की मूल बातें क्या हैं ? धर्म-गुरु कितने हुए हैं, मनीषियों का जीवन और उपदेश से थोड़ा परिचय सभी को रखना चाहिए. विज्ञान में नये नये आविष्कारों की जानकारी विशेष रूप से रखना बहुत आवश्यक है. भारतीय वैज्ञानिक जयन्त विष्णु नार्लीकर जब शिकागो धर्म महासभा की शताब्दी के उपलक्ष्य में भाषण देने गये थे, तो उन्हों ने ऐसा क्यों कहा, कि " वैज्ञानिकों से यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए, कि आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं या नहीं ? " साथ ही साथ यह समझने में भी समर्थ होना चाहिए कि उनहोंने जो कहा था, वह उचित था या नहीं ?   
  इसके साथ साथ,  प्रत्येक व्यक्ति को, सत्य को जानने या आविष्कार करने की अपनी अलग पद्धति रखना चाहिए. दूसरी मुश्किल है, सभी पुस्तकों में सही सही जानकारी नहीं रहती है, इसीलिए किसी योग्य व्यक्ति के पास जाकर उसका मर्म समझने की चेष्टा भी करनी चाहिए. क्योंकि तत्व को समझने के लिए श्रवण करने या पढ़ने के आलावा दूसरा क्या उपाय हो सकता है? सबकुछ को सुनकर सीख पाना संभव नहीं होता, इसीलिए पढ़ना जरुरी है. किन्तु पढ़ने से भी ज्यादा आवश्यक है- पढ़ने की तुलना में उसके विषय-वस्तु के उपर मन ही मन या परस्पर चर्चा एवं चिन्तन मनन करना बहुत आवश्यक है. इसी प्रकार बहुत दिनों तक एक एक विषय के उपर चिन्तन-मनन करने से ही, उसके सम्बन्ध में ठीक ठीक धारणा हो पाती है.
इन सब बातों का ज्ञान रखने के साथ साथ समाज की वस्तुस्थिति को समझना एवं उसमें जो भी अशुभ या हानिकारक प्रतीत होता हो, उसके निवारण के लिए जो करना अनिवार्य लगता हो, उसके विषय में संकल्प लेना तथा उस संकल्प को पूरा करने के लिए समस्त कार्य करते जाना. यह नहीं किये, और केवल कुछ युवाओं को बुला कर स्वामीजी की छवि पर अगरबत्ती दिखा कर थोड़ी देर आँख मूंद कर बैठना और स्वामीजी की किसी पुस्तक एक पृष्ठ हफ्ता में एक दिन पढ़ना और उसपर भाषण देकर अपने को स्वामीजी का भक्त समझना क्या उचित होगा ?
स्वामीजी ने कहा था- " यदि मुझे पुनः नये सीरे से अपनी शिक्षा प्रारम्भ करनी हो, और उसकी पद्धति भी तय करने का अधिकार मेरे पास रहे, तो मैं सबसे पहले मन को एकाग्र करने की विद्या ही सीखूंगा. उसके बाद यथासंभव तथ्यों को एकत्र करने की चेष्टा करूँगा. " (४/१०९) हमलोगों को भी यह समझना चाहिए कि स्वामीजी ने ऐसा क्यों कहा था ?
एकाग्रता के साथ नहीं पढ़ने से विषय को गहराई से समझना मुश्किल हो जाता है, या विश्लेषण और तुलनात्मक अध्यन की सहायता से स्पष्ट धारणा बनाना भी कठिन हो जाता है, पठित विषय और विश्लेषण के परिणाम को स्मरण रखना असम्भव हो जाता है. इसीलिए मनः संयोग का नियमित अभ्यास करना नितान्त आवश्यक है. इसके अलावा सबकुछ का ज्ञान प्राप्त करके भी, अपने जीवन में उसको धारण करने या जीवन-गठन में लापरवाही करने से, श्रीरामकृष्ण ने मनुष्य जीवन के उद्द्देश्य पर बातचीत के क्रम में कहा था- ' राख के उपर घृत की आहुति देने जैसा व्यर्थ होगा. 
 ' इसीलिए हर दृष्टि से देखने पर यह आवश्यक लगता है कि सचमुच " शिक्षितों का पुनः शिक्षा-प्रारंभ में नवीनीकरण ! " होना आवश्यक है. पीछे की तरफ न देख कर, अब से ही अपने जीवन को सन्मार्ग पर चालित रखने के प्रयत्न में जी-जान से जुट जाना होगा, और अपने साथ अन्य लोगों को भी चलाने की क्षमता अर्जित करनी चाहिए.
व्यक्ति-जीवन, पारिवारिक जीवन और संगठन-के जीवन में सर्वत्र यह अमोघ औषधि का कार्य करेगी. जो लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं, कि संघ जितना आगे बढना चाहिए था, उतना नहीं बढ़ पा रहा है, वे लोग यह पाएंगे कि ऐसा करने से संगठन में भी नये जीवन एवं गति का संचार हो रहा है.
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  २४.  
 " पाठ-चक्र (सामूहिक-परिचर्चा) की भूमिका."  
स्वामी विवेकानन्द ने अपनी दिव्य दृष्टि से जिन महान जीवन मूल्यों का साक्षात्कार किया था, उन्हीं महान भावों को यदि हम अपने भीतर भी उद्घाटित करना चाहते हों, तो केवल प्रवचन सुनना या कुछ निबन्ध पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं होगा.जिस बात की सच्ची आवश्यकता है, वह है- स्वयं अपने जीवन को एक जीवन्त एवं अनुकरणीय आदर्श के रूप में गठित करना.
महामण्डल क्या चाहता है ? महामण्डल अपने कर्मियों में यही भाव देखना चाहता है, इसी महाभाव के साथ व्यावहारिक क्रियाशीलता का सामंजस्य भी देखना चाहता है. और भारत की ' शाश्वत अनुसरन-परम्परा ' का तकाजा भी यही है.वे महान जीवन मूल्य क्या हैं? वह है, पौरुष (manliness), निःस्वार्थपरता, आत्मविश्वास और सर्वोपरी है ' मनुष्यत्व ' अर्जित करने का महाभाव !
इन्हीं जीवन-मूल्यों, इसी विचार धारा, स्वामीजी के द्वारा निर्देशित शिक्षा के मौलिक मार्ग आदि को, साधारण जनता के द्वार द्वार तक पहुँचा कर, जगत का, देश का एवं उसके साथ साथ अपना भी, वास्तविक कल्याण निष्पादन कर लेना महामण्डल का उद्देश्य है.
हमलोगों ने यह जो मनुष्य की आकृति प्राप्त की है, जिस मानव-शरीर को धारण करने के कारण ही हमलोगों ने विश्व-रंगमंच पर लीला करने का सामर्थ्य प्राप्त किया है, वह क्या हमें अनायास ही प्राप्त हो गया है? आपात-मधुर, क्षणस्थायी सुख-भोग के नशे में चूर होकर हम यह सोच सकते हैं कि हमने इस भोग-सुख प्रदान करने वाले शरीर को बिना कोई मूल्य चुकाए ही प्राप्त कर लिया है. किन्तु क्या सच्चाई भी यही है ? निश्चय ही इस सर्वोत्कृष्ट शरीर-मन-हृदय को प्राप्त करने के पीछे कोई गूढ़ रहस्य अवश्य छिपा हुआ है। इस रहस्य कि खोज या अनुसन्धान करने से ही (philosophy) या जीवन-दर्शन का उद्भव होता है. प्रत्येक व्यक्ति के पास अपना एक स्पष्ट जीवन-दर्शन रहना अत्यन्त आवश्यक है. ऐसा नहीं करने से, व्यक्ति का जीवन सार्थक नहीं होकर अत्यन्त दुखदायी होने को बाध्य है.

जब कोई मनुष्य अपने इस देव-दुर्लभ शरीर को प्राप्त करके भी, इसके उपयुक्त संगरक्षण, प्रतिपालन और शारीरिक व्यायाम द्वारा उसको सबल और शक्तिशाली बनाने का प्रयास नहीं करता, उस समय क्या वह अपने शरीर के प्रति विश्वासघात नहीं करता ?
उसी तरह ज्ञान-शक्ति रहने पर भी जो अपनी बुद्धि को उचित कार्यों में नहीं लगता, तब क्या उसे बुद्धिमान कहा जा सकता है ? विचार-शक्ति और ईच्छाशक्ति में कैसी अकल्पनीय और अदमनीय क्षमता है, उससे अवगत होकर भी, यदि कोई अपनी विचार-शक्ति और ईच्छाशक्ति का सदुपयोग नहीं करता, तो क्या वह अपने मनुष्यत्व का परिचय देता है ?
 सच्चे हृदय से उत्सर्जित होने वाले प्रेम और सहानुभूति में इतनी प्रचण्ड शक्ति है, जिसके फल स्वरूप जंगल का बाघ भी पालतू पशु बन जाता है, यह जान कर भी कोई मनुष्य यदि अपना प्रेम, अपने हृदय के विस्तार की चेष्टा नहीं करता, तब क्या वह उचित मनुष्योचित कर्म करता है ?
हम सभी लोग अपनी जीवन-यात्रा में, स्वाभाविक रूप से -शैशव, कैशोर, यौवन, प्रौढ़त्व, और वृद्धत्व आदि अवस्थाओं को प्राप्त करते हैं, किन्तु यदि उन सभी अवस्थाओं का समयोचित एवं यथोचित सद्व्यवहार नहीं करते, तो अंत में, जब ' वृद्धत्व ' के बाद, ' मृत्यु ' का सामना होगा, उस समय पाश्चाताप करते हुए सोचने पर बाध्य हो जायेंगे - ' हाय ! मैंने यह क्या किया, क्या-क्या किया, सब कुछ व्यर्थ हो गया- जीवन, यौवन सभी भ्रामक हैं, सब कुछ धोखा है ! ' और अधिकांश मनुष्यों के जीवन-नाटक के खेल का पटाक्षेप इसी भाँति हो जाता है।
पुनः कई लोग ऐसा भी सोचते हैं, कि जब ऐसा शरीर प्राप्त हो गया है तो शारीरिक व्यायाम द्वारा इसका चरम उत्कर्ष प्राप्त करने मिस्टर टाउन या मिस्टर इंडिया बन जाना ही इसका यथार्थ संगरक्षण और प्रतिपालन है.या कोई केवल बुद्धि-वृत्ति को विकसित करने के मार्ग पर चलकर शतरंज में विश्व-विजेता बन जाने का ख्वाब देखने लगता है, या कोई केवल अपने हृदय को विस्तृत करने की साधना में जीवन सफल करने के नशे में चूर रहते हैं.
किन्तु इस प्रकार का कोई भी एक-पक्षीय जीवन-दर्शन, जीवन के पूर्ण आदर्श को प्रतिफलित नहीं
करता है। शिरीर-मन और हृदय तीनो का सुसमन्वित विकास ही हमलोगों का स्वाभाविक जीवन-दर्शन बनाना उचित है. इसका अर्थ यह हुआ कि हमलोग केवल शारीरिक, या मानसिक या आध्यात्मिक अभ्यास में व्यस्त नहीं रहेंगे. अपने शरीर मन और हृदय का सर्वतोमुखी विकास ही हमलोगों के जीवन-दर्शन का दिशा-निर्देश रखना होगा. और यही वह पूर्णांग आदर्श - स्वामी विवेकानन्द जिसके मूर्तमान आदर्श हैं.
 इसीलिए महामण्डल स्वामी विवेकानन्द की विचार-धारा एवं भावादर्श से परिचित होना चाहता है. इसी परिचय को प्राप्त करने का माध्यम है- ' सामूहिक-परिचर्चा ' या साप्ताहिक पाठ-चक्र. पाठ-चक्र का उद्देश्य ही स्वामी विवेकानन्द के जीवन और साहित्य के पाठ-प्रकल्प के मार्ग पर चलते हुए स्वामीजी के स्वच्छ और सुंदर विचारों को व्यक्ति-जीवन में एवं सामाजिक जीवन में रूपायित और प्रतिफलित करना है. ( प्रत्येक पाठ-चक्र का प्राथमिक कर्तव्य होगा- पहले, प्रत्येक सदस्य के शारीरिक व्याम के लिए उपयुक्त व्यवस्था करना. दूसरा, प्रत्येक सदस्य को प्रतिदिन व्यक्तिगत रूप से स्वामीजी की पुस्तकों को पढ़ने के लिए उत्साहित करना; तीसरा, प्रत्येक सदस्य को प्रतिदिन मनः संयोग एवं विवेक-प्रयोग सम्बन्धी आत्मसमीक्षा तालिका में अपना मानांक नियमित रूप से भरने के दृढ़-संकल्प पर अटल रहने के लिए अनुप्रेरित करना, एवं सम्पूर्ण विश्व के प्रति कल्याण-कामना की प्रार्थना करने में उत्साहित करना. )  
 हमलोग यह जानते हैं कि सामान्य तौर से हमलोगों के मन का दो स्तर है- एक को चेतन दुसरे को अवचेतन कहते है. हमलोग प्रतिमुहूर्त जो सोचते हैं, या कल्पना करते हैं, जो कुछ भी कार्य करते हैं या बोलते हैं, वह सब हमारे मन के अवचेतन स्तर पर एक स्थायी और स्पष्ट छाप छोड़ जाता है. इसीलिए हमलोग यदि दीर्घ दिनों तक इसीप्रकार के  उच्च चिन्तन और महाभाव को मन में धारण करके उसमे ही प्रतिष्ठित रहने का दृढ संकल्प कर लें, तब निश्चित रूप से हमारे मन के अवचेतन स्तर पर उसका एक स्थायी और उज्ज्वल छाप अंकित हो जायेगा, एवं जिसके फलस्वरूप जब कभी मन के चेतन स्तर पर कोई मिथ्या प्रलोभन या अकारण भय आएगा, उसके साथ ही साथ अवचेतन स्तर में बैठे वे उच्च और उज्ज्वल संस्कार इस मिथ्या प्रलोभन और भय को धक्का मार कर वहां से निकाल बाहर करेंगे. या हम कह सकते हैं कि इन उच्च विचारों और महाभाव के संस्पर्श में आने से मिथ्या प्रलोभन और भय आ ही नहीं सकेंगे, क्योंकि मन के अवचेतन स्तर में बैठे विचार-धारा और महाभाव ही हमारे व्यवहारिक जगत के वास्तविक नियामक और नियंत्रक हो जायेंगे.
इसी प्रकार से महामण्डल के चरित्र-निर्माण आन्दोलन का चरम लक्ष्य है- जगत का सामग्रिक और यथार्थ मंगल साधित करना. हो सकता है कुछ लोग यह प्रश्न उठायें कि जब आपलोग भी सम्पूर्ण जगत का ही मंगल करना चाहते हैं, तो फिर क्यों आपलोग पहले अपना चरित्र निर्माण करने के कार्य में व्यस्त रहते हैं? यहाँ क्या आपलोगों को स्वार्थी नहीं कहना चाहिए ? यह क्या एकपक्षीय विचार नहीं है?
सतही दृष्टि से देखने पर किसी को ऐसा महसूस हो सकता है कि हमारा कार्य स्वार्थपूर्ण या एकपक्षीय है, किन्तु गहराई से विचार करने पर इस बात को समझ लेने में कोई विशेष दिक्कत नहीं होगी कि अपने को समर्थ और योग्य बनाये बिना जगत का यथार्थ मंगल साधक कोई बन ही नहीं सकता. क्योंकि जो स्वयं ही पंगु और लाचार होगा, जो अक्षम और असमर्थ होगा, वह चाहे जिस मार्ग से भी देश का मंगल करने की बात क्यों न सोचे, वह मार्ग ही क्रमशः और अधिक जटिल और अंधकार पूर्ण हो जायेगा. उससे जगत का मंगल न होकर अमंगल की छाया ही बढती जाएगी.  
इसीलिए सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में प्राथमिक अनिवार्यता है- स्वयं को सामर्थ्यवान मनुष्य के रूप में गढ़ लेना. और इसके लिए चाहिए वही उच्च महाभाव, उच्च विचारों का  तीव्र अनुशीलन, तीक्ष्ण अनुधावन, और अनुक्ष्ण अनुध्यान. महामण्डल निर्दिष्ट पाठ-चक्र का उद्देश्य है, उन्ही समस्त उच्च महाभावों एवं विचारों का यथार्थ अनुशीलन, अनुधावन और अनुध्यान में प्रत्येक सदस्य को उद्बुद्ध बना देना.                     
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२५. 
पाठचक्र क्यों जाएँ? 
महामण्डल की भावधारा को ठीक से जानना,तथा स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को सही रूप में समझना - ही पाठ-चक्र का उद्देश्य है. क्योंकि इन्हें समझ कर अपने जीवन में इनका अभ्यास करने से, जीवन सुंदर रूप से गठित हो जाता है. किसी पाठ-चक्र का यदि मुल्यांकन करना हो, तो उसका सबसे अच्छा तरीका है, यह देखना- कि उसके सदस्य, ' महामण्डल-पाठचक्र ' की  भावधारा (स्वामीजी कि शिक्षाओं) को ठीक से समझ पाये हैं या नहीं ?  यदि समझे हैं तो उनके जीवन में कुछ परिवर्तन आ रहा है या नहीं ? क्योंकि इन भावों को समझ लेने से जीवन सुंदर ढंग से गठित हो जायेगा. 
किसी का जीवन अच्छा बन सका है या नहीं, यदि इसका पता लगाना हो, तो इसका सबसे सरल उपाय है, यह देखना कि वह व्यक्ति अन्य लोगों के जीवन के साथ अधिकाधिक युक्त होता जा रहा है, या नहीं ? यदि किसी व्यक्ति का अपना जीवन तो बहुत अच्छा है, किन्तु यदि वह अन्य (पराये ) लोगो के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध नहीं रख पाता तो, उसके जीवन को बहुत अच्छा कैसे कहा जा सकता है? ठाकुर, माँ, स्वामीजी के जीवन को देखने से पता चलता है कि, उनका जीवन मानों हर किसी के जीवन के साथ जुड़ा हुआ था. वे तुरन्त अन्य लोगों के जीवन के दुःख और आनन्द में साझी हो जाया करते थे.
हमलोग यह विश्वास करते हैं कि, ठाकुर-माँ स्वयं भगवान और भगवती हैं, एवं स्वामीजी उनकी सन्तान हैं, तथा उनसे अभिन्न हैं. तब इनको भला किस बात का दुःख हो सकता था ? किन्तु वे लोग भी दूसरों के दुःख को देख कर दुखी हो जाते थे. जैसे, कोई व्यक्ति दावा करे कि वे, जीवन में बहुत बड़े है, किन्तु वे कभी किसी के साथ भेंट-मुलाकात नहीं करें, बहुत हुआ तो कभी-कभार केवल दर्शन दे दिया करें- तो इसको क्या बड़े आदमी होने का लक्षण कहा जा सकता है? इनसे अच्छे तो वे हैं जो स्वयं अच्छे होने पर भी, सभी तरह के लोगों के साथ मेल-जोल रखते हैं, सबों के साथ विचारों का आदान प्रदान करते हैं. वे जात-धर्म का भेद-भाव किये बिना सबों के जीवन के साथ अपने जीवन को जोड़ लेते हैं.
एक बार मैक्स मूलर के साथ प्रतापचन्द्र मजुमदार की मुलाकात होने पर, बातचीत के क्रम में उनसे जानना चाहे कि श्रीरामकृष्ण देव कैसे व्यक्ति हैं, उनका स्वभाव आदि कैसा है? किन्तु प्रताप मजुमदार महाशय ने ऐसा जताने की चेष्टा की जैसे वे रामकृष्ण देव के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं रखते. प्रश्न सुन कर बोले, मैं आजकल उनके साथ अधिक मेल-जोल नहीं रख पाता हूँ, क्योंकि आजकल वे बहुत नीच और गन्दे लोगों से, अपवित्र लोगों से भेंट-मुलाकात करते हैं, उनके साथ भी बात-चीत करते रहते हैं. उन्होंने सोचा, शायद यह बात सुनकर मैक्स मूलर का मन उनसे उचट जायेगा. 
किन्तु यह सुनते ही मैक्स मूलर उठ कर खड़े हो गये और उनके प्रति आदर का भाव दिखाते हुए बोले- ' आहा !  यदि यह बात नहीं सुन पाता, तो मैं कैसे आश्वस्त हो पाता हो कि, सचमुच श्रीरामकृष्ण देव एक ' मुक्तिदाता ' हैं, पतितों का भी उद्धार करते हैं !'
कोई मनुष्य, सच्चा मनुष्य या ' सत-पुरुष ' बन चुका है या नहीं, इसकी सबसे बड़ी पहचान यही है कि, वह दूसरों की उन्नति के लिए, पराये लोगों के कल्याण के लिए, उनके साथ कितना अधिक भेंट-मुलाकात करता है. क्योंकि, व्यक्तिगत उन्नति होते ही, सबसे पहले अन्य सभी का विचार मन में उठेगा. क्योंकि, स्वयं अच्छा ( निरोग या देहाध्यास से मुक्त ) होते ही; उसका लक्ष्य हो जायेगा, क्या करने से दूसरों का भी कल्याण हो सकता है ? ' सभी लोग रोग-मुक्त हों, सभी सुखी हों ' - यही उसकी स्वाभाविक प्रार्थना बन जाएगी ! स्वामी विवेकानन्द के ऐसे ही सर्वोच्च अभिलाषा में नीहित है, महामण्डल के आदर्श वाक्य,' Be and Make ' का उद्गम " स्वयं अच्छा (रोगमुक्त) मनुष्य बनो, और दूसरों को भी अच्छा (रोगमुक्त) मनुष्य बनाओ !" 
  स्वयं अच्छा हो जाने (भीषण भव-रोग से मुक्त हो जाने ) के बाद यदि कोई दूसरों को भी (देहाध्यास के भीषण रोग से रोगमुक्त करने ) अच्छा बनाने का प्रयास नहीं करता, तो उसके अच्छे होने का कोई मतलब नहीं निकलता. पवित्रता, चरित्र, अच्छा होना, धर्म-जीवन, आनन्द या विद्या बाँटने से कभी घटता नहीं है, जितना बाँटेंगे उतना ही बढ़ेगा. विद्या में सहभागी हुए लोग (शिष्य हों या चोर-मित्र ), कभी उसको विभाजित नहीं कर सकते. इसी बात को भवभूति ने बड़े ही सुंदर ढंग से कहा है-
ज्ञातिभिर्वन्टयतेनैव चौरानापि, न नीयते |
दानेनापि क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् | |   
सांसारिक वस्तुओं के साथ धर्म या विद्या या एक ' 3H ' के सुसमन्वित गठित जीवन में यही अन्तर है. बहुत देने से भी, मेरे अच्छा होने ( या नाम-रूप की उपाधि से मुक्त रहने) में कोई कमी नहीं आती. इनका किसी के साथ विरोध नहीं है. स्वयं अच्छा होने के साथ, दूसरों को अच्छा करने में कोई प्रतिद्वंद्विता या संघर्ष नहीं है. कोई ऐसा नहीं कह सकता कि, मैं दूसरों को अच्छा बनाने में लगा हुआ था, इसीलिए मैं स्वयं अच्छा मनुष्य न बन सका. यदि मैं सचमुच अच्छा हो गया हूँ (या देहाध्यास के रोग से मुक्त हो चुका हूँ ), तो दूसरों को अच्छा करने से, मैं खुद को रोक ही नहीं सकता. क्योंकि मैं जब तक दूसरों को अच्छा (रोगमुक्त ) नहीं कर पा रहा हूँ, तब तक मेरा अच्छा होना ( पूर्ण रोग-मुक्त होना) परिपक्व नहीं हुआ है. 
इस प्रकार ( स्थायी तौर पर ) अच्छा हो जाने (देहाध्यास से छूट जाने ) के लिए, हमलोगों को निरन्तर प्रयत्न करना ( ' विवेक-प्रयोग ' करते रहना ) होगा. और इसी प्रयत्न में लगे रहने के लिए, पाठ-चक्र के माध्यम से उद्द्य्म के उत्साह को बार बार सचेत करते रहना होगा. पाठ-चक्र का यह उद्देश्य सदा याद रहने से, फिर हमलोगों का महामण्डल जाना, या प्रत्येक रविवार को पाठ-चक्र में भाग लेना- लोक-लाज से बाध्य होकर किसी धर्म-भीरु के प्रत्येक रविवार को, खानापूर्ति के लिए चर्च जाने जैसा नहीं होगा. 
पाठ-चक्र को विद्या-बुद्धि की रण-भूमि में परिणत कर देने की मनोवृत्ति भी नहीं उठनी चाहिये. जिनका महामण्डल जाने का उद्देश्य - पाठ-चक्र को विद्या बुद्धि के रणक्षेत्र में परिणत कर देना हो, वे किसी ' वाद-विवाद सभा ' में जा सकते हैं. किन्तु जो पाठ-चक्र से जीवन का सच्चा उद्देश्य पाना चाहता है, उनको पाठ-चक्र 
को ' वादविवाद -सभा ' में परिणत करके, दूसरों को उससे वंचित करने की स्वाधीनता लेना उचित नहीं है.  बहुत से सदस्यों में अपनी पूर्वाग्रह से ग्रस्त धारणाओं को स्थापित करने के उद्देश्य से बोलते रहने,या पूर्व पठित विषयों की व्याख्या करते रहने की एक प्रवणता रहती है, जो कई बार खतरनाक बन जाती है. वैसा न कर, सही दृष्टिकोण से, युक्ति-तर्क के आधार पर पठित विषय के समबन्ध में, सच्ची धारणा के निर्माण का आग्रह होना चाहिए.
यह स्मरण रखना चाहिए कि, विभिन्न सदस्य, विभिन्न परिवेश में पले-बढ़े होने के कारण कई विषयों के बारे में, पहले से ही अपने मन कुछ भ्रांत धारणाएँ बनाये रख सकते हैं; या किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो सकते हैं. किन्तु यदि, पाठ-चक्र में भी उन्हीं सब बिन्दुओं को पकड़े रहने की चेष्टा करते रहेंगे, तो हमलोग स्वयं अपने विकास के मार्ग में बाधाएँ खड़ी कर लेंगे. 
जो लोग पाठ-चक्र का संचालन करेंगे, उनको स्वाभाविक रूप से दुसरे सदस्यों से अधिक पढ़ना होगा, और उसमें नीहित सच्चे भाव या गूढ़ार्थ को समझने में सक्षम भी होना होगा. इसके साथ साथ अपने जीवन में इन भावों को प्रयोग करने का अनुभव भी अत्यन्त मूल्यवान है. किन्तु सभी सदस्यों में खुद को एक विद्यार्थी ही समझने का मनोभाव, यदि सदैव बना रहे, (गुरु-भाव द्वितीय न चला आये) तो इससे सबों को लाभ होता है. हमारे लिये पाठ-चक्र में शामिल होने का उद्देश्य रहना चाहिए, स्वयं जानने के लिए पढना और उस विषय पर चर्चा करना. क्योंकि जब महान जीवन-मूल्यों को हम जान लेंगे, और उन्हें अपने जीवन में धारण करने का अभ्यास करेंगे तभी हमारा जीवन अच्छा और उदाहरण स्वरूप बन पायेगा- और अन्त में पाठ-चक्र की सफलता का पैमाना भी यही होगा.
इस बात को यदि मन में ठीक से बैठाया नहीं जाय, तो जीवन-मूल्यों पर चर्चा करना केवल एक ' पाण्डुलिपि में संचित ' विद्या बन कर रह जाएगी. जिसका बहुत ज्यादा मूल्य नहीं होता. इसीलिए परामर्श दिया जाता है कि, मोटी मोटी पुस्तकें या कठिन ' तात्विक-शास्त्रार्थ ' करने की अपेक्षा, स्वामीजी के सहज सरल संकलन, छोटी छोटी महामण्डल-पुस्तिकाओं के उपर अधिक जोर देना उचित है. ऐसा करने से, जीवन गठन के
 विचार,समाज-सेवा का सच्चा रहस्य, इस कार्य से हृदय के विस्तार का उपाय, तथा समस्त कार्यों का उद्देश्य और उपाय स्पष्ट हो उठेगा, जो अपने व्यावहारिक जीवन में काम आएगा. 
इन सहज विचारों को समझने के लिए, महामण्डल की पुस्तिकाओं के साथ साथ ' विवेक -अंजन ' (Vivek -Jivan  ) के नये और पुराने सभी अंकों से बीच-बीच में चर्चा करना अच्छा होगा. विशेष तौर से स्वामी विवेकानन्द की जीवनी और सम्भव होने से, श्रीरामकृष्ण देव एवं उनके संतानों की जीवनी का पठन-पाठन भी इस विषय में अत्यन्त प्रयोजनीय है.किन्तु महान जीवन मूल्यों को, जीवन में धारण कर लेना ही मूल बात है.  इसलिए पढ़ते समय, या विभिन्न विषयों पर चर्चा करते समय, यह बात स्वयं को याद दिलाते रहना चाहिये कि ये बातें केवल दूसरों को सुनाने के लिये नहीं हैं- मुझे स्वयं इन्हें अपने जीवन में उतारना भी है, नहीं तो हमारा ज्ञान भी ' पंचांग में लिखे ज्ञान- जैसा ' हो जायेगा; जैसे पंचांग में लिखा होता है ' इस साल अच्छी बारिश होगी ' किन्तु पंचांग को निचोड़ने से तो एक बूंद पानी भी नहीं निकलता. महान जीवन मूल्यों को जीवन में    उतार कर, एक सुंदर जीवन गठित कर लेना ही मूल बात है. 
" पाठ-चक्र में होने वाली चर्चाओं से, मैं अपने जीवन-गठन के उपादानों को प्राप्त करूँगा  और अपने जीवन को सुन्दर ढंग से गढ़ लूँगा " - ऐसी उत्कण्ठा, यदि महामण्डल के सभी भाइयों में एक जैसी हो तो, पाठ-चक्र प्राण-वन्त हो उठेगा. किन्तु यह मनोभाव किसी के भीतर बहार से भरना कठिन है. यह विचार स्वयं के भीतर ही उठना चाहिए. किन्तु यह विचार सबों के मन में जाग उठे, इसके लिए सबों को उत्साहित करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए. मूल उद्देश्य - " Be and  Make  " सदैव याद रहने से, महामण्डल का कोई भी कार्य प्राणहीन नहीं हो सकता. क्योंकि (जड़-पिण्डों में भी ) प्राण ' फूंक ' देना  महामण्डल का कार्य है. उसके लिए कई उपाय हो सकते हैं- जिनमें पाठ-चक्र भी एक है.                      
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२६. 
सावधानी  की आवश्यकता 
समाज में वास करने से समाज के संबन्ध में सोचना ही पड़ता है. क्योंकि समाज के बिना किसी भी व्यक्ति का जीवन स्वस्थ ( निरोग ) एवं  परोपकारी बन कर अपने सच्चे स्वरूप में  प्रस्फुटित नहीं हो सकता. इसीलिए समाज में रहने वाले व्यक्ति को समाज को स्वस्थ बनाने की चिन्ता करनी ही पड़ती है. आज केवल भारत ही नहीं, पृथ्वी के किसी देश का मानव -समाज स्वस्थ है- इस बात को, कोई भी व्यक्ति, पूरे साहस के साथ नहीं कह सकता.
सोभियत युग के एस्टोनिया प्रान्त में २० वर्ष की लड़की प्रातः काल प्रार्थना करते समय, रवीन्द्रनाथ टैगोर लिखित कविता पढ़ा करती थी, बाद में उसने रवीन्द्र-काव्य का अनुवाद भी किया था. या हाल में ही न्यूयार्क में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया कि- " पृथ्वी के समस्त धर्म समान रूप से गौरवशाली हैं "; इस प्रकार के समाचारों को पढ़ने से आनन्द मिलता है, किन्तु ऐसी घटनाएँ समाचार-पत्रों की सुर्खियाँ भी इसी लिए बन पाती हैं, कि मनुष्य के समाज की अवस्था इस समय अत्यन्त दुःखदायक है.
पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं भी सभ्यता का उन्मेष होने के बहुत पहले ही, जिस भारत में धर्म और दर्शन अपनी उचाईयों के शिखर पर थे, उसी भारत में आज के समाज की कैसी दशा है ! ऐसा प्रतीत होता है, मानों धर्मान्धता आज भी मध्ययुग के अंधेरों से बाहर नहीं निकल पाई है, विभिन्न धर्मों के बीच आक्रामक प्रवृत्ति, स्त्रियों के साथ अभद्रता, हत्या की तांडव लीला, पशुओं के प्राण रक्षा के लिए प्रचण्ड उत्तेजना के साथ साथ नृशंस नरहत्या का उल्लास, अनैतिकता की नग्न विभत्सता, आज का समाज भूलुंठित जीवन-मूल्यों के साथ स्वार्थपरता, हृदयहीनता, लोभ, मद, मात्सर्य आदि का क्रीड़ान्गन बन चुका है. 
समाज में जब अधोगति दिखने लगती है, जिस समय प्रचलित धर्म-आचरण, समाज-जीवन को धारण करने की क्षमता खो देता है, उस दशा में, महान पुरुषों के आविर्भाव एवं शिक्षा के प्रभाव से समाज में पुनः परिवर्तन की एक लहर चल पड़ती है. किन्तु विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उत्कर्ष के साथ संचार-माध्यम की भी उन्नति होती है, जिसके फलस्वरूप एक-दूसरे से अधिक धन-सम्पदा एकत्र करने की होड़ में,भौतिक सुखों को भोगने की आकांक्षा का असंयमित विस्तार होने के परिप्रेक्ष्य में, मानव-सत्ता और मनुष्य जीवन की सम्भावना एवं उद्देश्य क्रमशः उपेक्षित करते-करते मनुष्य अपने मन की शक्तियों को बिल्कुल ही खो देता है. 
चाहे जितनी भी बुद्धि-चातुर्य या वाक़-चातुर्य के मुलम्मे से लपेट कर, छुपाने की चेष्टा क्यों न की जाये, यह बात तो तय है की, आज कल राजनीति एवं अर्थनीति जनसाधारण के हित को ध्यान में रख कर नहीं, समुदाय-विशेष या व्यक्तिगत स्वार्थ को पूरा करने के लिए ही की जाती है. इसके फलस्वरूप मनुष्य के सच्चे कल्याण के लिए महापुरुषों ने जितने उपदेश दिये हैं, उनको भी अब मनुष्य पहनने के वस्त्र जैसा गाहे बगाहे पहन लेने में अभ्यस्त हो गया है; किसी विशेष अवसर पर, या भाषण देते समय  बीच बीच में उन्हें कोट करने के लिए निकाल लेता है, ताकि दुसरे लोग उसको ज्ञानी समझें. अभी किसी भी महापुरुष के आविर्भाव से इसका परिवर्तन सम्भव नहीं है.
इस दशा में क्या किया जाय? इस देश में कल्याणकारी उपदेश हजारों वर्षों से गाये जाते रहे हैं, जिनको उंच-नीच का भेद किये बिना सभी मनुष्यों के बीच वितरित करने का आदेश वेदों ने दिया है, वे उपदेश  समय के प्रवाह में नष्टप्राय हो गये थे; स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में- ' उन्ही वेदोक्त उपदेशों को; अपने जीवन-ज्योति से स्मुद्भासित कर के श्रीरामकृष्ण ने सभी वर्ग के लोगों में सरल वचनामृत के रूप में वितरण किया था.' एवं श्रीरामकृष्ण के उस मृदु-ध्वनि को, उन्हीं की कृपा से, विवेकानन्द ने अत्यंत उत्कट शंखनाद बना कर सम्पूर्ण जगत में गूंजायमान कर दिया था. अब हमलोगों को उन्हीं उपदेशों का श्रवण करके अपने हृदय में धारण करना होगा, अर्थात हमलोगों को मनुष्य बनना होगा- सच्चा मनुष्य ! ' भोग ' नहीं ' त्याग ' के मन्त्र में दीक्षित होना होगा. ' काम ' की सेवा न करके, ' निष्काम ' होने का प्रयत्न करना होगा.
स्वर्ग के सिंहासन पर बिराजमान किसी ईश्वर या उसके किसी दूत से कृपा की भिक्षा मांगने से कुछ नहीं होगा; या किसी निराकार सत्ता के आगे घुटने टेकने, अथवा ' अव्यक्त-ब्रह्म का ज्ञान हो जाने ' - मात्र से भी कोई व्यक्ति सच्चा मनुष्य नहीं हो जायेगा. हमलोगों को यह भी समझना पड़ेगा कि, ' वे '  (अव्यक्त ब्रह्म,  अल्ला या श्रीरामकृष्ण देव) ही - ' यह ' व्यक्त जगत बन गये हैं. आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, पेंड-पौधे, पशु-पक्षी, मनुष्य सब कुछ वे ही बने हैं. केवल ईश्वर-लीला ही नहीं, अवतार-लीला ही नहीं, अब हमें उन्हीं को नर-लीला करते देखने में भी सक्षम होना होगा. ईश्वर (ब्रह्म) से अवतार(ठाकुर-माँ स्वामीजी) बन कर लीला करते हुए ही नहीं; सामान्य नर-रूप में भी उनको (ठाकुर को) ही लीला करते देखना (सीखना) होगा. 
' পঞ্চভুতের ফাঁদে ব্রহ্ম পড়ে কাঁদছে ' 
ठाकुरदेव के कथनानुसार ' पाँच भूतों के फन्दे में गिर कर (सामान्य नर-नारी को नहीं,) ब्रह्म को ही रोते देख कर, रोना सीखना होगा. ऐसा मनुष्य बन जाना ही, सच्चा ' मनुष्य ' बनना है. सत्यवादी बनना होगा, सरल बनना होगा, निरहंकारी बन जाना होगा. अहंकार ही मनुष्य को छोटा बना देता है. किसी कानूनविद ने एक पुस्तक लिखी है, उसका विषय है-' जितना बड़ा अहंकार, उतना ही छोटा मनुष्य '. जो व्यक्ति जितना बड़ा बनता जाता है, उसका अहंकार उतना ही कम होता जाता है.
  बड़ा होना, किसे कहते हैं ? इस विषय पर श्रीरामकृष्ण कहते हैं- " कोई कोई व्यक्ति ज्ञान पर शास्त्रार्थ कर सकते हैं, इसीलिए सोचते हैं- पता नहीं मैं कितना महान हूँ ! हो सकता है, थोड़ा सा वेदान्त पढ़ लिया है, या किसी ने गीता के श्लोकों को रट कर उधृत करना सीख लिया है- अपने इसी ज्ञान पर वे फूला नहीं समाते. किन्तु सच्चा ज्ञान होने पर, अहंकार नहीं होता...मनुष्य उसके साथ अभिन्न हो जाता है, वैसा हो जाने (आत्मसाक्षात्कार हो जाने) के बाद फिर ' अहंकार ' नहीं रह जाता." इसको कहा जाता है- बड़ा होना. 
इस प्रकार बड़ा (बृहत) बन जाना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है, ऐसा बड़ा बनना, ' मनुष्य ' बन जाने की सम्भावना सबों के भीतर है. त्यागी हुआ जा सकता है, निष्काम हुआ जा सकता है,
(नारायण को ही) नरलीला करते देखा जा सकता है, ब्रह्म को रोता हुआ देख कर रोया जा सकता है. सत्य को पकड़े रहा जा सकता है, सरल बना जा सकता है, निरहंकार हुआ जा सकता है, छोटा आदमी न रह कर बड़ा (सच्चा) मनुष्य बना जा सकता है. ऐसा मनुष्य बना जा सकता है,जहाँ मनुष्य और ईश्वर का भेद भी समाप्त हो जाता है.श्रीरामकृष्ण ने अपने जीवन से ऐसा मनुष्य बन कर दिखा दिया है, स्वामी विवेकानन्द ने हम सभी लोगों को ऐसा ही मनुष्य बन जाने के लिए प्रयत्नशील रहने को अनुप्रेरित करना चाहा था.
इस युग में संघ ही शक्ति है. इसीलिए वर्तमान सामाजिक परिवेश में संघबद्ध होकर, यही कार्य करना (अर्थात मनुष्य बनना और बनाना ) आवश्यक है; इससे भिन्न समस्त चेष्टाएँ निष्प्रभावी हुई हैं, तथा आगे भी होती रहेंगी. क्योंकि, ' मनुष्य ' कहलाने योग्य, सच्चे मनुष्य कहाँ हैं ? बिना स्वयं मनुष्य बने, कोई संघ बना भी ले, तो वह संघ भी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता. उस संघ में, स्वार्थ, अभिमान, अधिक नाम-यश,अहंकार इत्यादि को लेकर झगड़े होते रहेंगे. संघ का आदर्श-उद्देश्य केवल दूसरों को सुनाने भर के लिए होगा, उनको कार्य में परिणत नहीं किया जा सकेगा. इसलिए (आत्मसमीक्षा तालिका को भरते समय ) सावधान रहने की आवश्यकता है, यह बात सदैव याद रखना अच्छा है, सभी तरह की ओछेपन को दफन करके बड़ा होने का प्रयत्न करते रहना अच्छा है.  
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२७. 
सावधानी की बात 
इसके पहले वाले लेख में सावधानी रखने की आवश्यकता के उपर चर्चा हो रही थी. लगता है इस चर्चा को और आगे बढ़ाना अच्छा होगा. एक प्रचलित कहावत है- ' सावधानी हटी, दुर्घटना घटी '. कोई बच्चा जब चलना सीखता है, तो पहले सावधान होना सीखता है, उसके बाद ही चलना सीखता है. उसी तरह जीवन के पथ पर यात्रा प्रारम्भ करने के पहले, सावधान रहना सीखने की आवश्यकता है. यदि सावधानी से यात्रा करना नहीं सीखते, तो कभी इतने जोर से गिर सकते हैं, कि फिर से उठकर चलने लायक भी नहीं रह जायेंगे. रोग हो जाने के बाद, तंदरुस्त हो जाने की चेष्टा तो सभी लोगों को करनी पड़ती है . किन्तु जिससे रोग हो ही न सके, लिहाजा सावधान रहना क्या बुद्धिमानी का कार्य नहीं है ? 
हमलोगों ने पहले यह समझ लिया है कि संघबद्ध हो कर - ' मनुष्य बनने और बनाने ' के लिये प्रयासरत रहना कितना आवश्यक है. किन्तु संघबद्ध रहने एवं संघबद्ध हो कर कार्य करने के लिये, किस हद तक सावधान  रहने की आवश्यकता होती है; इस विषय पर बहुत गहराई से विचार करना उचित है. स्वामी विवेकानन्द ने हमलोगों में विद्यमान एक विशेष गुण का आभाव या एक दोष को बहुत जोर देकर दिखलाया है. वह है, हमलोगों में संघबद्ध होकर कार्य करने की क्षमता का अभाव.
हमलोग अक्सर ऐसा सुना करते हैं कि स्वामीजी ने पाश्चात्य देशों में इस संघशक्ति का प्रयोग करने की परिपाटी को देखने के बाद ही भारत में एक संघ बनाने का निश्चय किया था. किन्तु हमलोगों के देश में भी व्यासदेव ने संघशक्ति की बात कही थी. उनके भी बहुत पहले, ऋगवेद एवं अथर्ववेद में भी इस संघशक्ति का गुणगान किया गया है. महामण्डल-गान में हमलोग भी गाते हैं- ' एक पथ पर चलेंगे, एक बात बोलेंगे, हमसब के मन को एक भाव से गढ़ेंगे '; किन्तु कार्य करते समय, क्या यह विचार सदैव याद रह पाता है ? समवेत संगीत गाते समय, अलग अलग व्यक्ति, यदि अलग अलग सुर में गायें, तो क्या उसे संगीत कहना उचित होगा ? इसीलिए सबों को एक साथ सुर में सुर मिलाकर गाने की चेष्टा करनी चाहिए. 
यदि हमलोग स्वयं मनुष्य बनने की चेष्टा न करें, अभी हमलोग जैसे हैं, उससे और अधिक अच्छा बनने का प्रयास करना छोड़ दें, यदि ऐसा भ्रम हो जाये कि, जैसा बनना चाहिए था, वैसा तो बन ही गया हूँ, तब यह कहा जा सकता है, कि यह कार्य जिस भाँति करने की आवश्यकता है, उस प्रकार नहीं कर पायेंगे. महामण्डल के प्रथम अध्यक्ष द्वारा महामण्डल के वार्षिक शिविर में कही गयी यह उक्ति प्रायः याद आती है- " जब किसी को ऐसा प्रतीत होने लगे, कि जो कुछ मुझे सीखना चाहिए था, वह सब मैंने सिख लिया है, अब मेरे लिये और कुछ सीखना बाकि नहीं है- तो समझ लेना होगा कि वह जीवित नहीं है- मर चुका है ! " यह उक्ति क्या श्रीरामकृष्ण के उपदेश ' যাবত বাঁচি তাবত শিখি ' अर्थात ' जब तक अंतिम साँस बाकी है, तब तक एक विद्यार्थी जैसा सीखने का मनोभाव बना रहना चाहिए ' की याद नहीं दिलाती है ? 
बहुत बार हमलोगों को लगने लगता है कि, हमलोग पर्याप्त लिख-पढ़ गये हैं, ठाकुर-स्वामीजी के सम्बन्ध में बहुत पढ़ लिये हैं, संघ में बहुत वर्षों से कार्य कर रहे हैं, दूसरों को कितना सिखा दिया हूँ, तो अब हमलोगों के सीखने लायक क्या बचा है ? ऐसा मनोभाव दूर न हुआ, यह बहुत बड़ी गलती होगी, जिससे अपनी हानी तो होगी ही,  संघ की भी बहुत बड़ी क्षति होगी. बहुत बार मेरे मन में ऐसा विचार उठता है कि, स्वामीजी से तो कई बातों को सीखा जा सकता है, किन्तु यदि उनसे कोई एक ही बात सीखनी हो, जिसको सीख लेने से बहुत कुछ सीखा जा सकता हो, तो क्या सीखना चाहिए ? वह है- ' यह सीखना कि, सीखा कैसे जाता है ? ' केवल यही ' सीखने का टेक्निक ' सीख गए, तो अपने-आप बहुत कुछ सीखा जा सकता है. 
सभी लोगों में कुछ न कुछ दोष रहता ही है. यदि कोई किसी दोष को दिखला दे, तो उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए. किन्तु अक्सर हमलोग उसके प्रति कृतज्ञ तो नहीं ही होते हैं, उल्टे उसीपर क्रोध करके यह समझाने लगते हैं कि मुझमें वैसा कोई दोष नहीं है. इसका कारण यही है कि हमलोग जैसे हैं, उससे और अधिक उन्नत होने की आवश्यकता का अनुभव नहीं करते हैं. किन्तु शांत दिमाग से, अपने भीतर जो दोष हैं, उनको खोजने की चेष्टा करें, तथा सवाधानी के साथ धीरे धीरे उनको दूर करने की चेष्टा करें, तो अभी हमलोग जैसे हैं, उससे अधिक अच्छे बन सकते हैं. हमलोग जितना अधिक सरल और अच्छा बनते जायेंगे, तो देखेंगे कि हमारे जीवन में शांति और आनन्द, उसी अनुपात में बढ़ रहा है. हमलोग और अधिक कार्य करने में सक्षम हुए हैं, तथा हमलोगों के जीवन और कार्य से संगठन भी और अधिक शक्तिशाली हो रहा है.
उसी प्रकार हमलोगों में से कईयों के पास अनेकों गुण भी रहते हैं. उन्हें जान कर, उन्हें और अधिक बढ़ाने का प्रयत्न करते रहना चाहिए. उन गुणों पर आत्मप्रशंसा करने में शक्ति का अपव्यय न कर, ऐसा सोच कर कि उतने ही गुण पर्याप्त नहीं हैं, उन गुणों को और अधिक बढ़ाने का प्रयास करने से, अपना और संघ का लाभ होगा. यदि ऐसा महसूस हो कि कोई खास गुण रहने से, अच्छा होता किन्तु वह गुण मुझमें नहीं है, तो वैसे गुणों को अर्जित करने की चेष्टा की जा सकती है. और प्रयत्न करने से, क्या नहीं हो सकता है ?
अन्य बहुत सी बातों के विषय में सावधानी बरती जा सकती है. यह विचार करना होगा कि केवल काम के नशे में कार्य कर रहा हूँ, या संघ के उद्देश्य को  कार्यरूप देने के लिये कार्य कर रहा हूँ. केवल इतना से ही नहीं होगा. इस कार्य को करने से, मुझे कुछ लाभ हो रहा है या नहीं इस ओर भी ध्यान रखना होगा. आत्मसमीक्षा करके देखते रहना होगा, कि इससे क्या मेरी आध्यात्मिक उन्नति हो रही है ? यदि नहीं हुई है, तो जो कुछ भी कर रहा हूँ, उसका कुछ भी मूल्य नहीं है. मनुष्य अपना समय मुख्यतः तीन कार्यों में व्यतीत करता है. पहला- (शरीर बना है रोटी से, अतः रोटी कमाने की चेष्टा करनी पड़ती है,) अतः अर्थ उपार्जन के लिये मनुष्य परिश्रम करता है, दूसरा- थके-मांदे शरीर को आराम देने के लिये विश्राम (निद्रा आदि )करता है. तीसरा - अपने क्लांत या थके-हारे मन के लिये मनोरंजन  में समय व्यतीत करता है.
मनोरंजन कैसे होगा- यह निर्भर करता है, व्यष्टि मन के गठन के उपर. और व्यक्ति मन का गठन निर्भर करता है, उसकी सांस्कृतिक परम्परा, शिक्षा, परिवेश, व्यक्तिगत संस्कार एवं रूचि के उपर. हो सकता है, कोई व्यक्ति अच्छी संगती (सत्संग) में, या काव्य-शास्त्र पर होने वाली गोष्ठीयों में, या अन्य अच्छे कार्यों में मन की क्लान्ति दूर करना पसंद करता हो. किन्तु, हो सकता है अन्य किसी व्यक्ति को, इन सांस्कृतिक परम्पराओं, परिवेश एवं व्यक्तिगत संस्कार आदि में, अपने मन का खुराक नहीं मिल पाता हो. ऐसी परिस्थित में, यथार्थ शिक्षा के द्वारा ऐसी रूचि का निर्माण  किया जा सकता है, कि संस्कृति, परिवेश, संस्कार आदि विपरीत होने से भी, उसके प्रभाव को टाला जा सके. इसीलिए इन सब विषयों में भी, सावधानी के साथ मनोरंजन करने से, जिस संघ के कार्य में लगा हूँ, वह हमारी उन्नति में सहायता कर सकता है. 
उन्नति का अर्थ होता है, जीवन-मूल्यों में उन्नति, अन्तर्निहित सत्ता की सम्भावनाओं की अधिकतर अभिव्यक्ति, अर्थात सच्ची आध्यात्मिक उन्नति. आध्यात्मिक उन्नति का अर्थ क्या है ? इसका अर्थ है- सबों को अपना बना लेना, किसी के प्रति क्रोध, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष, ये सब भाव मन में न आने देना, सभी को प्रेम करने में समर्थ होना, दूसरों के सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझने में समर्थ होना, परार्थ को ही स्वार्थ समझने में सक्षम हो जाना. अर्थात अनेक को अनेक रूपों में न देख कर, ' एक का ही बहुरूप ' मान कर देखना सीखना. क्योंकि सबों के भीतर एक ही वस्तु है. इसीलिए धीरे धीरे केवल सभी मनुष्य ही नहीं, संसार का सबकुछ ही अपना ही रूप लगने लगेगा. ' किसको अनवर पथ्थर मारें ? , कौन पराया है ? - शीश-महल में हर इक चेहरा अपना लगता है '. ऐसा होने को आध्यात्मिकता कहते हैं. 
इसीलिए सावधान रहना होगा कि संघ का उद्देश्य कभी भूलने नहीं पायें. संघ के प्रति भक्ति कभी ढीली न पड़ जाये. यह संसार कुत्ते कि टेढ़ी पूंछ के समान है, उसको हमलोग कभी सीधा नहीं कर पायेंगे. किन्तु अपने हृदय की वक्रता (टेढ़ापन) को दूर कर के हमलोग उन्नत हो सकते हैं. आध्यात्मिक उन्नति हो जाने से अहंकार स्वतः गिर जाता है. उस समय यह विचार मन में उठेगा ही नहीं कि, मेरा दृष्टिकोण ही ठीक है, मेरा विचार सभी मानना पड़ेगा. श्रीरामकृष्ण कहते थे- ' मैं अणु का भी अणु हूँ ', और हमलोग बोलेंगे, ' मैं बड़ा हूँ '? जिनको हमलोग अपना आदर्श कहते हैं, यदि हमारे आचरण से, उनके भाव के विपरीत भाव प्रकट होते हों, तो उनका नाम लेना क्या हमें शोभा देगा ? इसीलिए विचार करते समय, बोलते समय, कार्य करते समय हमलोगों को सर्वदा सावधान रहना चाहिए. 
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२८. 
" सावधानी " के उपर थोड़ी और चर्चा
हो सकता है, ' सावधानी के उपर थोड़ी और चर्चा ' सुनने में अच्छा न लगे. बहुत बार औषधि खाना अच्छा नहीं लगता, किन्तु दवा की पूरी खुराक ले लेने से, केवल रोग ही अच्छा नहीं होता, दुबारा उस रोग के होने की सम्भावना का निषेध भी हो जाता है. कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जो पूर्व में उत्कृष्ट लगती हैं, किन्तु बाद में उसका परिणाम बहुत बुरा होता है. फिर कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं, जो प्रारम्भ में, विष के समान प्रतीत होती हैं, किन्तु परिणाम अमृततुल्य होता है. इसीलिए विवेक-शील  मनुष्य दुसरे प्रकार की वस्तुओं को ही ' श्रेय ' समझ कर, उनको ही ग्रहण करना पसंद करते हैं. 
बंगाल में एक कहावत, पहले बहुत प्रचलित था-" সময়ের এক ফোঁড়, অসময়ের দশ ফোঁড় ।" - अर्थात समय पर दिया गया एक टांका, असमय पर दिए दस टांकों के बराबर है. यहाँ पहले प्रचलित ' था ', इस लिए कहना पड़ रहा है कि, पुराने समय में जो बातें प्रचलित थीं, वे सब अभी अ-चल हो गयी हैं, जिसके परिणाम स्वरूप, इनदिनों जो वस्तुएँ उपरी तौर पर अमृततुल्य प्रतीत होती हैं, हमलोग आँखे मूंद कर पहले उसी को ग्रहण करते हैं.किन्तु, जब  उसकी विषतुल्य प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है,तब बाद में हाय हाय करना ही वर्तमान युग में बुद्धिमानी समझी जाती है. यही कहावत अंग्रेजी में भी है, ' A stitch in time saves nine. ' यही कहावत
 संस्कृत में है- ' वरमेकाहुतिः काले नाकाले लक्षकोट्यः ' समस्त भाषाओँ मे जब यह कहावत प्रचलित है, तो क्या यह कोई मूर्खतापूर्ण विचार हो सकता है ? नहीं, इन कहावतों के माध्यम से एक बहुत कर्योपयोगी युक्ति बतलाई गयी है. और वह है- हमें प्रारम्भ से ही सवाधानी रखनी चाहिए. 
यदि किसी कुर्ते मे हल्का सा खरोंच लग जाये, तो शुरू में ही एक-दो टाँका लगा देने से काम चल जायेगा, समय पर वैसा नहीं किये, तो अधिक फट जाने के बाद, हजारों टाँका लगाने से भी काम नहीं चलेगा. इसी को कहते हैं- समय रहते सावधानी बरतना. कभी कभी कोई ब्रह्मज्ञानी  महापुरुष, अपने प्रिय अनुयायीयों को बार बार सावधान रहने का उपदेश देते हैं, किन्तु सुनने वाला सोचता है, एक ही बात को बार बार सुनने की क्या जरूरत है, अच्छा होगा कि यहाँ से निकल लिया जाय. नहीं, उस प्रकार अपने शुभचिंतक की उपेक्षा करके बाहर निकल जाने से, हम लोग कहीं न कहीं तो जरुर पहुँच जायेंगे, किन्तु अपने निर्दिष्ट लक्ष्य पर कभी नहीं पहुँच पाएंगे. क्योंकि किसी निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुँचने के लिए, बहुत सावधानी रखनी पड़ती है. इसीलिए सावधानी के उपर कुछ और बातें अवतरित हो रही हैं.
भगवान श्रीरामकृष्ण देव ने स्वयं ' रामकृष्ण मठ और मिशन ' जैसे एक महान और विश्व-व्यापी संघ का प्रारम्भ किया था. एवं स्वामी विवेकानन्द, जो उनके दासों के दास बनने का भीख मांगते थे, ने अपनी देख-रेख में इसको स्थापित किया था. इसके संचालन एवं प्रबंधन का दायित्व स्वामीजी एवं उनके गुरु-भाइयों के उपर था, जो स्वयं ब्रह्मज्ञ पुरुष थे. इस संघ के स्थापना के २५-३० वर्षों के भीतर, सन १९२६ में - " श्रीरामकृष्ण की विचारधारा के परिपेक्ष्य में संघ का महत्व एवं कार्यभार " के विषय पर गहन चिन्तन-मनन करने के उद्देश्य से, श्रीरामकृष्ण के त्यागी एवं गृही अनुयायियों ने मिल कर बेलुड़ मठ में एक सार्वजनिक सम्मेलन का आयोजन किया था. श्रीरामकृष्ण के साक्षात्-संतानों में से कुछ लोग, उस समय तक भी इस संघ के प्रबन्धन का दायित्व संभाल रहे थे. इस सम्मेलन के स्वागत-समिती के अध्यक्ष थे, श्रीरामकृष्ण के गुणाकार सन्तान स्वामी सारदानन्दजी, उन्होंने अपने स्वागत भाषण में, उन दिनों में भी संघ के भविष्य को लेकर सचेत एवं सावधान रहने का जो आह्वान किया था, उसे सुन कर आज भी आश्चर्य-चकित हो जाना पड़ता है. 
उन्होंने कहा था- " ऐसा प्रतीत होता है कि किसी भी नये आन्दोलन को समाज एवं विपुल जनसमुदाय का समर्थन या स्वीकृति प्राप्त करने के पहले, अनिवार्य रूप से विरोध और उपेक्षा या उदासीनता रूपी दो अवस्थाओं के बीच से गुजरना पड़ता है. ...इस द्वितीय अवस्था का अंत हो जाने पर, ऐसा दिखने लगता है, मानो जनसाधारण ने उस नये विचारधारा को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है. तथा जब वे उस भावधारा के सार-तत्व को  ग्रहण करने योग्य समझ लेते हैं, तब उस आन्दोलन के, जीवनप्रद विचारधारा को अपना लेने के लिए उत्साही व्यक्तियों की संख्या बड़ी तेज गति से बढने लगती है.
  किन्तु विपुल जनसमुदाय की स्वीकृति मिल जाने वाली इस तीसरी अवस्था को उस आन्दोलन का स्वर्ण युग मान लेना ठीक नहीं है. क्योंकि यह सामाजिक प्रतिष्ठा आन्दोलन के उद्द्य्म एवं कर्मशक्ति को धीमी बना देती है, तथा आन्दोलन को विविध प्रकार की तीव्रता के साथ फैला देने की योजना, इसके पुरोधाओं के भीतर, विचारधारा को लेकर गंभीरता तथा पूर्व निर्धारित लक्ष्य के प्रति, पहले जितनी एक-दिशात्मकता रहती थी, उसमें बिखराव आने लगता है. 
जिसके फलस्वरूप संघ के सदस्यों के दृष्टिकोण में विसंगति या अंतर रहने से, बाहरी बाधाओं के स्थान पर एक भीतरी अन्तर्द्वन्द्व मुखर होने लगता है. और क्रमशः पहले के सत्य के लिए त्याग का भाव के स्थान पर प्राप्त सामाजिक प्रतिष्ठा एवं निजी हितों की रक्षा को प्रोत्साहन देने से, सत्य एवं अर्ध-सत्य आपस में मिलकर समझौता कर लेते हैं, तथा आन्दोलन के विचारधारा की प्रतिमूर्ति ( आइकन ) के पक्ष में जनमत तैयार करने के स्थान पर, उसके बाहरी रूपों की ओर रुझान अधिक दिखने लगता है, और यही स्वछन्द अस्तित्व (निजी हित) के संरक्षण की प्रवृत्ति का वैशिष्ठ्य है. 
दूसरी ओर यदि आन्दोलन के मार्ग-दर्शक नेता यदि जागरूक और सतर्क नहीं रहें, या इस प्रकार की अशुभ परिस्थिति के उद्भव को रोकने या ठीक करने के उपाय नहीं ढूंढ़ सकें, तो उसका परिणाम क्या होगा, उसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है. इसका पहला और मुख्य परिणाम यह होगा, कि प्रेम का जो बंधन  पहले सभी कार्यकर्ताओं को आपस में जोड़े रखता था, वह ढीला पड़ने लगता है, उनमें स्वार्थ या आत्महित का भाव अधिक दिखने लगता है, तथा उस आन्दोलन के कार्यकर्ता अब सार्वजनिक कल्याण एवं उन्नति की ओर दृष्टि न रख कर संघ के पूर्णांग से अलग स्थायी और स्वछन्द दलबंदी करने लगते हैं. 
यह छोटी सी दरार से फूट का बीज संघ के शरीर में प्रविष्ट होकर अच्छे कार्य को टुकड़े टुकड़े में बाँट कर नष्ट करने लगता है. तथा समय के प्रवाह में सत्कार करने योग्य या पूजनीय नेतृत्व की आज्ञा का उलंघन करना, शेखी बघारना, कर्म में अरुचि, इत्यादि विभिन्न बुराइयाँ संघ के आचार-व्यवहार में दृष्टिगोचर होने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप संघ हमेशा के लिए विनष्ट हो जाता हैं. "  
इस संघ के शासन प्रबंधन तथा अनुयायियों में जैसे जैसे लोग उस समय थे, और हमारे जैसे लोग, जो आज इस महामण्डल के साथ जुड़े हुए हैं, में कितना अंतर है ! उनके लिए यदि श्रीरामकृष्ण के साक्षात्-संतान के मुख से इतना कठोर सत्य चेतावनी सन्देश के रूप में निकलता हो, तब हमलोगों को इस विषय में कितना अधिक सावधान रहना आवश्यक है ! कई बार तो ज्ञानियों का मन भी मोह-माया मरीचिका से आवृत होकर उनको पथ से भटका देता है, फिर हमलोग तो साधारण मनुष्य ठहरे, यदि हम सतर्क नहीं रहें तो, हमारा कैसा हस्र होगा ! इसीलिए हम सभी को आत्म-समीक्षा करके देखते रहना होगा कि, इस तरह के फूट का बीज कहीं हमलोगों के संघ में भी तो नहीं प्रविष्ट हो गया है? 
अत्यंत सावधानी के साथ इसका वर्जन नहीं किया गया, तो संघ को हानी पहुंचेगी. अपने आप से प्रश्न पूछना चाहिए- ' संघ बड़ा है, या मैं बड़ा हूँ ? ' बिना दूसरों को साथ लिए, अकेले बड़े होने में नुकसान यह कि, इससे गुटबंदी होने लगती है, जिससे संघ में दरार पड़ जाती है. इसका मौलिक कारण है, मोह. मोह का अर्थ है- भ्रम, आसक्ति, मुर्खता,अज्ञान,अविवेक. निराधार घमंड, मैं बड़ा आदमी हूँ, मेरा विचार सभी को मानना होगा आदि बेवकूफी भरे ख्याल, इसी मद से उत्पन्न होते हैं. अपने विचार को सबों के उपर लादने के लिए, फिर गुट बनाना शुरू करते हैं. जो संघ किसी महान आदर्श के पूर्व निर्धारित उद्देश्य को प्राप्त करने के लक्ष्य को सामने रख कर गठित होता हैं, उस संघ में किसी व्यक्ति के निजी विचारों की कोई विशेष अहमियत नहीं होती. क्योंकि, संघ का कोई भी निर्णय,किसी के व्यक्तिगत विचारों के अनुरूप नहीं,आदर्श और उद्देश्य के अनुरूप होता है. 
पुनः यदि मोह और मद के साथ साथ मात्सर्य या दूसरों की समृद्धि या सुख को देखने पर द्वेष से अपना चेहरा मुरझा जाता हो, तब उससे व्यक्ति और संघ का महा अनिष्ट होगा. अतेव संघ के आदर्श, उद्देश्य, स्थायित्व, प्रसार तथा अग्रगति की रक्षा करने के लिए, संघ के सामने अपने को समर्पित कर देना होगा. अपनी अहमियत को बढ़ाने की चेष्टा न कर, संघ के आदर्श और प्रतिष्ठा से स्वयं को प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करना बहुत बड़ी बात है, और वैसा करना ही सभी सदस्यों का पवित्र कर्तव्य है.           
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२९. 
" श्रेयांसि बहुविघ्नानि "
पुराने समय में यह कहावत अधिक प्रचलित थी- " अच्छे कार्यों में रुकावटें बहुत आती हैं ! " वैज्ञानिक दृष्टि से, किसी कार्य को पूरा करने में कितने अवरोधों को दूर करना पड़ा है, उसी के आधार पर, उस कार्य को मापा जाता है. अनंतकाल तक स्थिर रहना या अनंतकाल तक एक ही दिशा में एक ही गति से दौड़ते रहना; प्रकृति के सभी वस्तुओं का धर्म  होता है.
जैसे ही कोई वस्तु स्थिर अवस्था को त्याग कर चलना शुरू कर दे, या किसी दौड़ती हुई वस्तु, की गति धीमी होने लगे, या बिल्कुल ही रुक जाये, तो यह समझ लेना होगा कि उसके उपर कोई बाहरी शक्ति कार्य कर रही है. समस्त कार्यों का अर्थ ही होता है, दौड़ते रहने से रुक जाना या रुकी हुई अवस्था से चलना आरम्भ कर देना. और किसी भी कार्य को करने में किसी न किसी शक्ति का उपयोग करना आवश्यक होता है. 
आम तौर पर हमलोग कार्य करते समय रुकावटों या बाधाओं के उपर विशेष ध्यान नहीं देते हैं. किन्तु जिस कार्य को अच्छा समझ कर करना चाहते हैं, उस समय देखते हैं, कि हर कदम पर कोई न कोई अवरोध या बाधा सामने खड़ी हो जाती है. और ऐसी बहुत सी बाधाएँ आती हैं, जो मानो उस अच्छे कार्य को किसी भी तरीके से आसानी से सम्पन्न नहीं होने देना चाहती हैं. अतेव हमलोग थक-हार कर उसके लिए प्रयास करना भी छोड़ देते हैं. 
किन्तु कार्य का पूरा महत्व ज्ञात रहने से हमलोग यह समझ जायेंगे कि, अवरोधों का अतिक्रमण करने को ही कार्य कहते हैं. इसीलिए रुकावटों को देख कर निराश नहीं होंगे, बल्कि मार्ग में आने वाले अवरोधों के बिच से ही बलपूर्वक रास्ता बनाने का प्रयास करते रहेंगे. मनुष्य बनना, जीवन गठन या चरित्र-गठन सभी एक ही प्रकार के कार्य हैं. 
इससे अच्छा कार्य और कौन हो सकता है ? क्योंकि यदि मनुष्य नहीं बन सके, जीवन तथा चरित्र गठन नहीं कर सके तो , मानव-शरीर धारण करना ही व्यर्थ हो जायेगा ! सच्चा मनुष्य नहीं सके, या सच्चरित्रता अर्जित नहीं कर सके, तो पढाई, धन-दौलत, शारीरिक सुख आदि की कोई उपयोगिता नहीं रह जाएगी. क्योंकि यदि हमलोग चरित्रवान-मनुष्य नहीं बन सके तो, कमाई हुई सारी धन-सम्पत्ति जीवन को बर्बाद करने में खर्च हो जाएगी. किन्तु इस सबसे अच्छे कार्य को सम्पन्न करने में, बहुत कड़े कड़े रुकावटों का सामना करना पड़ता है, अतेव जोरदार रुकावटों के साथ जोरदार तरीके से युद्ध भी करना होगा. 
सभी कार्यों में, तथा विशेष रूप से चरित्रवान-मनुष्य बनने के कार्य में अवरोध या रुकावटें दो दिशाओं से आती हैं. अंदर से भी, और बाहर से भी. अंदर से आने वाली प्रथम रुकावट है, कार्य के विषय में जानकारी का न होना, उसे समझ न पाना, कार्य के महत्व से से अनजान रहना, तथा इस कार्य में जुट जाने का दृढ निश्चय करके उत्साह के साथ लगे रहने की आकांक्षा की कमी. इसके बाद शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल होना, कर्तव्यनिष्ठा एवं धैर्य में कमी रहना आदि. जिस प्रकार हीनभावना से ग्रस्त रहना एक रुकावट हो सकती है, उसी प्रकार अपने को तीसमारखां समझना भी एक बहुत एक बहुत बड़ी बाधा है. अपने को बिल्कुल गुणहीन समझने में भी हानि है, फिर अपने को बिल्कुल गुणाकरजी (या फन्ने मियाँ ) समझ लेने से, भी आगे विकास करने की उम्मीद नहीं रहती.
 बाहरी अवरोध भी कई प्रकार के हो सकते हैं. प्राथमिक रुकावटें है- वैसे लोगों की संगती;  जो इन बातों को बिल्कुल नहीं समझते, जो भोगवादी हैं तथा कामना-वासना के दास हैं, लोभी हों, जिनके लिए धन-दौलत ही सबकुछ का मापदंड है, ईमानदारी या मनुष्यता में विश्वास नहीं करते, दूसरों के हित की कोई चिंता नहीं करते, दूसरों को मदत करने की बात भी जो नहीं सोच पाते, और जो लोग इस कार्य से जुड़ना चाहते हैं, उसको केवल इसके विरुद्ध परामर्श ही नहीं देते, बल्कि उसकी हँसी भी उड़ाते हैं, गलत मार्ग पर चलने का प्रलोभन देते हैं, यहाँ तक कि जोर-जबरदस्ती से भी रोकने का प्रयास कर सकते हैं.
फिर पारिवारिक या पास-पड़ोस का वातावरण भी रुकावट की सृष्टि कर सकता है. जैसे किसी के पास, इतनी अधिक धन की कमी हो, कि जिसको पूरा करने में इतना कठोर परिश्रम करना पड़ता हो, कि इन कार्यों के लिए  समय ही न बचे. किन्तु जो शूरवीर है, जो प्रेय की अपेक्षा श्रेय को ही बड़ा समझता है, वह सभी बाधाओं को दूर हटाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहेगा, कोई भी रुकावट उसे इस कार्य को करने से रोक नहीं पायेगी. 
एक दूसरी बाधा है, किसी प्रयास में जब हम विफल हो जाते हैं, हम उससे पूरी तरह निराश हो जाते हैं, और दुबारा प्रयास ही नहीं करते. किन्तु स्वामीजी ने कहा है, प्रारम्भिक असफलता, या मिस - फ़ायर,से भी हमलोगों का भला होता है. क्योंकि उसी से हमलोग और भी अच्छी तरह से, सफल होने का उपाय भी सीख सकते हैं. जैसे ही कोई असफलता मिले, तब यही समझना चाहिए कि - सफल होने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्ति को जिस परिमाण में लगाने की आवश्यकता थी, उतना मैं लगा नहीं सका. परन्तु अगली बार मैं उपयुक्त शक्ति का प्रयोग कर अवश्य सफल हो सकता हूँ. 
स्वामीजी ने बार बार कहा है, पूर्णता ही मनुष्य का स्वभाव है. विभिन्न अवरोध या प्रतिबन्धक हमारी पूर्णता को दबाये हुए हैं, इसीलिए वह अपना सही मार्ग नहीं पा रही है. इसीलिए ' जीवन ' को परिभाषित करते हुए, वे कहते हैं- " एक अंतर्निहित शक्ति या उर्जा अपने को अभिव्यक्त करना चाह रही है, किन्तु बाह्य वातावरण का दबाव उसको अभिव्यक्त होने से रोक रहा है, उस दबाव को अस्वीकार करके, उसे दूर हटा कर अपनी सत्ता को ( यथार्थ स्वरुप या सच्चे स्वभाव को ) प्रस्फुटित और विकसित कर लेना ही जीवन है. "
पतंजली ऋषि भी योगसूत्र ( कैवल्य पाद :३) में रुकावट या प्रतिबन्धक को हटाने की बात कहते हैं- " वरंभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत ।" स्वामीजी इस सूत्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं - " सत (नैतिक) और असत ( अनैतिक ) कर्म प्रकृति ( पूर्णता ) के परिणाम ( योनी-परिवर्तन ) का प्रत्यक्ष कारण नहीं है, वरन वे उसकी रुकावटों को दूर कर देने वाले निमित्त मात्र हैं- जैसे किसान जब पानी के बहने में रुकावट डालने वाली मेड़ को तोड़ देता है, तो मेड़ में (नाम-रूप के मिथ्या अहंकार में ) अटका हुआ पानी अपने स्वभाव ( पवित्र-प्रेम स्वरूप के कारण ) से ही बहने लगता है. "  (१/२०५) "
" पूर्णता मनुष्य का स्वभाव है...हमारे अंतर्निहित पूर्णता रूपी यह अनंत ज्वार अपने को प्रकट कर देने के लिए संघर्ष कर रहा है; केवल उसकी सिटकिनी बंद हैं, जिसके चलते उसे प्रवाहित होने का मार्ग नहीं मिल रहा है. यदि कोई इस सिटकिनी को खोल सके, तब उसकी वह स्वाभाविक पूर्णता अपनी शक्ति के बल से अभिव्यक्त होगी, और तब मनुष्य अपने भीतर पहले से ही विद्यमान शक्तियों (समस्त चारित्रिक गुणों ) को प्राप्त कर लेता है. जब यह अवरोध (अहंकार रूपी प्रतिबन्धक ) दूर हो जाता है और प्रकृति (हमारे सच्चे स्वभाव ) को अबाध गति प्राप्त हो जाती है, तब जिन्हें हम पापी (पशु-मानव) कहते हैं वे भी साधू (चरित्रवान मनुष्य या देवमानव) में रूपान्तरित हो जाते हैं.
..केवल जीवन धारण या इन्द्रिय सुखों को चरितार्थ करने की चेष्टा ही इस अभिव्यक्ति( क्रम-विकासवाद) के कारण नहीं है. ये सब संघर्ष तो वास्तव में क्षणिक हैं, अनावश्यक हैं, वाह्य व्यापार मात्र हैं. वे सब मोह (अज्ञान ) से पैदा हुए हैं. सारी होड़ या प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाने के बाद भी, जब तक हममें से प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण नहीं हो जाता, तबतक हमारे भीतर निहित यह पूर्णस्वभाव हमें क्रमशः उन्नति की ओर अग्रसर करता रहेगा. ...पशु (पशु-मानव ) के भीतर मनुष्य (सच्चा मनुष्य ) दबा हुआ है. ज्यों ही कपाट खुल जाता है, अर्थात प्रतिबन्धक हट जाते हैं, त्यों ही पुरे वेग से सच्चा मनुष्य प्रकट हो जाता है; इसी तरह मनुष्य के भीतर ही भगवान भी अंतर्निहित हैं, केवल मोह या अज्ञान के अर्गल (सिटकिनी ) और बंधन से वे बंदी बने हुए हैं. जब ज्ञान इस सिटकिनी और बन्धनों को खोल देता है, तब वे अंतर्निहित ' भगवान 'प्रकट हो जाते हैं. " (१/२०६-७)    
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३०. 
विचारों को पचा लेना होगा.
 स्वामी  विवेकानन्द ने जगत को जो संदेश दिया है, वह कितना मूल्यवान है- इसे कौन समझ सकता है, या अभी तक कितने लोगों ने उसे समझा है ? इनदिनों सभी चीजों का मूल्य निर्धारित करना, एक प्रचलन बन गया है. और उसको ' मुल्यांकन ' का नाम दिया गया है
श्रीरामकृष्ण द्वारा कथित ' हीरे का मोल ९ सेर बैंगन ' वाली कहानी को एक बार फिर से सुना जाय- " एक कुँए का मेढ़क था, जिसने कभी पृथ्वी को देखा नहीं था, इसीलिए वह विश्वास नहीं करता था, कि पृथ्वी नामक कोई वस्तु भी है. भौतिकतावादी (सांसारिक) लोग जो ईश्वर ईश्वर कहते रहते हैं, वह सब सुनी सुनाई बात है. जिसके पास जितनी पूंजी होती है, वह सामग्री का दाम उसी के अनुसार निश्चित करता है. किसी व्यक्ति ने अपने नौकर से कहा- इस हीरे को बाजार में लेकर जाओ. आकर मुझे बताना कि कौन कितना दाम देता है. बैंगन बेचने वाले का भाव, कपड़ा बेचने वाले का दर और जौहरी का दर तो अलग अलग रहेगा ही. बैंगन बेचने वाला ९ सेर बैंगन से उपर नहीं उठ सकता. कपड़ा बेचने वाला १०० रुपया तक मूल्य निरूपण कर सकता है. जौहरी एक ही बार में उसका मुल्यांकन एक लाख रुपया कर देता है. "
कहानी को यहीं तक रह