Monday, September 27, 2010

[57] " इस जन्म के मेरे अन्य सगे-सम्बन्धी "

  बहुत से सन्यासियों का संग पाने का सौभाग्य मिला है. इससे जीवन में परम लाभ हुआ है. ऐसे ही एक अन्य सन्यासी - ' राममय महाराज ' की छवि अब भी स्मृति में बसी हुई है. राममय महाराज की स्मृति आते ही माँ के उपदेश याद आने लगते हैं. किस प्रकार स्कूली जीवन के समय से ही उनको माँ के सत्संग में रहने का सौभाग्य मिला था. और भी दो-चार असाधारण सन्यासियों की कहानी सुना हूँ जिनको बचपन से ही माँ के पास रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। हठात एक दिन सुबह में देखता हूँ कि राममय महाराज हमारे घर के एक कमरे में बिस्तर पर बैठे हुए हैं.मैं तो उनको वहाँ बैठे देख कर आवाक हो गया, और बोला- " महाराज आप यहाँ? " बोले- " मैं यहाँ किस सिलसिले में आया, लगता है तुमको वह नहीं पता है ?" मैंने कहा, ' जी नहीं, महाराज .' तब महाराज ने बताया- " तुम्हारे दादा (बड़े भैया ) करवीवरण मुखोपाध्याय को कलकाता में आयोजित होनेवाले एक फूलों कि प्रदर्शनी में एक विशेष फूल के लिये इस बार फर्स्ट प्राइज मिला है। 
 तब मैंने उसको कहा था कि मैं एकदिन तुमलोगों का बगान देखने आऊंगा. आज तुमलोगों का बगान देखने आया था, इसी लिये यहाँ बैठा हूँ. सुनकर मुझे बहुत आनन्द हुआ. तो मैं यह पहले ही कह चुका हूँ कि मेरे दादा ने I.Sc. तक की पढ़ाई मेरे साथ ही की है. उन्होंने I .Sc.बहुत अच्छे अंको पास किया और उसके बाद कलकाता में होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज में भारती हो गये थे.चार वर्ष तक बहुत अच्छा रिजल्ट किये थे कईबार तो फर्स्ट क्लास फर्स्ट हुए थे.
किन्तु चौथे वर्ष के अन्तिम भाग में, पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमन्त्री विधान चन्द्र राय किसी सभा में उपस्थित थे. उनके समक्ष ही मेरे दादा ने एक भाषण दिया था. उनके भाषण को सुनकर विधान चन्द्र राय ने कहा- " इसको एकबार राइटर्स बिल्डिंग में मेरे साथ भेंट करने के लिये कहियेगा." वे जब राइटर्स बिल्डिंग में गये तो बहुत काम देने लगे. वे उनके साथ इतने रम गये आगे की होमिओपैथी का कोर्स पूरा करना सम्भव नहीं हुआ. विधान राय के लिये ही वे कई बार बहुत सारी चीजें लिख दिया करते थे, कभी कभी उनके भाषण आदि भी वे ही लिख दिया करते थे. इसप्रकार वे उनके अत्यन्त करीबी व्यक्ति बन गये थे. 
उससमय ' भारतवर्ष ' और ' प्रवासी ' नामक दो बंगला मासिक पत्रिकाएं बहुत लोकप्रिय थीं, ' भारतवर्ष ' पत्रिका के सम्पादक फणीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय के साथ भी उनका घनिष्ट परिचय था. दादा (भैया ) बहुत अच्छा लिख सकते थे. उन्होंने बहुत सी कवितायेँ लिखीं हैं, प्रबन्ध लिखे हैं, बंगला भाषा पर उनकी आश्चर्य जनक पकड़ थी. घर की फुलवारी को बहुत मनोहारी ढंग से सजाये थे. अनेकों स्थानों पर सभा समितिओं में भाषण देते थे. ' भारतवर्ष '  के सम्पादक फणीन्द्रनाथ का जब देहावसान हो गया तो एक समिति गठित कर बहुत वर्षों तक उनका जन्मदिन मनाते थे. उस समय घर में बहुत से लोगों का आना-जाना लगा रहता था.
पहले जो मेरे ' बड़-दादू ' ( बड़े पितामह ) की बात हो चुकी है, उनके दो लड़के थे, बड़े लड़के का नाम देवदेव मुखोपाध्याय था. उनकी दो कन्यायें थी. वे दोनों राँची में अपने मामा के घर में रहित थी. बड़ीबहन का नाम मालविका था, उसने बी-ऐ पास किया था, तभी उसको टाईफेड हो गया था, उनदिनों इसकी भी अच्छी चिकत्सा उपलब्ध नहीं थी, उसका देहान्त हो गया था. छोटीबहन का नाम उत्प्ला था, उस समय राँची में कोई यूनिवर्सिटी नहीं थी, इसीलिये पटना यूनिवर्सिटी से उसने अंग्रेजी से एम्-ऐ में फर्स्ट क्लास फर्स्ट किया था. 
उसका जिनके साथ शादी हुई थी- (अर्धेन्दुशेखर) वे सात विदेशी भाषाओँ के ज्ञाता थे. बहुत समय तक दिल्ली में थे. उनदिनों जो लोग फोरेन-सर्विस में थे उनमे से कई लोग उनके पास विदेशी भाषा सीखने के लिये आया करते थे. संगीत में भी वे बड़े दक्ष थे. असाधारण संगीतज्ञ थे. जिस प्रकार गायन में उनको महारत हासिल थी उसी प्रकार यंत्र-संगीत में भी प्रवीन थे, खास तौर पर वे सितार बहुत अच्छा बजाते थे. वे क्लासिकल म्यूजिक के बहुत बड़े फनकार थे, कई सौ गानों की रचना किये थे. उनके(अर्धेन्दुशेखर ) द्वारा लिखित प्राचीन भारतीय संगीत के ऊपर अंग्रेजी में लिखी एक पुस्तक थी, नाम था- ' The Story of Indian Music ' उत्प्ला संस्कृत भी बहुत अच्छा जानती थी. यदाकदा वह संस्कृत में श्लोक भी लिख सकती थी. स्वामी अभेदानन्द की शतवार्षिकी के समय अभेदानन्द के ऊपर संस्कृत में एक बहुत बड़ी कविता लिखी थी. उस कविता को उनके स्मारक-ग्रन्थ में प्रकाशित भी किया गया था.
स्कूली जीवन के विषय में बताते समय एक ही स्कूल में तीन पीढ़ियों के पढने का जिक्र हुआ था. पितामह के छोटे भाई - विभूतिभूषण मुखोपाध्याय इंजीनियरिंग इत्यादि नाना प्रकार से करके अमेरिका में रहते थे. जब उनकी उम्र बहुत हो गयी थी वे अमेरिका में गीता पर क्लास लेते थे. गीता पढ़ाते थे.वहाँ के बहुत से लोगों ने उनसे संस्कृत सीखा है. मैंने यह भी देखा है कि इन्ही सब विषयों के बारे में वे पितामह के पास पत्र लिखा करते थे, एवं पितामह गीता के बारे में बहुत सी बातें उनको लिखते रहते थे. गीता की चर्चा होने पर 
भाटपाड़ा के विख्यात पण्डित पञ्चानन तर्कतीर्थ की याद आ रही है, उनके साथ पितामह की एक बार शास्त्र के ऊपर चर्चा हो रही थी. उस समय उन्होंने कहा था कि, मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूँ, गीता के एक श्लोक का अर्थ ऐसा होना चाहिये - मुझे ऐसा महसूस होता है. पञ्चानन तर्करत्न महाशय ने पूछा - " वह क्या है ?" पितामह कहते हैं- गीता में कहा गया है-
" त्रैगुन्यविषया वेदा निस्त्रैगुन्यः  भव अर्जुन |
                                                 निर्द्वन्द्वः नित्यसत्वस्थः निर्योगक्षेम आत्मवान || " (गीता : २: ४५ )
[" -हे अर्जुन ! वेद सत्व, रज, तम इन तीन गुणों वाले हैं- अर्थात कामना मूलक हैं.तुम इन तीन गुणों से अतीत अर्थात निष्काम हो जाओ.सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से रहित सदा आत्मनिष्ठ अर्थात सदा धैर्यशील तथा आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिये प्रयत्न रहित स्वस्थ अर्थात ईश्वर-अवलम्बी (धैर्य-सन्तुलन बनाये रखो )हो जाओ. " ]
 मेरे मन में गीता के इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार उभर कर सामने आता है,यदि आप अनुमति दें तो मैं आपके समक्ष उसको  निवेदन करना चाहूँगा. वे बोले - " आप इसका क्या अर्थ समझते हैं? " वेदों में तीन गुणों की बात, सत्व, रजः, तमः, की बात  कही गयी है, - " त्रैगुन्य विषया वेदाः " अतः हे अर्जुन ! तुम इन तीनों गुणों को ग्रहण मत करो- " निस्त्रयगुण्य भवार्जुन ! "" निः - द्वन्द्वः " माने ( जन्म-मरण, आदि ) दो गुणों को ग्रहण मत करो. हार-जीत, मान-अपमान, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों को ठाकुर की लीला एक खेल समझो 
और -" नित्य सत्वस्थ रहो ! "एक गुण को ही ग्रहण करो - एवं केवल सत्व गुण को ही ग्रहण करो. ' निर्योगक्षेम आत्मवान ' - ( अपने नफा-नुकसान के पचड़े में न पड़ कर धैर्य- सन्तुलन  बनाये रखो ! ) 
पञ्चानन तर्करत्न महाशय यह सुन कर बोले थे- " मैंने गीता पर एक शक्ति भाष्य की रचना की है, आप अधिकारी पुरुष हैं, वह पुस्तक मैं आपको दूंगा |"संस्कृत कॉलेज के अध्यक्ष Edward B. Cowell ने मेरे प्रपितामह (परदादा ) को इस कॉलेज से अध्यन समाप्त करने के बाद जो अभिज्ञता पत्र प्रदान किया था वह इस प्रकार था-
" This is to certify that Bhuban Chandra Mookerjee has attended at the Sanskrit College for 10 years and studied the following branches of Sanskrit Literature : Grammar, Belles Letters, Rhetoric and Law-; that he has attained respectable proficiency on the subject of these studies, that he has attained respectable proficiency on the subject of these studies, that he has made some progress in the English language and literature; and that his conduct has been satisfactory.
Fort William,
The 24th February 1862  
Edward B. Cowell 
Principal
    भुवनचन्द्र विद्यानिधि ने स्वयं भी कुछ दिनों तक संस्कृत कॉलेज में अध्यापन का कार्य भी किया है. पहले इस विषय में विस्तार से बताया गया है.विख्यात दार्शनिक ब्रजेन शील, जो स्वामीजी के समकालीन रहे हैं, स्वामीजी के सम्बन्ध में उनकी उक्ति असाधारण है. ऐसा भी हुआ है कि वे और स्वामीजी एक ही कॉलेज में पढ़े हैं. वे विख्यात दार्शनिक थे. उनके साथ एकबार पितामह की तन्त्र के ऊपर चर्चा हुई थी. तन्त्र के ऊपर चर्चा होते होते किसी विषय को लेकर उन्होंने जो व्याख्या की तो उसे सुनकर पितामह ने विनम्रता से निवेदन किया कि , ' मुझे ऐसा लगता है कि यह इस प्रकार न होकर इस प्रकार होगा .' तब ब्रजेन शील जैसे उच्च कोटि के दार्शनिक व्यक्ति ने भी कहा था, ' आप ही ठीक कह रहे हैं.' 
उनके (ब्रजेन्द्र शील के ) समय में भारतवर्ष में कई दार्शनिक हुए थे, जो बहुत बड़े पण्डित, ज्ञानी, बहुत बड़े अध्यापक, भी थे और दर्शन शास्त्र से जुड़े कई विषयों पर ग्रन्थ भी लिखे हैं. किन्तु दार्शनिक लोगों का ऐसा मानना है कि, उस समय एकमात्र कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य ही ऐसे व्यक्ति हुए थे जिन्होंने भारतवर्ष की जो निजी दार्शनिक विचार धारा है, उसमे यदि कोई नया सिद्धान्त जोड़ देने की क्षमता रखता हो, कुछ नयी चीज उसमे जोड़ दिये हों तो केवल उन्होंने ही किया है.
अन्यान्य दार्शनिक गण तो अनेक हुए हैं, किन्तु भारतीय दर्शन के भीतर कोई नया दृष्टिकोण य़ा सिद्धान्त किसी ने जोड़ दिया हो तो वे हैं - कृष्णचंद्र भट्टाचार्य ! और प्रेसिडेन्सी कालेज में कृष्णचंद्र भट्टाचार्य पितामह के सहपाठी भी थे. पितामह  का ऑनर्स  था, अंग्रेजी एवं दर्शन में तथा कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य ने तीन विषयों -अंग्रेजी, संस्कृत और दर्शन में ऑनर्स रखा था.           
Dr. Bidhan Chandra Roy, M.R.C.P., F.R.C.S. (Bengali: বিধান চন্দ্র রায়; 1 July 1882–1 July 1962) was the second Chief Minister of West Bengal in India. He remained in his post for 14 years as a Indian National Congress candidate, from 1948 until his death in 1962. He was a highly respected physician and a renowned freedom fighter. Bidhan Roy is often considered as the great architect of West Bengal, who had founded two eminent cities Kalyani and Bidhannagar. He was an alumnus of the Medical College Calcutta of the University of Calcutta. He is one of the few people who completed both F.R.C.S. and M.R.C.P. simultaneously within only two years and three months. In India, the National Doctor's Day is celebrated on the date of his birth (and death) July 1 every year. Dr. Bidhan Chandra Roy constituted a trust for his properties at Patna for social service and made eminent nationalist Ganga Sharan Singh (Sinha) the trustee. He won the Bharat Ratna in 4 February 1961, India's highest civilian honour.
Bidhan Chandra Roy was born on July 1, 1882, at Bankipore in Patna, Bihar. His father Prakash Chandra was an Excise Inspector. Bidhan was the youngest of five children and was greatly influenced by the simplicity, discipline and piety of his parents. Bidhan did his I.A. from Presidency College, Calcutta and B.A. from Patna College with Honors in Mathematics. He applied for admission to the Bengal Engineering College, and the Calcutta Medical College. He was accepted to both institutions but opted to go to medical school. Bidhan left for Calcutta in June 1901. While at medical school Bidhan came upon an inscription which read, "Whatever thy hands findeth to do, do it with thy might." Bidhan was deeply impressed by these words and they became a source of inspiration for him throughout his life.

Dr. Roy believed that the youth of India would determine the future of the nation. He felt that the youth must not take part in strikes and fasts but should study and commit themselves to social work. At his Convocation Address on December 15, 1956 at the University of Lucknow, Dr. Roy said, "My young friends, you are soldiers in the battle of freedom-freedom from want, fear, ignorance, frustration and helplessness. By a dint of hard work for the country, rendered in a spirit of selfless service, may you march ahead with hope and courage... ."
The partition of Bengal was announced while Bidhan was in college. Opposition to the partition was being organized by nationalist leaders like Lala Lajpat Rai, Arvinda Ghosh, Tilak and Bipin Chandra Pal. Bidhan resisted the immense pull of the movement. He controlled his emotions and concentrated on his studies realizing that he could better serve his nation by qualifying in his profession first.Dr. Roy was both Gandhiji's friend and doctor. When Gandhiji was undergoing a fast in Parnakutivin, Poona in 1933 during the Quit India Movement, Dr. Roy attended to him. Gandhiji refused to take medicine on the grounds that it was not made in India. Gandhiji asked Dr. Roy, "Why should I take your treatment? Do you treat four hundred million of my countrymen free?" Dr. Roy replied, "No Gandhiji, I could not treat all patients free. But I came... not to treat Mohandas Karamchand Gandhi, but to treat "him" who to me represents the four hundred million people of my country." Gandhiji relented and took the medicine.
Krishnachandra Bhattacharya (May 12, 1875 – December 11, 1949) was a philosopher at Calcutta University who studied one of the central questions of Hindu philosophy, which is how mind, life or consciousness creates an apparently material universe.
His answer was that the question itself is illegitimate, because it is asked from a position anchored in maya (illusion). On attaining knowledge of Brahman, illusion drops away and there are no more questions. The last knowledge that an individual has as an individual is the knowledge that all this is mere illusion. Beyond that is only the blissful residing in Brahman. Until then, "why" is a matter of faith, not reason.
Subject-object dualism: Therefore again, there seems to be no real debate between KCB and Aurobindo except that the former is self- conscious and rigorous about the method of philosophy and science while the latter is loose and well meaning. The key lies in KCB's assertion that science and philosophy, "Both deal with the object understood as what is believed to be known in the objective attitude as distinct from the subjective, enjoying or spiritual attitude." (Emphasis mine.) Raghuramaraju completely misreads KCB's analysis as an approach where "science denies philosophy." 
He misses the point about their common approach that lies in assuming the distinctness of the subject and object of knowledge or of matter and spirit that is the basis of Western philosophy's brand of analytic rigour. It is Gandhiji alone who recognised that this dualism of the subject and object of knowledge was the crux of the problem, the real basis of modern civilisation, its systematic philosophies, vivisectionist science and imperialist politics.
In the midst of the cacophony about independence, poverty, nationalism, colonialism, materialism, spiritualism, East, West, Left and Right, tradition and modernity, he therefore conducted his systematic experiments in the non-dualism of subject and object in science, religion and politics thus forging a new tradition and modernity. Note his careful choice of the subtitle for his autobiography, `The Story of My Experiments with Truth' (as against `Reform of the Indian Reality'), recording his experiments from non-vivisectionist healing and vegetarianism to satyagraha and sexuality; to reduce it to merely a movement for `spiritualising politics' is a real pity. The real puzzle/debate then is why Raghuramaraju, along with Sudhir Kakar, Partha Chatterjee and other contemporary Indian thinkers does not find Gandhiji systematic, scientific or technical enough!
  



 
     

Wednesday, September 22, 2010

[56] अल्मोड़ा यात्रा

क्या नवनी दा को अपने पूर्वजन्म का स्मरण भी था ?  
महामण्डल के कार्य से उनदिनों इस प्रकार अक्सर यात्रायें करनी पड़ती थी, तब एक भाई ने परामर्श दिया कि जहाँ पर मिलिट्री का जितना डिस्पोजल में जीप आता है उसके गवर्नमेन्ट डिपो से पुराने जीप बेचे जाते हैं. तब हमलोगों एक सहयोगी वहाँ जाकर जीप पसन्द किये और तय किये कि इसी जीप को खरीदा जायेगा, बहुत ठीक बात है. कम दाम में एक जीप खरीद लिया गया, यह सोंच कर कि महामण्डल का इतना काम रहता है, एक जीप रहने से अच्छा ही रहेगा. जीप को खरीद लेने के बाद वहाँ से लाने लायक एक ड्राइवर लेगये  जो उस जीप को चला कर ले आया. यहाँ लाकर गाड़ी को खूब अच्छी तरह फिट-फाट करने के लिये एक गैरेज में भेज कर रंग-रोगन भी करवा लिया गया. 
तब चिन्ता हुई कि गाड़ी को चलायेगा कौन ? यह सब बताने में भी कष्ट होता है. तब हम सभी लोग जानने की चेष्टा करने लगे कि, हममेसे गाड़ी कौन चला सकता है ? क्योंकि यदि गाड़ी के लिये ड्राइवर रखना पड़ा, तब तो उसको पूरा तलब भी देना होगा और उसके रहने की व्यवस्था भी करनी होगी. इतना पैसा कहाँ से आयेगा ? तब मैंने सुझाव दिया कि यदि तुमलोगों को कोई आपति न हो तो मैं ही यदि ड्राइवर का काम करूँ, इस गाड़ी को यदि मैं ही चलाऊं तो कैसा रहेगा ? सबों ने कहा- ' क्या आप को गाड़ी चलाना आता है ? ' मैंने कहा चलाना तो नहीं आता, पर किसी से थोड़ा सीख लेना होगा. 
यह निश्चय करके जिस गैरेज में जीप को डेंटिंग-पेन्टिंग के लिये दिया गया था, उन्ही मिस्त्री लोगों को पूछा क्या मुझे थोड़ा गाड़ी चलाना सीखा देंगे ? तब वे एक मैदान में लेजाकर जीप को ड्राइव करके थोड़ी दूर तक आगे ले जाना और फिर बैक करके वापस उसी जगह में ले आने के लिये कहे. एक दिन केवल एक घन्टा इधर उधर स्टेरिंग काटना सिखाये, उसी मैदान में दूसरे दिन डेढ़ घन्टा एक्सीलेटर, ब्रेक, क्लच, गेअर आदि बदलने का अभ्यास करवा दिये, और थोड़ा सड़क पर लाकर इधर-उधर घूमा दिये. इस प्रकार कुल ढाई घंटे का ट्रेनिंग मिला. जब सब हो गया तो वहाँ से १० किलोमीटर जितना रास्ते पर गाड़ी को स्वयं ही चलाकर महामण्डल के हेड ऑफिस - खड़दा तक ले आया, और वहाँ लाकर बगीचे के एक किनारे में गाड़ी को खड़ा कर दिया. 
इसके कुछ दिनों के बाद मुझे से कहे कि, आपको ड्राइविंग लाइसेन्स लेने के लिये एक परीक्षा देनी होगी, आप अमुक तारीख को आ जाइयेगा. तब दूसरी बार पुनः उसी तारीख को खड़दा से १० किलोमीटर दूर तक गाड़ी खुद चला कर उस दफ्तर तक ले गया और गाड़ी को उनके दफ्तर के सामने ही गाड़ी खड़ा कर दिया. उस दफ्तर के सामने ही एक बहुत चौड़ा और गहरा ड्रेन है. उनके दफ्तर के चारदीवारी के भीतर घुसते समय जो छोटे छोटे स्लैब को ब्रीज के जैसा बना कर इधर उधर बिखरा रहता है, उससे निकाल कर गाड़ी को भीतर खड़ा कर दिया था. ऑफिस में जाकर बातचीत हुई. हमलोगों के एक और व्यक्ति भी वहाँ गये थे,जो उस समय महामण्डल के सहायक सचिव थे और बैरकपुर में रहते थे. जो इन्स्पेक्टर गाड़ी को चलाते देख कर लाइसेन्स देने के लिये अधिकृत थे, वही इंस्पेक्टर उस गाड़ी में बैठे और मुझसे बोले- ' आप स्टीयरिंग पर बैठिए '. वह लेफ्ट हैण्ड drive गाड़ी थी, मैं उधर ही बैठ गया.
जब हमलोगों के एक और सदस्य गाड़ी में बैठना चाहे तो, इन्स्पेक्टर ने कहा- ' आप मत बैठिए, आप नहीं बैठ सकते हैं. ' इंस्पेक्टर बोले- ' टेस्ट के समय इनके अलावा गाड़ी में और कोई नहीं रह सकते है.' वे नीचे ही खड़े रह गये. मुझसे बोले गाड़ी को बैक करके सड़क पर ले चलिए. गाड़ी को थोड़ा सा बैक करके उसी ब्रीज से कटाते हुए सड़क पर ले आये. इतना सब कुछ करने में गाड़ी का चक्का तीन-चार बार से अधिक नहीं मोड़ना पड़ा था. मुझसे पूछे, ' आप कितने दिनों से गाड़ी चला रहे हैं ? ' मैंने कहा मैं एक दिन यहाँ से गाड़ी चला कर १० किलोमीटर दूर खड़दा तक गया हूँ, और फिर आज १० किलोमीटर तक चला कर यहाँ ले आया हूँ- कुल मिलाकर यही २० किलोमीटर चलाया हूँ. इसके अतिरिक्त और दो दिन एक मिस्त्री के साथ एक मैदान में एक दिन एक घन्टा और एक दिन डेढ़ घन्टा एक मैदान में चलाने का प्रैक्टिस किया था, बस यही दो दिन चलाया था. " ऐसा तो हो ही नहीं सकता मैं इन्स्पेक्टर हूँ, इतना कुछ देखा हूँ, आप ने जरुर अनेकों बार गाड़ी चलाया है."
नहीं, मैंने इसके अलावा और कभी नहीं चलाया है, पहले बिल्कुल अनाड़ी था. " आखिर ऐसी महारत मिली कैसे ? " ऐसा होने का एक ही कारण है." यह गाड़ी स्वामीजी का कार्य करने के लिये आया है. हमलोगों के पास मासिक वेतन देकर ड्राइवर रखने कि क्षमता नही है, तब सीखे बिना उपाय क्या था, बस यही भावना और क्या ?" एवं उसके बाद इसी गाड़ी को लेकर विभिन्न स्थानों में जाना पड़ता था, उस गाड़ी से प्रचूर यात्रायें करनी पड़ती थी. उस समय बहुत से केन्द्र हो गये थे. कई स्थानों पर जाने कि आवश्यकता थी. वह सब कार्य सुचारू रूप से चलने लगा. फिर एक बार चर्चा हुई कि हमलोगों चन्दा तो अधिक मिलता नहीं है, रुपये-पैसों का इतना आभाव रहता है. तो एक सूत्र से जानकारी मिली कि आप लोग यदि यहाँ से गाड़ी लेकर मायावती-अल्मोड़ा की ओर निकलें तो आपलोगों के रास्ते में जितने शहर पड़ेंगे, पहले से बता देने पर उन शहरों में आपलोगों के रहने का इन्तजाम भी हो जायेगा और कुछ चन्दा भी इकठ्ठा हो जायेगा, क्योंकि मुझे एक ऐसे संघ के साथ परिचय जिनका बहुत से शहरों में केन्द्र है.
उसी योजना के अनुसार गाड़ी लेकर हमलोग रवाना हो गये. हमलोगों के दल में पाँच-छः लोग शामिल थे.जहाँ- जहाँ से भी  थोड़ा बहुत चन्दा मिलने की सम्भावना थी,  जिन जिन के यहाँ हमलोग रुकते थे उनसे ही पूछ पूछ कर एक जगह, से दूसरे जगह पर चन्दा भी एकत्र करने की चेष्टा करते हुए आगे बढ़ते चलते गये. कुछ कुछ प्राप्त भी होने लगा. इसी प्रकार हमलोग अल्मोड़ा पहुँच गये. अल्मोड़ा पहुँचने से पहले की ही घटना है, मैदानी समतल भूभाग समाप्त करके जब एक बार पहाड़ की चढ़ाई शुरू हुई तो गाड़ी बस एक पहाड़ के बाद दूसरे पहाड़ को पार करते हुए क्रमागत ऊपर की ओर ही चढ़ती चली गयी. काफी देर तक सफ़र करने के बाद भी रास्ते में कोई बस्ती, दुकान-मकान नहीं दिखाई दे रहा था, किन्तु बहुत आगे जाने पर एक चाय की दुकान दिख गयी.
हमलोगों ने विचार किया थोड़ा रुक कर चाय पी लिया जाये. वह दुकान एक मोड़ के किनारे पर थी. और मोड़ के पास थोड़ी सी जगह भी थी जहाँ गाड़ी खड़ी की जा सकती थी. वहीं पर गाड़ी को खड़ी करके हमलोगों ने चाय पिया.चाय पीने के बाद गाड़ी पर आकर बैठे और जब ईंजन को स्टार्ट किया तो, बार बार चाभी घुमाने से भी गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही थी. थोड़ा भी आगे पीछे नहीं हो रही थी. हमलोगों के साथ एक व्यक्ति ऐसे थे जो गाड़ी के जानकर थे. उनको देखने को कहे. वे बोनेट खोल कर थोड़ी देर तक निरिक्षण-परिक्षण करने के बाद बोले- " इसमें जो हुआ है, वह अभी किसी तरह ठीक नहीं हो सकता है." अमुक पार्ट्स बदल देना होगा, वह किसी कारण से काम नहीं कर रहा है, खराब हो गया है. यहाँ तो कोई पार्ट्स की दुकान आदि भी नहीं है. यहाँ से डेढ़ सौ- दो सौ माइल दूर टनकपुर माने पिथौड़ागढ़ तक जाने के बाद हो सकता है कि एक जगह वह विशेष पुर्जा प्राप्त हो जाये. पर चुकी यह डिस्पोजल का जीप है, यहाँ वह पार्ट्स मिल ही जायेगा कहना कठिन है. किन्तु उसके बाद एक समस्या और है उस पार्ट्स को बदलने के लिये जीप के गिअर बॉक्स भी उतार कर नीचे रखना होगा, उसके लिये बाँस कि जरुरत होगी, और बाँस यहाँ मिलेगा कहाँ ?हमलोगों ने देखा कि अब तो काफी देर हो चुकी है. इस समय वहाँ से कहीं भी जाना सम्भव नहीं था, उस समय कुछ भी करने का उपाय नहीं था.
बहुत संकोच के साथ उस चाय-दुकान वाले से ही पूछा गया कि क्या वहाँ पर रात में ठहरा जा सकता है ? वह बोला " आपलोग यहाँ कैसे रह पायेंगे ? सोने के लिये यहाँ कोई कमरा नहीं है, इसी दुकान की छत के नीचे बाँस-बल्ली लगाकर एक मचान जैसा छावनी बना दिया गया है; और इसी बाँस की सीढ़ी से ऊपर चढ़ कर सोना होता है. वहाँ थोड़ा पुआल आदि बिछा है यदि आपलोग वहाँ रहना चाहें तो रह सकते हैं. "
" हमलोगों को कोई आपत्ति नहीं है. किन्तु भोजन का क्या होगा ? हमलोगों के पास तो खाना बनाने का कोई समान नहीं है, एक-दो पाकेट बिस्कुट आदि सफ़र में जैसा रहता है, वैसा ही है. तुम्हारे पास क्या आंटा है ? " " हाँ, आंटा तो है."
" और क्या है, चिनि है ? " " हाँ, चिनि भी है." " कुछ रोटियाँ बना दे सकते हो ? " " आपलोग कहेंगे तो बना दूंगा. " उसने जब रोटी बना दिया तो हमलोगों ने उसमे चिनि लपेट कर खा लिया.और जितना सम्भव था, पेट भर कर पानी पी लिया गया. खा-पीकर उसी सीढ़ी से मचान पर चढ़ कर, किसी प्रकार रात बीता कर अगले दिन वह पुर्जा कैसे प्राप्त होगा, यही चर्चा चल रहा थी. सुबह में जब नीचे उतरे तो मन में बिचार आया की अच्छा देखा जाय न कि, आज सुबह में गाड़ी कि क्या अवस्था है?  सुबह में जब ईंजन को स्टार्ट किया तो तुरन्त स्टार्ट हुआ, गिअर लगाने से गाड़ी आगे पीछे भी हुई, बैक करने पर गाड़ी पीछे से आकर सामने सड़क पर खड़ी हो गयी. यह देख कर तो सभी आश्चर्य-चकित रह गये, यह क्या हुआ ? आखिर यह चमत्कार हुआ कैसे ?
बहुत देर के बाद यह बात समझ में आयी कि कल जो हमलोग लगातार चढ़ाई चढ़ते जा रहे थे, उसके कारण तेल कहीं से लिक करके गिअर बॉक्स में प्रविष्ट हो गया था और उस पुर्जे को गीला कर दिया था, जिसके कारण वह पुर्जा तब काम नहीं कर रहा था. इसीलिये वह समस्या हुई थी. सारी रात गाड़ी खड़ी थी, जिसके चलते सुबह में वह फिर से काम करने लगी है. जो हो, संकट खत्म हो गया था, हमलोग मायावती जा रहे थे. मायावती तक आराम से आ गये. वहाँ पर हम सभी लोगों के लिये रहने कि व्यवस्था थी. घूम-फिर कर आस-पास देख आया. स्वामीजी लोग जिस स्थान पर बैठ कर ध्यान करते थे, वहाँ की निस्तब्धता को देखकर ऐसा लगता था मानो जगत हो ही नहीं !
वसन्त रोग (चेचक) से आक्रान्त रहने के समय जो देखा था- " मैं मर गया हूँ, और जिस जगह पर शरीर का दाहसंस्कार कर दिया गया था, उसी स्थान को पुनः अपने सामने सेभियर के समाधि-स्थली के  रूप में साक्षात् देखा."(???) 
वहाँ से वापस लौटते समय उस समय अद्वैत आश्रम के जो प्रेसिडेन्ट थे, स्वामी बुद्धानन्दजी- वे हमलोगों से बोले " नवनीबाबू, आप एक काम कर सकेंगे ? " मैंने कहा, आप कहिये महाराज. " एड्ड नामका एक अमेरिकन भक्त आया हुआ है, वह जब लौटेगा तो उसको यहाँ से अकेला ही वापस लौटना होगा, यहाँ कोई गाड़ी-मोटर भी उपलब्ध नहीं है, यहाँ से काफी नीचे उतरने पर बस स्टैंड कई किलोमीटर दूर है, फिर वहाँ से भी किस समय बस मिलेगा यह भी निश्चित नहीं है.और वह तो यहाँ के लिये बिल्कुल नये हैं. और जब आपलोग भी उधर ही जा रहे हैं, तो उनको भी अपने साथ जीप में लेजाकर जहाँ कहीं भी मैदानी समतल भूभाग मिले इनको उतार दीजियेगा तो ये वहाँ से खुद चले जायेंगे."
' हाँ, महाराज निश्चय ही सही जगह में उतार दूंगा.'  तब वह मेरे दाहिनी तरफ आकर बैठ गया, पर वह इतना विशालकाय था कि उधर के सीट का तल्ली थोड़ा दब गया. वहाँ से कितने सुन्दर दृश्यों का अवलोकन करते हुए हमलोग धीरे धीरे नीचे उतर आये. उतरते उतरते काफी रात्रि हो चुकी थी, एक ऐसे जगह में आ पहुँचे जहाँ एक भी दुकान-मकान खुला हुआ नही दिख रहा था, और बहुत खोजने से भी ठहरने की कोई जगह नहीं मिली. वहाँ क्या किया जाय ? तब हमलोगों की दृष्टि एक भैंसे के तबेले पर जा पड़ी. वहाँ बहुत सी भैसे थीं. और जो लोग वहाँ भैंसे रखते थे, उनके बैठने के लिये कुछ खटिया-चौकी रखा था. दुकान सभी बन्द हो चुके थे. एक दुकान के भीतर बत्ती जाल रही थी. उसकी दुकान से कुछ मिठाई खरीद कर लाये और सबों ने मिल-बाँट कर खा लिया. एड्ड साहब को भी खिलाया गया. खाने के बाद उसी भैसे के तबेले के सामने थोड़ी खाली जगह थी, वहीं पर खटिया आदि डाल कर किसी प्रकार रात्रि बीता दी गयी. पर उनका कद-काठी इतना लम्बा था कि उनका सिर खटिया से बाहर हो रहा था.
दूसरे दिन सवेरा होने पर वहाँ से हमलोग आगे कि यात्रा शुरू किये. फिर से मिलो-मिल सड़क को पार करते हुए, एक जगह पार एक चाय कि दुकान देखने पर हमलोगों के मन में चाय पीने तथा कुछ मुख में देने (नाश्ता करने) की ईच्छा हुई. किन्तु उसने कहा, ' महाराज ने तो मुझ को बता दिया है कि बाहर का कोई चीज खाना नहीं है.' पर हमलोगों ने सोचा अब यहाँ से कितने मील दूर जाने पर कोई अच्छा सा होटल इत्यादि मिलेगा य़ा नहीं वह भी पता नहीं है. मैंने उसको समझाते हुए कहा, ' देखिये, पहली बात तो यह है कि वह जिस मिट्टी के कप में चाय दे रहा है उसमे कोई खराब कीटाणु आदि होने की सम्भावना नहीं है, उनलोगों ने उसको अच्छी तरह से धो भी दिया है; उसके बाद यह चाय भी खौलते हुए पानी में बनाया गया है, इसीलिये जितने भी कीटाणु आदि होंगे वे तो मर ही जायेंगे.
तुम बात मानो, हमलोग चाय पी रहे हैं, तुम भी थोड़ी चाय पी कर देखो.' तब वह मिट्टी के प्याली (भांड़) में एक भांड चाय पी कर बोलता है- " और पिऊंगा, थोड़ी और चाय पिऊंगा. " उसने दो-तीन भांड चाय पी लिया. दुकानदार उस समय पकौड़े छान रहा था. हमलोग तो पकौड़े खाएँगे ही. सुबह से कुछ खाया भी नहीं था. हमलोगों ने पकौड़े खाए. उसने पूछा - " What is that ?" मैंने कहा वह यहाँ का " Oil cake "-है. " Is it ?" यह कैसा होता है ? मैंने कहा यह तो बहुत टेस्टी है तुम यदि इसको एक बार मुख में डाल लिये तो फिर मांग मांग कर खाओगे. " Is it so ? " यह कहकर उसको एक पकौड़ा दिया गया. वह उसे खाने के बाद बहुत खुश हुआ और फिर और दो-चार पकौड़ा खा लिया. खा-पीकर फिर हमलोगों के साथ चलने लगा. इसी प्रकार काफी दूर तक आने के बाद, उसको एक ऐसे स्थान पर लाकर उतार दिया गया जहाँ से वह अपनी आगे की यात्रा को अकेले ही पूरी कर सकता था. वह चला गया. बहुत दिनों बाद महाराज ने कहा था कि एड्ड ने पत्र में लिखा था कि " मेरा उनलोगों ने बहुत ख्याल रखा था. किन्तु एक दिन रात्रि के समय, We had to pass a night in a stable. " तो महाराज बोले कि इसके उत्तर में मैंने लिखा था, " But this is wonderful !Was not Jesus Christ born in a stable ? " इसप्रकार से महाराज ने एड्ड का हौसला बढाया था. 
ऐसी कितनी ही घटनायें हैं. कुछ चन्दा भी एकत्र हो गया, किन्तु इसके साथ ही साथ हमलोगों ने मायावती का दर्शन भी कर लिया. फिर वहाँ से लौटते समय अल्मोड़ा भी गये थे. उस समय जो सन्यासी सुन्दरबन के मनसाद्वीप में पोस्टेड थे, वे भी तब वहीं पर थे. कितने ही वर्षों के बाद उनसे भेंट हुआ. वहाँ पर उन्होंने मुझे एक काम सौंप दिया. " बहुतों से पहले कह चुका हूँ, किसी ने किया नहीं है. उन्हीं वशी सेन की स्त्री ने अल्मोड़ा के ऊपर एक छोटा सा संस्मरणात्मक निबन्ध लिखा था, जो मेरे पास वैसे ही पड़ा हुआ है. क्या उस निबन्ध के साथ अल्मोड़ा के बारे में स्वामीजी से सम्बन्धित तथ्यों को एकत्र करके जोड़ कर एक पुस्तिका लिख सकते हैं ? " मैंने कहा, महाराज यह तो मेरा परम सौभाग्य होगा कि मैं उन सभी स्थानों का दर्शन कर लूँगा जहाँ जहाँ स्वामीजी गये थे.
तब एक सन्यासी मुझे अपने साथ लेकर उन सभी स्थानों का दर्शन कराने ले गये जहाँ बैठ कर स्वामीजी ने ध्यान किया था, वे घुमाते हुए मुझे उन समस्त स्थानों का दर्शन करा दिये; पर मैं यह भी मार्क कर रहा था कि वे मुझे प्रायः उन स्थानों पर अकेला छोड़ कर, स्वयं थोड़ी देर के लिये वहाँ से किनारे हो जाते थे. मैं उन सभी स्थानों पर बैठ कर स्वामीजी का ध्यान करने की चेष्टा किया था.तब मेरा ह्रदय महा आनन्द से भर गया था ! ह्रदय में एक अदभुत सिहरन जैसा अनुभव हुआ था ! एवं जिस स्थान पर दो नदियाँ आकर मील गयीं हैं, वहाँ पर जिस विशाल वृक्ष के नीचे बैठ कर स्वामीजी ने ध्यान किया था और जिस जहाँ पर कहा था-  
" आमार जीवनेर एकटा मस्त समस्या आमि महाधामे फेले दिये गेलुम ! "   
" -आज मेरे जीवन की एक बहुत गूढ़ समस्या का समाधान इस महा धाम में प्राप्त हो गया है ! "
इसी तरह अन्य कई महत्वपूर्ण तथ्यों का संग्रह कर के " अल्मोड़ार आकर्षण " नाम से एक छोटी सी पुस्तिका का पूरा मैटर तैयार हो गया. किन्तु तब मैंने कहा- " महाराज यहाँ पर बैठ कर तो लिख नहीं पाउँगा. मैंने समस्त तथ्यों को एकत्र कर लिया है. मैं जाकर लिखूंगा और और आपको भिजवा दूंगा."  आने का बाद जब लिखना हो गया तो उनको सूचित कर दिया. उन्होंने कहा, " यहाँ पर बंगला भाषा में उस पुस्तिका को छपवाने में असुविधा होगी. आप क्या उसको छपवा कर भेज सकते हैं ? " तब महामण्डल के द्वारा उस पुस्तिका को छपवा कर उसकी कुछ हजार प्रतियाँ हमलोगों ने अल्मोड़ा भिजवा दी थीं. उसके बाद उन्होंने कहा " अच्छा यह तो बंगला भाषा में है, अंग्रेजी में जो कुछ थोड़ी बहुत जानकारी उपलब्ध भी है तो उसमे कितने ही तथ्य नहीं हैं. क्या इस पुस्तिका को हिन्दी में भी छपवाया जा सकता है ? यहाँ के अधिकांश लोग तो बंगला पढना नहीं जानते हैं. " { हिन्दी में ' अल्मोड़ा का आकर्षण '- नामक महामण्डल पुस्तिका का मुद्रण पहली बार कैथोलिक प्रेस, पुरुलिया रोड, राँची से १४ अप्रैल १९९७ को हुआ था.
 स्वामीजी का उपरोक्त उद्गार - " आमार जीवनेर एकटा मस्त समस्या आमि महाधामे फेले दिये गेलुम ! "  
का वर्णन उस पुस्तिका के पृष्ठ संख्या ५ पर इस प्रकार दिया हुआ है- " स्वामीजी स्वामी अखंडानन्दजी के साथ नैनीताल पहुँचे कुछ दिनों बाद अल्मोड़ा के पथ पर पुनः उनलोगों ने अपनी पदयात्रा आरम्भ की. ...तीसरे दिन उन दोनों ने रात्रि व्यतीत करने योग्य एक मनोरम स्थान को ढूंढ़ निकाला.
पगडण्डी के निकट से ही कोशी ( कौशिकी) नदी बहती हुई चल रही थी. असंख्य छोटे-बड़े आकर के रोड़े-पत्थरों के ऊपर से होकर बहती हुई इस नदी को पैदल ही चलकर पार किया जा सकता था. एक स्थान पर दूसरी ओर से बह कर आती हुई सरोता नदी आकर कौशिकी का आलिंगन कर रही थी. 


दोनों के संगम-स्थली पर एक त्रिभुजाकार भूखण्ड उभर आया था. उसके बीच में एक विशाल पीपल का वृक्ष भी खड़ा था. स्वामीजी वहाँ रुककर खड़े हो गये, और स्वामी अखंडानन्दजी से कहा- " भाई, देखते हो यह स्थान तो ध्यान करने के लिये अत्यन्त उपयुक्त है ! "
उसने वहीं कोशी नदी में स्नान किया और ध्यान लगा कर उस वृक्ष के नीचे जा बैठे. कुछ ही क्षणों के भीतर वे गंभीर ध्यान में लीन हो गये, उनका पूरा शरीर निस्पंद हो गया था. कुछ समय के बाद ध्यान टूटने पर स्वामी अखंडानन्दजी से बोले- 
" आज मेरी एक दीर्घकालीन जिज्ञाषा का समाधान प्राप्त हो गया. सचमुच सृष्टि के आदि में केवल शब्दब्रह्म (१ॐ कार ) ही था. जो (' नाम ' य़ा शब्दब्रह्म ) पिण्ड में स्थित है, वही ( ' नाम ' य़ा शब्दब्रह्म ) इस ब्रह्माण्ड के पीछे भी अवस्थित है ! अनुविश्व (पिण्ड) और वृहत-विश्व (ब्रह्माण्ड ) दोनों के पीछे एक ही सत्ता ( ' शब्दब्रह्म ' ॐ कार और शक्ति  ठाकुर का नाम ) ही विराजमान है. जीवात्मा जिस प्रकार जीव के शरीर के भीतर ही अवस्थित होकर उसे चला रही है, विश्वात्मा भी उसी प्रकार इस प्रकृति (सृष्टि) के भीतर ही अवस्थित होकर इसको चला रही है ! शब्द ( ' नाम '-  परा, मध्यमा, पश्यन्ति और वैखरी ) और उसके अर्थ के समान ही ब्रह्म के ये दोनों रूप ( निराकार और साकार ) सनातन हैं ! अतः हमलोग जिस जगत को देख रहे हैं वह शाश्वत निराकार एवं शाश्वत साकार की मिलीजुली अभिव्यक्ति है ! " 
अल्मोड़ा के निकट जिस स्थल पर बैठ कर ध्यान करने स्वामीजी को साकार और निराकार ब्रह्म के बारे में जिज्ञाषा का समाधान प्राप्त हो गे था, उस स्थल का नाम है - काँकड़ी घाट. यह स्थल अल्मोड़ा से २३ किलोमीटर दूर है .}        
उसके बाद पुनः उस पत्रिका ( अल्मोड़ा का आकर्षण )  को हिन्दी में अनुवाद कर के पुनः प्रकाशित करवा कर अल्मोड़ा भिजवा दिया गया था. इस प्रकार थोड़ा बहुत ठाकुर-माँ- स्वामीजी की सेवा तो हुई ही, वहाँ आने वाले भक्तों की सेवा हुई, आश्रम की सेवा करने का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हुआ.

बार बार कहीं जाने की जाने की ईच्छा नहीं होती है. किन्तु एक जगह जाने से वहाँ से दूर एक पहाड़ के शिखर पर दंडायमान एक वृक्ष को लगातार टकटकी लगाकर देखने की ईच्छा होती थी; वह वृक्ष स्वामीजी के समय में भी उसी स्थान पर था, ऐसा लगता था मानो कोई जीवित प्राणी ऊपर खड़ा है. बहुत दिनों तक मुझे उस आश्रम के लाइब्रेरी कक्ष में रहने की व्यवस्था की गयी थी. रात्रि के समय में उस कक्ष के बाहर निकाल कर जहाँ से वह वृक्ष दिखायी देता था, वहाँ से चुचाप उसे बैठ कर देखता रहता था. 
दूसरे दिन सुबह में महाराज को मालूम हुआ तो उन्होंने कहा, " आप रात्रिबेला में बाहर बैठे हुए थे ? " मैंने कहा- " महाराज, वहाँ से सामने का दृश्य ऐसा दिखता है जहाँ बैठते ही स्वामीजी का जीवन, उनकी  बातें याद आने लगती हैं, क्या किया जाये ? "  " नहीं, नहीं, वैसे बाहर में मत बैठिएगा, यहाँ पर कभी कभी बाघ भी घूमता है ." मैंने कहा, " बाघ सामने आ जायेगा तो क्या होगा? अधिक से अधिक खा डालेगा- किन्तु यह विहंगम दृश्य तो छोड़ा नहीं जा सकता ! इसी तरह की अन्य कई तरह की अभिज्ञता इस जीवन में कुछ कुछ मिला है. कुछ कुछ सेवा करने का सूयोग भी कितने तरीके से कितने स्थानों पर प्राप्त हुआ है.          
                                                       
     

{It is said that Swami Vivekananda made three trips to Almora. After the passing away of Sri Ramakrishna, Swamiji, felt the need to travel across the country and the world to preach the words of Thakur and the Vedanta. In 1890, he walked from Nainital to Almora by foot with Swami Akahananda. Both were often ill with fever. He spent time in the Sehapahar (visible from the present lacation of the ashram) for meditation. Then crossed the Kosi river and climbed up to the Almora hill. Three kilometers short of Almora, in a place called Karbala, Swamiji fell on the ground, almost dying of exhaustion. His feet were blistered and he could not move any longer.
Swami Akhandananda ran hither and thither, looking for someone, to help. At the far end, he spotted near a graveyard, a Muslim fakir. He pleaded with him to give some food to Swamiji. But The Fakir was hesitant as his religion was different. Swami Vivekananda said � We are all brothers� The only food available with the fakir was a cucumber, which revived Swamiji. Life returned and they continued on their journey to reach Almora.

Today, where Swamiji fell, there is Vivekanada Rest House. It is an open platform where any one can come and stay and rest. The keys to this are with the grave keepers. Surrounding it is the expanse of a graveyard, with primordial silence. There is a Shrine that has been made over the grave of the fakir close by.


Visitors come during these months from all over the country both for meditation as well as tie in the sight seeing as well.
River Kosi winds her way...
Except for a few houses and the new library that is being built, the space is otherwise covered by trees and more trees, the pine with its shining needles and of course the all pervading silence in the air, only occasionally broken by the loud talk and laughter from insensitive visitors. Otherwise, what silence!

Tuesday, September 21, 2010

[55]" सत्यनिष्ठा "

मनसा द्वीप रामकृष्ण मिशन "
यह जो महामण्डल का कार्य चल रहा है, ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रयास बहुत ही महत्वपूर्ण है .और स्वामीजी भी तो यही चाहते थे- ' जगत का कल्याण '. सम्पूर्ण जगत का कल्याण, सभी देश के मनुष्यों का कल्याण. और माँ सारदा कि भाषा में वेदान्त का सार भी है- " कोई पराया नहीं, संसार तुम्हारा है ! " सभी को अपना जान कर यथासाध्य सबों के लिये कुछ (उनके मन को जगाने का प्रयास) करते जाना. किन्तु इस प्रयास में कूद पड़ने के पहले जो करनीय है, वह है -स्वयं को थोड़ा तैयार कर लेना. स्वयं थोड़ा तैयार हुए बिना यह कार्य होना सम्भव नहीं है. 
महामण्डल का कार्य कई स्थानों में चल रहा है. प०बंगाल के बिल्कुल दक्षिण में बंगोपसागर (बंगाल की खाड़ी) है. उसके बिल्कुल छोर पर अनेकों द्वीप हैं. हममे से वे लोग जो बीच में निवास करते हैं, हममे से कई लोगों ने केवल उनकी चर्चा सुनी है, परन्तु अपने आँखों से एक आध को ही देखा होगा. किन्तु उसकी धारणा नही की जा सकती. सुन्दरवन में एकसौ से भी अधिक द्वीप हैं.
उनमे से सागरद्वीप सबसे बड़ा है. सागरद्वीप में 'मनसाद्वीप रामकृष्ण मिशन ' केन्द्र है.उस अँचल के मनुष्यों के पास शिक्षा नहीं है, किन्तु उन पुराने सन्यासियों के बारे में कितने लोगों को पता है, जिन्होंने अपने ह्रदय में ठाकुर-माँ-स्वामीजी के उपदेशों के मर्म को धारण करके, वहाँ के लोगों के बीच इनकी शिक्षाओं को पहुँचा देने के लिये अपने प्राणों को न्योछावर करके कई वर्षों तक कार्य चलाया है?  
उस अँचल में गुरु विवेकानन्द के नाम पर अदभुत उत्साह जाग्रत हुआ था. कितने ही वर्षों पहले स्कूल कि स्थापना हुई है. उस स्कूल में एक सन्यासी उसकी स्थापना के समय से ही, कार्य किये थे. जब उनकी उम्र बहुत ज्यादा हो गयी तो उनका शरीर बिल्कुल जीर्ण-शीर्ण हो गया तब वे बेलुड मठ में invalid chair - पर बैठे कर इधर उधर का कुछ कार्य देखते थे. एक दिन उनका दर्शन करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था. वे उसी चेयर पर बैठे हुए थे, उनके सेवक गण उनके कान के निकट तेज आवाज में बोल बोल कर थोड़ा परिचय देने की चेष्टा किये. इस प्रकार एक महामण्डल नामक संस्था है, ये उसमे कार्य करते हैं. उन्होंने प्रसन्न होकर कहा था- ' वाः वाः बहत अच्छी बात है ! ' इनकी प्रसन्नता को देखने से जो आनन्द होता है, उसकी कल्पना भी नही  की जा सकती. 
परवर्ती काल में अनेकों साधु उसी सुन्दरवन में जाकर उस आश्रम के सञ्चालन का दायित्व ग्रहन किया है.आश्रम के बाहर सबसे पहले आता है- काकद्वीप. उसी रास्ते से होकर मनसाद्वीप जाने का मार्ग है.
इसीलिये वहाँ के कुछ निवासियों को मनसाद्वीप के सिद्धिदानन्दजी  ने वहाँ पर श्रीरामकृष्ण जन्मोत्सव मानाने की बात कही. सबसे पहले वहाँ पर रहने वाले नदिया के चाँद साहा एवं उनके व्यवसाई मित्र निर्मल पाल से इस सम्बन्ध में बातचीत किये. उनलोगों ने भी जन्मोत्सव के आयोजन के प्रति बहुत उत्साह और आग्रह दिखाया. किन्तु स्थानाभाव के कारण पहला उत्सव नदे बाबू के घर के छत पर ही आयोजित करना पड़ा. बाद में यह उत्सव एक क्लब के मैदान में आयोजित होने लगा और उन्हीं लोगों के उत्साह से काकद्वीप में भी ठाकुर का एक मन्दिर स्थापित हो गया. 
एक सन्यासी ने वहाँ आ कर उस मन्दिर के सञ्चालन का भार ग्रहण किया. उसके बादसे उसी जगह में उत्सव आदि होने लगे. वहाँ पर छोटे बच्चों के के लिये एक स्कूल निर्मित हो गया. इन सभी कार्यों में नदे बाबू का सहयोग मिला था, नदे बाबू एक गृहस्थ होने के बावजूद वयवसाय आदि में ज्यादा सिर नहीं खपाते थे.ठाकुर माँ स्वामीजी के विषय में पढना, रात रात भर जाग कर पढना और सर्वदा इसी को लेकर अपनी पूरी जिन्दगी समर्पित कर दिये थे. उस अँचल के घर घर में ठाकुर-माँ-स्वामीजी का भाव पहुँच गया है. वहाँ बहुत वर्षों से लगातार ठाकुर माँ स्वामीजी का उत्सव आयोजित होता आ रहा है. पर अब वही और भी अधिक फैलने लगा था. 
इस प्रकार होते होते अन्यान्य द्वीपों में भी ठाकुर का उत्सव मनाया जायेगा ऐसी योजना बनी. महामण्डल गठित होने के समय से ही प्रति वर्ष मुझे उस उत्सव में जाने के लिये कहते थे, और मैं जाया करता था. जहाँ तक मुझे याद है मैं लगातार पचीस-तीस वर्षों तक इन द्वीपों में प्रति वर्ष इधर उधर के कम से कम आठ, दस, बारह , चौदह द्वीपों तक के उत्सव में भाग लिया हूँ.केवल इस मनसा द्वीप में ही नहीं, इस प० बंगाल का सिवाना जहाँ तक है, वहाँ तक के कई द्वीपों में ठाकुर का उत्सव हुआ है. वहाँ पर जाने में अदभुत आनन्द मिलता था. किन्तु उन द्वीपों तक पहुँच पाना तब बहुत कष्टकर हुआ करता था, इधर सुनता हूँ कुछ उन्नति हुई है. 
किसी भी द्वीप में ठाकुर के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में दिन भर उत्सव मनाया जाता था, उसके बाद संध्या के समय थोड़ा गाना हुआ, आध्यात्मिक चर्चा सम्मलेन (आलोचना सभा) हुई, उसके बाद रात्रि में सभी एक साथ बैठ कर ' लंगर ' में भोजन किये. उस समय हमलोगों का एक प्रकार का यह अभ्यास सा ही हो गया था कि, एक द्वीप पर उत्सव समाप्त होते ही अगले द्वीप के उत्सव में भाग लेने के लिये निकल पड़ते थे.
उत्सव समाप्त होते होते रात्रि के बारह बज जाते थे, साढ़े बारह एक बजे तक भी हमलोग नौका में चढ़ कर सो रहते थे. एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक आवागमन का साधन यह नौका ही थी, परन्तु तब आज के जैसा मोटर चालित नावें नहीं हुआ करतीं थी, पतवार से चलने वाली नावें ही हुआ करती थीं. 
कई बार तो ऐसा भी होता था कि नौका रात भर चलती रहती थी. प्रातः काल में य़ा सुबह होने के बाद नौका किसी द्वीप में जाकर किनारे से लगती थी. उस द्वीप में नाव वाला घुटने तक जल में ही उतरने को कहता था, वह स्थान भी कादो-कीचड़ से भरा होता था. वहाँ उतरने के बाद किसी तरह कहीं थोड़ा सा जल मिला तो वहाँ रुक कर हाँथ पाँव धो कर फिर चलते चलो पैदल ही चलते जाना होता था क्योंकि जब रोड जैसा कुछ था ही नहीं तो किसी यान-वाहन का प्रश्न ही कहाँ उठता था.टेंढ़े-मेंढे पगडंडियों से होकर य़ा बांध के ऊपर से चलते चलते आधा घन्टा, एक घन्टा, डेढ़ घन्टा पैदल चलने के बाद जहाँ उत्सव होने वाला होता वहाँ हमलोग पहुँच पाते थे. जैसे तैसे वहाँ पहुँचने के बाद स्नान-भोजन-भजन समाप्त करके थोड़ा विश्राम करने के बाद संध्या में उत्सव में भाग लेते थे. वहाँ से कार्यक्रम समाप्त होने के बाद फिर अगले द्वीप पर उत्सव में भाग लेने के लिये निकलना होता था. इस प्रकार अनेकों बार हुआ है. प्रत्येक वर्ष वहाँ के उत्सव में जाने का सौभाग्य मिला है. 
वहाँ के निवासियों में ठाकुर-माँ स्वामीजी के प्रति अदभुत आकर्षण, प्रेम, श्रद्धा निवेदन की चेष्टा को देखने से बहुत आश्चर्य होता था. वहाँ के अधिकांश निवासी अशिक्षित थे. किसी किसी द्वीप में स्कूल भी है, वहाँ के निवासी शिक्षित भी मिलते थे. उस समय मनसाद्वीप में जो सन्यासी थे, वे वहाँ बहुत दिनों से थे तथा उनकी उम्र भी बहुत अधिक हो गयी थी, और वे एक अत्यन्त अच्छे मनुष्य थे.दुबला-पतला शरीर, दीर्घ चेहरा, ऐसा लगता मानो उनको चलने-फिरने में थोड़ा कष्ट का अनुभव भी होने लगा था. किन्तु उनके चेहरे पर कभी थकान नही दिखता था. माइल पर माइल पैदल ही चलते जा रहे हैं, तो जा रहे हैं. उनकी एक दो बातें याद जिन्हें मैं बांटना चाहूँगा. 
वे एक समय में रामकृष्ण मिशन के एक बड़े स्कूल में प्रधान शिक्षक के पद पर कार्यरत थे. वहाँ पर एक दिन एक ब्रह्मचारी आकर उनसे कहते हैं- ' कल तो प्राइज डिस्ट्रीब्युसन होने वाला है, उसके साथ सभी लडकों को सर्टिफिकेट आदि भी दिये जायेंगे, ढेर सारे सर्टिफिकेट देने हैं, इन सब पर आप आज ही हस्ताक्षर करके रख दीजिये.' जब वे एक सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने के बाद उस पर तारीख डालने ही वाले थे तो ब्रह्मचारीजी ने कहा- ' महाराज, आज की तारीख मत डालियेगा, वहाँ पर कल की तारीख डालनी होगी, क्योंकि यह सर्टिफिकेट तो कल देना होगा.' वे थोड़ी देर तक उस ब्रह्मचारी के चेहरे की ओर देख कर एक ओर रखने के बाद बोले- ' आज हस्ताक्षर कराना चाहते हो तो इस पर आज का ही तारीख दिया जायेगा, यदि कल की तारीख चाहते हो तो हस्ताक्षर भी कल ही होगा.'
और एक घटना है, इसी तरह किसी द्वीप में संध्या-सभा हो रही थी, वे ज्यादा बोलते नही थे, भाषण तो बिल्कुल ही नही देते थे. सभा के शुरुआत में एक दो बात कह दिया करते थे, जैसे- ' हमलोग कल अमुक जगह गये थे, आज यहाँ आये हैं, कल अमुक जगह जायेंगे. वहाँ पर ठाकुर का उत्सव हो रहा है. ' इसी प्रकार सामान्य ढंग से दो-चार बातें बता दिये करते थे, अधिक कुछ नही कहते थे. ऐसा नहीं था कि उनको बोलना नहीं  आता था, किन्तु ऐसा प्रतीत होता था कि वे बोलना नहीं चाहते थे. किन्तु सभी सभाओं में भाग लेते थे, और बैठे रहते थे. उनकी मौन सौम्य मूर्ति को देखने मात्र से ही सभी का मन आनन्द से भर उठता था. 
मुझे एकबार कि घटना याद आती आती है जिसे मैं बताये बिना नहीं रह सकता. कैसे कैसे सन्यासियों के दर्शन का सौभाग्य हुआ है, कितनो को ही देखा है. जब सभा समाप्त हो गया तो देखता हूँ वे माइक्रोफोन को पकड़ कर अपनी ओर खींच रहे हैं. हमलोगों को तो आश्चर्य हुआ ही, अन्य लोग भी थोड़ा विस्मित हुए कि जो महाराज कभी कुछ बोलना नहीं चाहते हैं, वे उसको अपनी पर खींच क्यों रहे हैं ? वे माइक पकड़ कर बोलते हैं - ' मुझसे उस समय बोलते समय एक भूल हो गयी है, मैंने कहा था कि कल मैं अमुक जगह गया था, वह भूल से निकल गया था, कल मैं वहाँ नहीं गया था, वहाँ तो मैं परसों गया था.' इस प्रकार से बोल कर उनहोंने अपने भूल को संशोधित कर लिया था. ' ऐसी सत्य निष्ठा ! कल्पना भी नहीं की जा सकती.
और एक वाकया है- मनसा द्वीप में मिशन के पास अपने धान के खेत हैं. उस जमीन में धान की पैदावार होने पर सरकार को एक ' लेभि ' चुकानी पड़ती है. लेभि के लिये सरकार नोटिस भेजती है. उसमे लिखा रहता है कि आपको जितना धान उपजा है उसका इतना अंश सरकार को देना होगा. मिशन में नोटिस आया था, उसके अनुसार लेभि का धान पहुँचा ही दिया गया था. उसके बाद वे उस नोटिस को देख रहे थे. बैठ कर उस नोटिश को अच्छी तरह से देखने के बाद लेभि की मात्रा का हिसाब-किताब करने लगे. उपज कितनी हुई और उसपर लेभि कितना दिया गया है, इसका हिसाब लगा कर उन्होंने देखा कि उसमे भूल हो गयी है. सरकार के नोटिश में जितनी लेभि मांगी गयी है, उसमे भूल है. 
जिस ऑफिस से नोटिश आया था वह आश्रम से दो माइल दूर है, गर्मी का दिन था और दोपहर का समय, वे उसी समय सिर पर छाता लगा कर पैदल ही चल पड़े. वहाँ जाकर उस अफसर के कमरे सामने जा कर खड़े हुए.साहब के दरवान ने कहा- ' साहब अभी व्यस्त हैं,भीतर मत जाइये.' थोड़ी देर बाद फिर देखने गये तब कहा कि, ' अभी साहब के पास कुछ लोग हैं, नही जाइये.' उसके बाद जब काफी देर हो गया तो वे खुद थोड़ा पर्दा खिसका कर देखने कि चेष्टा करते हैं. पर्दा खिसकते ही जो अफसर हैं- बोलते हैं, ' क्या है, आप को क्या काम है? ' 
तब वे हाथों में नोटिश लिये हुए थोड़ा आगे बढ़ कर, जैसे ही कमरे में प्रवेश किये हैं,उस कागज के रंग को देख कर ही साहेब पहचान गये है कि, यह लेभि जमा कराने का नोटिश है. दूर से ही देख कर कहते हैं, ' नहीं नहीं, अब इसमें कुछ भी नहीं किया जा सकता, बिल्कुल सही है, जितना है, एकदम ठीक है. अब उसमे कुछ भी नहीं किया जा सकता है.' अफसर समझ रहे थे कि महाराज उनके पास आवेदन करने आये होंगे कि लेभि ज्यादा लग गया है, इसको थोड़ा कम कर दिया जाय, इतना ज्यादा नहीं होना चाहिये. महाराज बोले,' नहीं नहीं, मेरी बात तो सुनिए, मैं किस लिये आया हूँ कमसे कम इतना तो सुनियेगा. ' ' बोलिए आपकी क्या बात सुनूँ ?' साधु कहते हैं- ' आप लोगों से हिसाब लगाने में भूल हो गयी है, लेभि तो और अधिक लगनी चाहिये थी, कानून के अनुसार हमलोगों को इतना मन धान और ज्यादा देना होगा.'
 यही है ' सत्य-निष्ठा '- सत्य पर अटल रहना. ऊपर से इतनी अधिक उम्र में, दुबले पतले शरीर को लेकर इतनी दूर पैदल चल कर सत्य बतलाने की असाधारण चेष्टा की जितनी भी बड़ाई की जाये कम है.
इस प्रकार की अनेकों घटनाएँ अनेकों लोगों को देखा हूँ. एक बार मनसा द्वीप में उत्सव हो रहा है, संध्या अनुष्ठान हो जाने के बाद रात्रि में ' जात्रा-पार्टी ' का भी कार्यक्रम होने वाला है.उत्सव में बहुत भारी भीड़ इकट्ठी हुई है.महाराज मंच पर बैठे हुए हैं, चेयर नहीं था, तो टेबल के ऊपर ही बैठ गये हैं. रात्रि के अन्त में पौ फटते समय उठ कर देखता हूँ कि जात्रा उस समय तक भी चल रहा था और महाराज उसी प्रकार बैठे हुए हैं. वे इसीलिये बैठे हैं कि जो लोग जात्रा कर रहे हैं, उनको वहाँ बैठे देख कर आनन्दित होंगे. इसीलिये (दूसरों को आनन्द देने के लिये) रात भर टेबल के ऊपर बैठे हुए रह गये हैं, पीठ भी टिकाने का अवसर नहीं मिला है, पर चेहरे पर कोई थकान नहीं हैं. मनुष्य को कोई साधु ही इतनी मर्यादा-दान कर सकता है, हमारे जैसे साधारण लोग तो जात्रा करने वाले मनुष्यों को गवैया-नचैया ही समझते हैं.             
ngrove forest, manik, Sundarbans
Sundarbans is the largest mangrove forest in the world

Sundarbans is the Sundarbans is situated Bangladesh and India both country.The Sundarbans features a complex network of tidal waterways, mudflats and small islands of salt-tolerant mangrove forests.Located about 320 km. south-west of Dhaka and spread over an area of about 60000 sq, km of deltaic swamps along the coastal belt of Khulna.Sundarbans is accessed from Kolkata ( Calcutta) by traveling either towards the South East or the South West. The South West route takes one through Diamond Harbour to Kakdwip and Namkhana. You can take a boat from these places or from Gangadharpur and visit Lothian Island and surrounding areas.The South Eastern route is more popular. You drive 86 kms through wetlands and agricultural land to reach Sonakhali. You can take a 3 hour boat ride from Sonakhali jetty to Sajnekhali Tourist Lodge or cross over to Basanti. From Basanti you can take an auto-rickshaw ride to Gadkhali (11kms). At Gadkhali take the ferry to cross the Bidya river to arrive at Gosaba. A Cycle Rickshaw ride will take you to Pakhiralaya in about half hour. Sajnekhali is across the water from Pakhiralaya. A UNESCO World Heritage Site (awarded in ’97) , Sundarban is a vast area covering 4262 square kms in India alone, with a larger portion in Bangladesh. The total area of the Indian part of the Sundarban forest, lying within the latitude between 21°13’-22°40’ North and longitude 88°05’-89°06’ East, is about 4,262 sq km, of which 2,125 sq km is occupied by mangrove forest across 56 islands and the balance is under water. The Sundarbans is the world's biggest mangrove forest - the home of the Royal Bengal tiger. The Royal Bengal tiger being the most famous, but also including many birds, spotted deer,crocodiles and snakes.the Sundarbon Indian restaurant in Monk Street, Abergavenny, is an exotic treasure just waiting to be discovered. Specialising in aromatic Bengali dishes, our chefs are masters in the art of preparing flavoursome food for diners who enjoy an authentic Indian experience.These dense mangrove forests are criss-crossed by a network of rivers and creeks.

November to March is best time to visit this forest.


Kakdwip subdivision (Bengali: কাকদ্বীপ মহকুমা), is a subdivision of the South 24 Parganas district in the state of West Bengal, India. It consists of four community development blocks: Kakdwip, Namkhana, Patharpratima and Sagar. The four blocks contain 42 gram panchayats. The subdivision has its headquarters at Kakdwip.

Area

The subdivision contains rural areas of 42 gram panchayats under four community development blocks: Kakdwip, Namkhana, Patharpratima and Sagar.There is no urban area under these four blocks.

 Blocks

Kakdwip block

Rural area under Kakdwip block consists of 11 gram panchayats, viz. Bapuji, Rabindra, Sri Sri Ramkrishna, Swami Bibekananda, Madhusudanpur, Ramgopalpur, Srinagar, Netaji, Rishi Bankimchandra, Suryanagar and Pratapadityanagar. Kakdwippolice statin serves this block. Headquarters of this block is in Pakurberia.

 Namkhana block

Rural area under Namkhana block consists of seven gram panchayats, viz. Budhakhali, Haripur, Namkhana, Shibrampur, Frezarganj, Mausini and Narayanpur. Namkhana and Kakdwip police stations serve this block. Headquarters of this block is in Namkhana.

Patharpratima block

Rural area under Patharpratima block consists of 15 gram panchayats, viz. Achintyanagar, Dakshin Raipur, Gopalnagar, Ramganga, Banashyamnagar, Digambarpur, Herambagopalpur, Sridharnagar, Brajaballavpur, Durbachati, Laksmijanardanpur, Srinarayanpur Purnachandrapur, Dakshin Gangadharpur, G Plot and Patharpratima. Patharpratima police station serves this block.Headquarters of this block is in Ramganga .

 Sagar block

Rural area under Sagar block consists of nine gram panchayats, viz. Dhablat, Dhaspara Sumatinagar–II, Ghoramara, Ramkarchar, Dhaspara Sumatinagar–I, Muriganga–I, Rudranagar, Gangasagar and Muriganga–II Sagar police station serves this block. Headquarters of this block is in Rudranagar.

Legislative segments

As per order of the Delimitation Commission in respect of the delimitation of constituencies in West Bengal, the area under the Patharpratima block forms the Patharpratima assembly constituency. The Kakdwip block, along with two gram panchayats under the Namkhana block, viz. Budhakhali and Narayanpur, will form the Kakdwip assembly constituency. The other five gram panchayats under the Namkhana block along with the area covered by the Sagar block will form the Sagar assembly constituency. All the three constituencies will be assembly segments of the Mathurapur (Lok Sabha constituency), which will be reserved for Scheduled castes (SC) candidates.
As per orders of Delimitation Commission, 131. Kakdwip constituency will cover Kakdwip CD Block and Budhakhali and Narayanpur gram panchayats of Namkhana CD Block.

       

                         

Monday, September 20, 2010

[54] " खण्ड का जगत और अखण्ड का जगत "

 " निवृत्ति मार्ग के सप्त ऋषियों में से एक हैं- स्वामी विवेकानन्द. " 
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- " जगत दो हैं जिनमें हम बसते हैं- एक बहिर्जगत और दूसरा अंतर्जगत. खोज पहले बहिर्जगत में ही शुरू हुई. परन्तु उससे भारतीय मन को तृप्ति नहीं हुई. अनुसंधान के लिये वह और आगे बढ़ा..खोज अन्तर्जगत में शुरू हुई, क्रमशः चारों ओर से यह प्रश्न उठने लगा- ' मृत्यु के पश्चात् मनुष्य का क्या हाल होता है?
' अस्तीत्यैके नायमस्तीति चैके ' (कठ० उ० १/१/२०) 
--' किसी किसी का कथन है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व रहता है, और कोई कोई कहते हैं कि नहीं रहता; हे यमराज ! इनमें कौन सा सत्य है ? 'समस्या के समाधान के लिये भारतीय मन ने अपने में ही गोता लगाया, तब यथार्थ उत्तर मिला. वेदों के इस भाग का नाम है उपनिषद या वेदान्त या आरण्यक !."(5/285) }
सृष्टि कि रचना के समय कि बात है. सृष्टि करते समय जब सृष्टा ने ' मनुष्य ' को गढ़ा तो उनको सबसे अधिक आनन्द हुआ, इतना आनन्द उनको अन्य किसी भी चीज को गढ़ने से नहीं हुआ था. तब सभी ने ईश्वर की इस सर्वश्रेष्ठ रचना - ' मनुष्य ' को प्रणाम किया. जिसका स्वाभाव शैतान के जैसा होता है, केवल वही मनुष्य के सामने अपना शीश अवनत नहीं करता.
इसीलिये सम्पूर्ण विश्व के मानव-समाज को आर्य (यथार्थ मनुष्य ) बनाना चाहिये, किन्तु पहले पहल कम से कम भारतवर्ष के नागरिकों को एक प्रबुद्ध नागरिकों का समाज य़ा एक यथार्थ मनुष्यों के समाज के रूप में अवश्य निर्मित करना होगा. मनुष्य ही देवता (जैसा )बन सकता है. मनुष्य के भीतर ही सब कुछ है. उत्तर गीता के एक  साधारण श्लोकांश में कहा गया है-कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो जाने के बहुत दिनों बाद एक दिन अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं- " आपने उस समय जो गीता सुनाया था, बहुत अच्छा लगा था, उसी तरह के कुछ उपदेश और दीजियेगा ? " श्रीकृष्ण कहते हैं - " उस समय मैंने तुमको योगस्थ होकर उपदेश दिया था, वैसा क्या बार बार थोड़े ही कहा जा सकता है ?  पर जब तुम कुछ कहने के लिये कह रहे हो तो बोलता हूँ. " ऐसा कहने के बाद श्रीकृष्ण ने जो कहा था, उसको ' उत्तर गीता ' कहा जाता है. अनुगीता, ब्रह्मगीता और ब्राह्मणगीता एक दूसरे के क्रम से हैं -उसमे एक जगह पर वे कहते हैं-
 " नरत्वम् नारायणोsसी " 
" - मनुष्य ही नारायण है ! " 
एवं श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ने स्वामी विवेकानन्द के भीतर इसी नारायण ऋषि को प्राप्त किया था, उनको लाये थे, उपस्थित किये थे. ठाकुर स्वामीजी को अपने साथ लेकर आये थे, ऐसा स्वीकार करने के बाद इसकी जो कहानी कहे थे, वह अदभुत कहानी है. उस कहानी को हमलोग बहुत चिन्तन मनन करने के बाद भी कितना समझ पाते हैं ?
महाभारत के ३४० वें अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है. एवं गीता के शंकरभाष्य के उपोदघात (भूमिका ) में अति संक्षेप में यही कहानी कही गयी है. इस प्रकार हम समझ सकते है कि स्वामी विवेकानन्द उस प्रवृत्ति मार्ग के सप्त ऋषियों में से एक नहीं हैं. बल्कि निवृत्ति मार्ग के सप्त ऋषियों में से एक हैं- स्वामी विवेकानन्द.
'ठाकुर एक दिन कहते हैं -" एक दिन मैं ने देखा कि- मैं ( मेरा मन ) पृथ्वी को पीछे छोड़ कर आकाश पथ से ऊपर की ओर ही उठता जा रहा है. वायूमंडल की सीमा जहाँ तक है उसको भी यह लाँघ गया है,उसके बाद और भी ऊपर जाते जाते देखता हूँ कि एक ज्योतिर्मय विभाजक जैसा घेरा दिया हुआ है.उसके एक ओर है खण्ड का जगत और ऊपर की ओर है अखण्ड का जगत.
उस विभाजक रेखा को लाँघ कर और भी ऊपर की ओर जाते जाते देखता हूँ, बहुत से देवी देवता बैठे हुए है, वे लोग भी पीछे छूटते चले गये.उसके बाद और ऊपर जाते जाते देखता हूँ कि महाशून्य के भीतर स्थित किसी अन्य लोक में पहुँच गया हूँ. वहाँ पहुँच कर देखता हूँ कि सात प्राचीन ऋषि समाधिस्त होकर बैठे हुए हैं. उनके नेत्र मूंदे हुए हैं और वे बिल्कुल ध्यानमग्न अवस्था में हैं.फिर ठाकुर कहते हैं- मैंने देखा कि उसके भी और उपरी आकाश से एक देव शिशु मानो धीरे धीरे उतर रहे हैं और उन ऋषियों में से एक के पास जाकर  उस देव शिशु ने प्रेम से उनके गले में गलबहियाँ डाल दिया,
तथा कोमल स्वर में उनको समाधि से जगाने के लिये चेष्टा करने लगे. किन्तु उनकी समाधि किसी भी तरह से भंग ही नहीं हो रही थी. बहुत समय के बाद थोड़ी मधुर मुस्कान बिखेरते हुए अपने अधखुले नेत्रों से उस देव-शिशु को देख लिये. तब उसशिशु ने उस ऋषि को कहा- ' मैं जा रहा हूँ, तुम भी आना.' तब उस ऋषि के मुख पर एक स्मित हँसी खेल गयी. " इस प्रकार उस ऋषि को वे ले आये.वह ऋषि ही स्वामी विवेकानन्द हैं. उन सप्तऋषियों में से ही एक ऋषि हैं स्वामी विवेकानन्द !


{ स्वामी सारदानन्द जी अपनी पुस्तक श्रीरामकृष्ण लीला प्रसंग; तृतीय खण्ड के पृष्ठ ८० पर इस कहानी का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि, श्रीरामकृष्ण देव ने अपनी अपूर्व सरल भाषा में उस दर्शन की बातें हमे बतायी थी. उस भाषा का हू ब हू प्रयोग कर पाना हमारे लिये असम्भव है, इसीलिये उनकी भाषा यथासाध्य ज्यों की त्यों रखकर हमने उसे यहाँ संक्षेप में व्यक्त किया है. जो इस प्रकार है- 
" एक दिन देखा - ' मन ' ( मेरा परिवर्तनशील मिथ्या व्यक्तित्व य़ा सूक्ष्म शरीर ) समाधि के मार्ग से ज्योतिर्मय पथ में ऊपर उठता जा रहा है. चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र से युक्त स्थूल जगत का सहज में ही अतिक्रमण कर वह पहले ' सूक्ष्म-भाव के जगत ' में प्रविष्ट हुआ. उस राज्य के ऊँचे से ऊँचे स्तरों में वह जितना ही उठने लगा, उतना ही अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ पथ के दोनों ओर दिखायी देने लगीं. क्रमशः उस राज्य की अन्तिम सीमा पर ' वह ' (मेरा Mind य़ा परिवर्तनशील ' अहम् ' ) आ पहुँचा.वहाँ देखा, " एक ज्योतिर्मय परदे के द्वारा खण्ड (Relative Truth )और अखण्ड ( Absolute Truth)  "राज्यों का विभाग किया गया है.
उस परदे को लाँघ कर वह (मन ) क्रमशः अखण्ड राज्य में प्रविष्ट हुआ. वहाँ देखा, मूर्तरूप धारी कुछ भी नहीं है, यहाँ तक कि दिव्य देहधारी  देवी-देवता भी वहाँ प्रवेश करने का साहस न कर सकने के कारण बहुत दूर नीचे अपना-अपना अधिकार फैलाकर अवस्थित हैं. किन्तु दूसरे ही क्षण दिखाई पड़ा कि दिव्य ज्योतिर्घन तनु सात प्राचीन ऋषि वहाँ समाधिस्त होकर बैठे हैं.
(बुद्धि ने ) समझ लिया कि " ज्ञान और पुण्य " में तथा " त्याग और प्रेम " में ये लोग मनुष्य का कहना ही क्या, देवी-देवता तक के परे पहुँचे हुए हैं. विस्मित होकर इनके महत्व के विषय में सोचने लगा. इसी समय सामने देखता हूँ, अखण्ड भेद-रहित, समरस, ज्योतिरमण्डल का (जगत्कारण परमात्मा य़ा सर्व व्याप्त सत्ता) का एक अंश घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु के रूप में परिणत हो गया.वह देव-शिशु उनमे से एक के पास जाकर अपने कोमल हाथों से आलिंगन करके अपनी अमृतमयी वाणी से उन्हें समाधि से जगाने के लिये चेष्टा करने लगा. शिशु के कोमल प्रेम-स्पर्श से ऋषि समाधि से जागृत हुए और अधखुले नेत्रों से उस अपूर्व बालक को देखने लगे.उनके मुख पर प्रसन्नोज्वल भाव देख कर ज्ञात हुआ, मानो वह बालक उनका बहुत दिनों का परिचित ह्रदय का धन है. वह अदभुत देवशिशु 
 ( जगत्कारण के साथ अद्वैत भाव में अवस्थित श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ईश्वर के लोक-कल्याण साधन रूप कर्म को प्रतिक्षण अपना ही समझकर अनुभव कर रहे थे. इसी के प्रभाव से उन्हें ज्ञात हुआ कि वर्तमान युग का धर्मग्लानि नाश रूपी महान कार्य, उनके शरीर और मन को यंत्ररूप बनाकर साधित हो, यही विराट की ईच्छा है. फिर उसी के प्रभाव से वे समझ सके थे कि क्षूद्र स्वार्थ साधन के लिये नरेन्द्रनाथ का जन्म नहीं हुआ है, बल्कि ईश्वर के प्रति अत्यन्त अनुराग रहने के कारण उपरोक्त जनकल्याण साधन कर्म में, उन्हें सहायता देने के लिये ही उसका आगमन हुआ है. इसीलिये स्वार्थ रहित नित्यमुक्त नरेन्द्र को परम आत्मीय समझना और उनके प्रति प्रबल भाव से आकृष्ट होना ठाकुर के लिये स्वाभाविक ही था. (लीलाप्रसंग :३: पृष्ठ ९०)    
अति आनन्दित हो उनसे कहने लगा-
' मैं जा रहा हूँ, तुम्हें भी आना होगा ! '
उसके अनुरोध पर ऋषि के कुछ न कहने पर भी, उनके प्रेमपूर्ण नेत्रों से अन्तर की सम्मति प्रकट हो रही थी. 
इसके अनन्तर ऋषि बालक को प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखते हुए पुनः समाधिस्त हो गये. उस समय आश्चर्य-चकित होकर मैंने (ठाकुर ने ) देखा कि उन्हीं  के शरीर-मन का एक अंश उज्जवल ज्योति के रूप में परिणत होकर विलोम मार्ग से धराधाम में अवतीर्ण हो रहा है. नरेन्द्र को देखते ही मैं जान गया था कि यही वह ऋषि है ! "
किन्तु ' सप्तऋषि ' में से एक ऋषि कहते समय अक्सर हमलोग उत्तर आकाश में जो सात तारे दिखायी देते हैं हम लोग उनमे से ही एक ऋषि स्वामी विवेकानन्द को समझ लेते हैं, किन्तु वैसा समझना ठीक नहीं है.
पुराणों में वर्णन मिलता है, शंकराचार्य के गीता भाष्य के प्रारम्भ में इस कहानी को सामान्य तरीके से वर्णन किये हैं. ब्रह्माजी ने जगत कि सृष्टि करने के बाद देखा कि इतना सुन्दर (पेड़-पहाड़ समुद्र नदियाँ) जगत की रचना तो मैंने कर दिया, किन्तु इसको देखने के लिये लोग कहाँ हैं, कौन इसको देखेगा ?
तब उनहोंने अपनी ईच्छा से सात ऋषियों की सृष्टि किये.ये वही सप्त ऋषि हैं जो उत्तर आकाश में दिखायी पड़ते हैं. पुलह, क्रतु, पुलस्त, अत्री इत्यादि सात ऋषि, किन्तु ह मे यहाँ यह ध्यान देना होगा कि ये लोग प्रवृत्ति मार्ग के ऋषि हैं, अतः ये लोग मनुष्य को प्रवृत्ति के मार्ग पर ले जायेंगे.
  मनुष्य में कई तरह कि प्रवृत्तियाँ रहती हैं. उसके कारण उनका वंश-विस्तार होगा, बहुत से लोग जन्म लेंगे. अनेक मनुष्य जन्म लेकर जब ब्रह्माजी के रचे इस अपूर्व सुन्दर जगत को देखेंगे तो बहुत खुश होंगे.
उसके बाद ब्रह्माजी के मन में विचार उठा कि यदि सभी मनुष्य प्रवृत्ति -मार्ग पर ही चलने लगेंगे तो दिनों दिन यह मनुष्य जाति अपना मनुष्यत्व खोने लगेगी. आज के समाज में हमलोग जैसा देख रहे हैं. 
तब उन्होंने निर्णय लिया कि नहीं, केवल प्रवृत्ति-मार्ग को जानलेने से ही नहीं होगा, निवृत्ति को भी सीखना होगा. ऐसा विचार करके उन्होंने पुनः अपनी ईच्छा से सन, सनक , सनन्दन आदि सात ऋषियों की सृष्टि किये. 
महाभारत के ३४० वें अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है. एवं गीता के शंकरभाष्य के उपोदघात (भूमिका ) में अति संक्षेप में यही कहानी कही गयी है. इस प्रकार हम समझ सकते है कि स्वामी विवेकानन्द उस प्रवृत्ति मार्ग के सप्त ऋषियों में से एक नहीं हैं. बल्कि निवृत्ति मार्ग के सप्त ऋषियों में से एक हैं- स्वामी विवेकानन्द.
उन्हीं सात ऋषियों में से एक का नाम है- ' नारायण '. स्वामी विवेकानन्द वही नारायण ऋषि हैं.(दक्षिणेश्वर में प्रथम दर्शन के दिन ठाकुर कहते हैं- ' आमि जानी प्रभु तूमि सेई नारायण ! ' ) अर्थात ' नरेन्द्रनाथ दत्त ' निवृत्ति मार्ग के सप्त ऋषियों में से एक ' नारायण ' नामक ऋषि हैं; जिनके गले में एक शिशु के जैसा आलिंगन करके ठाकुर अपने साथ लीला-सहचर के रूप ले आये थे ! इस नारायण का अर्थ बैकुण्ठ वाले - नारायण नहीं है. स्वामीजी को बैकुण्ठ का नारायण समझना ठीक नहीं होगा. एक पुराण में आता है कि एक ऋषि ऐसे हुए थे जो एक पर्वत की चोटी पर बैठ कर सहस्र वर्षों तक गायत्री का जप किये थे, जिसके फलस्वरूप वे ब्रह्मलोक में गये थे. 
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Sri Ramakrishna’s vision of Nara-Narayana in Narendranath

Accompanied by a devotee and a few friends, Narendra one day came to Dakshineswar and entered the small room of Sri Ramakrishna. He came by the western door, as Sri Ramakrishna described afterwards, careless about his body and dress, and unlike other people, not mindful of the external world. On Sri Ramakrishna's request, he began singing a Brahmo song, 'Shortly after I sang the song; he suddenly rose and, taking me by the hand, led me to the northern veranda, shutting the door behind him. He said, 'Ah, you have come so late! How could you be so unkind as to keep me waiting so long! My ears are well nigh burnt by listening to the profane talk of worldly people.' The next moment he stood before me with folded hands and began to address me, 'Lord, I know you are that ancient sage, Nara, the incarnation of Narayana, born on earth to remove the miseries of mankind.'
Nara-Narayana is the twin-brother incarnation of the preserver-god Vishnu on earth, working for the preservation of dharma or righteousness. In the concept of Nara-Narayana, the human soul Nara (नरेंद्र) is the eternal companion of the Divine Narayana (श्रीरामकृष्ण).
The Hindu epic Mahabharata identifies god Krishna with Narayana and Arjuna - the chief hero of the epic - with Nara. The legend of Nara-Narayana is also told in the scripture Bhagavata Purana. Hindus believe that the pair dwells at Badrinath, where their most important temple stands.
Krishna and Arjuna are often referred to as Nara-Narayana in the Mahabharata and are considered part incarnations of Narayana and Nara respectively, according to the Bhagavata Purana.
In a previous life, the duo were born as the sages Nara and Narayana, and who performed great penances at the holy spot of Badrinath. Nara and Narayana were the Fifth Avatar of Lord Vishnu.
The twins were sons of Dharma, the son of Brahma and his wife Murti (Daughter Of Daksha) or Ahimsa They live at Badrika performing severe austerities and meditation for the welfare of the world. These two inseparable sages took avatars on earth for the welfare of mankind and to punish the wicked ones.
The sages defeated a demon called Sahasrakavacha ("one with a thousand armours"). Legend has it that once Lord Shiva tried to bring the fame of Nara and Narayana before the entire world. To do that, he hurled his own potent weapon Paashupathastra at the meditating rishis. 
 The power of their meditation was so intense that the astra lost it's power before them. Lord Shiva stated that this happened since the duo were jnanis of the first order constantly in the state of Nirvikalpa Samadhi.)
(Nara-Narayana (Sanskrit: नर-नारायण
{ " महाभारत का ३२० वाँ अध्याय आश्वमेधिक-पर्व " ( अर्जुन का श्रीकृष्ण से गीता का विषय पूछना - गीता प्रेस, गोरखपुर का चौंतीसवाँ पुनर्मुद्रण पृष्ठ संख्या- ६६७)  
इस प्रकार कहा गया है- '...अर्जुन ने यह वचन कहा, देवकीनन्दन ! जब युद्ध का अवसर उपस्थित था, ...मुझे जो ज्ञान का उपदेश दिया था, वह सब इस समय बुद्धि के दोष से भूल गया है. उन विषयों को सुनने के लिये बारम्बार मेरे मन में उत्कंठा होती है. ..अतः पुनः वह सब विषय मुझे सुना दीजिये....श्रीकृष्ण बोले-
अबुद्ध्या नाग्रहीर्यस्त्वं तन्मे सुमहदप्रियम्।
न च साद्य पुनर्भूयः स्मृतिर्मे सम्भविष्यति॥१०॥ 
....श्रीकृष्ण बोले- ...अब मेरे लिये उस उपदेश को ज्यों-का त्यों दुहरा देना कठिन है; क्योंकि उस समय योगस्थ होकर मैंने परमात्म-तत्व का वर्णन किया था. अब उस विषय का ज्ञान ज्ञान कराने के लिये मैं एक प्राचीन इतिहास का वर्णन करता हूँ.
सिद्ध ने कहा - " तात कश्यप ! मैंने तृष्णा से मोहित होकर अनेकों बार जन्म और मृत्यु का क्लेश उठाया है, .हे तात! विविध प्रकार के कर्मों से और केवल पुण्य कर्मों के योग से मर्त्य प्राणि या तो यहाँ (पृथिवी पर) या फिर देवलोक में जाते हैं। कहीं पर भी आत्यान्तिक सुख नहीं है। और न ही कहीं पर शाश्वत स्थिति है। बार बार अत्यन्त कठिनाई से प्राप्त स्थान से च्युति होती है। मेरे द्वारा काम और क्रोध से अभिभूत होकर, तथा तृष्णा से मोहित होकर, पाप का सेवन करने के कारण अशुभ योनियाँ भोगीं गईं हैं(मेरे द्वारा) बार बार जन्म (भोगा गया है) और बार बार मृत्यु (भोगी गई है)। विविध प्रकार के आहार भोगे गये हैं तथा नाना प्रकार के स्तनों से दुग्धपान किया गया हैहे अनघ! मेरे द्वारा विविध प्रकार की माताऐं, विमिन्न पिता, विचित्र सुख और दुःख देखे गए हैं। ..जिस तरह आँखवाले मनुष्य अँधेरे में इधर- उधर उगते -बुझते हुए खद्योत (जुगनुओं ) को देखते हैं, उसी प्रकार सिद्ध पुरुष अपनी ज्ञानमयी दिव्य दृष्टि से जन्मते-मरते तथा गर्भ में प्रवेश करते हुए जीव को सदा देखते रहते हैं.जीव के तीन स्थान- यह मर्त्यलोक भूमि, कर्मभूमि कहलाती है."..पुण्य कर्म करने वाले जीव स्वर्ग में पाप कर्म करने वाले कर्मानुसार नरक में पड़ते हैं. यह आवागमन की परम्परा बराबर लगी रहित है. (पेज-६६९) ...सदाचार (character -building )  से ही धर्म में अटल स्थिति होती है.


मुञ्जं शरीरं तस्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम्।
एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्भिरनुत्तमम्॥२२॥
..जैसे मनुष्य सपने में किसी अपरिचित पुरुष को देखकर जब पुनः उसे जाग्रत-अवस्था में देखता है तो तुरन्त पहचान लेता है की - ' यह वही है ! '. उसी प्रकार साधनपरायण योगी समाधि अवस्था में आत्मा को जिस रूप (सच्चिदानन्द-रूप ) में देखता है, उसी रूप में उसके बाद (वहाँ से लौट आने के बाद) में भी देखता है.  जैसे कोई मनुष्य मूँजसे सींक को अलग करके दिखा दे, वैसे ही योगी पुरुष आत्मा को इस देह से पृथक करके देखता है. यहाँ शरीर को मूँज कहा गया है और आत्मा को सींक. " (पेज-६७१) 
{विनय पत्रिकामे, भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं। श्री नर नारायण स्तुति
नौमि नारायणं नरं करुणायनं, ध्यान - पारायणं, ज्ञान - मूलं ।

अखिल संसार - उपकार - कारण, सदयहदय, तपनिरत, प्रणतानुकूलं ॥१॥


भावार्थः-- मैं उन श्रीनर - नारायणको नमस्कार करता हूँ, जो करुणाके स्थान, ध्यानके परायण और ज्ञानके कारण हैं । जो समस्त संसारका उपकार करनेवाले, दयापूर्ण हदयवाले, तपस्यामें लगे हुए और शरणागत भक्तोंपर कृपा करनेवाले हैं ॥१॥ 
पुण्य वन शैलसरि बद्रिकाश्रम सदासीन पद्मासनं, एक रुपं ।
सिद्ध - योगींद्र - वृंदारकानंदप्रद, भद्रदायक दरस अति अनूपं ॥५॥ 


जो पवित्र वन, पर्वत और नदियोंसे पूर्ण बदरिकाश्रम में सदा पद्मासन लगाये एकरुपसे ( अटल ) विराजमान रहते हैं । जिनका अत्यन्त अनुपम दर्शन सिद्ध, योगीन्द्र और देवताओंको भी आनन्द और कल्याणका देनेवाला है ॥५॥
हे विश्वम्भर ! वहाँ आपके बदरिकाश्रमके मार्गमें ' मनभंग ' नामक पर्वत हैं , ( जिसे देखकर लोग आगे साधनका उत्साह भंग हो जाता है; ) वहाँ ' चित्तभंग ' पर्वत है, तो यहाँ मद ही चित्तभंगका काम करता है; वहाँ जैसे कठिन - कठिन पर्वत हैं तो यहाँ काम - लोभादि कठिन पर्वत हैं । ( वहाँ जैसे हिंसक पशु आदि बड़े विघ्न हैं तो ) यहाँ राग, द्वेष, मत्सर आदि अनेक बड़े - बड़े विघ्न हैं, जिनमेसे प्रत्येक बड़ा निर्दय और राग, द्वेष, मत्सर आदि अनेक बड़े - ब्वड़े विह्न हैं, जिनमेसें प्रत्येक बडा निर्दय और कुटिल कर्म करनेवाला है ॥६॥
यहाँ कामिनीकी अत्यन्त बाँकी चितवन ही छुरेकी भयंकर धार और कामका विष ही तलवारकी ते धार है, जो बड़े - बड़े धीर और गम्भीर पुरुषोंके मनको पीड़ा पहुँचानेवाला है फिर हम - सरीखे निर्बलोंकी तो गिनती ही क्या है ? ॥७॥
हे नाथ ! प्रथम तो यह आपके दर्शनका मार्ग ही बड़ा कठिन है, फिर दुष्ट और नीचोंका ( मेरा ) साथ हो गया है, सहारेके लिये हाथमें वैराग्यरुपी लकड़ी भी नहीं है । यह दास आपके दर्शनके लिये घबरा रहा है, फंदेमें फँसकर दुःखी हो रहा है । हे नाथ ! दासके कष्टको दूरकर इसकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥८॥
मुझ दीन तुलसीदासके पास धर्मरुपी मार्ग - व्यय ( कलेवा ) भी नहीं हैं, मैं थककर बड़ा दुःखी हो रहा हूँ, मोहने मेरी बुद्धिका भी नाश कर दिया है, अतएव हे चक्रधारी ! आप तेज, बल और सुखकी राशि हैं, मुझे बिना विलम्ब अपने कर - कमलका सहारा दीजिये ॥९॥}
 दोनों हाथों को दोनों ओर सीधा फैलाकर एक हाथ के सिरे से दूसरे हाथ के सिरे तक की लंबाई के माप को नर कहते हैं। इसी माप को एक पुरूष भी कहते हैं। एक शिष्य ने पूछा- गुरूजी, हमने तो नर शब्द का अर्थ मनुष्य समझा है। क्या नर का अर्थ मनुष्य भी है?
आचार्य ने कहा- तुम ठीक कह रहे हो वत्स, नर शब्द का एक अर्थ मनुष्य भी है। पुरूष के अर्थ में भी नर शब्द रू ढ़ हैं जबकि पुर का अर्थ है परिधि, यानी शरीर और जो शरीर में रहता है, केन्द्र में रहता है, उस आत्मा को पुरूष कहते हैं। इसलिए वैदिक वांग्मय में पुरूष शब्द का अर्थ कोरा नर नहीं है। नर और नारी दोनों लिंगों के अर्थ में पुरूष शब्द आत्मा के अर्थ को ही प्रकट कर रहा है। परमात्मा और नित्य पुरूष के अर्थ में भी नर और नारायण शब्द का व्यवहार होता है।
आचार्य बोले- "श्वेताश्वतरोपनिषद्" में नर और नारायण के युगल भाव यानी जुगल जोड़ी की चर्चा मिलती है-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्ष परिषष्वजाते।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वžयनश्नन्नन्योùभिचाकशीति।
यानी दो पक्षी साथ-साथ मित्रभाव से सृष्टि रूपी वृक्ष का आश्रय लेकर रहते हैं। उनमें से एक वृक्ष के फल खाता है यानी भोग के फल खाता है और दूसरा केवल साक्षी-भाव में रहता है यानी फलों को और सखा पक्षी के भोग फल को प्राप्त करते हुए देखता है। इस रूपक में आत्मा और परमात्मा का सखा-भाव दिखाया है। दूसरी परिभाषा के अनुसार जीव और आत्मा दोनों शरीर में रहते हैं। जीव कर्मों के फलों का भोग करता है जबकि आत्मा साक्षी-भाव में जीव की प्रवृत्तियों को देखता है।
आचार्य ने बताया- "मनुस्मृति" नर शब्द का अर्थ मादा के विपरीत लिंगी नर के अर्थ में करती है। नर का एक अर्थ शतरंज का मोहरा भी है। धूप घड़ी की कील को भी नर कहते हैं। नर नामक एक ऋषि भी हुए हैं।
"भगवद्गीता" और "मनुस्मृति" के अनुसार नराधिप, नराधिपति नरेश्वर, नरपति और नरपालक नाम नारायण के माने गए हैं। नर-नारायण शब्द कृष्णवाची होने से मूलत: एक ही अर्थ में माना जाता है। पुराणों और महाकाव्यों में ही नर और नारायण के रू प में दो चरित्र सामने आते हैं। नर को अर्जुन का समरू प माना गया है और नारायण कृष्ण को कहा गया है। इस तरह नर-नारायण का युग्म यानी जोड़ा कृष्णार्जुन भी है। 
पशु जैसे मनुष्य को नर-पशु कहते हैं। "हितोपदेश" में कहा गया है- आहार, निद्रा, भय और मैथुन नर और पशुओं में समान रू प से पाया जाता है। मनुष्य में महज धर्म यानी कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक बोध हैं। अगर किसी आदमी के पास यह धर्म नही है, उसे नर-पशु ही कहा जाता है।
मर्दानी औरत यानी जिस औरत के पुरूषों की तरह दाढ़ी, मूंछ आते हैं उसे नरमानिका, नरमानिनी और नरमालिनी कहते हैं।
आचार्य बोले-   नर-मेध शब्द का अर्थ नरयज्ञ हैं। कलिकाल के दुष्प्रभाव के कारण नर-मेध का अर्थ नरबलि के रू प में लिया जाने लगा जबकि नर-मेध प्रतीकात्मक यज्ञ प्रक्रिया थी। इसका तात्पर्य मनुष्य के अहंकार का परमात्मा या इष्ट के सामने संपूर्ण समर्पण यानी अपने घमंडरू पी पशु भाव का बलिदान करना है। 
 "अनार्य मान्यता" के अनुसार आदमी अपने अहंकार के दमन के बदले दूसरे मनुष्य की बलि देने लगा। मघ्ययुग में यह प्रवृति जोर पकड़ने लगी। "कालिका" पुराण में इसकी चर्चा मिलती है। भवभूति ने अपने नाटक "मालतीमाधव" के पांचवें अंक में नर-मेध का नरबलि के रू प में वर्णन किया है। अघोरी अघोरघंट द्वारा नायिका की बलि करने की विभत्सता इस दृश्य मेंदिखाई देती है। कलिकाल में मूल अर्थ से भटक कर नरमेध और गोमेध के अर्थ हिंसापरक होने से शास्त्रकारों ने इन्हें वर्जित अनुष्ठान माना है। नरबलि शब्द जघन्य अपराध के अर्थ में ही सदैव देखा जाता रहा है।
आचार्य बोले- मनुष्य सृष्टि को नर-यान कहते हैं। आदमी द्वारा खींचे जाने वाली गाड़ी को नरवाहन कहते हैं। कोलकाता में इसका प्रचलन रहा है। "रघुवंश" के अनुसार कुबेर का एक विशेषण नरवाहन है। पराक्रमी मनुष्य को नरवीर और नरशार्दुल कहते हैं।
याज्ञवल्क्य के अनुसार मृत्यु को नरांतक कहते हैं। विष्णु का एक विशेषण नारायण है। राक्षस और पिशाच को नृशंस कहते हैं। चक्रवर्ती राजा को नरेंद्र कहा जाता है।
(वहाँ (ऋष्यमूक पर्वत पर) मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल की सीमा श्री रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर-----सुग्रीव अत्यंत भयभीत होकर बोले- हे हनुमान्‌! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके जाकर देखो। अपने हृदय में उनकी यथार्थ बात जानकर मुझे इशारे से समझाकर कह देना!!-----यदि वे मन के मलिन बालि के भेजे हुए हों तो मैं तुरंत ही इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँ (यह सुनकर) हनुमान्‌जी ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ गए और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे-॥
 को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा ॥
कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी॥4॥
-----हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं?॥
 मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता ॥
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ।-----नर नारायन की तुम्ह दोऊ॥ 
मन को हरण करने वाले आपके सुंदर, कोमल अंग हैं और आप वन के दुःसह धूप और वायु को सह रहे हैं क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश- इन तीन देवताओं में से कोई हैं या आप दोनों नर और नारायण हैं॥


जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।
की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥1॥
------अथवा आप जगत्‌ के मूल कारण और संपूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं भगवान्‌ हैं, जिन्होंने लोगों को भवसागर से पार उतारने तथा पृथ्वी का भार नष्ट करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार लिया है?

कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए॥
नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई॥1॥
------(श्री रामचंद्रजी ने कहा-) हम कोसलराज दशरथजी के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आए हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुंदर सुकुमारी स्त्री थी॥


इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥
आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥2॥
------भावार्थ:-यहाँ (वन में) राक्षस ने (मेरी पत्नी) जानकी को हर लिया। हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए ॥


प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥
पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना॥
------भावार्थ:-प्रभु को पहचानकर हनुमान्‌जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े (उन्होंने साष्टांग दंडवत्‌ प्रणाम किया)। (शिवजी कहते हैं-) हे पार्वती! वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता। शरीर पुलकित है, मुख से वचन नहीं निकलता। वे प्रभु के सुंदर वेष की रचना देख रहे हैं!॥


पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही॥
मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं॥
-------फिर धीरज धर कर स्तुति की। अपने नाथ को पहचान लेने से हृदय में हर्ष हो रहा है। (फिर हनुमान्‌जी ने कहा-) हे स्वामी! मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था, (वर्षों के बाद आपको देखा, वह भी तपस्वी के वेष में और मेरी वानरी बुद्धि इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थिति के अनुसार मैंने आपसे पूछा), परंतु आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं? 
तव माया बस फिरउँ भुलाना। ताते मैं नहिं प्रभु पहिचाना॥
मैं तो आपकी माया के वश भूला फिरता हूँ इसी से मैंने अपने स्वामी (आप) को नहीं पहचाना ॥


एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान॥2॥
-----------एक तो मैं यों ही मंद हूँ, दूसरे मोह के वश में हूँ, तीसरे हृदय का कुटिल और अज्ञान हूँ, फिर हे दीनबंधु भगवान्‌! प्रभु (आप) ने भी मुझे भुला दिया!॥
:जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥
नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥
एहे नाथ! यद्यपि मुझ में बहुत से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामी की विस्मृति में न पड़े (आप उसे न भूल जाएँ)। हे नाथ! जीव आपकी माया से मोहित है। वह आप ही की कृपा से निस्तार पा सकता है॥


आधुनिक भौतिक-विज्ञान के अनुसार ‘जल’ की उत्पत्ति ‘हाईड्रोजन+ऑक्सीजन’ इन दो गैसों पर विद्युत की प्रक्रिया के कारण हुई है। पौराणिक सिद्धान्त के अनुसार ‘वायु’ और ‘तेज’ की प्रतिक्रिया के कारण ‘जल’ उत्पन्न हुआ है। यदि वायु को गैसों का समुच्चय एवं तेज को विद्युत माना जाये तो इन दोनों ही सिद्धांतों में कोई अन्तर नहीं है। अतः जल की उत्पत्ति का पौराणिक सिद्धांत पूर्णतया विज्ञान-सम्मत सिद्ध होता है।


आधुनिक वैज्ञानिक आकाश, वायु तेज, जल और पृथ्वी को तत्व नहीं मानते। न मानने का कारण ‘तत्व’ संबंधी अवधारणा है। तत्व के सम्बन्ध में पौराणिक अवधारणा यह है कि जिसमें ‘तत्’ (अर्थात् पुरुष/विष्णु/ब्रह्म) व्याप्त हो, वह ‘तत्व’ कहलाता है। 
आधुनिक विज्ञान के अनुसार ‘तत्व’ केवल मूल पदार्थ (Element) होता है। वस्तुतः ‘तत्त्व’ और ‘तत्व’ में बहुत अन्तर है। ‘तत्त्व’ वास्तविक रूप में एक ‘भूत’ है। किन्तु तत्व या Element एक पदार्थ मात्र है। अतः यह भेद मात्र अवधारणा के कारण उत्पन्न हुआ है।

इस सम्बन्ध में ‘विष्णु पुराण’ का निम्नलिखित श्लोक दृष्टव्य है-


‘पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।
सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज् जगत्।।’
अर्थात्- पृथिवी, आपः (जल), तेज, वायु, आकाश, समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण इत्यादि जितना भी यह जगत् (गतिशील संसार) है, सब ‘पुरुष रूप’ है।
-श्री विष्णु पुराण/प्रथम अंश/अ.-2/श्लोक -68


महर्षि पाराशर का कथन है कि सृष्टि की रचना में भगवान् तो केवल निमित्त-मात्र हैं (क्योंकि) उसका प्रधान कारण तो ‘सृज्य पदार्थों’ की शक्तियाँ ही हैं। वस्तुओं की रचना में निमित्त मात्र को छोड़कर और किसी बात की आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि वस्तु (ह्रदय) तो अपनी ही (परिणाम या इच्छा ) शक्ति से ‘वस्तुता’ (स्थूलरूपता या मन और शरीर) को प्राप्त हो जाती है-


‘निमित्तमात्रमेवासौ सृ्ज्यानां सर्गकर्मणि।
प्रधान कारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः।।
निमित्त मात्रं मुक्त्वैवं नान्यक्तिञ्चिदपेक्षते।
नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्।।’
< -श्री विष्णु पुराण/प्रथम अंश/अ.-4/श्लोक 51-52


‘जल’ की उत्पत्ति के संबंध में एक अन्य पुरातन- अवधारणा भी विचारणीय है। लगभग सभी पुराणों और स्मृतियों में यह श्लोक (थोड़े-बहुत पाठभेद से) दिया रहता है जो इस अर्थ का वाचक है कि जल की उत्पत्ति ‘नर’ (पुरुष = परब्रह्म) से हुई है अतः उसका (अपत्य रूप में) प्राचीन नाम ‘नार’ है, चूंकि वह (नर) ‘नार’ में ही निवास करता है, अत: उस नर को ‘नारायण’ कहते हैं-


आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।।

-ब्रह्मपुराण/अ-1/श्लोक-38


विष्णुपुराण के अनुसार इस समग्र संसार के सृष्टि कर्ता ‘ब्रह्मा’ का सबसे पहला नाम नारायण है। दूसरे शब्दों में में भगवान का ‘जलमय रूप’ ही इस संसार की उत्पत्ति का कारण है-


जल रूपेण हि हरिः सोमो वरूण उत्तमः।
अग्नीषोममयं विश्वं विष्णुरापस्तु कारणम्।।

-अग्निपुराण /अ.-64/श्लोक 1-2


‘हरिवंश पुराण’ भी इसकी पुष्टि करता है कि ‘आपः’ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। ‘हरिवंश’ में कहा गया है कि स्वयंभू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से सर्वप्रथम ‘जल’ की ही सृष्टि की। फिर उस जल में अपनी शक्ति का आधीन किया जिससे एक बहुत बड़ा ‘हिरण्यमय-अण्ड’ प्रकट हुआ। वह अण्ड दीर्घकाल तक जल में स्थित रहा। उसी में ब्रह्माजी प्रकट हुए-


ततः स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्।।35।।
हिरण्य वर्णभभवत् तदण्डमुदकेशयम्।
तत्रजज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयंभूरिति नः श्रुतम्।। 37।।


इस ‘हिरण्यमय अण्ड’ के दो खण्ड हो गये। ऊपर का खण्ड ‘द्युलोक’ कहलाया और नीचे का ‘भूलोक’। दोनों के बीच का खाली भाग ‘आकाश’ कहलाया। स्वयं ब्रह्माजी ‘आपव’ कहलाये-


‘उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य ज्ञज्ञिरे।
आपवस्य प्रजासर्गें सृजतो ही प्रजापतेः।।49।।’


अर्थात्- इस प्रकार प्रजा की सृष्टि रचते हुए उन ‘आपव’ (अर्थात् जल में प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्मा के अंगों में से उच्च तथा साधारण श्रेणी के बहुत से प्राणी प्रकट हुए।


-हरिवंश/हरिवंश पर्व/प्रथम अध्याय}