Tuesday, May 4, 2010

" तंत्र विद्या की अद्भुत साधना " जीवन नदी के हर मोड़ पर -19

" मेरी प्रमातामही (पर-दादी) जगन्मोहिनी देवी "
हमलोगों  ने पहले पढ़ा है कि नित्यानद प्रभु खड़दह में किस प्रकार बाहर से आकर अपना निवासस्थान बनाये थे,और बाद में उनके ही पुत्र ने खड़दह में " श्याम " का मन्दिर बनवाया था,जिसका नाम है- " श्यामसुंदर का मन्दिर|" उसके बारे में भी लम्बा-चौड़ा इतिहास है, नित्यानन्द के पुत्र वीरभद्र ने स्वप्न में देख कर एक बड़े पत्थर से कृष्ण, काली और शिव की तीन मूर्ति बनवा कर तीन मन्दिरों में प्रतिष्ठित करवाया था|
[We decorate our(?) temple on puja days

[ Nityananda came to stay in Khardaha in 1522.  Virabhadra was born in 1535 in the Kunja Bati. His samadhi is there also. In 1570, Birbhadra received a large piece of stone from the Nawab, which was then carved into the Shyamasundar deity.
Shiromoni House One of the oldest Houses in Khardah. All the houses in its near vicinity are more or less relatives. Late Sanath Mukherjee was Amrita's and  Sourav's grandfather, whose houses u can locate nearby. One of the most well known families in Khardah. The Radhakanta Temple belongs to the family.]. One day, about A.D. 1520, two thousand and five hundred men and women, "all Mussulmans," hearing of the great teacher of love and mercy, had come to him there to receive discipleship, and been admitted by him into Hinduism, as the order of Nera-Neris, or the Shaven-hes and the Shaven-shes. The records called them Mussulmans because to the writers they were not recognisable as Hindus, and it had been long ago forgotten that there could be any other category outside orthodox society to which they could belong. But they were in fact Buddhists, and that memorable day in the life of Nityananda definitely marked the death of Buddhism in Bengal.
The Vaishnavite cult has left its mark on Khardah. Nityananda Prabhu, a disciple of Sri Krishna Chaitanya, had settled in a thatched hut here. It is now a humble brick structure known as Kunjabati.
His son Bir Bhadra Goswami had started the worship of Shyamsundar that 
 subsequently became the presiding deity of Khardah.
It is said that about 250 years ago, a woman named Pateswari Ma Goswami had raised the famous Shyamsundar temple, 
The temple compound has a large kitchen and natmancha, and close to the Hooghly banks are the ratha-shaped Rasmancha and Dolmancha. The sanctity of the Dolmancha has been violated by blocking the archway. Recent attempts at decorating the main temple with white panels depicting Krishnalila are quite appalling. Adjacent to the Shyamsundar temple is a smaller one dedicated to Madanmohan. Khardah is famous for its Ras and Dol celebrations.]

इस श्याम के मन्दिर में ठाकुर गये हैं, माँ गयी है | शायद इसीलिये ठाकुर और माँ के दो छोटे छोटे चित्र इस श्यामसुंदर मन्दिर के बरामदे में ऊपर ताखा में रखा हुआ है |ठाकुर भक्तों के बीच अक्सर चर्चा किया करते थे कि, इस अंचल में तीन जाग्रत देवता हैं| एक हैं, दक्षिणेश्वर की माँ भवतारिणी, कालीघाट की माँ काली, और खड़दह के श्यामसुंदर|यह कथन स्वयं ठाकुर-देव का है |इस मन्दिर में ठाकुर गये हैं, इतना ही नहीं, यह भी कहा है कि उस अंचल के तीन जाग्रत देवताओं में से एक - " खड़दह के श्यामसुंदर " भी हैं| 
एक दिन सुबह सुबह दक्षिणेश्वर में गंगा के किनारे एक नौका आकर लगी, नौका से कई लोग उतरे, ठाकुर लगता है कहीं निकट ही होंगे, वे उनलोगों से पूछे- " क्यों, इतनी सुबह-सुबह कहाँ चल दिये ? " उनलोगों ने बताया- ' हमलोग श्यामसुंदर का दर्शन करने खड़दह जा रहे हैं, सोंचे एकबार आपका भी दर्शन करते चलें ! ' 
ठाकुर बोले- " अच्छी बात है, जरुर जाओ, आज तुमलोग देखोगे कि वे बहुत सुन्दर कपड़ा पहने हैं, जिसके पाढ़ (किनारे) में डिजाइन- दार नक्शा बना हुआ हैं| और माथे कि पगड़ी में बहुत सुन्दर सा एक मोर का पंख लगाये हुए हैं! " 
उनलोग वहाँ जाकर देखे कि सचमुच बहुत सुन्दर नक्काशी किया हुआ, बहुत चौड़े पाढ़ का धोती पहने हैं और माथे पर एक नया सा ' मयूर-पंख ' भी लगा हुआ है!

Shyam Sundar in our (?)temple 
at Khardah
The deity is being worshipped for 500 years
The founder was Birabhadra Pribhu, the son of Lord Nityananda.

इस मन्दिर के अतिरक्त हमलोगों के घर के नजदीक में ही ' राधाकान्त देव ' -  का मन्दिर भी है ! खड़दह का श्यामसुंदर मन्दिर - नित्यानन्द प्रभु के समय का है, जिसका अर्थ हुआ कि यह मन्दिर लगभग ५५० वर्ष पुराना है ! किन्तु " राधाकान्त " तो ७५० वर्ष पुराने हैं! ये कहीं अन्यत्र थे, वहाँ से यहाँ आये हैं ! येही हमलोगों के " कुल-देवता " हैं ! यहाँ का मन्दिर बहुत बाद में निर्मित हुआ है | जो हमलोगों के घर के निकट में ही है|
हमलोगों का कुल श्री हर्ष के वंश-परम्परा से आता (बिलोंग करता) है, श्री हर्ष की जो वंशावली है उसमें एक नामी परिवार है| उसको लोग ' शिरोमणि परिवार ' के नाम से जानते हैं| उस वंश के एक व्यक्ति ने ' शिरोमणि ' की उपाधि प्राप्त की थी|
उसी शिरोमणि परिवार से कम से कम दो व्यक्ति दूसरे क्षेत्र में भी बहुत ऊँचा पद प्राप्त किये हैं|एक व्यक्ति कलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हुए थे, दूसरे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हुए थे|
उस समय- अर्थात पितामह के जमाने में खड़दह में बहुत सारे संस्कृत के टोल (पाठशाला) हुआ करते थे| उनलोगों ने तो प्रेसिडेन्सी कॉलेज तक की पढाई पूरी की थी, इसलिए उनलोगों के संस्कृत अध्यन करने का तरीका दूसरे प्रकार का था| हमलोग एक बहुत हँसी की बात सुनते थे | 
घर के सामने सीमेन्ट के दो ऊँचे बेंच बने हुए थे, वहाँ पर बहुत से लोग अक्सर बैठते थे| वहाँ पर उम्रदराज लोगों के साथ साथ उनदिनों कमउम्र के लोग भी बैठा करते थे| वहाँ के जो लोग कलकाता में पढने जाते थे, उनलोगों को विद्यासागर महाशय (ईश्वर चन्द्र विद्यासागर) द्वारा लिखित ' व्याकरण कौमुदी ' पढाया जाता था| 
जो लोग टोल में संस्कृत पढ़े हैं, उनसे एक दिन अन्यभाव से संस्कृत पढ़े हुए लोगों ने पूछा- " जरा बताओ तो कि ' भू ' धातु का ' लट ' में क्या कहा जायेगा ?"टोल में पढ़े छात्रों ने बहुत से सूत्र को स्मरण किया, काफी सोंच-विचार करने के बाद बोले- ' भूति ' होगा| 
सभी व्यस्क लोग हो हो करके हंस पड़े ! जिन लोगों ने विद्यासागर महाशय की लिखी संस्कृत -व्याकरण की पुस्तक ' व्याकरण कौमुदी ' को पढ़ा है, वे लोग तो ' शब्दरूप ' और ' धातुरूप ' में पारंगत होंगे ही ! उनलोगों ने सुधार करते हुए कहा, भू- धातु का लट ' भवति ' होगा; ' भूति ' नहीं होगा | उनदिनों बुद्धिमान लोगों का समय इसी प्रकार- " काव्यशास्त्र विनोदेन " बीता करता था|
उस समय का खड़दह बिल्कुल एक(पल्लिग्राम) नीरा गाँव था| वहाँ अन्य भी कई चीजें थी| तब घर मकान इतने अधिक नहीं थे, बहुत कम थे, अधिकांश जमीन धान के खेत से भरा हुआ था|हमलोगों का मकान बैरकपुर ट्रंक रोड से प्रवेश करने पर जो प्रथम मोहल्ला आता है, उसी मोहल्ले में था| और चारों ओर हरे-भरे धान के खेत ही दिखाई देते थे| घर के दोनों ओर जजों का और अधर दास का तालाब हुआ करता था| अभी जहाँ अस्पताल है, वहाँ एक मिट्टी का टिल्हा था| एक समय वहीं पर " पूँटे की माँ " नामक एक बूढी का घर था|
उस समय वहाँ भी नाटक, अभिनय, आदि का प्रचलन था| पितामह और उनके अग्रज ने मिल कर एक नाटक-मन्डली का गठन किया था| उस नाटक मन्डली का नाम दिये थे - " प्रमीथियन थियेटर "| वहाँ पर अभिनय होते, गीत संगीत, आदि हुआ करते थे|पितामह के अग्रज एक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट (यन्त्र) बजाया करते थे| और पितामह गाने गाया करते थे|गाना गाने में उनको अच्छी महारत हाँसिल थी| 
उनकी माँ जगन्मोहिनी देवी भी उनसे बीच-बीच में गाना सुनना चाहतीं थीं| एक दिन घर के सामने वाले बरामदे में बैठ कर पितामह को एक गाना गाने के लिये बोलीं|वे गिरीश घोष की रचना का गान करने लगे- 
" हाम दे पालाय पाछू फिरे चाय, रानी पाछे तोले कोले |" (" घुटरुन चलत रेणु तन मण्डित,मुख दधि लेप किये "- सूरदास )इस गाने को सुन कर उनकी माँ कहती हैं-" यह देखो, गोपाल कैसे घुटनों के बल चलता हुआ आ रहा है !" इस प्रकार की अनेकों घटनाएँ घटी हैं!मेरी प्रमातामही (पर-दादी) जगन्मोहिनी देवी, असाधारण आध्यात्मिक शक्तिसम्पन्ना एक साध्वी महिला थीं
यदि माँ ही गुरु हों-  तो घटनाक्रम के अनुसार तन्त्र शास्त्र के मत में उसे ही श्रेष्ठ स्तर की तंत्र विद्या कहा गया है| मेरे पितामह की गुरु उनकी माँ ही थीं, एवं उनसे कई प्रकार की साधनाएँ करवाईं थीं ! यहाँ तक की बहुत सी तान्त्रिक साधनाएँ भी करवाईं थीं ! 
बेल के वृक्ष के तालाब के सामने बेल के पेंड़ के नीचे जो शिव हैं, उनकी प्रतिष्ठा भी उन्होंने ने ही किया था|ऊपर के पूजा-घर में माँ काली की प्रतिष्ठा भी उन्होंने ने ही किया था! पितामह को बेल के पेंड़ के नीचे शिव के निकट बैठाकर, और ऊपर ( खिड़की पर खड़ी होकर) से निर्देश देते हुए तन्त्र की बहुत सारी साधनाएँ करवाईं थीं| एक विशेष साधना का प्रशिक्षण देते समय ऊपर से बोल रही हैं- " राधायन्त्र एंके आगे पूजो करे निये एई तन्त्रेर साधनाटी करो ! " (- अर्थात राधायन्त्र की पूजा पहले करके फिर शिवजी के पास तन्त्र का साधना करने का निर्देश दे रही हैं|) 
इस प्रकार पितामह के जीवन में सबकुछ अद्भुत था !जिस समय वे आन्दुल स्कूल में कार्यरत थे, तब वहाँ पर भी कई आश्चर्य-जनक घटनाएँ घटती रहतीं थीं;  जिसके विषय बहुत थोड़े से लोग ही जान पाते थे| रात्रि के समय  कुछ तान्त्रिक लोग न जाने कहाँ कहाँ से आकर वहाँ पर बैठा करते थे| बहुत सारे तन्त्र को लेकर चर्चाएँ होतीं थीं| तान्त्रिक धर्म-चक्र बैठकें भी होतीं थी| एक दिन की घटना - अत्यन्त आश्चर्य पूर्ण है!
उस घटना का, किसी के पास जिक्र करते समय हमने उनके ही मुख से सुना था|हमलोग इसी प्रकार वह सब वृतान्त सुना करते थे| ऐसा नहीं था कि, वे स्वयं हमलोगों को वह-सब  सुनाया करते हों|उनके पास बहुत सारे लोग आते रहते थे, कई विषयों पर बातचीत होती रहती थी, उस समय हमलोग वह सब दूर से (निकट वाले कमरे में बैठ कर) सुन लेते थे|
एक दिन, बहुत रात्रि-काल बीत जाने के बाद वे उस आन्दुल स्कूल से बाहर निकले, उससमय किन्तु आन्दुल-मौड़ी भी बिल्कुल एक गाँव के ही जैसा था| अधिकांश क्षेत्र वन-जंगल से भरपूर था, किनारे से सरस्वती नदी प्रवाहित रहती थी | हमलोगों को यह भी याद है कि, सरस्वती नदी के किनारे-किनारे से चलते हुए ही हमलोग भी स्कूल आते-जाते थे| 
 उस दिन, मध्य रात्रि में पैदल चलते चलते पितामह न जाने कितनी दूर निकल आये हैं, और यह भी पता नही चला कि वे कहाँ पहुँच गये हैं- हठात एक जगह पर एक ' शव '(मुर्दा) पड़ा हुआ दिखाई देता है! वे उसी शव के ऊपर बैठ कर उस रात्रि में ' शव-साधना ' करते हैं। किन्तु शव-साधना करने के बाद उनके मन में यह विचार उठा कि, अभी तुरन्त ही अपने गुरु के पास जाना होगा ! अर्थात उसी समय उनको अपनी मातृ-देवी के पास खड़दह जाना ही पड़ेगा| साथ ही साथ उनके मन में यह भावना भी उठी  कि, " घर में घुसते ही बस एक बार ' माँ ' कह कर पुकारूँगा, और माँ यदि मेरी पुकार सुनते ही सामने नहीं दिखाई दी य़ा उनका कोई उत्तर न आया तो- यह शरीर और बचेगा नहीं - वहीं गिर कर नष्ट हो जायेगा !"
इस प्रकार आन्दुल स्कूल से निकल कर पैदल ही चलते हुए, खड़दह- जा पहुँचे! घर में प्रवेश करते ही, सीधा प्रवेश किया जा सकता है, किन्तु सामने ही एक छोटा दीवार जैसा उठा हुआ है, अभी भी वैसा ही है, इसीलिये बाहर से भीतर का पूरा हिस्सा देखा नहीं जा सकता है| वे घर के भीतर प्रवेश कर बाहर के दरवाजे से पूजा का दालान पारकर जब घर में प्रविष्ट हुए तो एक बार ' माँ ' कह कर पुकारे| 
एक बार जैसे ही ' माँ ' कह कर आवाज दिये, तो देखते हैं कि माँ एक तुरन्त का कटा हुआ एक डाभ के मुख ढँक कर हाँथ में लिये हुए वहाँ खड़ी हैं ! और कह रही हैं- " लो मेरे बेटे, इसे पी लो "! पितामह की गुरु और अपनी माँ कैसे यह जान गयीं कि माँ कहकर एक बार आवाज लगाने के बाद यदि वे उसको नहीं दिखाई देंगी तो उनका शरीर वहीं गिर जायेगा ? और कैसे वे पहले से हाथ में एक डाब के मुख को काट- छिल कर ढँक कर खड़ी हैं ? एवं पितामह किस प्रकार आन्दुल से पैदल चल कर इतनी दूर खड़दह आ पहुँचे हैं? माँ यह कैसे जान गयी कि रात्रि में उन्होंने शव-साधना किया है ? और जैसे ही उन्होंने ' माँ ' कह  कर आवाज लगायी, कि माँ ने सामने आकर उनके हाथ में डाभ पकड़ा दिया? इन बातों की कल्पना भी नहीं की जा सकती, किन्तु यह सब सचमुच घटित हुआ है !    
                  

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